पीएम मोदी अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहली बार जा रहे कश्मीर, क्या कह रहे हैं आम लोग?

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, श्रीनगर से
"हमारे कॉलेज के टीचिंग स्टाफ़ को मोदी जी के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कहा गया है. कुछ दिन पहले ही हमें इस बात की जानकारी कॉलेज प्रशासन ने दी. इस जानकारी के बाद हमारा पुलिस वेरिफ़िकेशन भी हुआ. थाने से फ़ोन आया और मेरे घर की पूरी जानकारी मांगी गई. अब पुलिस जांच के बाद पास बनाए जा रहे हैं.”
श्रीनगर के एक सरकारी कॉलेज के कर्मचारी ने नाम ना बताने की शर्त पर बीबीसी को ये बात बताई.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को श्रीनगर के बख़्शी स्टेडियम में एक जनसभा को संबोधित करने वाले हैं.
जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 की साल 2019 में समाप्ति के बाद ये प्रधानमंत्री की पहली कश्मीर यात्रा होगी.
इसमें ज़्यादा से ज़्यादा लोग शामिल हों इसके लिए प्रशासन और भारतीय जनता पार्टी पूरी कोशिश कर रहे हैं.
इसी के तहत सरकारी कर्मचारियों से भी इस जनसभा में शामिल होने के लिए कहा गया है.
कश्मीर में ही कृषि विभाग के एक सरकारी अधिकारी ने नाम ना बताने की शर्त पर बताया, “मुझे विभाग के आला अधिकारियों ने प्रधानमंत्री की रैली में शामिल होने के लिए कहा है. इतना ही नहीं बल्कि अपने ज़ोन के दो सौ किसानों को भी साथ लाने के लिए कहा गया है.”
वो बताते हैं, “अधिकारियों ने हमें आदेश दिए हैं कि आप किसानों से ये कहें कि उन्हें किसान मेला में ले जाया जा रहा है. हमसे कहा गया है कि किसानों को सुबह साढ़े पांच बजे पिक अप करके सभा स्थल की ओर ले जाएँ. हमसे अपने-अपने ज़ोन के किसानों की सूची भी मांगी गई.”
उन्होंने कहा कि इसके अलावा, सरकारी स्कीम से जिन किसानों को फ़ायदा पहुंचा है ऐसे 20-20 किसानों को प्रधानमंत्री का वर्चुअल भाषण सुनाने की ज़िम्मेदारी दी गई है.
बीजेपी का दावा

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जम्मू-कश्मीर के भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष रविंदर रैना ने दावा किया कि गुरुवार को श्रीनगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में दो लाख लोगों के आने की उम्मीद है.
लेकिन कई लोग इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि जिस बख़्शी स्टेडियम में पीएम की सभा होनी है उसकी क्षमता दो लाख से काफ़ी कम है.
पार्टी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर ने कहा, “बख़्शी स्टेडियम के बगल में स्थित शेर-ए-कश्मीर इनडोर स्टेडियम में भी लोगों को बिठाया जाएगा जहां से वो पीएम का भाषण वर्चुअली सुन सकते हैं.”
क्या कह रहे हैं आम लोग?

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कश्मीर के आम लोगों में प्रधानमंत्री के दौरे को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है.
कई लोग उनके आगमन को लेकर उत्साहित हैं तो कई लोग कश्मीर को लेकर सरकार की नीतियों से नाराज़ हैं और उन्हें पीएम मोदी के दौरे से कोई ख़ास उम्मीदें नहीं हैं.
श्रीनगर में एक प्राइवेट फ़र्म में काम करने वाले एक व्यक्ति ने कहा, “मैं ना तो उनकी रैली में जाऊंगा और ना ही मुझे उसमें कोई दिलचस्पी है. आर्टिकल 370 को हटाकर उन्होंने हम कश्मीरियों पर बड़ा ज़ुल्म किया है. देशभर में मुसलमानों पर जो अत्याचार हो रहे हैं, उसकी बात भला उन्होंने कब की?”
शहर के ही एक बुज़ुर्ग ने कहा, “बिजली के रेट आसमान छू रहे हैं. चावल हासिल करने के लिए भी इतनी मशक्कत करनी पड़ती है. महंगाई आसमान छू रही है. ऐसी सरकार का भाषण सुनने हम क्यों जाएं?”

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हालांकि, बख़्शी स्टेडियम के ही बाहर खड़े पुलवामा के अब्दुल रज़ाक ने मोदी के कश्मीर दौरे पर ख़ुशी ज़ाहिर की.
उन्होंने कहा, “बहुत अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री कश्मीर आ रहे हैं. बीते कुछ वर्षों से हमें एक हज़ार रुपये पेंशन मिल रही है. पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. मैं तो उनकी रैली में ज़रूर शिरकत करूंगा.”
वहीं, श्रीनगर के ही रहने वाले ख़ुर्शीद अहमद कहते हैं, “चुनाव का वक़्त है. ऐसे में पीएम यहां आ रहे हैं तो हमें लगता है कि वो कोई बड़ा एलान करेंगे. वो किसी बड़े पैकेज की घोषणा करके हम कश्मीरियों को राहत दे सकते हैं.”
वो कहते हैं कि 'अनुच्छेद 370 हटने के बाद सरकार लगातार कह रही थी कि हम नया कश्मीर बनाने जा रहे हैं. अब तक तो कुछ हुआ नहीं. देखते हैं कि मोदी जी यहां आकर क्या कुछ नया करते या कहते हैं.'
कड़ी सुरक्षा के इंतज़ाम

