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हाइड्रोजन पेट्रोल-डीज़ल और बिजली का कितना बड़ा विकल्प बन पाएगी - दुनिया जहान
स्कूल की प्रयोगशाला में जिस तरह धातु की दो पट्टियों को पानी में डुबोकर उन्हें बैटरी से जोड़ने पर धातु की पट्टियों पर बुलबुले उभरते है. असल में ये ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के बुलबुले होते हैं यानी H2O.
पानी के तत्वों का विघटन होकर वो ऑक्सीजन और हाइड्रोजन में बदल जाता है.
इस हाइड्रोजन का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जा सकता है. खाना पकाया जा सकता है, गाड़ियां ही नहीं बल्कि हवाई जहाज़ उड़ाने के लिए भी इस ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा सकता है.
पेट्रोल या कोयले से कार्बन गैस बनती है और पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाती है. मगर हाइड्रोजन की सबसे अच्छी बात यह है कि जलने के बाद ऑक्सीजन और हाइड्रोजन मिल कर पानी में बदल जाते हैं और कार्बन उत्सर्जन नहीं होता.
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अक्षय ऊर्जा साबित हो सकती है और जलवायु परिवर्तन की समस्या सुलझाने में भी मददगार सिद्ध हो सकती है.
इस हफ़्ते हम दुनिया जहान में यही समझने की कोशिश करेंगे कि क्या हाइड्रोजन हमारी ऊर्जा की समस्या का हल कर सकती है?
हाइड्रोजन से कैसे बनता है ईंधन?
ब्रिटेन की शेफ़िल्ड यूनिवर्सिटी में केमिकल इंजीनियरिंग की प्रोफ़ेसर और ब्रिटेन की संस्थाओं में हाइड्रोजन के इस्तेमाल पर अनुसंधान कर रही रेचेल रॉथमन कहती हैं हाइड्रोजन को कई तरीक़े से जलाकर ईंधन का काम लिया जा सकता है.
उनके मुताबिक़, “हाइड्रोजन के जलने से भाप बनती है. हम हाइड्रोजन को किसी छोटी बॉयलर टंकी में जला सकते हैं या बड़ी फ़ैक्ट्रियों या बड़े वाहनों की टंकी में जला सकते हैं. इसे वाहनों को कंबस्टन इंजन में भरकर जलाया जा सकता है या बैटरी के सेल में रख कर ऊर्जा पैदा की जा सकती है.”
हाइड्रोजन तो कई तरीके से बनायी जा सकती हैं मगर ज़रूरी यह है कि उसे स्वच्छ तरीके से बनाया जाए.
रेचेल रॉथमन कहती हैं, “हाइड्रोजन धरती पर प्राकृतिक रूप से नहीं मिलती लेकिन पानी, हाइड्रोकार्बन के रूप में कोयले और गैस और तेल में मिलती है. हाइड्रोकार्बन स्रोत यानि प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन निकालने की प्रक्रिया को स्टीम मीथेन रिफ़ॉर्मिंग कहते हैं और दुनियाभर में इसका इस्तेमाल हो रहा है और हर साल 12 करोड़ टन हाइड्रोजन बनाया जा रहा है."
"लेकिन इसमें समस्या यह है कि इससे कार्बन गैस का उत्सर्जन भी होता है. इसलिए हाइड्रोजन बनाने का सबसे बेहतर तरीका है उसे पानी से निकालने का जिसे इलेक्ट्रोलिसिस कहते हैं. इस प्रक्रिया में सिर्फ़ ऑक्सीजन ही बाहर निकलती है.”
हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रियाओं को ब्लू, ग्रीन या ब्राउन रंग के चार्ट में दिखाया जाता है जो यह बताते हैं कि वह प्रक्रिया कितनी स्वच्छ है यानि उस प्रक्रिया से कितनी कार्बन बाहर निकलती है.
रेचेल रॉथमन बताती हैं कि फ़िलहाल मिथेन स्टीम रिफ़ॉर्मिंग की ब्राउन प्रक्रिया से कार्बन गैस भी निकल कर हवा में मिलती है.
ब्लू प्रक्रिया में अंतर सिर्फ इतना है कि इससे निकलने वाली कार्बन गैस को इकट्ठा कर उसका कोई और इस्तेमाल किया जा सकता है.
सबसे बेहतरीन है ग्रीन प्रक्रिया और वो है इलेक्ट्रोलिसिस यानि पानी से हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया. बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी ज़रूरत की पूरी ऊर्जा ब्लू और ग्रीन प्रक्रिया से बनाएं.
