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राहुल गांधी बने विपक्ष के नेता, संसद में मोदी सरकार के ख़िलाफ़ क्या होगी रणनीति
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राहुल गांधी विपक्ष के नेता चुने गए हैं. कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी.
उन्होंने कहा कि सीपीपी के अध्यक्ष ने प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरि महताब को चिट्ठी लिख कर बताया है कि राहुल गांधी को विपक्ष का नेता चुना गया है.
राहुल गांधी को विपक्ष का नेता बनाने का फ़ैसला लोकसभा स्पीकर के चुनाव के एक दिन पहले किया गया है. इससे साफ़ है कि विपक्ष अपने तेवर हमलावर रखना चाहता है
तीन सप्ताह पहले जब चुनावी नतीजे कांग्रेस और विपक्ष के बेहतर प्रदर्शन की ओर इशारा कर रहे थे तो उसी बीच कांग्रेस दफ़्तर में दोपहर को राहुल गांधी मीडिया से मिलने पहुंचे. उनका चेहरा खिला हुआ था.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी की उपस्थिति में, लाल जिल्द वाले संविधान को लेकर राहुल गांधी बोले, "लड़ाई संविधान को बचाने की थी."
संविधान की कॉपी उनकी चुनावी रैलियों, यात्राओं में कई बार दिखी. राहुल गांधी के ये भाव मार्च में उनके रुख से बिल्कुल अलग थे. उस दिन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद तल्ख़ रुख़ में उन्होंने कहा था, "आज भारत में लोकतंत्र नहीं है."
उस दिन पार्टी की ओर से कहा गया था कि उनके बैंक अकाउंट फ्रीज़ कर दिए गए थे और पार्टी के लिए चुनाव लड़ने की चुनौती थी.
'लोकतंत्र खतरे में है' और ईडी, सीबीआई जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं के कथित 'दुरुपयोग' का सिंहनाद लेकर चुनाव में उतरने वाले विपक्ष से शायद ही किसी विश्लेषक को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद रही होगी. इस चुनाव को विपक्ष के लिए 'करो या मरो' बताया गया था.
बदले सुर
हमें इंडिया गठबंधन की बैठकों में, कांग्रेस दफ़्तर के बाहर, भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान कांग्रेस और राहुल गांधी का उपहास करते कई पत्रकार और 'जानकार' मिले थे.
दूसरी पार्टियों से संसाधनों में कहीं आगे भाजपा का विशाल बहुमत से सत्ता में वापस आना लगभग तय माना जा रहा था.
लेकिन अब सुर बदले हुए हैं और ये पहली बार होगा जब प्रधानमंत्री मोदी के सामने गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने की चुनौती होगी.
साल 2014 में 44 सीटों पर और 2019 में 52 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस का 99 सीटें जीतना और इंडिया गठबंधन का 234 के आंकड़े तक पहुंचने को विपक्ष के लिए बड़ी 'सफलता' बताया जा रहा है, हालांकि ये आंकड़ा भाजपा की कुल सीटों से कम है. कांग्रेस का वोट शेयर करीब दो प्रतिशत बढ़ा है.
कई चुनावी विश्लेषक ये भी कह रहे हैं कि इस चुनाव में राहुल गांधी ने मुद्दो की जमीन तैयार की और बीजेपी ने अपना चुनावी प्रचार उसके विरोध में बनाया. बाद सिर्फ मु्द्दो तक नहीं रही - राहुल गांधी के खटाखट जैसे जुमले भी खूब चले.
शुरुआत में जो चुनाव मीडिया में एकतरफा दिखाई दे रहा था, ज़मीन पर एक दूसरी इबारत लिखी जा रही थी.
राहुल गांधी की यात्रा में हिस्सा लेने वाले और स्वराज अभियान से जुड़े योगेंद्र यादव कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के लिए राहुल गांधी को श्रेय देते हैं कि "जब माहौल हिंदुत्व की पिच पर ही बैटिंग का था, उन्होंने ऐसा नहीं किया. उनकी निजी ज़िद और दृढ़ विश्वास बड़ी बात थी."
वो कहते हैं, "अगर कांग्रेस को 60 सीटें मिलती तो उन पर सारा आरोप लगाया जाता, तो इस प्रदर्शन का कुछ तो श्रेय उनको मिलना चाहिए."
यूपी के लड़कों की केमेस्ट्री
इंडिया गठबंधन के इस आंकड़े तक पहुंचने में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, महाराष्ट्र में महाविकास अघाढ़ी, पश्चिम बंगाल में टीएमसी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही.
