दिल्ली चुनावः ऑटो वाले अरविंद केजरीवाल को लेकर क्या कह रहे हैं?

- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मयूर विहार टीएसआर (थ्री सीटर रिक्शा) स्टैंड पर क़रीब 10 ऑटो सवारी के इंतज़ार में खड़े हैं. खाली ड्राइवर गप्पे मार रहे हैं.
दिल्ली चुनाव के बारे में पूछने पर सभी एक सुर में कहते हैं, “आएंगे तो केजरीवाल ही.”
इस स्टैंड से जुड़े क़रीब 30 में से अधिकतर ड्राइवर आम आदमी पार्टी के समर्थक हैं. इन सबकी राय एक जैसी है.
सभी मुफ़्त में बिजली और पानी देने की नीति से ख़ुश हैं और सबकी शिकायत भी एक जैसी ही है.
ऑटो चलाते-चलाते बुज़ुर्ग हो गए हाशिमुल्लाह कहते हैं, “ऑटो ड्राइवरों की ज़िंदगी पहले से मुश्किल हुई है. पहले जितनी कमाई नहीं है लेकिन जहाँ तक वोट का सवाल है, हम पहले भी केजरीवाल के थे, अब भी हैं.”
हाशिमुल्लाह की बात को आगे बढ़ाते हुए दिनेश पाल कहते हैं, “हमें लगता है कि हम जैसे ग़रीब लोगों के लिए वही सबसे ठीक हैं.”
दिनेश पाल के लिए कमाई के लिहाज से आज का दिन अच्छा नहीं है. उन्हें ऑटो लेकर निकले दो घंटे हो चुके हैं लेकिन दोपहर 12 बजे तक वह सिर्फ 60 रुपए ही कमा सके हैं.
दिनेश पाल कहते हैं, “कमाई पहले से कम हुई है, महंगाई की मार अलग. हालात मुश्किल हैं लेकिन फ्री बिजली-पानी से कुछ राहत है.”

बिहार के दिनेश क़रीब 20 साल से दिल्ली में ऑटो चला रहे हैं. उनका कहना है कि कमाई के लिहाज से ये उनके लिए सबसे मुश्किल वक़्त है.
दिनेश बात पूरी कर ही रहे थे कि देवीलाल यादव का ऑटो रुकता है. हाल पूछते ही वो कहते हैं, ‘हाल ना पूछे बहुत परेशान हैं. सुबह से निकला हूं, सवारी ही नहीं मिल रही है, अब तक सिर्फ़ 400 रुपए का काम किया है.”
पिछले दो चुनाव में आम आदमी पार्टी को वोट देने वाले देवीलाल का मन इस बार बदल गया है. वो कहते हैं, “10 साल किसी को परखने के लिए ये लंबा वक़्त है. केजरीवाल मेरी उम्मीद पर खरे नहीं उतरे.”
देवीलाल के आने पर एक और ड्राइवर जो अब तक ख़ामोश थे, कहते हैं, “मन तो इस बार हमारा भी बदल गया है.”
संख्या से अधिक प्रभाव
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अधिकतम एक लाख तीपहिया ऑटो चल सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में एक लाख से अधिक ऑटो के लाइसेंस पर रोक लगाई हुई है.
कई ऑटो को दिन में दो ड्राइवर अलग-अलग शिफ्टों में चलाते हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली में क़रीब डेढ़ लाख ऑटो ड्राइवर हैं. मोटा-मोटा अनुमान लगाया जाए तो ऑटो से जुड़े लोगों के परिजनों को मिलाकर क़रीब पांच-छह लाख वोट दिल्ली में होंगे.
लेकिन ऑटो चालकों का प्रभाव इस संख्या से कहीं अधिक है. पीले रंग के ये ऑटो सड़कों पर अलग ही नज़र आते हैं. ये परिवहन ही नहीं प्रचार भी करते हैं.
यही वजह है कि दिल्ली में ऑटो चालक सिर्फ़ वोट बैंक ही नहीं हैं बल्कि ये ख़ास राजनीतिक प्रभाव भी रखते हैं
अगर पिछले चुनावों को देखा जाए तो ऑटो चालकों का बड़ा वर्ग खुलकर आम आदमी पार्टी का समर्थन करा रहा है.

