पाकिस्तान में प्रधानमंत्री बनने के बाद नेता करते हैं ये एक ग़लती- ब्लॉग

    • Author, मोहम्मद हनीफ़
    • पदनाम, पत्रकार व विश्लेषक

जीवन में जो पहला उपन्यास अंग्रेज़ी में पढ़ा था और पूरा समझ आया था वह कोलंबिया के प्रसिद्ध लेखक गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ का था.

यह नॉवेल भी नहीं, नॉवेलेट था. स्पेनी भाषा से अंग्रेज़ी में अनुवाद हुआ था. माहौल बिल्कुल देसी लगा.

हीरो का नाम नसर था. शेष पात्र भी कुछ जाने पहचाने थे. शायद इसीलिए समझ भी आ गया और दिल को इतना छू गया कि उर्दू में अनुवाद करने की नाकाम कोशिश भी की.

'क्रॉनिकल ऑफ़ ए डेथ फोरटोल्ड' में एक छोटे से गांव में नसर का क़त्ल होने वाला है.

पूरा गांव जानता है कि आज नसर की हत्या होने वाली है. हत्यारे भी पूरे गांव को बताते फिर रहे हैं कि वह हत्या करने वाले हैं (शायद इस उम्मीद में कि उन्हें कोई रोक सके).

पूरे गांव को इस पूर्व घोषित मौत की ख़बर है, सिवाय नसर को, न कोई उसे बताता है, न बताने की कोशिश करता है.

आख़िर हत्या होकर रहती है और नसर अपने घर के दरवाज़े पर अपनी आंतें पकड़े अपने अंतिम शब्द बोलता है कि 'मां, उन्होंने मुझे मार दिया है.'

अल्लाह इमरान ख़ान की उम्र बड़ी करे, उन्हें जेल में वह सुविधाएं भी मयस्सर हों जो वह अपने विरोधियों से छीनना चाहते थे.

लेकिन यह कैसी गिरफ़्तारी है, कैसी सज़ा है, कैसी अयोग्यता है, जिसके बारे में पूरा देश जानता था कि आज हुई या कल हुई और इस पूर्व घोषित घटना को न पुराने ख़ानदानी, न नए क्रांतिकारी राजनेता और न वो लाखों युवा राजनीतिक कार्यकर्ता मिलकर रोक सके जो अपने पुराने धूल धूसरित इतिहास को पुनर्जीवित कर एक सुनहरे भविष्य के सपने देखने निकले थे.

...वो खुद को पीएम समझने लगता है

हमारे वह सयाने जिन्होंने जनरल बाजवा की डॉक्ट्रिन की दस वर्षीय योजना बता दी थी और वह जो 'यह कंपनी नहीं चलेगी' वाली नसीहत करते थे, उनमें से कोई भी इस घिसे पिटे स्क्रिप्ट को नया मोड़ नहीं दे सका.

सत्ता के गलियारों से कान चिपकाए हमारे विचार निर्माता भी बताते रहे कि नहीं, न अब संस्थाएं वैसी हैं और न ही इमरान ख़ान पुराने घाघ नेताओं जैसा है.

होश संभालने के बाद पहला प्रधानमंत्री जो देखा था उसका नाम मोहम्मद ख़ान जुनेजो था.

वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि जब उनके नाम का प्रधानमंत्री पद के लिए ऐलान हुआ तो वरिष्ठ पत्रकारों के भी वरिष्ठ पत्रकारों ने पूछा था, मोहम्मद ख़ान जुनेजो कौन?

इसके बाद वह एक अत्यंत शरीफ़ और सौम्य प्रधानमंत्री सिद्ध हुआ लेकिन अधिक देर तक चला नहीं.

प्रधानमंत्री चाहे गुमनाम हो, पाकिस्तान का एक ऐसा हीरो है जिसे बचपन से सब जानते हों, कोई संस्थाओं के हाथों से छीन कर सरकार ले, पिछले दरवाज़े से घुसकर वार्ता करे या उनके कंधों पर बैठकर आए, प्रधानमंत्री बनने के दो या तीन साल बाद एक ही ग़लती कर बैठता है.

वह अपने आप को प्रधानमंत्री समझने लगता है.

...जनरल सुजुकी कारों में बैठेंगे!

