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जापान में 23 साल की महिला कैसे बनीं यौन हमलों के ख़िलाफ़ लड़ाई की प्रतीक
शाइमा खलील
टोक्यो संवाददाता
अपनी ज़िंदगी में रीना गोनोई के दो सपने थे. पहला सपना था सैनिक बनना और दूसरा ओलंपिक में जूडो खिलाड़ी के तौर पर हिस्सा लेना.
रीना ने चार साल की उम्र से ही अपने भाई की निगरानी में जूडो सीखना शुरू कर दिया था. जब वो 11 साल की थीं तो पहली बार उन्होंने सैनिकों के काम करने का तरीका देखा.
जापान में सैन्य बलों को सेल्फ़ डिफे़ंस फ़ोर्सेज (एसडीएफ़) कहा जाता है. जापान में 2011 के भूकंप और सुनामी के बाद जब गोनोई और उनके परिवार को एक राहत केंद्र पर लाया गया तो एसडीएफ़ के लोगों ने उनकी बड़ी मदद की थी.
23 साल की रीना मियागी प्रांत की हिगाशी मात्सुशिमा की रहने वाली हैं. ये इलाका भूकंप और सुनामी से बुरी तरह प्रभावित हुआ था.
रीना गोनोई कहती हैं, "भूकंप राहत केंद्र में महिला सैनिक काम कर रही थीं. उन्होंने हमें खाना दिया. वो यहां सूप किचन चला रही थीं."
उन्हें याद करते हुए रीना कहती हैं, "वे दौड़-दौड़ कर हमारे लिए नहाने का गर्म पानी लेकर आ रही थीं. मैं उनको देख कर ये सोचती रही थी कि ये महिलाएं क्या गजब काम कर कर रही हैं. मैंने भी सोचा कि मैं भी इसी तरह समाज की सेवा करूंगी."
कैसे टूटा सपना
जब रीना जापान की आर्मी ग्राउंड सेल्फ़ डिफ़ेंस फ़ोर्स में शामिल हुईं तो उन्हें लगा कि उनके दो सपने अब पूरे हो जाएंगे.
लेकिन यौन उत्पीड़न की वजह से उनके दोनों सपने ध्वस्त हो गए. ट्रेनिंग के बाद यूनिट जॉइन करने के बाद उन्हें यौन प्रताड़ना से गुजरना पड़ा.
वो कहती हैं, "मेरी छाती दबाई गई. मुझे जबरदस्ती चूमा गया. मेरे स्तनों को दबाया गया. हॉल जाने के रास्ते में मेरे सहकर्मी और सीनियर खुद को मेरे शरीर से टकरा देते थे. उस दौरान लोग तमाशबीन बन कर खड़े रहते.’"
"कई बार मुझसे ब्लोजॉब की मांग की जाती थी."
"मेरे सहकर्मी मेरे शरीर पर टिप्पणी करते थे. वे कहते थे कि कैसे मेरे स्तन छोड़े या बड़ा हैं या फिर शरीर कितना बड़ा है."
अगस्त 2021 उनकी जिंदगी में एक अंधेरा मोड़ लेकर आया.
उस दौरान एक दिन पहाड़ों पर एक ट्रेनिंग अभ्यास के दौरान रीना गोनोई के तीन सहकर्मियों ने उन्हें एक टेंट में बुलाया. वहां वे शराब पी रहे थे.
गोनोई ने बताया, "वे मार्शल आर्ट के एक दांव की बात कर रहे थे जिसमें किसी का मुंह बंद कर उसे जमीन पर गिरा दिया जाता है. मुझे देखते हुए उन्होंने कहा गोनोई इसे आजमाओ. जब मैं ये दांव आजमा रही थी तो उन्होंने मुझे नीचे गिरा कर मेरा मुंह बंद कर दिया. मेरा दम घुटने लगा."
गोनोई ने कहा कि तीनों पुरुष सहकर्मियों ने उनके पैर फैला दिए और बारी-बारी से अपने कमर के निचले हिस्से से उनके शरीर को दबाना शुरू कर दिया.
उस समय लगभग एक दर्जन सहकर्मी वहां मौजूद थे. गोनोई ने कहा, "लेकिन किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की. उनमें से कई हंस रहे थे."
जब यौन शोषण की शिकायत खारिज हो गई
वो कहती हैं, "मैं निराशा से भर गई. मैंने सोचा- अपने शरीर और आत्मा पर ये दाग लिए मैं कैसे जी पाऊंगी."
गोनोई ने अपने वरिष्ठ सहकर्मियों को इस घटना की जानकारी दी. लेकिन किसी ने इस घटना की गवाही नहीं दी और शिकायत ख़ारिज़ हो गई.
बाद में जीएसडीएफ़ पुलिस यूनिट ने तीन पुरुष सैनिकों को इस घटना का ज़िम्मेदार करार देते हुए अदालत भेजा. लेकिन सुबूत के अभाव में ये केस ख़ारिज़ हो गया.
