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इनकम टैक्स में मिली राहत से मिडिल क्लास को सचमुच में कितना फ़ायदा होगा?
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वित्त वर्ष 2025-26 के टैक्स प्रावधानों को मध्य वर्ग के लिए बड़ी राहत देने वाला बताया जा रहा है.
भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को जब अपने बजट भाषण में नए इनकम टैक्स स्लैब का एलान किया तो सबसे ज़्यादा फ़ायदा उन लोगों को होता हुआ दिखा जिनकी सालाना आय 12 लाख रुपये से कम है.
सीतारमण ने एलान किया कि 12 लाख रुपये तक की आय पर कोई इनकम टैक्स नहीं देना होगा.
सैलरी पाने वाले लोगों के लिए ये सीमा बढ़ाकर 12 लाख 75 हज़ार रुपये कर दी गई है.
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कितना बड़ा मिडिल क्लास और कितना फ़ायदा
एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ अगर किसी शख़्स की सैलरी सालाना 13 लाख रुपये है तो उसे नए़ टैक्स स्लैब की वजह से 60 से 70 हज़ार रुपये की टैक्स बचत होगी.
इस ऐसे समझ सकते हैं कि नए टैक्स स्लैब के मुताबिक़ चार से आठ लाख रुपये की सालाना आय वाले लोगों को अब सिर्फ़ पांच फ़ीसदी टैक्स देना होगा.
आठ से बारह लाख रुपये की सालाना आय वाले लोगों को दस और 12 से 16 लाख रुपये की सालाना आय वाले लोगों को 15 फ़ीसदी टैक्स देना होगा.
अभी तक 12 से 15 लाख रुपये की सालाना कमाई पर 20 फ़ीसदी टैक्स देना पड़ रहा था.
भारत में मिडिल क्लास की परिभाषा के दायरे में वो लोग आते हैं जिनकी सालाना आय 5 से 30 लाख रुपये (2020-21 के मूल्यों के आधार पर) तक है.
पीपुल्स रिसर्च ऑन इंडियाज़ कंज़्यूमर इकोनॉमी के मुताबिक़ फ़िलहाल (2025) देश की आबादी का 40 फ़ीसदी मिडिल क्लास के दायरे में आता है. 2016 में 26 फ़ीसदी लोग मिडिल क्लास के दायरे में आते थे.
भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक़्त मांग की कमी से जूझ रही है. कहा जा रहा है कि चूंकि वस्तुओं और सेवाओं का सबसे बड़ा उपभोक्ता समूह मिडिल क्लास के हाथ में पैसा नहीं बच रहा है इसलिए उसकी ख़रीद क्षमता प्रभावित हुई है और अर्थव्यवस्था में मांग घट गई है.
चूंकि कंपनियां खपत में कमी देख रही हैं इसलिए वो उत्पादन नहीं बढ़ा रही हैं और न ही नया निवेश कर रही हैं. इसका असर आर्थिक ग्रोथ पर पड़ा है.
वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर 6.4 फ़ीसदी रही है जो पिछले चार साल की सबसे धीमी ग्रोथ है.
आर्थिक सर्वे में 6.3 से लेकर 6.8 फ़ीसदी ग्रोथ का अनुमान लगाया जा रहा है, जो स्लोडाउन की निशानी मानी जा रही है.
साल 2047 तक 'विकसित भारत' (ये मोदी सरकार का लक्ष्य है) का लक्ष्य हासिल करने के लिए लगातार कम से कम 8 फ़ीसदी ग्रोथ की ज़रूरत है.
मिडिल क्लास के फ़ायदे से अर्थव्यवस्था को क्या लाभ?
माना जा रहा है कि मध्य वर्ग के टैक्स पेयर्स को इनकम टैक्स में ज़्यादा छूट देने की सरकार की ये कोशिश मांग बढ़ाएगी और इससे अर्थव्यवस्था का चक्र फिर तेज़ी से घूमेगा.
कंज़्यूमर इकोनॉमिस्ट राजेश शुक्ला कहते हैं, ''लोअर मिडिल क्लास महंगाई की मार से जूझ रहा है. ऐसे में नए टैक्स स्लैब के ज़रिये इनकम टैक्स पेयर्स के हाथ में सालाना 70 से 80 हज़ार रुपये का आना बहुत बड़ी बात है. अगर ये पैसा खपत के बजाय बचत में भी जाता है तो भी इसका बड़ा फ़ायदा है. क्योंकि बचत आख़िरकार खपत को बढ़ावा देती है.''