रेचेल रॉथमन कहती हैं, “हमने जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने का जो नेट ज़ीरो लक्ष्य रखा है उसके लिए आवश्यक मात्रा में इलक्ट्रोलिसिस से हाइड्रोजन नहीं बन रहा है और उसके लिए जिस किस्म की टेक्नोलॉजी चाहिए, उसके बनने में समय लगेगा. तब तक हम ब्राउन और ब्लू प्रक्रिया वाली हाइड्रोजन का इस्तेमाल करते रहेंगे.”
लेकिन क्या सहारा रेगिस्तान में सौर ऊर्जा पैनल बिछा कर वहां इलेक्ट्रोलिसिस के ज़रिए हाइड्रोजन बना कर दुनिया को नहीं सप्लाई की जा सकती?
रेचेल रॉथमन कहती हैं इसमें कई दिक्कतें हैं, “सहारा रेगिस्तान में बिजली बना कर दूसरी जगहों पर सप्लाई करना आसान नहीं है. हाइड्रोजन के अणु बहुत सूक्ष्म होते हैं और आसानी से हवा में रिस जाते हैं. इसलिए हाइड्रोजन को बड़े कंटेनरों में भरकर भेजा जाए तो मंज़िल तक पहुंचने से पहले ही बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन रिस जाएगी."
"दूसरी बात उसे लाने के लिए पानी के बड़े जहाज़ों की ज़रूरत होगी जो डीज़ल पर चलते हैं. तो कार्बन कम करने का लक्ष्य तो वहीं का वहीं रह जाएगा.”
इससे साफ़ है कि इस्तेमाल की जगह ही हाइड्रोजन बनाई जाए. मगर क्या उसे बनाने के लिए घर के पिछवाड़े जैसी जगहों पर इलेक्ट्रोलायसर उपकरण लगाए जा सकते हैं?
रेचेल रॉथमन का कहना है कि सैद्धांतिक तौर पर यह संभव तो है लेकिन चुनौती इसे बड़े पैमाने पर सस्ती कीमत पर बनाने की है ताकि यह व्यवहारिक और टिकाऊ विकल्प बन पाए जो फ़िलहाल आसान नहीं है.
विमान, ट्रेन और गाड़ियां
यातायात साधनों पर बड़े पैमाने पर ऊर्जा खर्च होती है और यह कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत भी है.
अब हम सड़कों पर बिजली से चलने वाली गाड़ियां देख रहे हैं जो लिथियम बैटरी पर चलती हैं. मगर बड़े ट्रक, ट्रेन और नौकाओं को चलाने के लिए बैटरी की क्षमता काफ़ी नहीं होती. इन साधनों को चलाने में भी हाइड्रोजन का इस्तेमाल हो सकता है.
दुनियाभर में संस्थाओं को स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल के तरीकों पर सलाह देने वाली संस्था में क्लीन एयर टास्क फोर्स के प्रबंधक थॉमस वॉकर कहते हैं कि मालवाहक पोत और ट्रकों को हाइड्रोजन से चलाया जा सकता है.
वो कहते हैं, “दुनिया में यातायात साधनों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन का 2-3% हिस्सा बड़ी मालवाहक पोतों से होता है. इन नौकाओं में अमोनिया यानी नाइट्रोजन और हाइड्रोजन को ईंधन की तरह इस्तेमाल करने से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है.”
और सामान की ढुलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले ट्रकों में बैटरी की जगह कंबस्टन इंजन में हाइड्रोजन भर कर चलाने से भी क्या मदद मिल सकती है?
थॉमस वॉकर कहते हैं, “ट्रक लंबी दूरी की यात्रा करते हैं और बैटरियों पर उन्हें चलाने में समस्या यह है कि उन्हें कई बार चार्ज करना पड़ेगा. ये बैटरियां बहुत बड़ी होती हैं और 1000 किलोवॉट की बैटरी चार्ज करने में पांच घंटे तक का समय लग सकता है. लेकिन इसी ट्रक में हाइड्रोजन भरने में सिर्फ़ 20 मिनट लगते हैं.”
“मगर हाइड्रोजन के साथ भी एक समस्या है कि इसे भरने के लिए पेचीदा किस्म के उपकरणों की ज़रूरत पड़ती है क्योंकि दबाव की वजह से यह बहुत गर्म हो जाती हैं तो यह सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी होता है कि ट्रक में डालते समय हाइड्रोजन गैस सही कंडिशन में हो और दबाव बिल्कुल सही रहे.”