समाजवादी पार्टी नेता जावेद अली खान कहते हैं, "हम निचले तबके, उपेक्षित, अल्पसंख्यक, पिछले वर्गों को प्राथमिकता पर रखते हैं. राहुल गांधी भी इन वर्गों के हितों को आगे रखकर बात करते हैं. राहुल गांधी और अखिलेश यादव की अच्छी केमिस्ट्री बन गई थी."
ये 'केमिस्ट्री' ही थी जो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा नेताओं के निशाने पर रही.
वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "इन चुनाव में अगर कोई व्यक्ति मोदी के ख़िलाफ़ झंडा उठाकर अंगद की तरह पांव गड़ाकर खड़ा रहा तो वो राहुल गांधी थे. साल 2014 के बाद आज पहली बार उनको ईमानदारी से अपनी पीठ थपथपाने का अवसर मिला है."
कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता संजय झा चुनावी फ़ैसले को मोदी विरोधी मत मानते हैं और कहते हैं कि ताज़ा आंकड़ों ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री मोदी के विकल्प का 'गंभीर दावेदार' बना दिया है.
आसान सफ़र नहीं
करीब 150 सांसदों का निलंबन, अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन का भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजा जाना, राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता से अयोग्यता, कांग्रेस के घोषणापत्र और राहुल गांधी पर प्रधानमंत्री मोदी सहित वरिष्ठ भाजपा नेताओं के लगातार हमले, राहुल को वजह बताते हुए पार्टी नेताओं के इस्तीफ़े, राज्यों में पार्टी की चुनावी हार – पिछले कुछ महीनों में विपक्ष और राहुल गांधी के समक्ष चुनौतियों की कमी नहीं रही. यहां तक कि कांग्रेस के अस्तित्व पर भी सवाल उठे.
इंडिया गठबंधन की शुरुआती बैठकों और चुनावी सीटों की तालमेल में देरी, महीनों संयुक्त रैलियों और घोषणापत्र का न हो पाना – विपक्ष के सबसे बड़े संगठन होने के कारण कांग्रेस आलोचकों के निशाने पर रही. बार-बार कहा गया कि विपक्ष के पास न चेहरा है, ना नैरेटिव.
साथ ही भाजपा राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के तौर पर पेश करती रही है जो ऊंचे पदों पर अपनी काबिलियित के बल पर नहीं, बल्कि गांधी सरनेम की वजह से पहुंचे थे.
साल 2014 और 2019 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, हालांकि कई कांग्रेस समर्थक इससे सहमत नहीं.
एक कांग्रेस नेता के मुताबिक, "चुनाव में बुरे प्रदर्शन के बावजूद ये राहुल गांधी ही थे जो अपने विश्वास पर दृढ़ रहे क्योंकि उन्हें उस पर विश्वास था कि लोकतंत्र में सबसे पहले आम लोग आते हैं जिन्होंने अपने प्रतिनिधियों को चुना है."
राहुल के आलोचक कहते रहे कि वो राजनीतिक ताक़त तो चाहते हैं लेकिन ज़िम्मेदारी नहीं, और ये कि उन तक पहुंच आसान नहीं.
लोकसभा चुनाव के अलावा कई विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर लगातार सवाल खड़े किए, हालांकि बीच में ऐसे भी दौर आते रहे जब पार्टी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन भी किया, लेकिन चुनावों में जीत में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा लगातार आगे रही.
राहुल गांधी के लिए भाजपा नेताओं ने 'पप्पू', 'शहज़ादा', 'ट्यूबलाइट', 'मूर्खों का सरदार' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है.
उनके बारे में कहा गया कि वो ऐसे 'डिज़्नी के राजकुमार की तरह हैं जो अपनी ही डिज़्नी की दुनिया में रहते हैं', और वो 'पुरानी वैक्सीन' हैं.
संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "इतनी जिल्लत, बेइज्ज़ती के बावजूद, इतने सार्वजनिक उपहास के बावजूद टिके रहने के लिए तो उनके 100 में से 200 नंबर हैं. लेकिन खाली टिके होने से कुछ नहीं होता. टिके रहकर डिलिवर करना महत्वपूर्ण है."
कल और आज
अब माहौल बदला हुआ है कांग्रेस के ताज़ा आंकड़ों को उस 'डिलीवरी' का सुबूत माना जा रहा है.
काग्रेस पार्टी को बरसों से देखते परखते आए पत्रकार और लेखक रशीद किदवई कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी के अलावा कोई और व्यक्ति होता तो बरदाश्त कर पाता."
"ज्योतिरादित्य सिंधिया को वो चार साल की उम्र से जानते थे. मिलिंद देवरा, जितिन प्रसाद से उनके पारिवारिक संबंध थे. एक-एक करके न सिर्फ़ लोग पार्टी को छोड़कर गए, लेकिन उन पर तंज कसके भी गए."
