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क्या देह लज्जा से मुक्ति की बात करती थी निखंड साड़ी?
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बीते 24 नवंबर को सोशल मीडिया एप इंस्टाग्राम पर thanos_jatt नाम के एकांउट से एक साड़ी पहनी महिला का वीडियो पोस्ट किया गया है. इस महिला ने ब्लाउज़ नहीं पहना है, बल्कि उसकी जगह मेहंदी से ब्लाउज़ का पैटर्न शरीर के ऊपरी हिस्से में बनवा लिया है.
पोस्ट वायरल हुई तो इस पर जहां एक तरफ ब्यूटीफ़ुल, कॉन्सेप्ट अच्छा लगा जैसे कॉमेंट आए, वहीं दूसरी तरफ कुछ इंस्टाग्राम यूज़र्स ने भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए लिखा, 'बेशर्मी की हद हो गई'.
इंस्टाग्राम की इस दुनिया से दूर बिहार राज्य के दरभंगा ज़िले में आयोजित मधुबनी लिट्रेचर फ़ेस्टिवल में 'एकवस्त्र' नाम का एक फ़ैशन शो चल रहा है. दरभंगा शहर के ख़ूबसूरत कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्दालय के दरबार हॉल में मॉडल्स अपने शरीर पर सिर्फ़ साड़ी लपेटे वॉक कर रही है. उन्होंने ना तो ब्लाउज़ पहना है और ना ही पेटीकोट. इंटरनेट की दुनिया की आलोचनाओं से दूर दरबार हॉल में बैठे लोग इसे बहुत सहजता से ले रहे हैं और तालियों के साथ मॉडल्स का स्वागत कर रहे हैं.
मिथिला की परंपरा 'निखंड साड़ी'
दरअसल बिहार के मिथिलांचल इलाके में निखंड साड़ी की परंपरा रही है. यानी स्त्रियां सिर्फ़ साड़ी पहनती थीं और पेटीकोट - ब्लाउज़ नहीं.
पद्मश्री से सम्मानित हिन्दी और मैथिली साहित्य की सुप्रसिध्द लेखिका उषा किरण ख़ान बताती हैं, "हमलोगों ने अपने घर आंगन में सिर्फ़ साड़ी पहने स्त्रियों को देखा. सिलाई का कॉन्सेप्ट तो मुस्लिमों के साथ आया. इसके अलावा अपने बचपन में आदिवासी संथाल महिलाओं को देखा कि वो अपने स्तन नहीं ढकती थीं. सिर्फ़ किसी जलसे के मौके पर ही वो साड़ी इस तरीके से पहनती थीं कि उनके स्तन ढकें. कई मौकों पर तो वो एक कपड़ा ऐसे ही अपने बदन पर डाल देती थीं जो उड़ता रहता था. यानी उसमें देह का ऊपरी हिस्सा कभी दिखता-कभी छिपा रहता था."
बाद में जैसे-जैसे वक्त बीता ब्लाउज़ और पेटीकोट पहले कुछ घरों की महिलाओं ने पहनना शुरू किया और बाद में ब्लाउज़-पेटीकोट को समाज ने इस तरह अपनाया कि निखंड साड़ी की परंपरा ही समाप्त हो गई.
मधुबनी लिट्रेचर फ़ेस्टिवल जहां ये एकवस्त्र नाम का फ़ैशन शो आयोजित हुआ, उसकी आयोजक सविता झा ख़ान कहती हैं, " एकवस्त्र का कॉन्सेप्ट दो स्तरों पर है. पहला बुनकर महिलाएं जिनकी परंपरा धीरे-धीरे लुप्त हो गई और दूसरा हमारे इलाके में महिलाएं अपने शरीर को सेलीब्रेट करती थीं. उनमें इसको लेकर किसी तरह की लज्जा नहीं थी. ये महिलाएं किस तरीके के कपड़े पहनना चाहती थीं, वो ख़ुद तय करती थीं और इसमें भी वो किसी को डिक्टेट नहीं करने देती थीं. देह को लेकर जो दर्शन हमारे मिथिला का रहा, उसको बहस के केन्द्र में लाना चाहते हैं. आप देखिए सीता को तो 'वैदेही' कहा जाता है जिसका मतलब ही है देह से परे."
लेकिन क्या ये महिला सशक्तीकरण से जुड़ा है?
मिथिला भारती के संपादक और मिथिला की शादी परंपरा पर आधारित किताब 'गोत्राध्याय' के लेखक भैरव लाल दास कहते हैं कि देह की दृष्टि से देखें तो निखंड साड़ी को महिला सशक्तीकरण से जोड़ा नहीं जा सकता.
