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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री महिलाओं पर ऐसी टिप्पणी कर घिरे
- Author, सहर बलोच
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ पूर्व पीएम इमरान ख़ान की पार्टी की महिला नेताओं पर अभद्र टिप्पणी को लेकर विवाद में हैं.
पिछले सप्ताह पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने संसद में विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की महिला नेताओं को 'कूड़ा करकट' कहा था.
लेकिन शायद तब उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि उनके इस बयान का देश में इस तरह का विरोध होगा.
इससे पहले भी कई पाकिस्तानी लेखकों, क्रिकेटरों, मशहूर हस्तियों और न्यायाधीशों ने भी महिलाओं पर इसी तरह की आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं.
पाकिस्तान की प्रांतीय असेंबली की सदस्य शर्मिला फ़ारूक़ी मीडिया से बात करते हुए कहती हैं, ''पुरुषों के पास महिलाओं के ख़िलाफ़ इस तरह की आपत्तिजनक टिप्पणी करने का लाइसेंस है.''
ये पहली बार नहीं है जब 73 साल के ख़्वाजा आसिफ़ ने संसद में ऐसी बात की हो.
इससे पहले संसद के एक संयुक्त सत्र में ख़्वाजा आसिफ़ ने एक पूर्व मंत्री शिरीन मज़ारी को ''ट्रैक्टर ट्रॉली'' कहा था, ये शब्द उन्होंने उनके वजन पर तंज कसते हुए कहे थे.
पाकिस्तान की संसद में पहले भी इस तरह की भाषा का इस्तेमाल होता रहा है.
अक्सर ख़्वाजा आसिफ़ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल-एन) पार्टी और पाकिस्तान तहरीक-ए- इंसाफ़ पार्टी ने विरोधी दलों की महिला नेताओं के बारें में भद्दे शब्द कहे हैं.
हालांकि, इस बार ख़्वाजा आसिफ़ के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया ज़्यादा व्यापक और तेज़ है.
अब तक नहीं मांगी माफ़ी
पीटीआई और अन्य दलों के सांसदों ने सोशल मीडिया पर ख़्वाजा आसिफ़ पर निशाना साधा, तो वहीं कई न्यूज़ चैनलों और अख़बारों ने उनकी आलोचना की.
पाकिस्तान के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा, ''हमारे रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ को लैंगिक समानता पर स्कूली शिक्षा की ज़रूरत है.''
तमाम आलोचनाओं के बावजूद ख़्वाजा आसिफ़ ने अपने बयान पर अब तक माफ़ी नहीं मांगी है.
उन्होंने ट्वीट कर कहा कि उनके बयान को ग़लत समझा गया है और किसी को कचरा कहना लिंग-विशेष शब्द नहीं है.
लेकिन समाजशास्त्री निदा किरमानी कहती हैं कि इस तरह बयानों की आलोचना करना समाज में बदलाव का संकेत देते हैं.
वो कहती हैं, ''कुछ साल पहले तो इतना हंगामा भी नहीं होता और उन्हें भी अपने बयान पर किसी तरह की सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं पड़ती. अगर आज ख़्वाजा आसिफ़ को अपने बयान पर सफ़ाई देनी पड़ी तो ये महिला अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं के अथक संघर्ष का नतीजा है.''
निदा किरमानी कहती हैं कि ज़ाहिर सी बात है कि सोशल मीडिया गेमचेंजर रहा है, जो महिलाओं को अपनी बात रखने का मौक़ा देता है.
'टीवी पर महिलाओं का ग़लत चित्रण है ज़म्मेदार'
हाल ही में ऐसा ही एक वाक्य ने तब सुर्ख़ियाँ बटोरीं जब लोकप्रिय नाटक बेबी बाजी की एक क्लिप वायरल हो गई.
इस क्लिप में पति का किरदार निभाने वाले शख्स को अपनी ऑन स्क्रीन पत्नी को थप्पड़ मारते हुए दिखाया गया.