राहुल गांधी की यात्राएं
कांग्रेस के बेहतर नतीजों के लिए राहुल गांधी की दो लंबी यात्राओं को काफ़ी श्रेय दिया जा रहा है.
राहुल गांधी की 2022-23 की भारत जोड़ो यात्रा को पार्टी और राहुल की छवि के लिए काफ़ी सफ़ल माना गया था. कन्याकुमारी से कश्मीर तक पहुंची इस यात्रा की काफ़ी चर्चा हुई.
दूसरे चरण में जब जनवरी में राहुल गांधी ने मणिपुर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की, तब इसकी टाइमिंग पर कई सवाल उठे थे.
हालांकि विश्लेषक राहुल वर्मा न्याय यात्रा को 'असफल' मानते हैं क्योंकि "इस दौरान पार्टी के महत्वपूर्ण सहयोगी जैसे नीतीश कुमार साथ छोड़कर चले गए."
लेकिन यात्रा में हिस्सा लेने वाले योगेंद्र यादव के मुताबिक न्याय यात्रा पार्टी को उसके सामाजिक आधार की ओर लेकर आई.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "कांग्रेस हमेशा से ही समाज के गरीब तबकों की पार्टी रही है, लेकिन उसकी नीतियां और उसका नेतृत्व दोनो उससे अलग हो रहा था. राहुल ने जो किया उससे जुड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई. ये प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई है और उसको पूरा होने में अभी वक्त लगेगा."
यात्रा से जुड़े कांग्रेस के एक पदाधिकारी के मुताबिक़, "जब न्याय यात्रा शुरू हुई तो ऐसे बहुत से कांग्रेस नेता थे जिन्हें लगता था कि ये जम़ीन पर काम करने का, सहयोगियों से बातचीत करने का वक्त है, न कि यात्रा करने का, लेकिन ये राहुल गांधी ही थे जिन्हें इस पर दृढ़ विश्वास था."
उनके मुताबिक़, "यात्रा के वक्त इंडिया गठबंधन बंटा हुआ था लेकिन जब न्याय यात्रा शुरू हुई तब विपक्ष की एजेंडा सेटिंग शुरू हुई और इस यात्रा के दौरान लोगों से मिले विचारों से न्यायपत्र या कांग्रेस के घोषणापत्र का निर्माण हुआ."
कांग्रेस उत्तर पूर्व से राष्ट्रीय मीडिया कोऑर्डिनेटर मैथ्यु ऐंटनी कहते हैं, "इस यात्रा में राहुल गांधी की रणनीति थी कि वो आम लोगों से उनकी सोच सुनें. आम लोगों की बातें न्याय घोषणापत्र तक पहुंची. यात्रा का दूसरा हिस्सा था मोदी सरकार के झूठ का पर्दाफ़ाश करना."
कांग्रेस ने पांच न्याय की बात करते हुए चुनाव लड़ा था. इनमें युवाओं, किसानों, महिलाओं, श्रमिकों आदि को न्याय देने की बात की गई थी. यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने महंगाई, किसानों की समस्या, बेरोज़गारी का लगातार ज़िक्र किया.
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक जावेद अंसारी कहते हैं, "राहुल गांधी ने देश में मोदी-विरोध का माहौल बनाया. उनकी यात्राओं ने कांग्रस कार्यकर्ताओं में जोश डाला और लड़ने का जज़्बा जगाया."
ये अनुमान लगाना कठिन है कि आखिर इन यात्राओं ने हवा बदली या जैसा राजनितिक विचारक और राहुल गांधी की यात्रा में शामिल रहे योगेद्र यादव ने कहा कि ये जनता का चुनाव है और ये परिणाम तंत्र के उपर लोक की जीत माना जाना चाहिए.
इन चुनाव में राहुल गांधी ने लगातार जाति जनगणना की बात की. उन्होंने आगे बढ़ कर कहा कि जितनी आबादी उतनी हिस्सेदारी होनी चाहिए. इन नारों ने जरूर कई तबको में असर छोड़ा. जाति जनगणना की मांग की तीखी आलोचना भी होती रही है.
फ़रवरी में बीबीसी से बातचीत में पूर्व राजनीतिक रणनीतिकार और जन सुराज अभियान के संयोजक प्रशांत किशोर ने कहा था, "इमेज क्या बन रही है, मोदी बात कर रहे हैं पाच ट्रिलियन (डॉलर) अर्थव्यवस्था की, देश को आगे बढ़ाने की, प्रोग्रेसिव की, बड़े निर्णयों की, और राहुल गांधी क्या बात कर रहे हैं? जाति की, गलत या सही, वो (नरेंद्र मोदी) प्रगतिशील दिख रहे हैं, आप (राहुल) पीछे जाने वाले की तरह दिख रहे हैं. जब यूपीए सरकार थी तो जाति जनगणना करवाने के लिए किसने रोका था?"
'संविधान ख़तरे में है' - राहुल गांधी ने ये कहते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर तीखे हमले किए. इसका साफ़ संदेश इस बात को लेकर लोगो तक ये पहुंचा कि बीजेपी अगर पूर्ण बहुमत मे आती है तो संविधान में संशोधन लाकर आरक्षण खत्म कर देगी.
भाजपा के कुछ नेताओ के इस संदर्भ में बयान ने इस बात को हवा दी, हालांकि बीजेपी के मैनिफेस्टो में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था और बीजेपी के नेतृत्व ने इसका खंडन भी किया.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "पहले मैं सोचता था कि संविधान वाला मामला बुद्धिजीवियों के लिए है लेकिन दलित समाज में ये संदेश पहुंचा, क्योंकि एक दलित के लिए आरक्षण का वही महत्व है जितना किसान के लिए ज़मीन का पट्टा. किसान आंदोलन इसलिए खड़ा हुआ था क्योंकि लोगों को लगा कि मेरी ज़मीन जा रही है."
भविष्य की चुनौतियां
कांग्रेस के सामने चुनौती थी कि देश का एक तबका जो कांग्रेस को छोड़कर दूसरी पार्टियों को वोट कर रहा है, उसे वापस कैसे लाया जाए.
रशीद किदवई कहते हैं, "साल 1991 में कांग्रेस ने जो आर्थिक सुधार किए थे, उससे उसे वोट नहीं मिलते थे. 1996 में नरसिम्हा राव हार गए. साल 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह सुधारों का चेहरा थे. वो गरीब आदमी का चेहरा नहीं थे. राहुल गांधी इस चीज़ को भांप गए और उन्होंने 'भारत' पर मेहनत की."
"अब कांग्रेस 'भारत' में दाखिल हो गई है. 'इंडिया' में तो उसका समर्थन था, लेकिन मध्यम वर्ग ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया था. अब कांग्रेस गरीबों, वंचित समाज को जिन्हें आर्थिक सुधार का फ़ायदा नहीं मिला, उससे जोड़ पाई है."
आने वाले दिनों मे हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और सभी की निगाहें होंगी कि लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन और खासकर कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहता है.
संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक़, ज़रूरी है कि राहुल गांधी और कांग्रेस ज़मीन पर लगातार काम करें ताकि आने वाले विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को मज़बूती दी जा सके.
वो कहते हैं कि "विपक्ष को ये नहीं समझना चाहिए कि मोदी और भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति फ्लॉप हो गई है. अगर वो फ्लॉप होती तो उसकी संख्या और नीचे जाती. आज उसकी हवा निकली है, लेकिन आप उसमें दोबारा हवा मत भरिए."
राजनीतिक विश्लेषक राहुल वर्मा के मुताबिक़, "ज़रूरी है कि कांग्रेस को ऐसा न लगने लगे कि अचानक राहुल गांधी का जादू बोलने लगा है."
वो कहते हैं, "भाजपा ने ओडिशा जैसी जगहों पर नए घर ढूंढ़ लिए हैं. ताज़ा नतीजों को बेस बनाकर आगे बढ़ने की ज़रूरत है. ऐसा न सोचा जाए कि यहां से कांग्रेस के लिए राजनीति आसान हो गई है."
ये सोच कांग्रेस को कितनी दूर ले जाती है ये देखना होगा.
रशीद किदवई कहते हैं, "जितने राज्यों में कांग्रेस की सरकार आएगी, उतना ही वो नरेंद्र मोदी और भाजपा के ऊपर प्रभाव डाल पाएंगे क्योंकि अभी चुनौतियां शुरू हुई हैं."
वो कहते हैं, "नई लोकसभा में राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष बनना चाहिए. अगर आप संसदीय प्रणाली में हैं तो आप संसद में भाजपा को, सरकार को घेरें. अगर राहुल पहले नेता प्रतिपक्ष बन जाते तो वो काफ़ी बड़ा प्रभाव छोड़ते."
राहुल गांधी के लिए चुनौती होगी कि उनके विरोधी उन्हें जिस 'मौसमी राजनीतिज्ञ' की 'छवि' में बांधना चाहते हैं, वो उसे आने वाले विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन से कैसे गलत साबित करते हैं, और दिखा पाते हैं कि पार्टी का ताज़ा बेहतर प्रदर्शन कोई अनायास सफ़लता नहीं थी.