क्या दुनिया समुद्र में बिछे इंटरनेट केबल नेटवर्क पर निर्भर रह सकती है?: दुनिया जहान

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समुद्र के नीचे इंटरनेट की तारों या केबल का एक विशाल जाल फैला हुआ है, जो पूरी दुनिया का संपर्क जोड़े रखता है.
इन नाज़ुक फ़ाइबर ऑप्टिक तारों से दुनिया का 95 प्रतिशत इंटरनेट डेटा प्रसारित होता है, जो सरकारों, संस्थाओं और अरबों लोगों तक जानकारी लाने और ले जाने के काम आता है.
अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद इन तारों की ख़ास सुरक्षा नहीं की जाती, जिसकी वजह से दुर्घटनावश यह क्षतिग्रस्त हो जाती हैं.
और जैसा कि हाल में देखा गया है कि इन्हें जानबूझ कर तोड़ने की हरकतें भी हुई हैं, जिसका संबंध राजनीतिक तनाव से है.

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पिछले साल बाल्टिक सागर में इन केबलों को चीन और रूस द्वारा निशाना बनाए जाने के आरोप लगे हैं. ये महज़ दुर्घटनाएं थीं या यह एक नए अस्पष्ट युद्ध के युग की शुरुआत का संकेत?
हमलों के अलावा यह नाज़ुक तारें हर साल कई बार क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और सरकारें इनकी सुरक्षा के उपायों के बारे में सोच रही हैं.
जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या एआई विकसित हो रहा है. डिजिटल और इंटरनेट टेक्नॉलॉजी की मांग बढ़ रही और इसमें निवेश भी बढ़ रहा है.
तो इस हफ्ते दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या दुनिया समुद्र में बिछे इंटरनेट केबल नेटवर्क पर निर्भर रह सकती है?
अदृश्य हाइवे

1850 के दशक में अमेरिका और ब्रिटेन के बीच अटलांटिक महासागर में टेलीग्राफ़ की तांबे की तार बिछाई गई थी.
इस तार से 1858 में भेजे गए कुछ सार्वजानिक संदेशों में से एक संदेश ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया द्वारा राष्ट्रपति जेम्स बुकानन को भेजा गया बधाई संदेश था, जो सौ शब्दों से भी कम था, लेकिन उसे प्रसारित करने में सोलह घंटे लगे थे.
अब अंदाज़ा लगाइए कि तब से अब तक सूचना तंत्र में कितना बड़ा कायापलट हुआ है. आज समुद्र में बिछी फ़ाइबर ऑप्टिक केबलों में प्रति सेकंड 60 करोड़ घंटे के एचडी वीडियो के बराबर डेटा दुनियाभर में भेजने की क्षमता है.
अनुमान है कि आने वाले हर तीन सालों में यह क्षमता दोगुनी होती जाएगी.
लेकिन सवाल ये है कि समुद्र में बिछी फाइबर ऑप्टिक तारें या केबल कैसी होती हैं? ये कितनी सुरक्षित हैं?
यह समझने के लिए हमने बात की लेन बर्डेट से, जो टेलीजियोग्राफ़ी नाम की कंपनी में रिसर्च एनालिस्ट हैं. यह कंपनी समुद्र में बिछी फाइबर ऑप्टिक तारों का नक्शा बनाती है.
लेन बर्डेट ने बताया कि जो केबल तट के नज़दीक होती हैं, उन पर मज़बूत कवच होता है, लेकिन समुद्र की गहराई में बिछी तारों पर ऐसा कवच नहीं होता.
यह दरअसल ऑप्टिकल फ़ाइबर के बंडल की तरह होती हैं. भीतर यह मनुष्य के बाल जितनी मोटी ही होती हैं. कांच की इन लंबी तारों के ज़रिए डेटा प्रसारित किया जाता है.
यह आधुनिक केबल उन्नीसवीं सदी की तारों से बिल्कुल अलग ज़रूर हैं, मगर उन्हें समुद्र में बिछाने का तरीका अभी भी वैसा ही है.

