बीजेपी नीतीश कुमार को फिर साथ क्यों लाई, जानिए किसे होगा फ़ायदा- प्रेस रिव्यू

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बिहार में सियासी पाला बदलकर सीएम नीतीश कुमार अब फिर से एनडीए का हिस्सा बन गए हैं.
रविवार को नीतीश कुमार ने आरजेडी के साथ अपनी गठबंधन सरकार को ख़त्म किया और बीजेपी के साथ नई सरकार बना ली.
दिल्ली से छपने वाले ज़्यादातर अख़बारों ने इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह दी है.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक़, सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार को इस बार ज़्यादा आक्रामक बीजेपी का सामना करना होगा क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह बिहार जीतना चाहते हैं.
अख़बार लिखता है कि बीजेपी नीतीश कुमार के साथ साझेदारी के लिए शायद इसलिए तैयार हुई क्योंकि वो विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया को नुक़सान पहुंचाना चाहती होगी.
पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि बिहार में बीजेपी पूरा नियंत्रण अपने पास लेना चाहती है.
एक बीजेपी नेता ने कहा, ''बिहार बीजेपी की आपत्तियों के बावजूद शीर्ष नेतृत्व नीतीश कुमार के साथ गया. ये जीतने के लिए झुकने वाली रणनीति है. इस बार बिहार नीतीश कुमार नहीं, बीजेपी चलाएगी.''
हालांकि मोदी और शाह लोकसभा चुनावों तक नीतीश कुमार के मामले में दखल नहीं देंगे ताकि चुनावों में बिहार से ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल की जा सकें.

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बीजेपी-जेडीयू में क्या डील हुई?
टेलीग्राफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बार बीजेपी जेडीयू से ज़्यादा सीटों पर लड़ेगी.
2019 चुनाव में बीजेपी और जेडीयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ी थीं. बाक़ी की छह सीटों पर लोक जनशक्ति पार्टी ने चुनाव लड़ा था.
बीजेपी के एक नेता ने कहा कि इस बार पार्टी 20 सीटों पर ख़ुद लड़ेगी और 14-15 सीटें जेडीयू को दी जा सकती हैं.
पार्टी के रणनीतिकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में बीजेपी अपनी पकड़ मज़बूत करने की शुरुआत करेगी ताकि नीतीश को किनारे किया जा सके.
नीतीश कुमार 72 साल के हो चुके हैं. नीतीश अपने राजनीतिक करियर के ढलान की ओर हैं और बिना किसी मज़बूत उत्तराधिकारी के हैं. बीजेपी का मानना है कि इन कारणों से नीतीश को किनारे करना आसान होगा.
इस वक़्त भी बिहार में जेडीयू की हालत बहुत अच्छी नहीं है. 243 सीटों वाले बिहार में जेडीयू के बस 44 विधायक हैं. वहीं बीजेपी के 78 विधायक हैं.
अगले साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में अगर बीजेपी ने जेडीयू से ज़्यादा सीटें जीत लीं तो वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना दावा करेगी.
बीजेपी के एक नेता ने कहा कि नीतीश कुमार को सम्मानजनक निकासी दी जाएगी और 2025 में नीतीश को केंद्र में जगह दी जा सकती है.

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बीजेपी के दो उपमुख्यमंत्री
टेलीग्राफ अख़बार लिखता है कि बीजेपी ने जब दो डिप्टी सीएम पद बनाए, तो इसी से नीतीश के पर कतरने की झलक देखी जा सकती है. ख़ासकर सम्राट चौधरी को डिप्टी सीएम बनाए जाने पर.
सम्राट चौधरी बिहार बीजेपी के अध्यक्ष हैं और ओबीसी कुशवाहा जाति से हैं. वो नीतीश कुमार की अतीत में खुलकर आलोचना करते रहे हैं.
नीतीश कुमार की ताक़त लव-कुश जाति को माना जाता है. कुर्मी, कुशवाहा जाति के लिए लव-कुश टर्म का इस्तेमाल किया जाता है.
सम्राट चौधरी को डिप्टी सीएम बनाकर बीजेपी नीतीश कुमार के सपोर्ट बेस में घुसना चाहती है.
सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के साथ शपथ जब ली, जब वो सिर पर साफा बांधे हुए थे. ये वही साफा है, जिसके बारे में चौधरी ने कहा था कि ये तभी उतरेगा जब वो नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर करेंगे.
सूत्रों का कहना है कि नीतीश चाहते थे कि सुशील कुमार मोदी को डिप्टी सीएम बनाया जाए लेकिन बीजेपी ने ये बात नहीं मानी.
सुशील मोदी ओबीसी हैं और अतीत में नीतीश कुमार के साथ डिप्टी सीएम रह चुके हैं.
सम्राट चौधरी के अलावा बीजेपी ने विजय सिन्हा को भी डिप्टी सीएम चुना है. ये दोनों नेता नई पीढ़ी के आक्रामक नेता हैं.
बिहार से एक बीजेपी सांसद ने कहा- हम चाहते हैं कि बिहार में अब लड़ाई बीजेपी बनाम आरजेडी की हो, ये मुश्किल इसलिए भी नहीं है क्योंकि नीतीश के वोटर एंटी-आरजेडी हैं.