वो कहते हैं, " हमारी संस्कृति में बग़ैर सिले हुए वस्त्रों का संबंध पुरुष-महिला सभी से रहा. उसकी वजह धार्मिक-सांस्कृतिक थी. बाद में जब मुस्लिम आक्रांता अपने साथ सिलाई का हुनर ले कर आए तो इसमें राजनीति का आयाम भी जुड़ गया, क्योंकि आम जन मानस ने उनकी सिलाई के इस हुनर का प्रतिकार अपने तरीके से किया. वैदिक कार्य जिसमें मिथिला की महिलाएं बहुत सक्रिय थीं, वहां पर भी सिले हुए कपड़े इस्तेमाल में नहीं आते. इसलिए निखंड साड़ी या एकवस्त्र का संबंध सशक्तीकरण से इतर शास्त्रीयता और लोगों की ग़रीबी से था. मिथिला की ग़रीबी का तो पूरा दस्तावेज़ हमें विद्यापति की रचनाओं में भी मिलता है. फिर आप देखें तो बंगाल की पेन्टिंग्स और परिधानों में भी महिलाएं ब्लाउज़ नहीं पहने दिखती हैं."
देखा जाए तो सिर्फ़ मिथिलांचल ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान के कई इलाकों में साड़ी के साथ ब्लाउज़ ना पहनने की परंपरा रही है. जैसे ब्रह्म समाज में भी महिलाएं ब्लाउज़ नहीं पहनती थीं, लेकिन बाद में इस समाज की महिलाओं ने ब्लाउज़ पहनना शुरू किया.
पटना से प्रकाशित 147 साल पुराने 'बेहार हेराल्ड' अख़बार के संपादक विद्युत पाल बताते हैं, "कपड़ों की डिज़ाइनिंग हिस्ट्री पर काम 90 के दशक के बाद शुरू हुआ. लेकिन इसमें भी जो हमें जानकारी मिलती है वो ये कि ज्ञाननंदनी देवी जो रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई और आई सी एस सत्येन्द्र नाथ टैगोर की पत्नी थी, उन्हें ब्लाउज़ ना पहनने के चलते अंग्रेज़ी क्लब में प्रवेश करने की अनुमति नहीं मिली. जिसके बाद उन्हें ब्लाउज़ पहनना पड़ा."
साड़ी कब आई?
साड़ी जिसे कई मौकों पर सबसे सेक्सी परिधान माना जाता है, वो भारतीय उपमहाद्वीप में ग्रीक प्रभाव से आई.
पुरातत्वविद् जलज कुमार तिवारी बताते हैं, "ग्रीक प्रभाव मौर्य काल के शासन में एकदम स्पष्ट तौर पर सामने आया जिस वक्त चन्द्रगुप्त मौर्य ने ग्रीक राजकुमारी से शादी की. दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के शुंग काल में मिली टेराकोटा की मूर्तियों में स्पष्ट है कि महिलाएं साड़ी पहनती थीं. उसमें ब्लाउज़ जैसा कुछ नहीं था.
साड़ी के अलावा महिलाएं चूड़ीदार पायजामा जैसा कोई वस्त्र भी पहने हुए दिखती हैं. इसके बाद हमें टेराकोटा में नौवीं शताब्दी में महिलाएं महाराष्ट्रीयन स्टाइल में साड़ी पहने मिलती हैं जिसमें उनकी साड़ी को इस तरीके से पहना जाता था कि औरतें आराम से सारा काम कर सकें. उस वक्त की तारा और दुर्गा आदि देवियों की मूर्तियों से ये साफ़ है."
ऐसे में ये सवाल मौजूं है कि उस वक्त साड़ी ड्रैपिंग (पहनने का तरीक़ा) में यदि औरत की शारीरिक गतिशीलता को अहमियत दी जाती थी, तो बाद में उसमें एक तरीके के लालित्य का तत्व क्यों लाया गया?
जलज कुमार तिवारी बताते हैं, " एक समय में स्त्रियां कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थीं. वो युध्द करती थीं, खेती, शिकार सब करती थीं. लेकिन बाद में जब उन्हें घर के अंदर रहने और उसकी ज़िम्मेदारी संभालने को कहा गया तो उसका असर साड़ी पहनने के तरीक़े पर भी पड़ा और उनकी मोबिलिटी या गतिशिलता भी प्रभावित हुई."
ब्रेस्ट टैक्स
ये सवाल भी है कि क्या आज के आधुनिक युग में हम जैसे कपड़ों के बारे में सोचते हैं, वैसे ही पहले भी सोचते थे.
