निवी से नौवारी तक: भारत में साड़ी पहनने के इन तरीकों के बारे में कितना जानते हैं आप?

    • Author, अंजलि सिंह
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

हमारी दादी-नानी की अलमारी से लेकर अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के रेड कार्पेट पर शान बिखेरती साड़ी का सफ़र बेहद ख़ूबसूरत और दिलचस्प है. साड़ी सिर्फ़ एक पहनावा ही नहीं है, बल्कि यह खुद में भारतीय संस्कृति, कला और सदियों के इतिहास को समेटे हुए है.

अगर साड़ी के इतिहास की बात की जाए तो इसका ज़िक्र सांस्कृतिक इतिहासकार कमला एस. डोंगरकेरी की किताब 'द इंडियन साड़ी' में मिलता है.

इसके मुताबिक साड़ी के अस्तित्व के प्रमाण लगभग 3200 ईसा-पूर्व यानी 5000 साल से भी ज़्यादा पुरानी सभ्यताओं में मिलते हैं. इनमें मिस्र की सभ्यता, सिंधु घाटी की सभ्यता और इसके बाद भारत में मौर्यों के अधीन विकसित सभ्यताएं शामिल हैं.

साड़ी को संस्कृत में शाटिका बोलते हैं, यानी 'कपड़े की पट्टी'. लेकिन भारतीय महिलाओं और कुछ पुरुषों के लिए सूती, सिल्क या लिनन से बनी साड़ियां केवल एक परिधान नहीं हैं. कई लोगों के लिए ये पहचान का हिस्सा भी है.

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

बदलते दौर के साथ साड़ी ने भी अपने रंग-रूप बदले. साड़ी पहनने के तरीकों में बदलाव आए और अब प्री-स्टिच्ड साड़ियां भी आने लगी हैं.

मशहूर साड़ी इतिहासकार और लेखिका ऋता कपूर चिश्ती ने अपनी किताब 'साड़ीज़: ट्रेडिशन एंड बियॉन्ड' में साड़ी पहनने के करीब 108 पारंपरिक तरीकों के बारे में बताया है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "पूरे भारत में अपने अध्ययन के दौरान हमने हर राज्य में लगभग 2-3 महीने बिताए. अपनी किताब में हमने ज़्यादातर राज्यों में साड़ी पहनने के करीब 7-8 स्टाइल दर्शाए हैं. हालांकि कई और ऐसे स्टाइल हो सकते हैं जो अभी इसमें शामिल न हो पाए हों."

साड़ी को एक धरोहर के तौर पर मानकर, इसके सम्मान में हर साल 21 दिसंबर को 'वर्ल्ड साड़ी डे' के तौर पर मनाया जाता है.

तो आइये, अंतरराष्ट्रीय साड़ी दिवस के मौके पर हम आपको बताते हैं कुछ ऐसे ही पारंपरिक ड्रेप्स के बारे में, जो भारत की सांस्कृतिक बहुलता को बयान करते हैं.

निवी

भारत में ज़्यादातर महिलाएं जिस तरह से साड़ी बांधती हैं उसे निवी कहा जाता है.

कमला एस. डोंगरकेरी की किताब 'द इंडियन साड़ी' में निवी या मॉर्डन स्टाइल को आधुनिक दौर में भारतीय महिलाओं द्वारा साड़ी पहनने का सबसे सामान्य तरीका बताया गया है. इसमें साड़ी को कमर के चारों तरफ लपेटकर सामने की ओर प्लीट्स बनाई जाती हैं और पल्लू को बाएं कंधे पर डाला जाता है, जिसे आम भाषा में उल्टा पल्लू भी कहा जाता है. यह तरीका न सिर्फ़ देखने में सुंदर है बल्कि पहनने में आसान और रोज़ के काम करने में व्यावहारिक भी होता है.

साड़ी के इन अलग-अलग ड्रेप की विशेषताओं को लेकर बीबीसी ने मशहूर सेलिब्रिटी साड़ी ड्रेपिंग आर्टिस्ट डॉली जैन से बात की.

उनका कहना है कि हमारे देश में हर राज्य का कपड़ा अलग है, उसकी बुनाई अलग है, उसको पहनने, स्टाइल करने का तरीका अलग है और सब नायाब हैं. हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता साड़ियों के ड्रेप में भी दिखाई देती है.

तो वहीं समाजसेवी और पूर्व-सांसद बृंदा करात कहती हैं कि वह साड़ी में सबसे सहज महसूस करती हैं.

साड़ी के प्रति अपने लगाव के बारे में बात करते हुए उन्होंने बीबीसी से कहा, "साड़ी एक बहुत ही सुविधाजनक परिधान है. हमारे देश के टेक्सटाइल की विविधता साड़ी में भी झलकती है. मज़दूर या आदिवासी महिलाएं साड़ी को इस तरीके से ढाल लेती हैं कि उनके काम पर कोई असर न पड़े. साड़ी की खासियत यही है कि वह खुद को पहनने वाले के अनुकूल बना लेती है."