इमेज स्रोत, @ArvindKejriwal
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन के बाद जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी का उदय हुआ था तो ऑटो चालक पार्टी के थे.
ऑटो पर केजरीवाल के समर्थन में पोस्टर या झाड़ू का चुनाव चिह्न दिखना कोई हैरान करने वाली बात नहीं थी.
आम आदमी पार्टी ने भी ऑटो चालकों को अपने साथ रखने के लिए भरसक कोशिश की. पार्टी में अलग से ऑटो विंग भी स्थापित किया गया.
यही नहीं, पार्टी के नेताओं के बयानों में भी ऑटो चालकों को जगह मिलती रही.
इस साल के विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए अरविंद केजरीवाल ने एक ऑटो चालक के घर अपने परिवार सहित खाना भी खाया था.
दिल्ली में ये धारणा हैं कि अधिकतर ऑटो चालक आम आदमी पार्टी के साथ ही हैं.
क्या बदल रहा है ऑटो चालकों का मन?

मयूर विहार स्टैंड पर ऑटो चालकों से बात करते हुए मज़बूत हुई ये धारणा नेहरू एन्कलेव मेट्रो स्टेशन के पास बने ऑटो स्टैंड के ड्राइवरों से बात करते हुए टूट जाती है.
यहां सभी ड्राइवर एक सुर में आम आदमी पार्टी का विरोध करते हैं. इनमें कैपिटल ड्राइवर्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन से जुड़े चंदू चौरसिया भी हैं.
चौरसिया कहते हैं, “जब आम आदमी पार्टी आई तो हम सब चालकों ने खुलकर पार्टी का समर्थन किया. हमें लगा था कि हमारे बीच से निकलकर लोग आए हैं, हमारी हितों की बात करेंगे. हमारी ज़िंदगी में सुधार आएगा लेकिन हमारी उम्मीदें पूरी नहीं हुई.”
चौरसिया कहते हैं, “हो सकता है, मैं व्यक्तिगत स्तर पर आम आदमी पार्टी का समर्थन कर भी दूं लेकिन सवाल ये है कि हमारे साथ जुड़े अधिकतर ड्राइवर पार्टी का विरोध कर रहे हैं. इसलिए मैं भी उनसे अलग नहीं हो सकता.”
कारण बताते हुए चौरसिया कहते हैं, “इस इलाक़े में ट्रैफ़िक जाम बड़ी समस्या है. अवैध पार्किंग की वजह से सड़कें तंग रहती हैं. इसके अलावा ई-रिक्शा बड़ी तादाद में हैं, जिनकी वजह से ऑटो की सवारी कम हो रही है. रही-सही कसर बाइक टैक्सी ने पूरी कर दी है. अकेली सवारी अब ऑटो में बैठती ही नहीं.”
इस स्टैंड पर काम कर रहे अधिकतर ऑटो ड्राइवर बिहार और उत्तर प्रदेश से आकर दिल्ली में बसे हैं.
बाइक टैक्सी से बढ़ गई प्रतिद्वंद्विता

राजधानी दिल्ली में कई ऐप आधारित टैक्सी कंपनिया बाइक टैक्सी की सुविधा देती हैं.
इन बाइक के लिए कॉमर्शियल रजिस्ट्रेशन होना अनिवार्य नहीं हैं. यानी कोई भी व्यक्ति, वैध ड्राइविंग लाइसेंस के साथ, अपनी निजी बाइक से भी सवारी बुक कर सकता है.
हालांकि, मई 2023 में दिल्ली सरकार ने निजी बाइक के टैक्सी इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस प्रतिबंध को जारी रखा था.
वहीं इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के बाइक टैक्सी को लेकर नीति बनाने तक प्रतिबंध को जारी रखा था.
दिल्ली सरकार ने नवंबर 2023 में दिल्ली मोटर व्हीकल एग्रीगेटर और डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर स्कीम 2023 लागू की थी जिसके तहत दिल्ली में सिर्फ ई-बाइक ही टैक्सी में इस्तेमाल हो सकेंगी और डीज़ल और पेट्रोल वाहनों को चरणबद्ध तरीके से चलन से बाहर किया जाएगा.
फिलहाल दिल्ली में कितनी बाइक टैक्सी चल रही हैं, इसका सटीक आंकड़ा नहीं है लेकिन अनुमानों के मुताबिक़ इनकी संख्या 70 से 80 हज़ार तक हो सकती है.
दिल्ली के ऑटो चालकों को लगता है कि ये बाइक टैक्सी उनके हिस्से की सवारी ले रही हैं.
'फ़्री में कुछ नहीं चाहिए...'