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लेन बर्डेट ने कहा, " यह केबल आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक से बनाई जाती हैं, लेकिन उन्हें समुद्र में बिछाने का तरीका बहुत ही आसान है. उन्हें नौकाओं से नीचे समुद्र में सावधानी से गिराया जाता है और धीरे-धीरे जब वह समुद्रतल पर बिछ जाती हैं, तो उन्हें खींच कर तयशुदा दिशा में ले जाया जाता है."
अनुमान है कि फ़िलहाल ऐसी 565 तारें समुद्रतल पर बिछी हुई हैं. साथ ही 83 और केबलों को बिछाये जाने की योजना है. इनकी कुल लंबाई लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर है.
अमेरिका और यूरोप के बीच 20 से अधिक ऐसी केबलें बिछी हुई हैं. कई केबल पूरी दुनिया के इर्द-गिर्द बिछी हुई हैं.
लेन बर्डेट की राय है कि हर रूट पर कई केबल बिछाना ज़रूरी है, ताकि अगर कोई केबल क्षतिग्रस्त हो जाए तो दूसरी केबल के ज़रिए डेटा का प्रसारण जारी रहे.
उन्होंने बताया कि यूरोप और अमेरिका के बीच अटलांटिक महासागर में कई केबल हैं. इसके अलावा भूमध्य सागर से दक्षिणी अफ़्रीका तक भी कई केबल बिछी हुई हैं.
कई केबल लाल सागर से होती हुई दक्षिण भारत और वहां से सिंगापुर और आगे साउथ चाइना सी, फ़िलीपीन्स, टोक्यो से ऑस्ट्रेलिया और फिर वहां से प्रशांत महासागर के ज़रिए अमेरिका तक पहुंचती हैं.
यह केबल अक्सर टूट जाती हैं. हर साल लगभग दो सौ ऐसी घटनाएं होती हैं. लेन बर्डेट का कहना है कि ज़्यादातर केबल दुर्घटनावश कटती हैं.
केबल टूटने की ज्यादातर घटनाएं तट के नज़दीक होती हैं, जहां पानी गहरा नहीं होता और कई बार नौकाओं के लंगर में फंसने से यह केबल टूट जाती हैं.
केबल की मरम्मत के लिए नौकाएं हमेशा तैयार रहती हैं. जहां केबल टूट जाती है, वहां जाकर इंजीनियर उसे समुद्रतल से ऊपर उठा कर दोबारा जोड़ देते हैं. अब सवाल है कि यह काम किसकी ज़िम्मेदारी है और दुर्घटना होने पर क्या होता है?
केबल पर किसका नियंत्रण

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मल्टा स्थित संस्था डिप्लो फ़ाउंडेशन के निदेशक यूवान कुर्बाल्या बताते हैं कि दुनियाभर की अधिकांश इंटरनेट तारों या केबल की मिलकियत चंद कंपनियों के हाथों में है.
यूवान कुर्बाल्या ने कहा, "समुद्र में बिछी केबल की मिलकियत मुख्यत: तीन प्रकार की कंपनियों के पास है. इसमें एक है टेलीकॉम कंपनियां, जैसे कि ब्रिटिश टेलीकॉम, जर्मन टेलीकॉम और एटी एंड टी. समुद्र में बिछी केबलों की दूसरी बड़ी मिलकियत सिलिकॉन वैली की टेक्नॉलॉजी से जुड़ी कंपनियों के पास है, जिसमें फ़ेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ़्ट शामिल हैं. इन केबल की मिलकियत का बहुत छोटा हिस्सा कुछ सरकारों के हाथ में है. मिसाल के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात और ब्राज़ील."
यूवान कुर्बाल्या के अनुसार समु्द्र में फ़ाइबर ऑप्टिक केबल बिछाने और इन केबल को बनाने का काम ज़्यादातर चीन, अमेरिका, इटली और फ़्रांस की कंपनियां करती हैं. हालांकि, इन केबल की मिलकियत सरकारों के पास नहीं है, मगर उनके पास इस व्यवस्था को नियंत्रित करने के कई दूसरे रास्ते हैं.
इस केबल प्रणाली को बढ़ाने और बरकरार रखने के लिए इन्हें समुद्र तट पर लाना पड़ता है, जिसे लैंडिंग स्टेशन कहते हैं. बिना लैंडिंग स्टेशन के यह केबल किसी काम की नहीं होती. समुद्र तट सरकार के नियंत्रण में होते हैं. सरकार दो तरीके से इस केबल प्रणाली को नियंत्रित कर सकती है.
यूवान कुर्बाल्या ने बताया कि निजी कंपनियों की केबल को नियंत्रित करने का एक ज़रिया कानून है. जो केबल कंपनियां ब्रिटेन में रजिस्टर्ड हैं, उन्हें ब्रिटेन के कानूनों के हिसाब से ही काम करना पड़ता है.
इस केबल व्यवस्था को नियंत्रित करने का दूसरा तरीका लाइसेंसिंग है.
"मिसाल के तौर पर अमेरिका ने पिछले कुछ सालों में उन केबलों को अमेरिका में लैंडिंग स्टेशन की अनुमति देने पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिन्हें चीनी कंपनियों ने विकसित किया है या जिनके पास चीन या हांगकांग में लैंडिंग स्टेशन हैं."

