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नरेंद्र मोदी के तीसरी बार पीएम पद की शपथ लेने पर क्या कह रहा है विदेशी मीडिया?
लोकसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद नरेंद्र मोदी ने रविवार को 71 सदस्यीय मंत्रिमंडल के साथ प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली .
नौ जून को हुए पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह पर दुनियाभर के मीडिया की निगाहें थीं.
इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा हासिल करने में नाकाम रही है और इसके लिए उसे अपने दो सहयोगी टीडीपी और जनता दल (यूनाइटेड) पर निर्भर रहना पड़ा है.
दुनियाभर के कई अख़बारों और मीडिया आउटलेट ने नरेंद्र मोदी की पार्टी की गठबंधन के सहयोगियों पर इस निर्भरता को लेकर टिप्पणी की है.
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क़तर के न्यूज़ चैनल 'अल जज़ीरा' ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से जुड़ी राजनीतिक विश्लेषक ज़ोया हसन के एएफ़पी को दिए इंटरव्यू का हवाला दिया है.
ज़ोया हसन कहती हैं कि नरेंद्र मोदी की पार्टी के नए गठबंधन को आगे चलकर आपसी संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है.
वो कहती हैं, ''चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार दोनों काफ़ी मंझे हुए राजनीतिक नेता हैं. इसलिए मोदी को इन दोनों से संतुलन बिठाना होगा.''
उनका इशारा दोनों के बीजेपी के राष्ट्रवादी एजेंडे से मतभेद की ओर है.
ज़ोया हसन कहती हैं कि दोनों के विपक्ष में भी दोस्त हैं और आगे चलकर निश्चित तौर पर विपक्ष भी उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश करेगा.
नरेंद्र मोदी के सुर नरम हुए - फ़ाइनैंशियल टाइम्स
ब्रिटेन का अख़बार'फ़ाइनैंशियल टाइम्स' लिखता है कि नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ले ली है लेकिन पहले की तुलना में चुनाव में कमज़ोर प्रदर्शन की वजह से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में गठबंधन के सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा.
"बीजेपी इस बार बहुमत से दूर रही है और इसने उसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगियों पर निर्भर बना दिया है. इसने पिछले एक दशक से शासन कर रहे नरेंद्र मोदी को करारा झटका दिया है. लिहाज़ा अब उनके सुर नरम हो गए हैं और उन्होंने आम सहमति से शासन चलाने की बात की है."
लंदन में थिंक टैंक चैटहम हाउस में सीनियर रिसर्च फ़ैलो चितगी बनर्जी ने अख़बार से कहा, ''मोदी को आम सहमति से शासन करने का अनुभव नहीं है. इससे मोदी सरकार के लिए जोखिम पैदा हो सकता है, खासकर उस स्थिति में जब बीजेपी गठबंधन के सहयोगियों को अलग-थलग करने की कोशिश करेगी या फिर उनमें फूट पैदा करने की जुगत लगाएगी.''
क्या मोदी आम सहमति से काम कर पाएंगे - न्यूयॉर्क टाइम्स
अमेरिकी अख़बार 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने लिखा है कि नई दिल्ली की राजनीतिक फ़िज़ा बदली हुई लग रही है और मोदी पहले से विनम्र दिख रहे हैं.
"मोदी के अंदर परिवर्तन दिखने लगा है. कम से कम से इस समय तक जो मसीहाई छवि उन्होंने इख्तियार कर ली थी वह गायब हो गई है."
"उन्होंने खुद को एक विनम्र प्रशासक के तौर पर पेश किया है. वोटर शायद ऐसे ही मोदी को देखना चाहते थे."
"लेकिन सवाल ये है कि क्या मोदी वो बन पाएंगे जो वो निर्वाचित नेता के तौर पर दो दशक के अपने जीवन में नहीं रहे हैं. क्या वो आम सहमति से काम करने की शैली विकसित कर पाएंगे."
अख़बार लिखता है कि मोदी के शासन में संसदीय प्रक्रियाओं और कानूनों पर बहस की उपेक्षा करना उनकी कार्यशैली की निशानी बन गई थी.
