हिन्दू-मुस्लिम हिंसा से मिले ज़ख्मों से जूझता ब्रिटेन का शहर लेस्टर

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ब्रिटेन के लेस्टर से
लेस्टर की सड़कों पर डोर-टू-डोर कैम्पेन कर रहे भारतीय मूल के कीथ वाज़ को देखकर ये कहना मुश्किल है कि ये वही जगह है, जहाँ सितंबर 2022 में हिन्दू और मुसलमानों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं.
कीथ वाज़ 32 साल तक पूर्वी लेस्टर सीट से लेबर पार्टी के सांसद रह चुके हैं. इस बार के चुनाव में वो एक नई पार्टी, वन लेस्टर से चुनाव लड़ रहे हैं.
लेस्टर से इतने सालों तक जुड़े रहने की वजह से वो यहाँ का एक जाना-माना चेहरा हैं. जब वो लोगों से मिलते हैं तो उनके स्थानीय मुद्दों पर बात करते हैं.
बात नहीं होती तो उस तनाव भरे वक़्त की जब अलग-अलग संस्कृतियों की मिसाल माना जाने वाला लेस्टर हिंसा की आग में जल उठा था.
हिन्दू-मुस्लिम हिंसक झड़पें
17 सितंबर 2022 को दोनों समुदायों के बीच चल रहा तनाव सड़कों पर उतर आया था.
इन झड़पों में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए और दर्जनों लोगों को गिरफ़्तार किया गया था.
कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसा तनाव ज़्यादातर भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मैचों के दौरान देखा जाता था. लेकिन 2022 में हालात इतने बिगड़े कि दोनों समुदायों के बीच बन चुकी एक गहरी खाई साफ़ दिखने लगी.

गुजराती मूल के धर्मेश लखानी लेस्टर की उसी बेलग्रेव रोड पर एक रेस्टोरेंट चलाते हैं, जहाँ हिंसा हुई थी.
उस दिन की यादें उनके मन में आज भी ताज़ा हैं.
बेलग्रेव रोड पर जहाँ हिंसा हुई, उस जगह को दिखाते हुए वह कहते हैं, "उस दिन यहां सैंकड़ों लोगों की भीड़ जमा थी. एक आक्रोशित भीड़ थी. मैं यहां खड़ा देख रहा था कि ये क्या हो रहा है. ऐसा लग रहा था कि हमारा शहर जल रहा है."
धर्मेश लखानी बेलग्रेव रोड पर एक कार वॉश को दिखाते हुए बताते हैं, "इस कार वॉश को पुलिस ने घेर लिया था. घेरे के अंदर क़रीब 150 से 200 हिन्दू समुदाय के लोग थे और घेरे के बाहर मुसलमानों की एक बड़ी भीड़ थी."
कार वॉश के ठीक सामने ही एक हिन्दू मंदिर है.
धर्मेश लखानी कहते हैं कि भीड़ में से कुछ लोगों ने मंदिर की दीवार फांद कर मंदिर के एक झंडे को नीचे उतारकर जलाने की कोशिश की.
वो कहते हैं, "झंडा थोड़ा सा जला ही था कि मुसलमान युवक ने उस आग को बुझा दिया. उसे लगा कि ऐसा नहीं करना चाहिए. जो भी ये सब कर रहे थे वो आग भड़काना चाह रहे थे. लेकिन उस भीड़ में सब लोग ऐसे नहीं थे. जो भी हुआ वो ठीक नहीं था. दोनों ही समुदायों को बहुत बुरा लगा."
उस वक्त की एक बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक़ इस हिंसा में चर्चों, मस्जिदों और मंदिरों को निशाना बनाया गया था.

