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ब्लॉग: क्या महिलाएं कभी कह पाएंगी, हां आज़ाद हूं मैं
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आज सुबह अख़बार हाथ में लेते ही भोपाल से लेकर बिहार तक हो रहे बलात्कारों की ख़बरों पर नज़र पड़ी. उदास होकर अख़बार मेज़ पर रखने ही वाली थी कि नज़र अखबार के ऊपर पर छपी तारीख़ पर गई - 14 अगस्त 2018.
बुधवार को भारत आज़ादी की 72वीं सालगिरह मना रहा है. यूं तो सृष्टि के विशाल इतिहास में 72 साल वक़्त की आंख से छलके एक आंसू जितना छोटा अरसा है, लेकिन फिर भी बाहर गिरती बारिश में डूबते मेरे मन में एक सवाल उठा- 72 साल के इस युवा आज़ाद देश में आखिर कितनी आज़ाद हैं हम महिलाएं?
आज़ाद भारत में बड़ी हुई एक भारतीय लड़की होने की वजह से इस सवाल के जवाब का एक स्वरूप मैं अपने दिल में जानती हूं और हर रोज़ सड़कों पर चलते हुए महसूस भी करती हूं. लेकिन फिर भी इस सवाल के ताज़ा आकड़ों से लेकर इतिहास के पन्नों में दर्ज जवाबों को टटोलने के लिए मैंने इंटरनेट और किताबों को खंगालना शुरू किया.
जानना यह था कि जिस 'आधी आबादी' का आवाहन महात्मा गाँधी ने स्वतंत्रा आंदोलन के दौरान 'भारत की अप्रयुक्त शक्ति' के तौर पर किया था, क्या आज उस आधी आबादी को अपनी क्षमताओं का पूरा दोहन करने का अवसर मिल रहा है?
समाज और कई बार अपनी ही संविधान सभा के सदस्यों से लड़कर भारत के जिस संविधान में बाबा साहब आम्बेडकर ने हमारे आज़ाद और स्वावलंबी भविष्य के बीज बोये थे, आज वह क़ानून हमें हमारे जीवन पर कितना अधिकार दिला पाते हैं?
सिर्फ़ दो प्रतिशत महिलाओं के साथ शुरू हुई भारत की पहली संसद की यात्रा आज कितनी आगे पहुंची है? इन सवालों के जवाब में मुझे मिला आंकड़ों का एक पुलिंदा और इस देश में स्त्री सशक्तीकरण के लिए समय-समय पर बनाए क़ानूनों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त. इनमें से कुछ मह्त्वपूर्ण जानकारियों को मैं आपके साथ आगे साझा भी करूंगी पर उससे पहले आइए मिलते हैं सुगंधा से.
हसरतों की उड़ान
सुगंधा मध्यप्रदेश के बेतूल या महाराष्ट्र के बीड ज़िले में या कहीं और रहने वाली कोई भी लड़की हो सकती है. ठीक इसी तरह वह मुंबई और दिल्ली जैसे भारत के महानगरों में बसने वाली कोई लड़की भी हो सकती है. सुगंधा अपनी आँखों में सपने लिए हर रोज़ अपने गांव या शहर की सड़कों पर निकलना चाहती है. वह पढ़ने जाना चाहती है. कभी खेतों तो कभी फ़ैक्ट्रियों में काम करने जाना चाहती है. अपने काम में वह एक पद के लिए सामान वेतन चाहती है.
वह शारीरिक पोषण और मानसिक विकास के समान अवसर चाहती है. सड़कों पर देर रात फिरना चाहती है. दिल होने पर बेख़ौफ़ होकर गहरे गले का ब्लाउज़ पहनना चाहती है. वह प्रेम का निवेदन पहले करना चाहती है. सुगंधा की आत्मा जब उसके दिल और मर्ज़ी की थाप पर एक साथ गुनगुनाती है, तब वह निर्भय होकर शारीरिक प्रेम करना चाहती है. उसे 'देवी' और 'स्त्री की गरिमा' के नाम पर अपने ऊपर थोपे गए समाज के तमाम नैतिक निर्णयों पर कभी हंसी आती है तो कभी गुस्सा.