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कश्मीर दौरे से पहले वहां सुरक्षा के बेहद कड़े इंतज़ाम किए गए हैं.
बख़्शी स्टेडियम को सुरक्षाबलों ने एक तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया है. पूरे शहर में गाड़ियों की चेकिंग की जा रही है और हर तरफ़ चेक प्वाइंट्स बनाए गए हैं.
कई जगहों पर बैरिकेडिंग की गई है और लोगों को गाड़ियों से उतारकर उनकी चेकिंग की जा रही है.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि हर जगह सुरक्षा के चाकचौबंद प्रबंध किए जा रहे हैं और बख़्शी स्टेडियम के आसपास की सभी इमारतों की सुरक्षा जांच के साथ-साथ उनको सैनिटाइज़ किया जा रहा है.
पांच सालों में पहला दौरा

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साल 2019 में आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी का ये पहला कश्मीर दौरा है.
हालांकि, बीते महीने प्रधानमंत्री ने जम्मू का दौरा कर वहाँ कई प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन किया था.
मोदी सरकार ने पांच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील किया था.
पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से फ़ैसला देते हुए जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म करने का फ़ैसला बरक़रार रखा है.
क्या था अनुच्छेद 370

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अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का एक प्रावधान था. यह जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता था. यह भारतीय संविधान की उपयोगिता को राज्य में सीमित कर देता था.
संविधान के अनुच्छेद-1 के अलावा, जो कहता है कि भारत राज्यों का एक संघ है, कोई अन्य अनुच्छेद जम्मू और कश्मीर पर लागू नहीं होता था. जम्मू कश्मीर का अपना एक अलग संविधान था.
भारत के राष्ट्रपति के पास ज़रूरत पड़ने पर किसी भी बदलाव के साथ संविधान के किसी भी हिस्से को राज्य में लागू करने की ताक़त थी. हालाँकि इसके लिए राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य थी.
इसमें यह भी कहा गया था कि भारतीय संसद के पास केवल विदेश मामलों, रक्षा और संचार के संबंध में राज्य में क़ानून बनाने की शक्तियां हैं.
इस अनुच्छेद में इस बात की भी सीमा थी कि इसमें संशोधन कैसे किया जा सकता है.
इसमें कहा गया था कि इस प्रावधान में राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सहमति से ही संशोधन कर सकते हैं.
जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा का गठन 1951 में किया गया था. इसमें 75 सदस्य थे.
इसने जम्मू और कश्मीर के संविधान का मसौदा तैयार किया था. ठीक उसी तरह जैसे भारत की संविधान सभा ने भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया था.
राज्य के संविधान को अपनाने के बाद नवंबर 1956 में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा का अस्तित्व ख़त्म हो गया था.
बीजेपी काफ़ी लंबे समय से इस अनुच्छेद को कश्मीर के भारत के साथ एकीकरण की दिशा में कांटा मान रही थी.
चार साल पहले हुआ था अनुच्छेद 370 निरस्त

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पाँच अगस्त 2019 को राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी किया. इससे संविधान में संशोधन हुआ.
इसमें कहा गया कि राज्य की संविधान सभा के संदर्भ का अर्थ राज्य की विधानसभा होगा. इसमें यह भी कहा गया था कि राज्य की सरकार राज्य के राज्यपाल के समकक्ष होगी.
इसके तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट में इसके ख़िलाफ़ याचिकाएं दायर की गईं.
अगस्त 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को पाँच जजों की बेंच के पास भेज दिया था. अदालत ने इस साल अगस्त में इस मामले की अंतिम दलीलें सुननी शुरू की थीं.
जून 2018 में, भाजपा ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. इसके बाद राज्य 6 महीने तक राज्यपाल शासन और फिर राष्ट्रपति शासन के अधीन रहा.
सामान्य परिस्थितियों में इस संशोधन के लिए राष्ट्रपति को राज्य विधानमंडल की सहमति की ज़रूरत होती, लेकिन राष्ट्रपति शासन के कारण विधानमंडल की सहमति संभव नहीं थी.
इस आदेश ने राष्ट्रपति और केंद्र सरकार को अनुच्छेद 370 में जिस भी तरीक़े से सही लगे संशोधन करने की ताक़त दे दी.
इसके अगले दिन राष्ट्रपति ने एक और आदेश जारी किया. इसमें कहा गया कि भारतीय संविधान के सभी प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू होंगे. इससे जम्मू कश्मीर को मिला विशेष दर्जा ख़त्म हो गया.
9 अगस्त को, संसद ने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में बाँटने वाला एक क़ानून पारित किया. जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, लेकिन लद्दाख में नहीं होगी.
जम्मू-कश्मीर में पाँच अगस्त से लॉकडाउन लगा दिया गया था. वहां कर्फ्यू लगा दिया गया था. टेलीफोन नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई थीं.
राजनीतिक दलों के नेताओं समेत हज़ारों लोगों को या तो हिरासत में ले लिया गया या गिरफ्तार किया गया या नज़रबंद कर दिया गया.
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बल के कई लाख जवानों को तैनात किया गया.
2जी इंटरनेट को कुछ महीने बाद जनवरी 2020 में बहाल किया गया जबकि 4जी इंटरनेट को फ़रवरी 2021 में बहाल किया गया. अनुच्छेदों को हटाए जाने के तुरंत बाद इसे चुनौती देते हुए कई याचिकाएँ दायर की गईं.
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