चुनावी सरगर्मी
ब्रिटेन में चार जुलाई को आम चुनाव का मतदान होना है. पूर्वी लेस्टर सीट से कुल 10 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें से आठ दक्षिण एशियाई मूल के हैं. ये उम्मीदवार लेस्टर में बसी एक बड़ी दक्षिण एशियाई आबादी के वोटों के दम पर इस सीट से जीतने की उम्मीद कर रहे हैं.
लेकिन जिस तरह तक चुनावी माहौल दक्षिण एशियाई देशों, ख़ासकर भारत में देखा जाता है, उससे लेस्टर बहुत अलग है.
यहां मुश्किल से ही कुछ उम्मीदवारों के पोस्टर या बैनर सार्वजानिक स्थलों पर लगे दिखते हैं.
ज़्यादातर चुनाव प्रचार शनिवार और रविवार को किया जाता है, क्योंकि उस दिन नौकरीपेशा लोग घरों पर होते हैं. प्रचार के लिए उम्मीदवार लोगों के घरों और दुकानों पर जाते हैं.
पूर्वी लेस्टर सीट पर बहुत सी नज़रें इसलिए भी टिकी हैं क्योंकि 2022 की घटनाओं के बाद ये देखना दिलचस्प होगा कि दक्षिण एशियाई लोग किस पार्टी या उम्मीदवार में अपना विश्वास जताते हैं.
‘विविधता की मिसाल'
1951 की जनगणना में, दक्षिण एशियाई विरासत वाले केवल 624 लोगों को लेस्टर में दर्ज किया गया था. अब, 70 साल बाद लेस्टर उन शहरों में है, जहां ब्रिटिश दक्षिण एशियाई लोगों का अनुपात सबसे अधिक है.

1950 के दशक से, भारतीय और पाकिस्तानी चेन माइग्रेशन के ज़रिए लेस्टर आए. यानी उनके परिवार के सदस्य या गांव के लोग यहां रहते थे, इसलिए वो भी यहां आ गए. उनके लिए लेस्टर आकर्षक था - यह समृद्ध था और डनलप, इंपीरियल टाइपराइटर और बड़ी होजरी मिलों में नौकरियां थीं.
नए आने वाले लोगों में से कई शुरुआती दिनों में उत्तर और पूर्वी लेस्टर के इलाक़े जैसे बेलग्रेव रोड और स्पिनी हिल पार्क में बस गए जहां हिंसा हुई थी. आने वाले लोगों में हिंदू, मुसलमान और सिख शामिल थे जिन्होंने भारत के बँटवारे के दौरान हुई हिंसा देखी थी.
1960 के दशक के शुरुआती सालों में लोगों के परिवार भी यहां आने लगे.
लेस्टर को दशकों से सांस्कृतिक विविधता, सहिष्णुता और सामुदायिक एकजुटता की एक मिसाल माना जाता रहा है.
पूर्वी लेस्टर के पूर्व सांसद कीथ वाज़ कहते हैं, "जो भी लेस्टर को जानता है, उसके लिए ये चौंकाने वाला था. ये जगह अलग-अलग धर्मों और अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले लोगों का मिश्रण है. जब ऐसा हुआ वो मेरे लिए एक झटका था. हमने पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था."
कीथ वाज़ के मुताबिक़ 2022 की हिंसा के पीछे कई वजहें थी, जिनमें कोविड लॉकडाउन, यहाँ की आर्थिक स्थिति और रोज़गार का न होना शामिल हैं.
वे कहते हैं, "ये एक चिंगारी थी. मुझे लगता है कि ये ऐसी घटना थी जो एक बार ही होती है. ये पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ."