क्लिप के वायरल होने के बाद कई पुरुषों ने उस सीन की तारीफ़ करते हुए कहा, ''आख़िरकार इस महिला को इसकी असल जगह दिखा दी.''
लेकिन महिलाओं ने तुरंत इसका विरोध किया.
अमीना रहमान ने कमेंट करते हुए लिखा, ''मैं अपने आसपास दुर्व्यवहार करने वाले बहुत से परुषों को देखती हूँ. महिलाओं का इस तरह का चित्रण लोगों के दिमाग़ में घर कर जाता है, और इस जब सच में किसी महिला को इस तरह थप्पड़ जड़ा जाता है, तो लोग ख़ुशी मनाते हैं.”
पाकिस्तान की कई महिलाओं का मानना है कि टीवी पर आने वाले मनोरंजक कार्यक्रम कई बार महिलाओं का ऐसा चित्रण करते हैं, जो उन्हें पिछड़ा हुआ दिखाते हैं.
वीडियो ब्लॉगर सबाहत ज़कारिया कहती हैं कि टीवी या स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर जो कंटेंट परोसा जाता है उसमें पहले की तुलना में अब महिलाओं के खिलाफ़ ज़्यादा लिंगभेद दिखाया जाता है.
वो कहती हैं कि 1980 के दशक में आने वाले कार्यक्रम काफ़ी बेहतर थे, जो महिलाओं को अपने करियर के साथ-साथ परिवार का ख़्याल रखते हुए दिखाते थे.
लेकिन कई ऐसे शो भी हैं जो इस धारणा को तोड़ रहे हैं, जैसे कि महिला जासूसों पर बनी एक काल्पनिक वेब सिरीज़- चुड़ैल.
पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड ने इसे बहुत साहसिक पाया और लोगों के विरोध के बाद इसे बैन कर दिया
पाकिस्तानी अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता आदिल अफ़ज़ल कहते हैं,''पाकिस्तानी समाज ने महिलाओं को एक इंसान, एक शख़्सियत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है, उसे सबकी तरह जीने का अधिकार ही नहीं दिया है जिसकी वह हक़दार हैं.''
''और हर वो चीज़ जो हम महिलाओं के ख़िलाफ़ होते देखते हैं वह उसी का नतीजा है. जैसे, जब कोई महिला दुर्व्यवहार या उत्पीड़न के बारे में शिकायत करती है, तो हम उससे लड़ते हैं उसके ख़िलाफ़ जाते हैं और इस बीच अपराधी भाग जाता है.''
पर कई बार लोगों का आक्रोश इतना तेज़ होता है कि मजबूर होकर बात करनी पड़ती है
बीते महीने अप्रैल में, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेता नबील गोबोल की एक टिप्पणी ने बहस छेड़ दी.
एक पॉडकास्ट शो में नबील ने राजनीतिक समझौतों का ज़िक्र करते हुए कहा, ''अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि जब बलात्कार होने से नहीं रोक सकते तो आप उसका आनंद भी ले सकते हैं''
नबील गोबोल के इस बयान ने बहुत सारे लोगों को नाराज़ कर दिया. लोगों ने ट्विटर और फ़ेसबुक पर अपनी नाराज़गी जताते हुए गोबोल की पार्टी को टैग कर कहा कि वो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करे.
आख़िरकार उनकी पार्टी ने उनसे माफ़ी मांगने को कहा. जिसके बाद गोबोल ने माफ़ी मांगी भी.
समाजशास्त्री निदा किरमानी उम्मीद के साथ कहती हैं, ''इस तरह निरंतर आलोचना होने की वजह से राजनेता और लोग महिलाओं के ख़िलाफ़ कुछ भी कहने से पहले ख़ुद पर काबू रखेंगे. उम्मीद करती हूं एक दिन ऐसा आएगा''
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