अगर उपकरणों और टेक्नोलॉजी की समस्या सुलझ भी जाए तो यह सुनिश्चित करना होगा कि हर जगह पर्याप्त संख्या में हाइड्रोजन पंप उपलब्ध हों.
वॉकर कहते हैं इसके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने होंगे और इसे बढ़ावा देने के लिए सरकार की तरफ़ से रियायतें भी देनी होंगी. लेकिन क्या हवाई जहाज़ चलाने के लिए हाइड्रोजन का इस्तेमाल हो सकता है?
थॉमस वाकर का मानना है कि इस दिशा में कुछ प्रयास तो हो रहे हैं, “हमें लगता है कि हवाई यायतायात में हाइड्रोजन के इस्तेमाल से काफ़ी बदलाव लाए जा सकते हैं. यातायात से होने वाले कार्बन उत्सर्जन का 10% विमानों से होता है.”
“हमने हाल में देखा है कि छोटे विमानों में हाइड्रोजन के इस्तेमाल के प्रयोग के अच्छे नतीजे दिखाई दिए हैं. हाइड्रोजन के इस्तेमाल के लिए हवाई ज़हाज़ के इंजन में बदलाव लाया जा रहा है.”
मगर थॉमस वॉकर यह भी याद दिलाते हैं कि हवाई यातायात के क्षेत्र में हाइड्रोजन के इस्तेमाल में कम से कम 10 से 20 साल का समय लग सकता है.
घर और उद्योगों में हाइड्रोजन का इस्तेमाल
हाइड्रोजन का इस्तेमाल रसोई में खाना बनाने और घरों को गर्म रखने के लिए भी किया जा सकता है.
न्यूकासल यूनिवर्सिटी में ऊर्जा विषय की प्रोफ़ेसर सारा वॉकर कहती हैं कि ब्रिटेन में फ़िलहाल खाना बनाने या इमारतों को गर्म रखने के लिए 80% प्रतिशत से अधिक प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होता है.
कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हाड्रोजन इसका विकल्प बन सकता है.
साल 2019 से ही ब्रिटेन की सरकार ने कुछ गिने चुने इलाकों में हाइड्रोजन का इस्तेमाल प्रयोग के तौर पर शुरू कर दिया है. लेकिन उसके लिए कुछ बदलावों की ज़रूरत होगी.
वो कहती हैं, “हमें घरों और इमारतों में इस्तेमाल होने वाले उन ब्वायलरों को बदलना होगा जो प्राकृतिक गैस पर काम करते हैं. इसी तरह हाइड्रोजन का इस्तेमाल करने के लिए खाना पकाने के उपकरण भी बदलने होंगे."
"हम देख रहे हैं कि इसके इस्तेमाल से लोगों के जीवन पर क्या असर पड़ रहा है, वो किस प्रकार इस बदलाव को अपना पा रहे हैं और हाइड्रोजन के इस्तेमाल की पूरी व्यवस्था कैसे काम करती है.”
प्रयोग
सारा वॉकर कहती हैं कील यूनिवर्सटी में पूरी तरह हाइड्रोजन के ज़रिए हीटिंग की ज़रूरत पूरी करने का प्रयोग किया गया और उसके नतीजे भी अच्छे निकले.
ब्रिटेन सरकार 2026 तक नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है इसलिए उसे तय करना होगा कि हाइड्रोजन उत्पादन और सप्लाई नेटवर्क के ढांचे बनाने के लिए किस प्रकार का निवेश करे या फिर बिजली के मूलभूत ढांचा निर्माण पर बल दे.
पूरी दुनिया इस समय प्राकृतिक गैस की क़ीमत में आए उछाल से निपट रही है ऐसे में हाइड्रोजन के इस्तेमाल की क्या क़ीमत होगी?
वो कहती हैं, “स्वाभाविक है कि हाइड्रोजन गैस मंहगी होगी क्योंकि ब्रिटेन में फ़िलहाल 97 प्रतिशत हाइड्रोजन गैस प्राकृतिक गैस से बनायी जा रही है. हालांकि वो तरीक़ा स्वच्छ है फिर भी हमें देखना है कि हम साफ़ ऊर्जा कम क़ीमत पर कैसे बना सकते हैं.”
सारा वॉकर का यह भी कहना है कि हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में अपनाने के शुरुआती दौर में इसका इस्तेमाल इमारतों को गर्म करने के बजाय अगर बड़े उद्योगों में किया जाए तो बेहतर रहेगा.