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लोकसभा चुनाव पर बीजेपी की निगाहें
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, नीतीश कुमार ने पांचवीं बार जब अपना सियासी पाला बदला और बीजेपी ने उनका स्वागत किया तो पार्टी के दिमाग़ में लोकसभा चुनाव रहे होंगे.
पार्टी से जुड़े सूत्रों ने बताया है कि बीजेपी ने तीन कारणों से नीतीश कुमार को अपने पाले में लिया है.
द हिंदू से बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अगर आप महागठबंधन के 2020 चुनाव के वोट बैंक पर नज़र दौड़ाएं तो आरजेडी, कांग्रेस, जेडीयू और सीपीआई (एमएल) का वोट फ़ीसद 52.6 रहा. अगर लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार अकेले भी बीजेपी के साथ रहे तो कम से कम 15 फ़ीसदी वोट बीजेपी के पास आ सकता है.
52 फ़ीसदी ऐसा आंकड़ा है जो बीजेपी और उसके हम, लोक जनशक्ति पार्टी जैसे सहयोगियों से दोगुना है.
2022 में जब बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन ख़त्म हुआ, तब पार्टी जिन 144 सीटों पर कमज़ोर हैं, उनमें बिहार की सीटों की संख्या चार से बढ़कर 10 हो गई थी.
इसके अलावा बीजेपी जाति और पहचान से जुड़ी राजनीति पर काबू पाना चाहती है.
नीतीश कुमार अगर बीजेपी के पाले में रहते हैं तो कुछ दिन पहले जारी किए गए जाति सर्वे से होने वाले फ़ायदे को वो उठा सकेगी. इसी बहाने जाति जनगणना पर कांग्रेस की बयानबाज़ी को भी चुनौती दी जा सकेगी.
बीजेपी के इस क़दम से इंडिया गठबंधन को भी झटका मिला है. इस गठबंधन को जोड़ने में नीतीश कुमार की अहम भूमिका रही थी.
एक सूत्र ने कहा- इंडिया गठबंधन पहले से ही बंगाल में टीएमसी, दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी के साथ चुनौतियां का सामना कर रहा है. ऐसे में बिहार में हुई राजनीतिक घटना एक झटका है.
अतीत में सरकार चलाने के मामले में बीजेपी नीतीश कुमार के सामने चुनौती की तरह आकर नहीं खड़ी हुई थी. लेकिन अब दो ऐसे लोगों को बीजेपी ने डिप्टी सीएम बनाया है, जो नीतीश कुमार के आलोचक रहे हैं.

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जातियों पर है बीजेपी की नजर
ट दाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि नीतीश कुमार के एनडीए में आने से नॉन यादव ओबीसी, अपर कास्ट, अति पिछड़े, पासवान, मुसहर और अन्य दलित समुदाय का समर्थन हासिल किया जा सकेगा.
नीतीश के बाहर निकलने से इंडिया गठबंधन के पास अब मुस्लिम, यादव वोट ही रह जाएंगे.
2019 लोकसभा चुनाव में एनडीए को 40 में से 39 सीटें मिली थीं. एक सीट कांग्रेस ने जीती थी.
अब नीतीश के आने से बीजेपी का दावा है कि एनडीए बिहार में क्लीन स्वीप करेगी.
रिपोर्ट में लिखा गया है कि इस नए राजनीतिक फेरबदल से आरजेडी के वोट बैंक मुस्लिमों और यादवों पर कोई असर नहीं होगा. ये बिहार का एक तिहाई वोट बैंक है.
जेडीयू और एनडीए के बीच हुई डील इंडिया के लिए झटका है. ख़ासकर तब राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के साथ बिहार में प्रवेश करने वाले हैं.

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नीतीश की कोशिशें और नीतीश का दिया झटका
हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ने रिपोर्ट की है कि नीतीश कुमार ने कैसे इंडिया गठबंधन को जोड़ने की कोशिश की और अब ख़ुद की उसे झटका देकर किनारे हो गए हैं.
अख़बार लिखता है कि नीतीश का ये क़दम काफ़ी अहम है क्योंकि इससे उस हिंदी भाषी राज्य में इंडिया गठबंधन को झटका पहुँचा है, जहाँ वो सरकार में थे.
2023 में तीन महीने से ज़्यादा वक़्त तक नीतीश कुमार ने कई राज्यों का दौरा किया. कई बड़े नेताओं से मुलाक़ात की और तब इंडिया गठबंधन की नींव रखी गई.
कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि हाल ही में हुए चुनावों में कांग्रेस को तीन राज्यों में हार का सामना करना पड़ा था, इसके मद्देनज़र बिहार में गठबंधन का सफल होना बहुत ज़रूरी था.
वो बोले- आरजेडी और जेडीयू वो शुरुआती राजनीतिक दल थे, जिनसे कांग्रेस ने इस साल की शुरुआत में सीट शेयरिंग पर बात की थी.
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