थक हार कर गोनोई ने ये सोचा कि अब उनके पास सेना छोड़ कर घर लौटने के अलावा कोई चारा नहीं है.
वो कहती हैं, "मैं मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह थक चुकी थी. मैंने अपने घर में खुद को एक कोने में दुबका लिया था."
जब उन्होंने अपने साथ हुए इस व्यवहार के बारे में सार्वजनिक तौर पर बोलने का फैसला किया तो उनके परिवार और आसपास के लोगों ने इसका विरोध किया.
पुरुष वर्चस्व वाले जापान के समाज में यौन अपराध की शिकार पीड़ितों के लिए ये लोकलाज की बात मानी जाती है. अपने यौन शोषण के बारे में बोलना वहां आसान नहीं है. जो लोग बोलते हैं उन पर हमले होते हैं.
हाल के एक सर्वे में बताया गया है कि जापान में यौन हमले के 70 फीसदी से ज्यादा मामलों की रिपोर्टिंग नहीं होती.
जब गोनोई ने अपने साथ हुई घटना के बारे में बोलने का फैसला किया तो उन्हें ये पता नहीं था कि ये इतना कठिन होगा. वह जापान के सैन्य प्रतिष्ठान से लोहा लेने की तैयारी कर रही थीं.
उन्होंने यूट्यूब पर बताया कि उनके साथ क्या हुआ था. जापान में इस घटना ने पूरे देश और मीडिया का ध्यान खींचा.
लोग आते गए कारवां बनता गया
गोनोई कहती हैं, "इसके बाद सेना और दूसरी जगहों पर काम करने वाले पुरुषों ने अपने साथ हुई यौन हिंसा की कहानियां साझा कीं." गोनोई ने अपनी याचिका के लिए एक लाख दस्तखत इकट्ठा किए.
उन्होंने इस याचिका के आधार पर रक्षा मंत्रालय से अपने मामले की जांच करने के लिए कहा. लेकिन इसके लिए भी उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा.
गोनोई कहती हैं, "कुछ लोग कहते थे, तुम बदसूरत हो. कुछ लोग कमेंट करते थे कि मेरे कान फूलगोभी की तरह दिखते हैं. ये इसलिए कि मैं जूडो किया करती थी. कुछ लोग कहते थे, क्या तुम एक पुरुष हो."
"जब मैं याचिका के लिए दस्तख़त इकट्ठा कर रही थी तो मुझे एक धमकी भरा ई-मेल मिला. इसमें लिखा था, अगर और आगे बढ़ी तो मैं तुम्हें मार डालूंगा."
जापान में यौन शोषण के जिस बड़े मामले ने ज्यादा ध्यान खींचा वो 2019 का था. उस साल जापान की एक पत्रकार शियोरी ने उस पत्रकार के खि़लाफ़ मुकदमा जीता था, जिस पर उन्होंने बलात्कार करने का आरोप लगाया था.
उसी साल ‘फ्लॉवर डेमो मूवमेंट’ शुरू हुआ था. इस आंदोलन के दौरान अप्रैल 2019 से हर महीने की 11वीं तारीख को यौन हिंसा के शिकार लोग अपने समर्थकों के साथ पूरे जापान में सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन करते थे.
वे यौन अपराधियों को ग़लत तरीके से छोड़े जाने का विरोध करते थे.
इस दौरान 2019 में जिन चार मामले में यौन अपराधियों को जिन दलीलों के आधार पर छोड़ा गया, उनकी समीक्षा की गई और बताया कि जापान इस संबंध में से जुड़े कानून में क्या खामियां हैं.
इनमें से एक पिता पर अपनी 19 साल की बेटी के साथ रेप करने का आरोप था. अदालत ने कहा कि उस शख्स ने अपनी बेटी की मर्जी के खि़लाफ़ उसके साथ यौन संबंध बनाए. इसके बावजूद पिता को छोड़ दिया गया.
यौन उत्पीड़न से जुड़े जापान के कानून में क्या खामियां हैं?
मिनोरी किताहारा ने टोक्यो में इसी तरह के एक प्रदर्शन के बाद बीबीसी को बताया, "मैंने ‘फ्लॉवर डेमो मूवमेंट’ शुरू किया था. मैंने यौन हिंसा के ख़िलाफ़ कई महिलाओं के गुस्से को महसूस किया था. लेकिन वो इस पर खुल कर बोल सकें, ऐसी कोई जगह नहीं थी."
‘फ्लॉवर डेमो’ अब यौन हिंसा पर चुप्पी को तोड़ने का प्रतीक बन गया है.
इस साल फरवरी में जापान की सरकार ने एक बिल को मंजूरी दी. इसके मुताबिक़ सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र 13 से बढ़ा कर 16 कर दी गई. सरकार ने इसे देश में यौन हिंसा पर सजा के प्रावधान को कड़ा करने वाला प्रावधान माना.