''2016 में उन्होंने नोटबंदी की थी. रातों-रात इस अप्रत्याशित फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था को झटका दिया. इसी तरह कृषि कानूनों के मामले में उन्हें अचानक पीछे हटना पड़ा था."
"चुनाव नतीजे आने से पहले मोदी की पार्टी ने भविष्यवाणी की थी कि उनका गठबंधन भारत की 543 सीटों वाली संसद में 400 सीटें जीतेगा. विपक्ष 'दर्शक दीर्घा में' बैठने तक सिमट कर रह जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब मोदी ज़्यादा विनम्रता से शासन चलाएंगे."
लोकसभा स्पीकर के पद के लिए ज़ोर-आज़माइश पर नज़र
अमेरिकी अख़बार ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ ने लिखा है कि मोदी का शपथ ग्रहण समारोह एक दुर्लभ उपलब्धि रही लेकिन पीएम के सामने एक नया यथार्थ है, जिससे वो विनम्र दिख रहे हैं.
अख़बार ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर श्रुति कपिला के हवाले से लिखा है कि पहली पंक्ति के मंत्रियों में से किसी को भी बिठाया नहीं गया है लेकिन सरकार कमज़ोर लग रही है, ऐसा लगता नहीं है कि ये सरकार आगे ज़्यादा सफ़र तय कर पाएगी.
अख़बार लिखता है कि कई विश्लेषक इस बात पर नज़र रखे हुए हैं कि मोदी के क़रीबी सहयोगी ख़ासकर अमित शाह जैसे लोग सत्ता पर अपनी मज़बूत पकड़ बनाकर रखेंगे या नहीं, ख़ासकर क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों पर, जिनके ख़िलाफ़ विपक्षी नेताओं के आरोप हैं कि उनका दुरुपयोग हुआ है.
"एक और अहम सवाल ये है कि क्या आने वाले दिनों में एनडीए के पार्टनर लोकसभा के स्पीकर के पद के लिए ज़ोर-आज़माइश करेंगे, क्योंकि दल बदल की स्थिति में स्पीकर की भूमिका अहम हो जाती है."
'विदेश में कामयाब लेकिन घर में दबाव में'
पाकिस्तानी अख़बार 'डॉन' ने लिखा है कि नरेंद्र मोदी के शासन में भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे ज़्यादा तेज़ी दिखाई दी है.
''इसने भारत के ग्लोबल रुतबे को भी बढ़ाया है. लेकिन वो देश में पर्याप्त नौकरी पैदा नहीं कर पाए. इसके अलावा महंगाई बढ़ी हुई है. लोगों की आय घट रही है और धार्मिक नफ़रत बढ़ी है. इन हालात की वजह से वोटर उन पर लगाम कसने को बाध्य हुए हैं."
अख़बार लिखता है, "विश्लेषकों के मुताबिक़ मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली लेकिन इस बार का कार्यकाल चुनौतियों से भरा होगा. उन्हें गठबंधन में शामिल में क्षेत्रीय दलों और मज़बूत विपक्ष के बीच सहमति कायम करने के लिए जद्दोजहद करनी होगी."
अख़बार ने लिखा है कि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि गठबंधन की सरकार होने की वजह से दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगड़ सकता है क्योंकि एनडीए के क्षेत्रीय सहयोगी विकास के लिए ज़्यादा फंड की मांग करेंगे.
बांग्लादेश के अख़बार 'डेली स्टार' ने भी मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का ब्योरा देते हुए लिखा है कि इसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी बेटी साइमा वाजेद समेत कई गणमान्य लोगों ने हिस्सा लिया.
73 साल के मोदी भारत में जवाहरलाल नेहरू के बाद दूसरे प्रधानमंत्री हैं जो लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं.
डेली स्टार ने शेख हसीना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात का ज़िक्र किया है.
अख़बार ने लिखा है कि अपने-अपने देश के चुनावों में जीत के बाद दोनों की ये पहली मुलाकात थी. दोनों के बीच मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के बाद मुलाकात हुई.
दोनों फिर साथ-साथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ वहां दिए जा रहे भोज में गए.
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