बेलग्रेव रोड का माहौल
बेलग्रेव रोड आकर लगता है, जैसे आप हिंदुस्तान में हैं. चाहे रेस्टोरेंट हों या कपड़ों और ज़ेवरों की दुकानें... ज़्यादातर भारतीय मूल के लोग ही इन्हें चलाते हैं.
ये वही इलाक़ा है, जहां 2022 में दोनों समुदायों में हिंसक झड़पें देखी गईं.
यहाँ के कारोबारी आज भी उस अशांति के असर को महसूस करते हैं.
भारतीय मूल के इमरान पठान यहां पर एक वेडिंग गारमेंट्स का स्टोर चलाते हैं.
वो कहते हैं, "उस अशांति के बाद ये हो गया है कि थोड़ा सा बिज़नेस पर असर पड़ा है. वो इस तरह पड़ा है कि लोग एक बार आने से पहले सोचते हैं, पूछताछ करते हैं कि क्या सब सही है. जैसे अभी हाल ही में इंडिया पाकिस्तान का टी-20 मैच हुआ था. तो पहले वो जल्दी जल्दी सुबह आ गए, हमें फ़ोन करके अपॉइंटमेंट लेते हैं कि मैच शुरू होने से पहले हम निकल जाएँ. एक डर हो गया लोगों के दिमाग में अब इस चीज़ का...हिंसा ने जो निशान छोड़े उन्हें ख़त्म होने में कुछ वक़्त तो लगेगा."
बेलग्रेव रोड पर ही इमरान के स्टोर से कुछ ही क़दमों की दूरी पर भारतीय मूल की रंजू मोढा भी कपड़ों का एक स्टोर चलाती हैं.
वो कहती हैं, "कभी सोचा नहीं था कि ऐसा कुछ होगा. दो साल में व्यापार के नज़रिये से देखती हूँ, तो हाँ व्यापार कम हुआ है. शहर के बाहर से जो हमारे साउथ एशियाई ग्राहक आते थे वो कम हो गए हैं क्यूंकि ये सब घटनाएं मीडिया पर देखी गईं. उससे लोग डर गए. इस व्यापार पर काफ़ी असर पड़ा है."
भौगोलिक तौर पर ‘बँटे’ समुदाय

लेस्टर में पिछले कई दशकों से साउथ एशियन कम्युनिटी की एक बड़ी आबादी रहती आ रही है. इसमें हिन्दू भी शामिल हैं और मुसलमान भी.
लेकिन पिछले कुछ सालों में हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि लेस्टर के कुछ कोनों में हिन्दू जनसंख्या बहुसंख्यक हो गई है और कुछ इलाक़ों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं.
ऐसा ही इलाक़ा एविंगटन रोड है. यहाँ पर एक बहुत बड़ी मस्जिद है.
स्थानीय लोग बताते हैं कि जहां बेलग्रेव रोड इलाक़े में ज़्यादातर हिन्दू समुदाय के लोग रहते और कारोबार करते हैं, वहीं हाई फ़ील्ड्स और एविंगटन रोड जैसे इलाक़ों में ज़्यादातर मुसलमान.
कुछ लोगों का कहना है कि दोनों समुदायों में तनाव की वजह से कई बार वो एक दूसरे के बाहुल्य वाले इलाक़ों में जाने से हिचकिचाते हैं.
‘हिन्दू बनाम मुस्लिम’
दोनों ही समुदाय 2022 की घटनाओं के लिए एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं.
लेस्टर में रहने वाले मोहम्मद ओवैस यूके इंडियन मुस्लिम काउंसिल में निदेशक हैं.
वे कहते हैं, "मुस्लिम समुदाय लगातार ख़तरा महसूस कर रहा है. वो लगातार तनाव महसूस कर रहा है. हमारा मानना है कि एक वैश्विक हिंदुत्व आंदोलन के ज़रिये मुस्लिम आबादी को नाराज़ करना यहां एक रणनीतिक मक़सद है."
मोहम्मद ओवैस के मुताबिक़ दंगों से पहले एक सामुदायिक भाईचारे का रिश्ता था. वे कहते हैं, "हम चाहेंगे कि वो वापस आएं. हमारा मानना है कि लेस्टर में ज़्यादातर हिंदू लोग शांति चाहते हैं और हिन्दुओं का मुसलमानों, सिखों और बिना आस्थावाले लोगों के साथ एक जैसा भाईचारा है. हालाँकि, हमें लगता है कि उनकी आवाज़ें बहुत ख़ामोश हैं."

'लोग भूले नहीं हैं'
कीथ वाज़ कहते हैं कि हिंसा से जो नुकसान हुआ वो लोगों ने देख लिया और वो समझ गए हैं कि भाईचारे और एकजुटता के साथ रहकर ही वो आगे बढ़ सकते हैं.
उनका मानना है कि लेस्टर के ज़्यादातर लोग 2022 की ख़राब यादों को भूलकर अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ चुके हैं.
दूसरी तरफ़ कई लोगों का ये भी कहना है कि जो हुआ उसे समझने के लिए लोगों के मंहगाई, रोज़गार और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के संघर्षों और उनसे जुड़ी निराशा को समझना होगा.
भारतीय मूल की रीटा पटेल लेस्टर सिटी काउंसिल में पूर्व सहायक मेयर रह चुकी हैं. वो कहती हैं, "लोग उन घटनाओं को भूले नहीं हैं.''
उन घटनाओं ने अविश्वास की विरासत छोड़ी है और हमारा यह मानना ग़लत होगा कि चूंकि चीज़ें अभी शांत हो गई हैं, समस्या दूर हो गई है. हमें सबक सीखना होगा. अगर हम सबक नहीं सीखेंगे तो उन ग़लतियों को बार-बार दोहराने का जोखिम रहेगा."
रीता पटेल कहती हैं, "मुझे लगता है कि अगर आप लोगों से बात करेंगे तो आप पाएंगे कि उन घटनाओं ने लोगों के ज़हन में एक बहुत बुरा अनुभव छोड़ा है... लोगों को और ज़्यादा अनिश्चित महसूस कराया है. मेरा मानना है कि एक घटना किसी शहर को बनाती या बिगाड़ती नहीं है. यह झटका हो सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि लेस्टर के लोगों ने हमेशा मुश्किलों का सामना कर आगे बढ़कर क़दम उठाया है."
इंसाफ़ का इंतज़ार

लेस्टर में हुई हिंसा की वजहों की तह तक पहुँचने के लिए फ़िलहाल दो जांच चल रही है.
इनमें से एक जांच सरकार करवा रही है और दूसरी जांच लंदन की सोआस (SOAS) यूनिवर्सिटी कर रही है.
लेस्टर में पिछले 60 साल से रह रहे भारतीय मूल के प्रोफ़ेसर गुरहरपाल सिंह कहते हैं कि अशांति की सुगबुगाहट अभी भी मौजूद है क्योंकि जिन वजहों से अशांति हुई, उनमें कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है.
प्रोफ़ेसर गुरहरपाल सिंह कहते हैं, "शहर के भीतर संसाधनों की कमी है और जहाँ समुदाय बसे हुए हैं, वहां क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर भारी तनाव है. राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और उसके बाद होने वाले समारोहों को लेकर तनाव का माहौल था. दक्षिण एशिया में या यहां कोई भी महत्वपूर्ण घटना इन समुदायों या संघर्ष पैदाकर ने में दिलचस्पी रखने वाले गुटों को लामबंद कर सकती है."
हमने प्रोफ़ेसर गुरहरपाल सिंह से पूछा कि जो कुछ भी हुआ और जिस तरह से उससे निपटा गया, क्या वो शासन की विफलता है?

उन्होंने कहा, "बिल्कुल. मैं एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर कह सकता हूँ जो 60 वर्षों से लेस्टर में रह रहा है कि जो संकट हुआ उसकी गंभीरता से निपटने के लिए न तो राष्ट्रीय स्तर पर और न ही स्थानीय स्तर पर कोई प्रभावी प्रतिक्रिया दी गई."
ऊपर से देखें तो लगता है कि लेस्टर में हालात सामान्य हो चुके हैं. लेकिन यहाँ के लोगों से बात करें तो समझ में आता है कि 2022 में हुई हिंसक घटनाओं का तनाव यहाँ की एक बड़ी आबादी के ज़हन में आज भी तरो-ताज़ा है.
यहाँ के लोग कहते हैं कि 2022 में जो हुआ उससे लेस्टर की छवि ख़राब हुई और अगर उन बुरी यादों से लेस्टर को आगे बढ़ना है तो उस हिंसा के लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान करनी होगी और दोषियों को सज़ा दिलवानी होगी.
वो कहते हैं कि जब तक ये नहीं किया जाता तब तक लेस्टर के ज़ख़्म हरे ही रहेंगे
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