नेहरू एन्कलेव मेट्रो स्टेशन ऑटो स्टैंड से जुड़े चालक हरि प्रसाद कहते हैं, “शेयर्ड सवारी ई-रिक्शा में चली जाती है, अकेली सवारी बाइक टैक्सी वाले ले जाते हैं, हमारे लिए दिन के पांच सौ रुपए कमाना भी मुश्किल हो गया है.”
मूलरुप से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के रहने वाले हरि प्रसाद सड़कों की हालत और जाम को लेकर सबसे ज़्यादा नाराज़ हैं.
वह कहते हैं, “हमारे इलाक़ों में सड़के ऐसी हैं कि महीने भर में हैंडल हिल जाता है. अधिकतर समय सवारी के इंतज़ार में बीतता है, सवारी मिलती है तो जाम में फंस जाते हैं.”
सरकार से मांग करते हुए वह कहते हैं, “हमें फ्री में कुछ नहीं चाहिए. हम भिखारी नहीं हैं. हम बस ये चाहते हैं कि सड़के अच्छी हों, हमारे बच्चों के लिए स्कूल अच्छे हों और इलाज के लिए फ्री अस्पताल हों.”
यहां मौजूद कई अन्य ऑटो ड्राइवर इसी तरह की राय ज़ाहिर करते हैं.

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ऑटो चालकों की राय बँटी हुई है. लेकिन यहां भी ऐसे ड्राइवरों की संख्या अधिक है जो अब आम आदमी पार्टी के साथ नहीं हैं.
अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए एक चालक ग़ुस्से में कहता है, “हमने ही अरविंद केजरीवाल को जिताया था, हमारे ही पेट पर लात पड़ गई. हम ऑटो पर पोस्टर लगाकर घूमते थे, केजरीवाल का प्रचार करते थे, लेकिन अब हम अपना घर तक नहीं चला पा रहे हैं. डीटीसी में महिलाओं के लिए फ्री टिकट है, जो महिलाएं ऑटो में बैठती थीं अब वो फ्री में बस में जाती हैं.”
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने डीटीसी (दिल्ली परिवहन निगम) की बसों में सभी महिलाओं के लिए यात्रा फ्री की है.
कई ऑटो ड्राइवरोें को ये लगता है कि इसका सीधा असर उनके काम पर हुआ है.
एक ड्राइवर केजरीवाल सरकार की खामियां गिना ही रहा होता है कि कई ड्राइवर मज़ाकिया लहज़े में कहते हैं, “कुछ भी कह लो, कुछ भी कर लो दिल्ली में आएगा तो केजरीवाल ही.”
केजरीवाल का समर्थन करने वाले ये ड्राइवर एक सुर में कहते हैं, "केजरीवाल ने ऑटो वालों के लिए जो किया है वो अब तक किसी ने नहीं किया."
2013 में जब आम आदमी पार्टी आई थी, तब से लेकर अब तक दिल्ली में ऑटो चालकों के लिए बहुत कुछ बदल गया है.
तब सीएनजी 46 रुपए प्रति किलो थी, अब दाम 75 रुपए प्रति किलो हैं. अब डीटीसी में महिलाओं के लिए यात्रा फ्री है. केजरीवाल ने दिल्ली मेट्रो में छात्रों के लिए आधा टिकट करने की घोषणा भी कर दी है.
वहीं दिल्ली मेट्रो नेटवर्क में भी बड़ा विस्तार हुआ. इसके अलावा ऐप आधारित कैब और बाइक टैक्सी की सुविधा भी अब उपलब्ध है.
इन हालात में अब ऑटो के लिए प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई है, जिसका सीधा असर ऑटो चालकों के काम पर नज़र आता है.
ऑटो चालकों का संघर्ष

मुरारी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सवारी के इंतज़ार में खड़े हुए. शाम होने वाली है और उनकी जेब में दो सौ रुपये से भी कम है.
जेब से पैसे निकालकर दिखाते हुए मुरारी कहते हैं, “सुबह से चार सौ का काम किया है. आधे पैसे सीएनजी गैस और खाने में खर्च हो गए. जेब में 200 रुपये भी नहीं हैं.”
मूलरूप से बिहार के रहने वाले मुरारी दिल्ली में 22 साल से ऑटो चला रहे हैं. वो किराये पर ऑटो लेकर चलाते हैं. ऑटो ना ख़रीदने के सवाल पर वो कहते हैं, “अपना ऑटो लिया था लेकिन किस्त जमा नहीं कर पाया. ऑटो फाइनेंसर ले गया.”
मुरारी के पाँच लोगों का परिवार किराए के एक छोटे कमरे में रहता है. ख़र्च चलाने के लिए उनकी आमदनी नाकाफ़ी है. पत्नी सिलाई करके हाथ बँटाती है.
एक कमरे के घर में पांच लोगों के सोने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है. चार लोग बेड और एक नीचे सोते हैं.
मुरारी का नाबालिग़ बेटा पढ़ाई छोड़कर एक दुकान पर मज़दूरी करने के लिए मजबूर है.
दीवार पर ट्रोफ़ी लेते हुए उसकी तस्वीरें लगी हैं. कराटे चैंपियन बनने के उसके सपने अधूरे ही रह गए हैं.
भूख और ख़्वाहिशों की बीच फंसी ज़िंदगी