यूवान कुर्बाल्या का मानना है कि असल ख़तरा इस बात से है कि इन केबल की मिलकियत सिलिकॉन वैली की चंद टेक्नॉलॉजी कंपनियों के हाथ में सिमट रही है, जिससे इस क्षेत्र में उनका एकाधिकार हो सकता है.
मिसाल के तौर पर कुछ ख़बरों के अनुसार मेटा कंपनी दुनियाभर में समुद्र में यह केबल बिछाने के लिए दस अरब डॉलर के निवेश की योजना बना रही है, वहीं गूगल भी इसके लिए अरबों डॉलर लगा रही है.
यूवान कुर्बाल्या ने चेताया, "अगर सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म और दूसरे डिजिटल माध्यम एक ही कंपनी के हाथ में आ जाएं तो वो वह हमारी डिजिटल अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन को भी नियंत्रित करने लगेगी."
"पहले ऐसा होता था कि फ़ेसबुक या इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफ़ार्म इन कंपनियों के हाथ में थे, लेकिन वह ट्रैफ़िक ब्रिटिश टेलीकॉम और एटी एंड टी जैसी टेलिकॉम कंपनियों के माध्यम से चलता था, जिससे इस व्यवस्था पर अंकुश लगा रहता था. अगर हमारे कंप्यूटर और मोबाइल फ़ोन से होने वाली गतिविधियां एक या चंद कंपनियों के हाथ में चली जाएं तो अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था के लिए बड़ा ख़तरा पैदा हो सकता है."
यूवान कुर्बाल्या का कहना है कि समुद्र में बिछी केबल की सुरक्षा के लिए कई अंतर्राष्ट्रीय संधियां हैं, लेकिन उन्हें लागू करना मुश्किल है. हमने देखा है कि हाल में बाल्टिक सागर में बिछी केबल को निशाना बनाने की कई वारदातें हुई हैं.
केबल कटिंग

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वॉशिंगटन स्थित संस्था सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ की वरिष्ठ शोधकर्ता एरिन मर्फ़ी का मानना है कि ऐसी अधिकांश वारदातें नौकाओं के लंगर में केबल फंस जाने से होती रही हैं.
इस प्रकार की वारदातों से इंटरनेट सेवा प्रभावित ना हो, इसलिए कई जगहों पर वैकल्पिक केबल डाली गई है. लेकिन यह हर जगह मौजूद नहीं हैं.
मिसाल के तौर पर दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित टोंगा के नज़दीक ज्वालामुखी फटने और सुनामी आने सें वहां समुद्र में बिछी एकमात्र केबल कई जगह से कट गई और टोंगा का शेष विश्व से संपर्क लगभग एक महीने तक टूट गया. वहां लगभग एक साल तक इंटरनेट सुविधा प्रभावित रही.
एरिन मर्फ़ी का कहना है कि केबल संपर्क को दोबारा बनाने में लगभग एक साल तक का समय लग जाता है.
"अगर ऐसे क्षेत्र के आस-पास दूसरी केबल बिछी हुई हो, तो समस्या का समाधान जल्दी निकल जाता है. लेकिन टोंगा जैसे द्वीप राष्ट्र को इस स्थिति में सैटेलाइट टेक्नॉलॉजी पर निर्भर करना पड़ता है."
समस्या वहां भी गंभीर हो सकती है जहां सबमरीन या समुद्र में बिछी कई केबल मिलती हैं. ऐसी जगहों को चोक पॉइंट कहा जाता है. यानी अगर यहां केबल कट जाए तो इसका बड़ा प्रभाव पड़ता है.