उनके अनुसार, “हाइड्रोजन का इस्तेमाल पहले उद्योगों को ऊर्जा सप्लाई में होना चाहिए जैसे कि शीशा और धातु और केमिकल फ़ैक्ट्रियां जहां ऊंचे तापमान की ज़रूरत पड़ती है. वहां हाइड्रोजन का इस्तेमाल शुरुआत में अधिक आसान हो सकता है.”
जहां तक घरों और इमारतों को गर्म रखने का सवाल है, सारा वॉकर का कहना है कि फ़िलहाल उसके लिए हमें दूसरे ईंधन का इस्तेमाल करना चाहिए.
क्या ये हवाई दावे हैं?
रॉबर्ट हावर्थ जीव वैज्ञानक हैं और पर्यावरणीय मामलों के विशेषज्ञ भी. वो अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं और हाइड्रोजन को ईंधन की तरह इस्तेमाल करने को लेकर उन्हें कई संदेह हैं.
वो कहते हैं, “पहले कभी हाइड्रोजन का इस्तेमाल ईंधन की तरह नहीं किया गया है. इसका इस्तेमाल खाद, रिफ़ाइंड पेट्रोलियम या प्लास्टिक जैसी दूसरी चीज़ें बनाने में होता रहा है. कुछ ऊर्जा विशेषज्ञ कहते हैं कि कार्बन उत्सर्जन कम करने में यह काम आएगा लेकिन मेरे ख़्याल से कार्बन उत्सर्जन कम करने में हाइड्रोजन की भूमिका होगी लेकिन काफ़ी छोटी भूमिका होगी. मगर पिछले कुछ सालों में इसकी भूमिका को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है.”
रॉबर्ट हावर्थ कहते हैं कि पानी से बिजली के ज़रिए इलेक्ट्रोलिसिस की प्रक्रिया से हाइड्रोजन बनाना बिजली का अच्छा इस्तेमाल नहीं होगा.
“इलेक्ट्रोलिसिस से हाइड्रोजन बनाना किफ़ायती तरीक़ा नहीं है क्योंकि इसमें बिजली से पैदा होने वाली लगभग 40% ऊर्जा बेकार हो जाएगी और जो हाइड्रोजन बनेगा उसे दूसरी जगहों पर ले जाने के दौरान उसका एक बड़ा हिस्सा रिस जाएगा. इसे घर की रसोई में या घरों की हीटिंग के लिए इस्तेमाल करना बिल्कुल भी व्यवहारिक या किफ़ायती नहीं होगा.”
रॉबर्ट हावर्थ का मानना है इससे बेहतर तरीका तो घरों को गर्म करने के लिए बिजली का इस्तेमाल है. वहीं वो ब्लू हाइड्रोजन यानी गैस या तेल से निकालने वाले हाइड्रोजन की भी आलोचना करते हैं.
“ब्लू हाइड्रोजन बनाने का काम 10 साल से चल रहा है लेकिन इस प्रक्रिया से कार्बन उत्सर्जन में कोई ख़ास कमी नहीं आई है. वहीं हाइड्रोजन जब पर्यावरण में घुलता है तो वो धरती की तापमान बढ़ाता है क्योंकि वो पर्यावरण की दूसरी गैसों और तत्वों से मिलकर उनकी रासायनिक संरचना को बदल देता है. हाइड्रोजन के वायुमंडल में मौजूद ऑक्सीजन से मिलने से भाप भी बनती है और तापमान बढ़ता है.”
तो फिर हाइड्रोजन को लेकर दुनिया में इतना उत्साह क्यों है?
रॉबर्ट हावर्थ कहते हैं, “सरकार और प्राकृतिक गैस और तेल उद्योग इसे बहुत बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहा है. वो इसलिए भी ऐसा कर रहे हैं क्योंकि वो प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल को प्रमोट करना चाहते हैं. दूसरे वो चाहते हैं कि इन गैस पाइपलाइनों का इस्तेमाल जारी रहे. उनका दावा है कि ये पाइपलाइनें हाइड्रोजन सप्लाई के काम भी आ सकती हैं. लेकिन मौजूदा पाइप लाइनों से हाइड्रोजन की सप्लाई नहीं हो सकती. वो चाहते हैं कि कम से कम 10-20 सालों तक प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल जारी रहे और वो मुनाफ़ा कमाते रहें.”
रॉबर्ट हावर्थ का कहना है कि भविष्य में संभवतः हाइड्रोजन विमान और बड़े पोतों में ईंधन की तरह भी काम आए लेकिन ऊर्जा क्षेत्र में उसकी भूमिका छोटी ही रहेगी.
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