कुछ समर्थक भी समझाते होंगे, कुछ भला चाहने वाले हाथ भी जोड़ते होंगे कि आपसे पहले वाले ने भी यही किया था, आप करेंगे तो वही होगा जो पिछले वाले के साथ हुआ था.

अंतर केवल यह होगा कि कोट लखपत जाएंगे, अडयाला जाएंगे या अटक लेकिन सब करते वही हैं जो मोहम्मद ख़ान जुनेजो ने किया था.

जुनेजो मरहूम ने और भी कुछ किया होगा लेकिन एक बुनियादी ग़लती यह की थी कि संसद में एक बजट सत्र में भाषण देते हुए कह दिया था कि देश के आर्थिक हालात बहुत ख़राब हैं. अब हमारे जनरल भी सुज़ुकी कारों में बैठेंगे.

आज हमारी संस्थाओं (सेना) के सीनियर अधिकारियों और उनके नागरिक समकक्षों की गाड़ियों के मॉडल देखें तो अंदाज़ा होगा कि पता नहीं मोहम्मद ख़ान जुनेजो ने कौन सा नशा किया हुआ था कि हमारे बड़ों को सुज़ुकियों में बिठाने चला था.

नशा शायद मानसिक था कि जिसका एक हिलकोरा प्रधानमंत्री को आता है कि अंत में जनता का प्रतिनिधि हूं, कुछ करूं भी न, कम से कम नज़र तो आए कि कुछ कर रहा हूं.

हमारे बड़े विश्लेषक समझाते रहते हैं कि सिविलियन वर्चस्व बड़बोलेपन से नहीं मिलता, यह क़दम ब क़दम जद्दोजहद है, वार्ता से, अपने राजनीतिक विरोधियों से गठबंधन बनाकर, कुछ देकर, कुछ लेकर मिलता है.

कुछ लड़कर, कुछ मांगे तांगे की, कुछ संस्थाओं की मजबूरियों से हमारे सब निर्वाचित प्रतिनिधियों ने लोकतांत्रिक लगने वाला दिलासा दे रखा है कि आपको पूरे नहीं तो थोड़े बहुत नागरिक अधिकार ले कर देंगे.

मोहम्मद ख़ान जुनेजो और इमरान ख़ान

फिर संस्थाएं हिसाब किताब लेने पहुंच जाती हैं, जो पहले इतने अधिकार दे रखे हैं उसका तुमने क्या किया.

जनरल ज़ियाउल हक़ के मार्शल लॉ से हमें आज़ादी एमआरडी (मूवमेंट फ़ॉर द रेस्टोरेशन ऑफ डेमोक्रेसी) ने या मोहम्मद ख़ान जुनेजो ने नहीं दिलवाई, एक हवाई हादसे ने दिलवाई.

जनरल मुशर्रफ़ की वर्दी हमारे राजनेताओं ने नहीं दिलवाई, जनरल कियानी ने उनके हाथ से सेनापति वाला डंडा ही उचक लिया, जनरल बाजवा भी हमारे हाथ बांधने से घर नहीं गए, बस संस्था के अंदर उनका टाइम पूरा हो गया था.

संस्थाओं को अब तक इतनी समझ तो आ ही गई होगी कि अगर मोहम्मद ख़ान जुनेजो से लेकर शहबाज़ शरीफ़ तक हमारी शर्तों पर सब आने को तैयार हैं, और यह भी पता है कि तीन- साढ़े तीन साल साल बाद अपने आप को प्रधानमंत्री समझने लगेंगे तो वही करेंगे जो इससे पहले आने वाले के साथ किया था.

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का क़ाफ़िला जब गिरफ़्तारी के बाद फ़ुल स्पीड से जेल की तरफ़ रवाना हुआ तो पूर्व घोषित मौत का अंतिम दृश्य याद आ गया जब पूरे गांव को ख़बर होने के बाद आख़िर में नसर को एहसास होता है कि उसका क़त्ल होने वाला है, वह अपने घर की तरफ़ भागता है.

क़ातिल दरवाज़े तक पहुंच जाते हैं और वह दोनों हाथ से अपनी आंतें संभाले अपने दरवाज़े पर गिरता है और कहता है 'मां, मार दिया है उन्होंने मुझे.'

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