स्त्री की गरिमा किसी दूसरे मनुष्य की मानवीय गरिमा से अलग कैसे? जाति और धर्म के 'सम्मान' के नाम पर मारे जा रहे प्रेमियों के युग में सुगंधा अपनी मर्ज़ी से अपना साथी चुनने का अधिकार भी चाहती है. दिल चाहे तो वह बुर्क़ा पहनना चाहती है और मन करे तो बिकनी भी. उसकी मर्ज़ी हो तब लाल लिपस्टिक लगाने का अधिकार चाहती है और मर्ज़ी हो तो बिना मेकअप फिरने का हक़. शादी करने न करने के साथ-साथ बच्चे पैदा करने और माँ न बनने में से अपने लिए ख़ुद चुनने का अधिकार. किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का अधिकार. उसे अपने लिए चुनने का अधिकार चाहिए.
आज़ादी और आंकड़े
सुगंधा आज आज़ाद भारत की 72वीं सालगिरह की साक्षी है. अब आप कहेंगे कि यह सारे अधिकार तो संविधान उसे पहले ही दे चुका है!
बस, यहीं पर यह बात साफ़ हो जाती है कि क़ागज़ी क़ानूनों और ज़मीनी सच्चाई के बीच उतनी ही दूरी होती है जितनी एक हाथ से फिसलते चाय के प्याले और होठों के बीच. चाय पीने, क़ानूनों के काम करने और अधिकारों के मिल जाने का भ्रम तो बना रहता है, पर ज़मीन पर असल तस्वीर जस की तस रहती है.
सबसे ताज़ा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में हर रोज़ 106 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं. इन 106 में कम से कम 40 प्रतिशत पीड़ित नाबालिग लड़कियां हैं. आंकड़ों की यह स्थिति तब है जब 99 प्रतिशत यौन हिंसा के मामले दर्ज होने के लिए थाने तक पहुंच ही नहीं पाते हैं.
एक ओर जहां महिला आरक्षण बिल दशकों से अधर में लटका हुआ है, वहीं दूसरी ओर 2018 के आर्थिक सर्वेक्षण में पाया गया कि देश की कुल जनसंख्या का 49 प्रतिशत बनाने वाली भारतीय महिलाओं का संसद और अन्य ज़रूरी सरकारी पदों पर प्रतिनिधत्व बहुत कम है.
आज जहां देश के लगभग 85 प्रतिशत पुरुष शिक्षित हैं, वहीं 65 प्रतिशत लड़कियां ही साक्षर हो पाई हैं. यह बात और है कि एक अदद मौका मिलने पर लड़कियां हर तरह की राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार अपना परचम लहरा कर ख़ुद को साबित कर रही हैं. पर शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता से ही वंचित देश की हज़ारों लड़कियों के लिए रेस की शुरूआती लकीर औरों से पीछे खिंच जाती है.
भारतीय रोज़गार के बाज़ार में औरतों की सिर्फ़ 25 प्रतिशत हिस्सेदारी भी ऊपर लिखे आंकड़ों का प्रतिबिम्ब जान पड़ती है. एक रिपोर्ट का दावा है कि महिलाओं की रोज़गार में हिस्सेदारी सिर्फ़ 10 फ़ीसदी बढ़ाने से भारत के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी में 70 प्रतिशत का उछाल आ सकता है.
अपने शहर के मुख्य चौराहे पर लहरा रहे तिरंगे को देखते हुए आज सुगंधा इन्ही आकंड़ों के बारे में सोच रही है. उसे लगता है कि आज़ादी के 71 सालों में वह शायद इतना ही आगे बढ़ पाई है...जितना कोई और 78 दिनों या 78 महीनों में बढ़ सकता है. उसे अभी बहुत आगे जाना है...एक ऐसे भारत में अपनी आंखें खोलनी हैं जहां वह निडर होकर बस 'जी' सके और एक दिन...शायद हमारे 178वें स्वतंत्रता दिवस पर आप सबसे कह सके - 'आज़ादी मुबारक, दोस्तों'.
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