यूरोप, एशिया और अफ़्रीका के बीच स्थित मिस्र, भूमध्यसागर और लाल सागर के बीच जंक्शन पर बसा है. यह भी एक बड़ा चोक पॉइंट है.
एरिन मर्फ़ी ने कहा कि दुनिया की 40 प्रतिशत सबमरीन केबल मिस्र में जुड़ती हैं. यह केबल अफ़्रीका महाद्वीप को जोड़ती हैं.
पांच साल पहले एक वारदात हुई थी, जिसमें वहां एक केबल क्षतिग्रस्त हो गई, जिससे अफ़्रीका, मध्यपूर्व और एशिया का लगभग 80 प्रतिशत इंटरनेट कनेक्शन प्रभावित हुआ था. इससे केवल सोशल मीडिया और एप्स पर ही नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा क्योंकि आर्थिक सेवाएं और ई-कॉमर्स जैसी गतिविधियां भी बुरी तरह प्रभावित हुईं.
पिछले साल लाल सागर में कई बार समुद्र में बिछी केबल क्षतिग्रस्त हुईं, जिसका संबंध क्षेत्र में चल रहे संघर्ष से भी जोड़ा गया. वहीं बाल्टिक सागर में भी केबल को निशाना बनाया गया.
कुछ लोग मानते हैं कि इन केबल को निशाना बनाना अस्पष्ट रूप से लड़े जाने वाले युद्ध की तरह है क्योंकि यह साबित करना बड़ा मुश्किल है कि किसी देश ने जान-बूझकर केबल काटी होंगी.
एरिन मर्फ़ी कहती हैं कि समुद्र में बिछी केबल के विशाल जाल की निगरानी करना बहुत मुश्किल है. इन वारदातों में चीन और रूस की ओर उंगलियां उठाई गई थीं.
एरिन मर्फ़ी ने कहा, "चीन पर ताइवान की खाड़ी और साउथ चाइना सी में केबल को निशाना बनाने के आरोप भी लगे हैं. बाल्टिक सागर में केबल कटने की वारदात में चीन की एक नौका शामिल बताई गई है. इस नौका ने जानबूझकर केबल काटी या नहीं यह कहना मुश्किल या साबित करना मुश्किल है. मगर इससे रूस और चीन के बीच संबंधों को लेकर चिंता बढ़ गई है."
संचार के लिए दुनिया इन केबल पर बहुत अधिक निर्भर है, जिसके चलते उन्हें ख़तरा भी बढ़ गया है. ऐसे में सवाल यह है कि इन्हें भरोसेमंद बनाने और इनकी सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए क्या किया जा सकता है?
भविष्य की चुनौतियां

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वॉशिंगटन डीसी स्थित थिंकटैंक जर्मन मार्शल फ़ंड की निदेशक क्रिस्टीन बर्ज़िना बताती हैं कि यह सबमरीन केबल अब वहां पहुंच रही हैं, जहां पहले कभी नहीं डाली गई थीं.
"मिसाल के तौर पर उत्तरी ध्रुव में बर्फ़ीले पानी की वजह से केबल बिछाने वाली नौकाएं नहीं जा पाती. लेकिन उम्मीद है कि जिन जगहों में पहले केबल डालना मुमकिन नहीं था, अगले पांच या छह सालों में अब वहां भी केबल डाली जा सकेंगी."
जैसे-जैसे समुद्र में बिछी केबल का जाल फैलेगा, सरकारों के सामने हमलों से उनकी सुरक्षा करने की चुनौती भी बढ़ जाएगी. क्रिस्टीन बर्ज़िना बताती हैं कि यूरोपीय देशों ने केबल नेटवर्क की सुरक्षा के लिए चौकसी बढ़ा दी है.
कुछ यूरोपीय देश उन नौकाओं को रोक रहे हैं या ज़ब्त कर रहे हैं, जो उन्हें संदिग्ध नज़र आती हैं. नेटो देशों ने भी संदेश दिया है कि अगर कोई जानबूझकर समुद्र में बिछी केबल के निशाना बनाता है, तो वो उसे गंभीरता से लेंगे.
साथ ही इन केबल पर ऐसे सेंसर लग रहे हैं, जिनसे इंजीनियरों को पता लग जाता है कि केबल कहां कटी है. साथ ही, पानी के नीचे लगाए जा रहे नए क्वांटम सेंसर इस निगरानी को और आसान बना सकते हैं.
क्रिस्टीन बर्ज़िना ने कहा कि यह नए सेंसर मौजूदा सेंसर की तुलना में समुद्र की ध्वनि और किसी ग़लत कार्रवाई की आवाज़ में बेहतर तरीके से फ़र्क कर सकते हैं. क्वांटम टेक्नॉलॉजी से बने इन नए सेंसरों के ज़रिए समुद्र के नीचे क्या हो रहा है, यह अधिक साफ़ सुनाई देगा.

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दुनिया में इंटरनेट डेटा भेजने के माध्यमों में बदलाव आ रहा है. डेटा प्रसारण का दूसरा विकल्प अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट हैं. हालांकि, वो समुद्र में बिछी फ़ाइबर ऑप्टिक केबलों की तुलना में बहुत कम मात्रा में डेटा प्रसारित कर सकते हैं और अधिक मंहगे भी हैं. मगर इसमें भी बदलाव आ सकता है.
क्रिस्टीन बर्ज़िना ने कहा, "केबल अभी भी डेटा प्रसारण का सबसे किफ़ायती, तेज़ और भरोसेमंद माध्यम है. लेकिन सैटेलाइट के ज़रिए डेटा ट्रांसमिशन भी तेज़ होता जा रहा है. पृथ्वी के नज़दीक या निचली कक्षा में तैनात सैटेलाइट यह काम बख़ूबी कर रहे हैं. इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्टारलिंक है."
स्टारलिंक एक ऐसा सैटेलाइट नेटवर्क है, जिसे एलन मस्क द्वारा स्थापित की गई कंपनी स्पेस एक्स कंपनी चलाती है. पृथ्वी की निचली कक्षा में तैनात इस कंपनी के हज़ारों सैटेलाइटों के ज़रिए इंटरनेट डेटा का प्रसारण होता है.
साथ ही, हज़ारों और सैटेलाइटों को अंतरिक्ष में तैनात करने की योजना भी है. क्रिस्टीन बर्ज़िना कहती हैं कि जैसे-जैसे अन्य कंपनियां अपने सैटेलाइट अंतरिक्ष में तैनात करना शुरू करेंगी, वैसे-वैसे इस माध्यम की ओर रुझान भी बढ़ेगा. मगर यह सैटेलाइट समुद्र में बिछी डेटा केबल की जगह नहीं लेंगे, बल्कि डेटा प्रसारण में योगदान देंगे.
डेटा केबल दुनिया में डेटा के प्रसारण का मुख्य माध्यम बनी रहेंगी. इसके साथ ही इनकी सुरक्षा ज़रूरी है, हालांकि इन केबल के क्षतिग्रस्त होने पर इनकी मरम्मत भी काफ़ी तेज़ी के साथ कर दी जाती है.
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- क्या दुनिया समुद्र में बिछी इंटरनेट केबल नेटवर्क पर निर्भर रह सकती है? हमारे एक्सपर्ट कहते हैं कि फ़िलहाल हमारे पास डेटा प्रसारण का इससे बेहतर और किफ़ायती विकल्प नहीं है.
हालांकि, इस केबल नेटवर्क की सुरक्षा बड़ी चुनौती ज़रूर है. लेकिन इंटरनेट डेटा की बढ़ती मांग और इस प्रणाली के फैलते जाल के साथ हमें यह भी सोचना होगा दुनिया के सभी हिस्सों को यह सुविधा मिल पाए. हमारे एक्सपर्ट मानते हैं कि इन केबल पर होने वाले हमलों का कड़ा जवाब देना और डेटा प्रसारण के नए माध्यम विकसित करना भी बेहद ज़रूरी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित















