कहानी उन दिहाड़ी मज़दूरों की जिन्हें जंजीर से बांध कर रखा गया
प्रवीण ठाकरे उस्मानाबाद से, ज़ोया मतीन दिल्ली से
बीबीसी संवाददाता

जून की गर्म पसीने से लथपथ करने वाली रात में भगवान घुकसे की नींद एक झटके से टूटी और वो दौड़ पड़े. वो इस बार अपनी ज़िंदगी को बचाने के लिए दौड़ रहे थे.
बीते महीने से घुकसे को महाराष्ट्र के ज़िले उस्मानाबाद में एक बेहद गंदी, अंधेरी झोपड़ी में बंधक बना कर रखा गया था.
उनके साथ पांच और लोगों को बंधुआ मज़दूर बनाकर यहां रखा गया था. इन मज़दूरों को उस्मानाबाद में एक कुंआ खोदने के लिए कुछ ठेकेदारों ने काम पर रखा था. लेकिन फिर उन्हें ज़बरन बंधुआ मज़दूर बना दिया गया.
भारत में बंधुआ मज़दूरी ग़ैर-क़ानूनी है.
घुकसे अपने साथ हुए बर्बर बर्ताव को याद करते हुए बताते हैं कि उन्हें पीटा जाता था, नशा दिया जाता था और थोड़े से खाना और पानी के बदले कई घंटों तक काम कराया जाता था.
रात में इन मज़दूरों को ट्रै्क्टर से जंज़ीर के सहारे बांध दिया जाता था ताकि वो भाग ना सकें.
घुकसे बताते हैं कि जब मज़दूर भूख और दर्द से कराहते थे तो ठेकेदार उन्हें छड़ी से मारते और जबरन शराब पिलाते ताकि वो नशे के कारण शांत हो जाए.
वह कहते हैं, “मुझे पता है कि मौत आज नहीं तो कल आनी है लेकिन मैं मौत से पहले एक बार वहां से भागने की कोशिश करना चाहता था.”

कई दिन तो घुकसे और उनके बंधक साथी पिटाई, भूख और प्यास से इतने लाचार होते कि उनके पास इतनी ताकत ही नहीं होती की वो भागने की कोशिश भी कर सकें.
लेकिन घुकसे को ठीक-ठीक तारीख याद नहीं क्योंकि उनकी दुनिया में तारीखों की याद धुमिल हो चुकी थी, लेकिन वो कहते हैं कि शायद वो 15 या 16 जून की तारीख थी जब उन्होंने भागने की कोशिश करने की ठानी.
रात के अंधेरे में वो टटोलते हुए अपने पैरों से बंधी जंज़ीर के ताले तक पहुंचे. ताले में उंगली फंसा कर वो घंटों ताले को घुमाते रहे और एक वक्त ऐसा आया जब ताला टूट गया.
जैसे ही ताला टूटा वो चुपके-चुपके बाहर की ओर निकले. कपाउंड की दीवार पर चढ़ कर उन्होंने देखा तो दूर-दूर तक सिर्फ़ गन्ने के खेत दिख रहे थे. घुकसे खेत की तरफ़ बढ़ गए.
उस पल को याद करते हुए वह कहते हैं, “मुझे अंदाज़ा नहीं था कि मैं कहां हूं, मुझे बस इतना पता था कि मुझे अपने घर जाना है. मैं खेत के साथ लगी रेलवे की पटरियों के साथ दौड़ता रहा. मैं सोच रहा था कि जहां भी ये रास्ता ले जाएगा मैं बस वहीं जाउंगा.”
घुकसे किसी तरह अपने गांव पहुंच सके और पुलिस को इसकी जानकारी दी. इसके बाद पुलिस की कार्रवाई में वहां से 11 और बंधुआ मज़दूरों को छुड़वाया गया. ये लोग कुएं खोदने का काम करवाने वाले दो ठेकेदारों के लिए काम करते थे.

स्थानीय पुलिस अधिकारी जगदीश राउत ने बीबीसी को बताया, “पहले तो हमें मज़दूर की बात पर यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब हम उस जगह पहुंचे तो इन मज़दूरों की हालत देख कर हैरान रह गए. ”
पुलिस का कहना है कि इन मज़दूरों से जबरन 12-14 घंटे तक कुआं खोदने का काम करवाया जाता था. इसके बाद उन्हें जंज़ीर से बांध दिया जाता था. उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी जाती थी.
राउत बताते हैं, “उनके (मज़दूरों) पास शौचालय की सुविधा नहीं थी. वो जिस कुंए को खोदते थे उसी में उन्हों शौच करना पड़ता था और वो इसे खुद साफ़ करते थे.”
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पुलिस के मुताबिक़ इन मज़दूरों के पैरों पर और आंखों के पास छाले पड़ गए थे और उनके शरीर पर गहरी चोटें थीं. इनमें से कुछ का अस्पताल में इलाज चल रहा है.
इस मामले में दो महिलाओं और एक नाबालिग सहित सात लोगों पर मानव तस्करी, अपहरण, शोषण की धाराओं के साथ मामला दर्ज किया गया है.
इनमें से चार लोगों को पुलिस हिसारत में रखा गया है, नाबालिग को जुवेनाइल डिटेंशन सेंटर में रखा गया है.

पुलिस का कहना है कि ये मज़दूर गरीब और भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर थे जो नौकरी की तलाश में उस्मानाबाद के पास अहमदनगर शहर में आए थे.
यहां उन्हें एक एजेंट ने संपर्क किया और इसी एजेंट ने मज़दूरों को उस्मानाबाद के ठेकेदारों को दो हज़ार से पांच हज़ार रुपये में बेंच दिया.
एजेंट ने इन मज़दूरों से वादा किया था कि उन्हें हर दिन के 500 रुपये मिलेंगे और तीन वक्त का खाना दिया जाएगा, यहां उन्हें कुंंआ खोदने का काम करना होगा.
जब ये मज़दूर काम के लिए तैयार हुए तो उन्हें एक लोकेशन पर उन्हें बुलाया. यहां उन्हें एक टुक-टुक रिक्शे पर बैठाया. उन्हें शराब पिला कर नशे में धुत हालत में उस जगह ले गया जहां उन्हें बंधुआ मज़दूर बना लिया गया.
यहां पहुंचते ही उन्हें एक बड़ी चारदीवारी से घिरे कपाउंड में ले जाया गया. सभी के फ़ोन ले लिए गए.
राउत बताते हैं, “अभियुक्त मज़दूरों को इस भयानक परिस्थिति में दो से तीन महीने तक रखते और फिर बिना एक भी रुपया दिए उन्हें छोड़ देते. ”

पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इस तरह के रैकेट ज़िले में और भी जगहों पर चलाए जा रहे हैं.
तीन मज़दूरों के परिवारों ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन उनका आरोप है कि पुलिस ने जांच करने से इनकार कर दिया.
बीबीसी ने परिवार वालों के आरोपों पर पुलिस से सवाल पूछे जिसका जवाब पुलिस की ओर से नहीं दिया गया है. लेकिन एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि पुलिस गुमशुदगी के मामले में समय पर कार्रवाई करने में फेल रही.
इन मज़दूरों को उस प्रताड़ना भरी ज़िंदगी से बाहर निकले हफ़्तों हो चुके हैं लेकिन इनका कहना है कि जो चोट उनके दिलो-दिमाग पर लगी है उससे उबरने में उन्हें लंबा वक्त लगेगा.

इनमें से कई मज़दूर अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करना चाहते हैं लेकिन वो कहते हैं कि जो उनके साथ हुआ है वह बार-बार उन्हें निराशा के अंधेरे में खींचता है.
पुलिस के रेस्क्यू ऑपरेशन में बंधुआ मज़दूरी के चंगुल से बचाए गए मज़दूर भरत राठौर कहते हैं, "हमारे साथ गुलामों वाला बर्ताव किया गया."
वह यह कहते हुए अपने घाव, आखों और पैरों पर पड़े फफोले दिखाते हैं.
वह कहते हैं, “ठेकेदार हमें इतना मारते कि हमारे शरीर नीला पड़ जाता. हमें खाने में बासी रोटियां मिलती और नमक दिया जाता. कभी-कभी सब्ज़ी के नाम पर बैंगन के कुछ टुकड़े दिए जाते. आस-पास जो किसान रहते थे वो भी कभी-कभी हमारी हालत देखने आते थे लेकिन इनमें से किसी ने कभी हमारी मदद करने की कोशिश नहीं की.”
राठौर बताते हैं कि वह अपने पिता ही मौत के बाद काम की तलाश में अहमदनगर गए थे. उनकी मां बीमार रहती हैं और उनके इलाज के लिए वो पैसे कमाने निकले थे.
वह कहते हैं, “केवल भगवान जानता है कि मैं किस तरह सब कुछ सह कर ज़िंदा बच पाया.”

मारुति जतलकर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिन्हें अपनी आर्थिक स्थिति के कारण नांदेड़ ज़िले में अपना घर छोड़ कर काम की तलाश में अहमदनगर आना पड़ा था.
जतलकर एक किसान हैं, मई में उनकी बड़ी बेटी की शादी होनी थी. उन्हें अपने गांव में कोई काम नहीं मिल रहा था इसलिए वो अहमदनगर गए. वो कहते हैं कि यहां वो एक एजेंट से मिले जिसने उन्हें इस दलदल में धकेल दिया.
उन्होंने सोचा था कि अगर वो 15-20 दिन कुआं खोदने का काम करेंगे तो उन्हें इतने पैसे मिल जाएगे जिससे बेटी की शादी का इंतज़ाम हो सके.
पर ना तो वो पैसे कमा सके और ना बेटी की शादी देख सके. जब वो वापस आए तो पता चला बेटी की शादी हो गई है. वह कहते हैं, “ उस दिन मैं बहुत रोया.”
जतलकर कहते हैं कि आज भी डर के कारण रह-रह कर डर से कांपने लगते हैं.
वह कहते हैं, “वो हमें कुएं में जल्दी सुबह छोड़ देते और फिर देर रात को बाहर निकालते. हम उसी कुएं में शौच करते थे. जब खाना मांगते तो वो हमें पीटते थे. दिन में केवल एक बार खाना मिलता था. ”
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इन मज़दूरों का कहना है कि ये घाव सिर्फ उनके शरीर पर नहीं है उन्हें ये चोट भीतर तक लगी है और ये दर्द भी लंबे वक्त तक उनके साथ रहेगा. लेकिन इतना दर्द सह चुके ये मज़दूर अब नई शुरुआत करना चाहते हैं.
पिछले सप्ताह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने राज्य सरकार को फटकार लगाई और श्रम क़ानून के तहत मज़दूरों को राहत देने का निर्देश दिया.
राठौर कहते हैं, “कुछ वक़्त के लिए हम अपने गांव में ही काम ढूढेंगे और जो कुछ कमा सकते हैं कमाएंगे. क्या पता ज़िंदगी थोड़ी बेहतर हो जाए.”
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