कर्नाटक में सीएम सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ मुक़दमा कांग्रेस के लिए कितना बड़ा संकट है?

कांग्रेस नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया

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    • Author, इमरान कुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी दे दी है. लेकिन ये घटना राज्य के सियासी गलियारों में हैरानी की बात नहीं है.

पिछले 10 साल से हर कोई इस बात को लेकर हैरान था कि केंद्र की बीजेपी सरकार ने सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ कोई मामला दर्ज करने के बारे में क्यों नहीं सोचा. जबकि ऐसा कई ग़ैर बीजेपी नेताओं और मुख्यमंत्रियों के साथ हो चुका है.

इसके बाद से बीजेपी नैतिक आधार पर सिद्धारमैया के इस्तीफ़े की मांग कर रही है.

वहीं कांग्रेस का कहना है कि सिद्धारमैया पर लगाए गए आरोप 'राजनीति से प्रेरित' हैं. सिद्धारमैया ने भी साफ कर दिया है कि वो पद से इस्तीफ़ा नहीं देंगे.

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क्या है मामला?

राजनीति में सिद्धारमैया का 40 साल के रिकॉर्ड पर तब तक कोई दाग़ नहीं लगा था, जब तक राज्यपाल के सामने उनके ख़िलाफ़ पहली याचिका दायर नहीं की गई.

राज्यपाल थावरचंद गहलोत के सामने सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ तीन शिकायतें हैं.

इन तीनों शिकायतों में कही गई एक आम बात ये है कि सीएम की पत्नी पार्वती बी.एम. को मैसूर के विजयनगर लेआउट में 14 जगहों पर ज़मीन दी गई थीं. ये उन्हें केसारे गांव में उनकी 3.16 एकड़ ज़मीन के बदले में दी गई, जिस पर एमयूडीए (मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथोरिटी, मूडा) ने अनधिकृत रूप से कब्ज़ा किया हुआ था.

आसान भाषा में कहें तो सीएम की पत्नी पार्वती के पास जो 3.16 एकड़ ज़मीन थी, उसे एमयूडीए ने विकास के लिए ले लिया था और मुआवज़े के तौर पर उन्हें मैसूर के महंगे इलाके़ में ज़मीन दी गई.

मुख्यमंत्री ने इस मामले में यह कहकर अपना बचाव किया है कि जगह के आवंटन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

उन्होंने कैबिनेट की बैठक के तुरंत बाद एक संवाददाता सम्मेलन में पूछा, "मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया है कि मुझे इस्तीफ़ा देना चाहिए."

कैबिनेट की बैठक में उनका पूरा समर्थन भी किया गया. जब तक कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सिद्धारमैया की भूमिका पर कोई फ़ैसला नहीं करता है, ज़ाहिर तौर पर सिद्धारमैया के सवाल पर तब तक बहस की जा सकती है.

हालांकि सत्ताधारी दल और विपक्ष के बड़े नेता और राजनीतिक विश्लेषक भी इस बात पर एकमत हैं कि सिद्धारमैया के पास जो नैतिक अधिकार था, "उसकी चमक धीमी पड़" गई है.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया

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सिद्धारमैया और कांग्रेस के लिए कितना बड़ा झटका?

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एनआईटीटीई एजुकेशन ट्रस्ट में एकेडेमिक्स के निदेशक प्रोफे़सर संदीप शास्त्री जानेमाने राजनीतिक समीक्षक हैं.

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "सिद्धारमैया जिस उत्साह और उर्जा के लिए जाने जाते थे, इस आरोप के सामने आने के बाद वह नज़र नहीं आ रहा है. जैसी उनकी छवि थी, वह अब बहुत धूमिल हो गई है."

"उनकी भाव-भंगिमा में स्थिरता कम दिख रही है. ज़ाहिर तौर पर राजनीतिक और व्यक्तिगत तौर पर उनके लिए यह एक झटका है."

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस मुद्दे पर प्रोफे़सर शास्त्री से असहमत भी नज़र आते हैं.

मैसूर विश्वविद्यालय में आर्ट्स विभाग के पूर्व डीन प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र असदी कहते हैं, "सवाल यह है कि क्या वह भ्रष्टाचार में शामिल थे. इस मामले से पता चलता है कि वह भ्रष्टाचार में शामिल नहीं थे. वो ख़ुद के भ्रष्ट होने का आभास नहीं देते हैं."

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर नारायण के मुताबिक़, "यह भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है, बल्कि तकनीकी मुद्दे से जुड़ा हुआ सवाल है."

"ये ऐसा मुद्दा नहीं जिससे आप उन्हें पूरी तरह हरा करें. हो सकता है कि इससे कुछ हद तक उनकी चमक फीकी पड़ गई हो, लेकिन ऐसा नहीं है कि पार्टी इससे लड़ नहीं सकती है. यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को कैसे भुनाती है."

वहीं मैसूर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफ़ेसर चंबी पुराणिक इस मुद्दे को अलग नज़र से देखते हैं,

उनका कहना है, "सिद्धारमैया बहुत क़ाबिल और मजबूत नेता हैं. उनमें सभी वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने की क्षमता है. वह साफ छवि के साथ सत्ता में आए थे लेकिन अब उन्हें दोहरे ख़तरे का सामना करना पड़ रहा है. यह उनके साथ-साथ उनकी पार्टी के लिए भी झटका है."