स्नातक कर रही मुरारी की बेटी के पास ना मोबाइल में डेटा है और ना पढ़ने के लिए किताबें.
वो किसी तरह पड़ोस से वाईफ़ाई लेकर फ़ोन पर वीडियो से पढ़ने की कोशिश कर रही है. बीच-बीच में सिलाई मशीन का शोर उसका ध्यान भंग कर रहा है.
उदास मन से मुरारी कहते हैं, “हम ऑटो चालकों की ज़िंदगी ऐसी ही है. ना पेट की ज़रूरत पूरी कर पा रहे हैं ना बच्चों के सपने.”
मुरारी कई महीनों से घर का किराया नहीं दे पाए हैं. बीच में मकान मालिक आते हैं तो वो जल्द ही किराया देने का वादा करते हैं.
मुरारी कहती हैं, "संघर्ष बच्चों का पेट भरने का है, ख़्वाहिशें पूरी करने तक हम पहुंच ही नहीं पाते हैं."
दिल्ली चुनावों से मुरारी को कोई उम्मीद नहीं हैं. उदास मन से वो कहते हैं, “केजरीवाल हों या नरेंद्र मोदी या दूसरे नेता. उन्हें ये सोचना चाहिए कि हम जैसे प्रवासी, जो हज़ारों किलोमीटर से पेट भरने के लिए दिल्ली आते हैं, किराये के छोटे घरों में रहते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं, उनके हालात ऐसे क्यों हैं?”
चुनावी वादे

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आम आदमी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस ने ऑटो चालकों के लिए कई वादें किए हैं. बीजेपी ने तो ऑटो चालक सुधार बोर्ड बनाने का वादा भी किया है. सभी दल बीमा, आर्थिक मदद और कई अन्य सुविधाएं देने का वादा कर रहे हैं.
आम आदमी पार्टी ने सरकार बनने पर ऑटो चालकों को दस लाख रुपए तक का बीमा, पांच लाख का दुर्घटना बीमा, बेटियों की शादी में आर्थिक मदद और बच्चों के लिए फ्री कोचिंग का वादा किया है.
बीजेपी ने भी ठीक ऐसे ही वादें किए हैं. वहीं कांग्रेस के घोषणा पत्र में ऑटो चालकों का ख़ास ज़िक्र नहीं है लेकिन पार्टी ने बेरोज़गार युवाओं और ग़रीब परिवारों को आर्थिक सहायता देने का वादा किया है.
दिसंबर में अरविंद केजरीवाल ने कहा था, "मैंने ऑटो वालों का नमक खाया है. मैं ऑटो वालों को अपने परिवार का हिस्सा मानता हूं. ऑटो वाले 2011 से मेरे साथ हैं, तेरह साल हो गए, ना उन्होंने मेरा साथ छोड़ा है और ना मैंने उनका."
दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा एक बयान में कहा, "केजरीवाल ने दस साल पहले भी ऑटो चालक वेलफेयर बोर्ड बनाने का वादा किया था. ये अभी तक नहीं बना."
वहीं अपने अधिकारिक एक्स हैंडल पर किए एक पोस्ट में बीजेपी ने कहा है, "एक समय था जब दिल्ली के ऑटो वालों ने केजरीवाल का समर्थन किया था लेकिन आज वो समझ गए हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है."
लेकिन मुरारी जैसे ऑटोचालकों का एक ही सवाल है कि क्या ये वादें पूरे होंगे और इनका फ़ायदा उन जैसे लोगों को मिल पाएगा?
वादों और दावों के चुनावी शोर में मुरारी जैसे ऑटो चालकों की आवाज़ दबी दिखाई देती है. उन्हें चुनावी वादों से ज़्यादा ज़रूरत अपने जीवन में सुधार की है.
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