मौजूदा कानून के मुताबिक़, यौन हिंसा की शिकार शख़्स की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वो साबित करे कि यौन संबंध के लिए उसने सहमति नहीं दी थी. ये भी कि उस पर हमला किया गया या यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया. इसके अलावा ये भी साबित करना होता है कि ऐसी परिस्थिति बन गई थी कि यौन हमले का शिकार शख्स विरोध नहीं कर सका.
किताहारा कहती हैं, "मेरा मानना है कि दूसरे देशों के कानून की तुलना में जापान का क़ानून इस मामले में बड़ा भेदभाव भरा है. अभी भी ये यौन हमलों की शिकार महिलाओं के ख़िलाफ़ जाता है. मेरा तो मानना है कि ये क़ानून ही ऐसी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध की तरह है."
उन्होंने कहा, "मुझे पता है कि यौन संबंध बनाने के सहमति की उम्र सीमा 13 से बढ़ा कर 16 कर दी गई है. लेकिन लंबे समय तक इसकी उम्र 13 साल रहने से जापान में बड़ी समस्याएं आईं."
वो कहती हैं चूंकि जापान सरकार में ज्यादातर ‘बुज़ुर्ग पुरुष’ हैं, इसलिए वो समझ ही नहीं पाते हैं कि महिलाएं किस दर्द से गुजरती हैं.
रीना गोनोई के मामले ने मिलिट्री को आंतरिक जांच के लिए बाध्य किया. इस मामले में पिछले साल दिसंबर में पांच सैनिकों को बर्खास्त किया और यूनिट कमांडर को छह महीने के लिए निलंबित कर दिया गया.
अधिकारियों के मुताबिक़ रक्षा मंत्रालय की इस जांच में पाया गया कि सेना में यौन प्रताड़ना के 100 से अधिक शिकायतें सामने आई थीं.
बाद में मंत्रालय ने गोनोई से क्षमा याचना की.
गोनोई का संघर्ष और सफलता
गोनोई ने कहा कि वह चाहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वैसा किसी और के साथ न हो. उन्होंने इस मामले की उपेक्षा के लिए सरकार को भी दोषी ठहराया.
उन्होंने कहा, "एसडीएफ़ में शामिल हर सदस्य की हिफ़ाजत हो."
इस साल की शुरुआत में गोनोई पांच आरोपियों और जापान के सरकार के ख़िलाफ़ 55 लाख येन यानी 40 हजार डॉलर के हर्जाने का मुकदमा ठोका. अपनी मानसिक प्रताड़ना और इसे रोकने में सरकार के नाकाम रहने के एवज में उन्होंने अतिरिक्त 20 लाख येन मांगे.
मैंने उनसे पूछा कि अपने मामले को सार्वजनिक तौर पर उठाने के बाद हुई लानत-मलामत के बावजूद वो इस केस को आगे क्यों बढ़ा रही हैं.
थोड़ा हिचकिचाते हुए वो बोलीं, "आप कह सकते हैं कि इसमें कोई भी कदम इतना आसान नहीं था."
वो कहती हैं, "मैं एसडीएफ़ से बहुत प्यार करती हूं. उन्होंने 2011 की आपदा के दौरान हमारी मदद की. मैं यही करना चाहती थी."
"लेकिन मेरे साथ जो हुआ वो सही नहीं था. मेरे साथ जो हुआ वो अभी भी मेरे जेहन में कौंधता है. इसने मुझसे मेरा बहुत कुछ छीन लिया."
मार्च में फुकुशिमा के जजों ने जापान के जीएसडीफ़ के तीन पूर्व सदस्यों को दोषी ठहराया. उन पर गोनोई पर यौन हमला करने का शक था.
इस फैसले के बाद ट्वीट करते हुए गोनोई ने ट्विटर पर लिखा, "मुझे लगता है कि मेरा काम बेकार नहीं गया. मैं उम्मीद करती हूं कि तीनों लोग अपने अपराध को स्वीकार करें और प्रायश्चित करें."
वो कहती हैं, "मैंने एक लंबा समय ये सोच कर बिताया है कि मेरे मामले में किसी को दोषी क्यों नहीं ठहराया गया. मेरे लिए हर दिन एक संघर्ष था."
गोनोई कहती हैं वो अब अपनी ज़िंदगी के इस हादसे को पीछे छोड़ कर जीना चाहती हैं. वो यात्राएं करना चाहती हैं.
उन्होंने कहा, "मैं खुश रहना चाहती हूं. मैं दूसरों को हंसाना चाहती हैं. मुझे मुस्कराहट पसंद है. मैं लोगों को दिखाना चाहती हूं कि इतना सब होने के बावजूद मैं सकारात्मक रह कर जिंदगी जी सकती हैं. मैं जैसी हूं वैसी ही रहना चाहती हूं. मैं जो हूं वही रहूंगी.’’
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