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया

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सिद्धारमैया क्यों महत्वपूर्ण हैं?

कर्नाटक में राजनीतिक विश्लेषक और यहां के राजनीतिक हलकों में आमतौर पर यह मानते हैं कि सिद्धारमैया पिछड़े वर्गों के नेता हैं.

डी देवराज उर्स ने ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यकों के लिए जिस सामाजिक धुरी विकसित किया था, उसे सिद्धारमैया ने फिर से प्रज्वलित किया.

उनके इस विलक्षण अभियान ने उनके क़द को इतना बड़ा कर दिया कि जब जनता दल सेक्युलर उन्हें पार्टी से बाहर निकाल दिया था, तब कांग्रेस ने उन्हें पार्टी में शामिल होने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था. उनके शब्दों में ‘अहिंदा’ अल्पसंख्यकों, ओबीसी और दलितों के लिए कन्नड़ भाषा में छोटा नाम है.

राजनीतिक जानकार इस बात पर सहमत नज़र आते हैं कि राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर सिद्धारमैया का क्या महत्व है और उन्हें क्यों निशाना बनाया गया है.

प्रोफेसर मुज़फ़्फ़र असदी कहते हैं, "यह बिल्कुल स्पष्ट है कि बीजेपी सिद्धारमैया को इसलिए भी निशाना बना रही है क्योंकि वो राहुल गांधी के क़रीबी हैं. हमें नहीं भूलना चाहिए कि राहुल गांधी लगातार बीजेपी पर हमला बोल रहे हैं."

प्रोफे़सर शास्त्री कांग्रेस के लिए सिद्धारमैया के महत्व की कई वजह बताते हैं.

वो कहते हैं, "वास्तव में कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का एक सुरक्षित विकल्प चुना, क्योंकि उन्हें उस समय नेतृत्व करने के लिए बड़े कद के नेता की ज़रूरत थी. कांग्रेस के नियंत्रण वाले राज्य ख़त्म होते जा रहे थे. सिद्धारमैया न केवल ओबीसी का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि पिछड़ी जातियों के सशक्तिकरण के आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं.''

प्रोफे़सर शास्त्री के मुताबिक़, "यह फ़ैसला राहुल गांधी के बीजेपी पर हमले के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी की एकता को आगे बढ़ाने के बड़े एजेंडे में शामिल हो गया. नहीं तो यह उस धारणा को धूमिल कर देगा जो राहुल गांधी बना रहे हैं या जिस तरह से जाति जनगणना के मुद्दे पर बीजेपी पर हमला कर रहे हैं."

प्रधानमंत्री मोदी के साथ कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत (फ़ाइल फ़ोटो)

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क्या सिद्धारमैया को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए?

प्रोफे़सर शास्त्री 2023 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनावों के चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण की ओर भी इशारा करते हैं.

उनके मुताबिक़, राज्य में पिछड़े वोट को बीजेपी ने धीरे-धीरे काट लिया और ओबीसी के कमज़ोर वर्गों ने बीजेपी के पक्ष में मतदान किया. जबकि कांग्रेस की दीर्घकालिक योजना ओबीसी के कमज़ोर वर्गों को वापस कांग्रेस में लाना है.

प्रोफे़सर असदी इससे थोड़ा अलग सोचते हैं और कहते हैं कि ओबीसी सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ इस मामले को एक पिछड़े वर्ग के नेता के अपमान के तौर पर देखेंगे और इससे ओबीसी एकजुट हो सकते हैं.

वहीं प्रोफ़ेसर नारायण का मानना है कि इससे सिद्धारमैया के प्रति सहानुभूति पैदा होगी और कांग्रेस के पास उनके साथ खड़े रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

वो कहते हैं, "एक तरह से यह इस पर निर्भर करता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को कैसे संभालती है. क्या वह इसे अपने समर्थन के आधार को मज़बूत करने के अवसर के रूप में देखती है."

इस मामले में कांग्रेस की हालत पर प्रोफे़सर पुराणिक अलग राय रखते हैं.

उनका मानना है, "कांग्रेस की छवि को नुक़सान हुआ है. एक बार एफ़आईआर दर्ज होने के बाद सिद्धारमैया को इस्तीफ़ा देना होगा."

हालाँकि प्रोफे़सर शास्त्री को नहीं लगता कि कांग्रेस पार्टी की ओर से अब कोई ठोस कार्रवाई की जाएगी.

वो कहते हैं, "कांग्रेस को लगता है कि इस मुद्दे पर एकजुट होना सबसे अच्छा है. बेशक जैसे-जैसे यह मामला आगे बढ़ेगा, हमें यह देखने को मिलेगा कि पार्टी में क्या मतभेद उभरता है और क्या पार्टी इस मुद्दे पर एकजुट रह पाती है."

उनका कहना है, "सिद्धारमैया को पद छोड़ने के लिए कहा जाएगा या नहीं, इस पर कांग्रेस हालात के मुताबिक़ ही फ़ैसला लेगी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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