वो कहते हैं, ''मिडिल क्लास एक साथ उपभोक्ता, कर्मचारी और नियोक्ता, तीनों होता है. मिडिल क्लास ड्राइवर, घरेलू और दूसरे सहायकों की सेवाएं भी लेता है. लिहाज़ा उसके हाथ में बचा हुआ अतिरिक्त पैसा इस तरह की सेवा मुहैया करने वालों के हाथों में भी पहुंचेगा और ये पैसा बाज़ार में आएगा. इसलिए इनकम टैक्स में ज़्यादा छूट देने का कदम मिडिल क्लास और देश की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत भरा कदम साबित होगा.''
लेकिन कुछ विशेषज्ञ मिडिल क्लास की जेब को राहत देकर अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देने की सरकार की रणनीति पर सवाल उठाते हैं.
इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में मैलकम आदिशेषैया चेयर प्रोफेसर और जाने-माने अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि मिडिल क्लास को डायरेक्ट टैक्स में छूट देने की तुलना में इनडायरेक्ट टैक्स की दरें कम करना मांग बढ़ाने के लिए ज़्यादा कारगर साबित होता है.
वो कहते हैं कि इनडायरेक्ट टैक्स तो ग़रीब से ग़रीब उपभोक्ता को भी देना पड़ता है.
भारत में ज़्यादातर वस्तुओं और सेवाओं पर लिया जाने वाला इनडायरेक्ट टैक्स जीएसटी की दरें 28 फ़ीसदी तक हैं.
अरुण कुमार कहते हैं, ''भारत की लगभग एक अरब चालीस करोड़ की आबादी में सिर्फ़ साढ़े नौ करोड़ लोग टैक्स फ़ाइलिंग करते हैं और उनमें से भी छह करोड़ लोग शून्य रिटर्न दाख़िल करते हैं. तो सिर्फ़ साढ़े तीन करोड़ लोगों के लिए टैक्स छूट की सीमा बढ़ाने का क़दम बाज़ार में मांग बढ़ाने में कारगर नहीं हो सकता.''
अरुण कुमार कहते हैं कि सरकार ने मिडिल क्लास को इनकम टैक्स में राहत देने का क़दम उठाकर एक नैरेटिव खड़ा किया है क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और यहां बड़ी तादाद में सरकारी कर्मचारी रहते हैं, जो मिडिल क्लास के दायरे में आते हैं और इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं.
'डायरेक्ट नहीं इनडायरेक्ट टैक्स में देनी होगी राहत'
विशेषज्ञों का कहना है कि देश में जीएसटी कलेक्शन लगातार बढ़ा है. यानी सरकार इनडायरेक्ट टैक्स के ज़रिये लोगों की जेब से ज़्यादा पैसा निकाल रही है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ सरकार का जीएसटी कलेक्शन लगातार बढ़ रहा है.
साल 2023 की तुलना में साल 2024 में इसमें 7.3 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है और ये दिसंबर 2024 में 1.77 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया.
विशेषज्ञ मानते हैं कि जीएसटी के तौर पर ऊंचे इनडायरेक्ट टैक्स की मार से आम उपभोक्ताओं के खपत की क्षमता कम हो रही है. यानी उपभोक्ता महंगे होते सामानों की वजह से कम ख़रीदारी कर रहा है
भारत में ज़्यादातर कंज़्यूमर सामानों और सर्विसेज़ पर जीएसटी दर 18 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा है. इससे ये चीज़ें महंगी हो रही हैं. इसका असर कंज़्यूमर सामानों की बिक्री पर पड़ रहा है.
अरुण कुमार कहते हैं कि सरकार को अर्थव्यवस्था के उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना चाहिए जिनमें रोज़गार पैदा करने की क्षमता है.
"इनमें ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर शामिल हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में आवास निर्माण और बुनियादी ढांचा मज़बूत करने में पैसा लगाना चाहिए तभी लोगों के पास पैसा आएगा."
"आम लोगों के हाथ में बचने वाला यही पैसा बाज़ार में आकर मांग बढ़ाएगा और इकोनॉमी को रफ़्तार मिलेगी. सिर्फ मिडिल क्लास को राहत देने से बात नहीं बनेगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित