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पाकिस्तान के समाज में आज़ाद ख़्याल औरतों के लिए कितनी जगह: ब्लॉग
- Author, उरूज जाफ़री
- पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
मैं जब 2001 में बीबीसी की उर्दू सेवा ज्वाइन करने लंदन के लिए रवाना हो रही थी तो मुझसे कई बरस छोटी कज़िन अपना घर बसाने की तैयारियों में लगी थी.
अब्बू का देहांत हो चुका था लेकिन अम्मी ने मुझे मेरे बरसों के ख्वाब को पूरा करने के लिए लंदन जाने के लिए इजाज़त दी थी.
मैं अपने ख़ानदान की पहली लड़की थी जो किसी वर्क परमिट पर मुल्क से बाहर इतने बड़े ब्रॉडकास्टिंग हाउस में काम करने गई और वो भी शादी से पहले.
वो कहते हैं ना, 'पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं', हमारे घर में लिखने, पढ़ने और कला का माहौल ऐसा था कि जैसे कि पूत के पांव पालने में लिख दिए गए हों.
हम पांच भाई बहनों में तीनों बहनों ने लिखने को अपने करियर चुना. सबसे बड़ी बहन क्रिएटिव डायरेक्टर रहीं, कुछ साल हुए वो आसमानों में जा बसीं.
मैंने और समन आपा ने पत्रकारिता को चुना.
अम्मी ने जैसे मुझे लंदन भेजा था, उसी तरह जून 2004 में स्थानीय नौकरी से रिज़ाइन करवाकर साथ वापस भी ले आई थीं.
माएं भी अज़ीब होती हैं, पहले ख़्वाब पूरे करने देती हैं और फिर 'शादी करो' का राग सुनाती हैं.
शादी मैंने भी की, अपनी पसंद और अपने फ़ैसले से, एक पेशेवर पत्रकार से.
आज़ादी
अपना फ़ैसला आपको आज़ाद भी करता है और बांधता भी है. मैंने शादी के बाद, पहले ही दिन से कुछ सामाजिक टैबू गिराए.
मेरे पति के गांव में लोग मुझे देखकर कहते हैं कि 'बेनज़ीर की हुक़ूमत आई हुई है'.
मेरा हमेशा से यही माना है चाहे शहर हो या गांव, बेटी को शिक्षा दिलाओ और जायदाद में हिस्सा दो.
इस सारे सफ़र में ये बात सबसे अहम रही है कि मेरे पति ने हमेशा मुझे बराबरी की बुनियाद पर अपनाया.
हम बहनों ने जो पेशा चुना, वो अपने वक्त में काफ़ी अलग माने जाते थे.
इन पेशों में बहुत कम महिलाएं काम कर रही थीं. अब वक्त बदला है और बहुत सी पाकिस्तानी महिलाएं क्रिएटिव पेशों से जुड़ी हैं.
मैंने जब कुछ पढ़ी लिखी प्रोफ़ेशनल महिलाओं से पूछा कि वो पाकिस्तानी समाज में खुद को कहां देखती हैं तो उनका जवाब हौसले से भरे और उत्साहजनक थे.
सितारा एक आर्टिस्ट हैं. वो ना सिर्फ़ रंगों से जुड़ी हैं बल्कि अकेली मां होने के नाते ज़िंदगी के बहुत से रंग देखे हैं.
उनका मानना है कि समाज आज़ाद नहीं है और काम मिलना भी आसान नहीं.
औरत होने का समाज फ़ायदा लेता है लेकिन महिलाओं के लिए संघर्ष ज़्यादा होता है.
उनके लिए बिल भरने से लेकर किराए पर घर लेना तक मुश्किल भरा होता है.
सितारा की दो युवा बेटियां भी उनके साथ हैं, ऐसे में तीन महिलाओं को घर किराए पर देना भी समाज में मुश्किल चुनौती है.
महिलाओं को समाज से मदद कम ही मिलती है. आप अगर टीचर या डॉक्टर हैं तो शायद कुछ आसानी होती है लेकिन क्रिएटिविटी के मैदान में औरतों को देखने का आज भी समाज आदि नहीं है.
महिला अधिकारों से जुड़ी एक कार्यकर्ता अमना नवाज़ ख़ान क्लासिकल डांसर भी हैं.
उनका मानना है कि वो उस समाज का ख़्वाब देखती हैं जिसमें सबको बराबरी का अधिकार हासिल हो और विकास केवल सुविधा संपन्न तबके तक सीमित ना हो.
अमना का कहना है कि पाकिस्तान में सामाजिक मुद्दे भी सैनिक शासन का निवाला बने हुए हैं.
जब तक इस सब पर चर्चा का माहौल नहीं होगा, महिलाएं हर मसले पर निशाना बनाई जाती रहेंगी.
एक महिला मंडल का मानना है कि औरत आज़ाद, समाज आज़ाद. लेकिन समाज तो रीति रिवाज और धर्म के टुकड़ों में बंटा हुआ है और ये सब मुश्किल है मगर नामुमकिन नहीं.
पैरों में जंजीर
समाज में जेंडर के मुद्दे पर काम करने वाली रेहाना शेख़ का मानना है कि पाकिस्तान में सुरक्षा का मामला सबसे अहम है, इसलिए समाज और विकास पर ध्यान कम से कम जाता है, और महिलाओं के सवाल तो बहुत पीछे रह जाते हैं.
जब तक समाज अपने-अपने ऑर्बिट की परिक्रमा से बाहर नहीं निकेलगा, ना औरत आज़ाद होगी और ना ही समाज.
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की पूर्व चेयरपर्सन अफरासियाब खट्टक का भी मानना है कि पाकिस्तान एक सिक्योरिटी स्टेट है, जहां महिलाएं मुल्क के हर संकट को झेलने के लिए अभिशप्त हैं. साथ में धर्म और समाज की जंजीर उनके पैरों में हैं.
समाज की नज़र में पुरुष औरतों का रखवाला है. जब तक औरत को उनके फ़ैसलों में आज़ादी नहीं दी जाएगी, उनके विकास के रास्ते नहीं खुलेंगे.
महिलाओं के सामने एक चुनौती ये भी है कि पढ़ी लिखी महिलाएं भी अपनी जमात की दुश्मन बन जाती हैं.
बदलते वक्त में औरतें
समाज में ये भी कहा जाता है कि औरत की कमाई में बरकत या समृद्धि नहीं होती, जब ये माना जाए तो औरत का कामकाजी होना डरावना भी लगता है.
ऐसे में युवा पीढ़ी की भूमिका अहम हो जाती है. युवा पीढ़ी की लड़कियों का मानना है कि क्या उन्हें पढ़ने, सोचने और फ़ैसले लेने की आज़ादी तभी मिल सकती है जब वे घर के पुरुषों को बराबरी से तस्लीम करें.
एक तरफ़ अगर अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं पर पाबंदियां बढ़ी हैं तो दूसरी तरफ़ ईरान की औरतों ने हिज़ाब और बुर्का उतार फेंका है और कड़ी सजाएं भी झेली हैं.
लेकिन वक्त बदल रहा है और इस इंकलाब की बड़ी क़ीमत पाकिस्तान में भी औरत या लड़कियों को चुकानी होगी.
इन्हीं सब सियासी और समाजी कठिनाईयों से गुजर कर आज मलाला यूसुफ़जई, मुख्तारन माई, जलिला हैदर और बेनज़ीर भुट्टो जैसी महिलाओं ने पाकिस्तान को पहचान दी है.
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