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देश में कहां-कहां और कैसे मिलता है मुस्लिम समुदाय को आरक्षण
- Author, भाग्यश्री राउत
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपनी चुनावी रैलियों में कांग्रेस मेनिफ़ेस्टो को निशाने पर ले रहे हैं और पार्टी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे हैं.
महाराष्ट्र के सातारा में एक रैली में पीएम मोदी ने आरोप लगाया, "कर्नाटक में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने एक फ़तवा जारी किया और रातोंरात सभी मुसलमानों को ओबीसी घोषित कर दिया. कांग्रेस ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण पर हमला किया है और अब उसका एजेंडा पूरे देश में एक ही फॉर्मूला लागू करना है."
इससे पहले भी उन्होंने राजस्थान में कहा था, “कांग्रेस ने एससी, एसटी और पिछड़े समुदायों का आरक्षण घटाकर मुसलमानों को दे दिया.''
लेकिन, मुस्लिम समुदाय को ओबीसी के तहत आरक्षण मिलना कोई नई बात नहीं है.
मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियों को पहले ही ओबीसी से आरक्षण मिल चुका है.
देश में मुस्लिम समुदाय को आरक्षण कैसे दिया जाता है? मुस्लिम आरक्षण की क्या स्थिति है? आइए जानते हैं.
कब से मिल रहा है आरक्षण?
ओबीसी समुदाय के शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन का अध्ययन करने के लिए बी. पी मंडल के नेतृत्व में मंडल आयोग का गठन किया गया था. मंडल आयोग की स्थापना 1 जनवरी 1979 को हुई थी जब मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री थे.
1980 में इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. इसने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की, लेकिन, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.
हालांकि, 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का निर्णय लिया. इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन, सर्वोच्च अदालत ने कुछ बदलावों के साथ इसकी सिफ़ारिशों को हरी झंडी दिखा दी.
3,743 जातियों को मिलाकर उन्हें ओबीसी में 27 फीसदी आरक्षण दिया गया. उसी मंडल आयोग ने मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियों को भी ओबीसी में शामिल किया.
बाद में जब 1994 में शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें महाराष्ट्र में लागू की. महाराष्ट्र में ओबीसी को 19 फीसदी आरक्षण दिया गया. इसमें भी महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियों को ओबीसी से आरक्षण मिला हुआ है.
महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय की कौन सी जातियां ओबीसी के अंतर्गत आती हैं?
महाराष्ट्र में कसाई, कुरेशी, मुसलमानों में कसाब, लोहार, मैदासी, समेत मुसलमानों की कुछ जातियां ओबीसी के अंतर्गत आती हैं.
इसके अलावा मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियों को वीजेएनटी (B) और वीजेएनटी (D) ऐसे दो रिजर्वेशन कैटेगरी के तहत आरक्षण दिया जा रहा है.
मंडल आयोग शरद पवार के कार्यकाल में लागू किया गया था, लेकिन भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने भी महाराष्ट्र में मुस्लिम ओबीसी के पक्ष में कई फैसले लिए.
मुस्लिम समाज के जानकार सरफराज अहमद कहते हैं कि उनके समय में ज्यादातर मुसलमानों को ओबीसी सर्टिफिकेट दिया गया था.
बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ''ऐसा नहीं है कि सभी मुसलमानों को ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है. मुसलमानों में अपर कास्ट, ट्राइबल जैसी कई श्रेणियों में आने वाली जातियां भी हैं इसलिए, सभी मुसलमानों को ओबीसी में बदला नहीं जा सकता.”
महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण को लेकर अब तक क्या हुआ?
शरद पवार के मुख्यमंत्री रहते हुए कार्यकाल में मंडल आयोग लागू होने से मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियों को ओबीसी में आरक्षण मिला. लेकिन, उसके बाद भी शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षण की मांग जोर पकड़ने लगी.
इसके लिए प्रदेश में आंदोलन भी हुए. आखिरकार, साल 2009 में राज्य की तत्कालीन गठबंधन सरकार ने मुस्लिम समुदाय के शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की जांच के लिए महमूद उर रहमान समिति की स्थापना की.
21 अक्टूबर 2013 को समिति ने मुस्लिम समुदाय के लिए 8 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी. 2014 के चुनावों के लिए, पृथ्वीराज चव्हाण सरकार ने 9 जुलाई 2014 को मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में 5 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए एक अध्यादेश पारित किया.
इसी दिन मराठा समुदाय को आरक्षण भी दिया गया था. मराठा आरक्षण हाई कोर्ट में नहीं टिक पाया. हालांकि, हाई कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को दिए गए शैक्षणिक आरक्षण की वैधता को बरकरार रखा है.
बीबीसी मराठी से बात करते हुए एडवोकेट फ़िरदौस मिर्ज़ा कहते हैं, ''उस समय मुस्लिम समुदाय को आरक्षण नहीं मिल सका क्योंकि अध्यादेश केवल छह महीने के लिए प्रभावी होता था. साथ ही हाई कोर्ट के फैसले के बावजूद नई बीजेपी-शिवसेना सरकार ने अध्यादेश को क़ानून में नहीं बदला.”
मुस्लिम समुदाय के जानकार हुमायूं मुर्सल उनकी इस बात से सहमत हैं.
बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ''पृथ्वीराज चव्हाण सरकार द्वारा दिया गया आरक्षण, धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था. हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद तत्कालीन शिवसेना-बीजेपी सरकार ने इस आदेश को लागू नहीं किया और सिर्फ राजनीति के लिए मुस्लिम समुदाय को आरक्षण नहीं दिया.”
इसके बाद भी महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के साथ मुस्लिम आरक्षण की भी मांग उठी. मराठा आरक्षण के लिए आयोग की स्थापना की गई.
20 फरवरी 2024 को एकनाथ शिंदे सरकार ने मराठा समुदाय को 10 फीसदी आरक्षण दिया था. लेकिन, मुस्लिम आरक्षण को लेकर कोई हलचल देखने को नहीं मिली.
देश में मुस्लिम आरक्षण की क्या स्थिति है?
केंद्रीय पिछड़ा वर्ग सूची में कुछ मुस्लिम जातियों को उन राज्यों में आरक्षण मिलता है जहां मंडल आयोग लागू है.
इसमें पीआईबी में दी गई जानकारी के मुताबिक़, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु के कुछ मुस्लिम समुदाय की कुछ जातियों, उत्तर प्रदेश के तेली और कायस्थ मुसलमानों, साथ ही बिहार, केरल, असम के मुसलमानों को ओबीसी के तहत आरक्षण दिया जा रहा है.
केरल में शिक्षा में 8 फीसदी और नौकरियों में 10 फीसदी सीटें मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षित हैं.
तमिलनाडु में भी 90 फीसदी मुस्लिम समुदाय आरक्षण की श्रेणी में आता है, जबकि बिहार में मुस्लिम समुदाय को पिछड़ा और अति पिछड़ा के रूप में वर्गीकृत करके आरक्षण दिया गया था.
आंध्र प्रदेश में मुस्लिम समुदाय को 5 फीसदी आरक्षण दिया गया. हालांकि, यह आरक्षण रद्द कर दिया गया क्योंकि आरक्षण पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श किए बिना दिया गया था.
2005 में मुसलमानों को पांच फीसदी आरक्षण देने का कानून भी दूसरी बार पारित हुआ. लेकिन, आंध्र प्रदेश में आरक्षण की सीमा 51 फीसदी को पार कर रही थी. इसलिए यह आरक्षण कोर्ट में टिक नहीं सका.
शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर मुस्लिम आरक्षण का कोटा घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया गया ताकि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा पार न हो. इसके बाद भी मामला कोर्ट में चला गया. फिलहाल सुनवाई जारी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, कि कर्नाटक में कांग्रेस ने सभी मुसलमानों को ओबीसी से आरक्षण देकर ओबीसी घोषित कर दिया.
तो आइए एक नजर डालते हैं कि कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय को आरक्षण किसने दिया?
कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण किसने दिया?
ऐसा नहीं है कि कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय को अभी आरक्षण मिल रहा है. जनता दल (एस) सरकार, जो वर्तमान में भाजपा के साथ गठबंधन में है, ने ओबीसी के बीच उप-कोटा बनाकर मुस्लिम समुदाय को आरक्षण दिया था.
चिन्नापा रेड्डी आयोग ने ओबीसी में 'श्रेणी 2' बनाकर आरक्षण की सिफारिश की थी.
इसके बाद 90 के दशक में कांग्रेस समर्थित वीरप्पा मोइली सरकार ने ओबीसी के बीच 'श्रेणी 2 बी' बनाई थी और अनुसूचित जाति के उन लोगों को 6 प्रतिशत आरक्षण दिया था, जिन्होंने इस्लाम, बौद्ध और ईसाई धर्म अपना लिया था.
इसमें से 4 फीसदी आरक्षण मुस्लिम समुदाय को दिया गया. लेकिन, इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई.
सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को निरस्त कर दिया क्योंकि इससे आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत को पार कर रही थी. इसके बाद वीरप्पा मोइली और कांग्रेस सरकार गिर गयी.
1994 में एच. डी. देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने.
उन्होंने 1995 में पिछली सरकार के फैसले में संशोधन कर इसे लागू कर दिया.
बौद्ध और ईसाई धर्म अपनाने वाली अनुसूचित जातियों को '1 और 2ए' श्रेणियों में और मुसलमानों को 2बी श्रेणियों में पुनर्वर्गीकृत किया गया. इसके बाद राज्य सरकार की नौकरियों और शिक्षा में मुस्लिम समुदाय को 4 प्रतिशत आरक्षण दिया गया.
लेकिन, बीजेपी के सत्ता में आने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बोम्मई ने मुसलमानों के लिए 4 फीसदी आरक्षण रद्द कर दिया. फिर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सरकार के फैसले पर रोक लगा दी.
क्या कहता है संविधान?
मुस्लिम समुदाय की ओर से लगातार आरक्षण की मांग होती रही है.
क्या इस समुदाय को संविधान के अनुसार आरक्षण दिया जा सकता है?
महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता श्रीहरी अणे कहते हैं, ''संविधान के मुताबिक, धर्म के आधार पर आरक्षण देने का कहीं भी कोई प्रावधान नहीं है.''
बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "संविधान में अल्पसंख्यकों और पिछड़े समुदायों के लिए अलग-अलग अधिकार हैं. अगर किसी धर्म के लोग इसके तहत आ सकते हैं तो उन्हें अल्पसंख्यक या पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण मिल सकता है. लेकिन, केवल धर्म के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत आरक्षण नहीं दिया जा सकता. ऐसा कोई प्रावधान नहीं है."
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