लेखक-संपादक विद्युत पाल कहते हैं, " वस्त्र जब मनुष्य के जीवन में आए तो उनका संबंध लज्जा की बजाए हमारे दैनिक कार्यों की ज़रूरत से ज़्यादा था. जैसे मनुष्य को जब शिकार करना होता था तो स्त्रियों को दौड़-भाग करने में तब सहुलियत होती थी जब उनके शरीर का ऊपरी हिस्सा और पुरुषों का नीचे का हिस्सा बंधा हो या उसे किसी तरह का सपोर्ट हो. वस्त्र उसी ज़रूरत को देखकर बनाए गए."
लेकिन अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरत के लिए बनाए गए इन वस्त्रों को पहनने के लिए भी लंबी लड़ाई हिन्दुस्तान के कई इलाकों में महिलाओं को लड़नी पड़ी.
केरल में तक़रीबन डेढ़ सौ साल पहले निचली जाति की महिलाओं को स्तन न ढकने का आदेश था. इस आदेश के उल्लंघन पर स्त्रियों को 'ब्रेस्ट टैक्स' यानी स्तन कर देना पड़ता था. इस स्तन कर के विरोध में एझवा जाति की नंगेली नाम की एक महिला ने अपने स्तन ही काट दिए थे.
वर्तमान झारखंड के एक हिस्से में जहां महिलाएं अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को नहीं ढकती थीं, वहीं दूसरी तरफ केरल में निचली जाति की महिलाएं अपने स्तन ढकने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही थीं.
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज, पटना के निदेशक प्रोफ़ेसर पुष्पेन्द्र कुमार इस बारे में कहते हैं, "एक ही देश में, एक ही जगह पर, एक ही समुदाय में कपड़े सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तौर पर तय होते हैं. यूरोप में तो पूरा एंटी-क्लोथिंग कैम्पेन चला जिसमें एक समझ ये भी थी कि बहुत ज़्यादा क्लोथिंग यानी शरीर को कपड़ों से बहुत ज़्यादा ढकने की प्रवृत्ति ने यौन अपराध बढ़ाया है."
मिथिला की महिलाएं
मिथिलांचल में देखें तो यहां बिहार के दूसरे इलाकों से इतर विदुषी महिलाओं की समृद्ध परंपरा रही है. राजा राम की पत्नी सीता को मिथिलांचल की सेनापति कहा जाता है तो यहां से गार्गी, मैत्रेयी, भारती, और जैन तीर्थंकर मल्लिनाथ की परंपरा रही जो राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक मसलों पर अपने समय में हस्तक्षेप करती रहीं.
पद्मश्री उषा किरण ख़ान बताती हैं, " मिथिला में विदुषी स्त्रियों की परंपरा बौद्धों में तंत्रयान और सनातन में कौलाचार पद्धति आने के बाद कुछ समय के लिए रुकती है, क्योंकि तंत्रयान और सनातनीयों के आने से लड़कियों को तंत्र-मंत्र के लिए ले जाया जाने लगा और उनकी पढ़ाई-लिखाई पर असर हुआ. लेकिन उस वक्त भी महिलाओं ने ख़ुद को मिथिला पेन्टिंग के ज़रिए अभिव्यक्त करना शुरू किया."
रिसर्चर-लेखक भैरव लाल दास कहते हैं, "मुग़लों का कोई सीधा आक्रमण इस इलाके में तो नहीं हुआ, लेकिन उसका प्रभाव पड़ा. ये प्रभाव आपको घरों के स्ट्रक्चर में देखने को मिलता है जहां खिड़कियों की चौड़ाई घट गई और वो ज़्यादा ऊंचाई पर होने लगी. यानी औरतें ज़्यादा पर्दे में रखी जाने लगीं."
दरभंगा जैसे तुलनात्मक तौर पर छोटे शहर में 'एकवस्त्र' जैसे आयोजन को मॉडल्स किस तरीके से देखती हैं? इस सवाल पर टीवी एक्ट्रेस और रंगमंच कलाकार सोनल झा जो इस फ़ैशन शो की शो स्टॉपर रही, वो कहती हैं, "इसे सिर्फ़ देह तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन इतना ज़रूर है कि इस तरह से जब आप निखंड साड़ी पहनते हैं तो देह को लेकर जो संकोच है वो टूटता है. हालांकि इस तरह के कपड़े पहनने का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य अलग है. लेकिन आज जब देह पर इतना ज़्यादा फ़ोकस है, तो इस तरह के शो बहस को सही दिशा में आगे बढ़ाते हैं."
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