बृंदा करात के मुताबिक जब वो लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर बतौर एयर इंडिया ग्राउंड स्टाफ काम करती थीं, तब एयरपोर्ट ग्राउंड स्टाफ के लिए साड़ी न पहनने का नियम था. उन्होंने बताया कि इस पाबंदी का उन्होंने विरोध किया था, जिसके बाद यह नियम बदलना पड़ा.

नौवारी

प्रसिद्ध कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर नीरजा पटवर्धन के मुताबिक महाराष्ट्र में साड़ी पहनने की पारंपरिक शैली नौवारी का मतलब है 9 गज.

यानी यह साड़ी 9 गज की होती है जिसे दो हिस्सों में बांटकर पैंट की तरह पहना जाता है. मराठा शासनकाल में महिलाएं युद्ध और प्रशिक्षण के दौरान इसे पहनती थीं.

आटपूरे

पश्चिम बंगाल में साड़ी पहनने की शैली को आटपूरे कहा जाता है. इसमें साड़ी को दो बार लपेटा जाता है और पल्लू को पीछे से सामने की ओर लाया जाता है. एक के बजाय दो पल्लू लिए जाते हैं.

किताब 'साड़ीज़: ट्रेडिशन एंड बियॉन्ड' में इतिहास का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि समय के साथ बंगाल की महिलाओं ने सुविधा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक तरीकों में बदलाव किए.

फिर यहां पेटीकोट और ब्लाउज़ के साथ आधुनिक तरीके से साड़ी पहनने का चलन शुरू हुआ.

सीधा पल्लू

खासकर गुजराती महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली इस शैली का ज़िक्र ऋता कपूर चिश्ती ने अपनी किताब में किया है.

जिसमें साड़ी के पल्ले को सीधे कंधे पर सामने की ओर रखा जाता है. पल्ले की खूबसूरती सामने की ओर दिखती है. ये संभालने में आसान होता है और शहरी महिलाओं में लोकप्रिय है.

उत्तर प्रदेश और बिहार में भी अक्सर महिलाएं इस तरीके से साड़ी पहनती हैं.

मदिसरु (मदीसार)

तमिलनाडु में साड़ी पहनने का यह लोकप्रिय तरीका धोती और साड़ी का अनोखा मेल है.

इसमें साड़ी का निचला हिस्सा धोती की तरह लपेटा जाता है, जबकि ऊपरी हिस्सा पारंपरिक साड़ी की तरह प्लीट्स में सजाया जाता है.

मुंडुम नेरियाथुम (सेट मुंडु)

केरल में परंपरागत रूप से साड़ी पहनने के तरीके को मुंडुम नेरियाथुम कहते हैं.

इसमें एक बड़ा कपड़ा (मुंडू) और एक छोटा कपड़ा (नेरियाथु) होता है.

'साड़ीज़: ट्रेडिशन एंड बियॉन्ड' में ऋता चिश्ती ने लिखा है कि पहले बस एक कपड़ा मुंडु शरीर के चारों ओर लपेटा जाता था, लेकिन 1940 के दशक में महिलाओं की गरिमा का ध्यान रखते हुए ऊपर के हिस्से को ढकने के लिए एक और कपड़ा शामिल किया गया.

इसका लोकप्रिय नाम सेट मुंडु है. आमतौर पर ये सुनहरे बॉर्डर वाली सफेद साड़ी होती है.

कूर्गी (कोडागु)

कर्नाटक में साड़ी पहनने की एक खास शैली है कूर्गी जिसे कोडागु भी कहा जाता है.

मशहूर अभिनेत्री रश्मिका मंदाना कई मौकों पर इस इस ख़ास स्टाइल में नज़र आती हैं.

इसमें साड़ी की प्लीट्स बनाकर पीछे की ओर टक की जाती हैं.

पल्लू को पीछे से सामने की ओर लाकर बाएं कंधे पर रखा जाता है. कूर्ग इलाक़े की महिलाएं विशेष तौर पर इस शैली में साड़ी पहनती हैं.

सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साड़ी महिलाओं में अपनी ख़ास जगह बना रही है.

इस लोकप्रियता को ऋता कपूर चिश्ती सकारात्मक दृष्टि से देखती हैं. उनका कहना है कि, "1990-95 के दशक में आधुनिकीकरण की रेस में लोग साड़ी को भूलने लगे थे. हालांकि बीते कुछ सालों में सोशल मीडिया पर प्रसार के चलते साड़ी के प्रति लोगों में फिर से रुचि आई है जो कि एक अच्छा संकेत है. यह दिखाता है कि दुनिया भर में लोगों को साड़ी में कुछ खूबी नज़र आई, इसीलिए उन्होंने इसे अपनाया."

वहीं डॉली जैन भी कहती हैं कि साड़ी ही एकमात्र परिधान है जिसे पहनने वाला चाहे किसी भी कद-काठी का हो यह उसके शरीर के आकार के हिसाब से खुद को ढाल लेती है. एकमात्र ऐसा पहनावा है जो पीढ़ियों तक जस का तस पहुंचाया जा सकता है, इसकी सिलाई या बनावट से बिना कोई छेड़छाड़ किए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.