चैंपियंस ट्रॉफ़ी फ़ाइनल की 25 साल पुरानी टीस, तब भी न्यूज़ीलैंड और भारत थे आमने-सामने

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कहते हैं कि इतिहास ख़ुद को दोहराता है. चैंपियंस ट्रॉफ़ी क्रिकेट के इतिहास में 25 साल बाद इतिहास ख़ुद को दोहरा रहा है.
दरअसल, 25 साल पहले, 15 अक्तूबर 2000 को जिमखाना क्लब ग्राउंड, नैरोबी में आईसीसी नॉकआउट (जिसे बाद में चैंपियंस ट्रॉफ़ी नाम दिया गया) मुक़ाबले का फ़ाइनल भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच खेला गया था.
तब न्यूज़ीलैंड की टीम ने बेहद रोमांचक मुक़ाबले में भारत को चार विकेट से हराकर चैंपियंस ट्रॉफ़ी पर क़ब्ज़ा जमा लिया था.
दुबई में चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल मुक़ाबले में भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ जब मुक़ाबले के लिए उतरेगी तो उसके सामने 25 साल पहले का हिसाब बराबर करने का मौका होगा.

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25 साल पहले क्या हुआ था

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क़रीब 25 साल पहले 15 अक्तूबर, 2000 को नैरोबी में चैंपियंस ट्रॉफ़ी में भारतीय टीम फ़ाइनल तक पहुंची थी, यह किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था.
इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही थी कि उस वक्त भारतीय क्रिकेट में फिक्सिंग का भूचाल आया हुआ था और टीम एक बदलाव के दौर से गुज़र रही थी.
कोच के तौर पर कपिल देव और कप्तान के तौर पर सचिन तेंदुलकर अपने-अपने पद छोड़ चुके थे. ऐसे समय में न्यूज़ीलैंड के सलामी बल्लेबाज़ रहे जॉन राइट और सौरव गांगुली की जोड़ी ने मोर्चा संभाला था और चैंपियंस ट्रॉफी वो पहली सिरीज़ थी, जहां से इन दोनों का इम्तिहान शुरू हुआ था.
ऐसे इम्तिहान में सौरव गांगुली ने ख़ुद को बख़ूबी साबित किया. पहले तो उन्होंने सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले में दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ पारी की शुरुआत करते हुए 142 गेंदों में 141 नाबाद रनों की पारी खेली.
इस पारी में उन्होंने 11 चौके और छह ज़बर्दस्त छक्के जमाए. वो पारी की शुरुआत से अंत तक क्रीज़ पर जमे रहे और भारतीय टीम का स्कोर 295 रन तक पहुंचा दिया, जो दक्षिण अफ्रीकी टीम की पहुंच से काफी दूर रहा.
फ़ाइनल मुक़ाबला

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फ़ाइनल मुक़ाबले में न्यूज़ीलैंड के सामने भारतीय टीम को सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली ने शानदार शुरुआत दी. दोनों ने 27वें ओवर तक भारत के लिए 141 रन जोड़ दिए.
सचिन तेंदुलकर 83 गेंदों पर 69 रन बनाकर आउट हुए. वो रन आउट हुए थे, नहीं तो उनको आउट करना किसी कीवी गेंदबाज़ के बस में नहीं लग रहा था.
गांगुली के पूरे करियर में ख़राब रनिंग बिटविन द विकेट किसी साये की तरह उनका पीछा करता रहा, लेकिन वे इससे पार पाने का दूसरा तरीक़ा निकाल चुके थे. भरपाई के लिए विकेट पर खुद टिके रहते थे.
इस फ़ाइनल मुक़ाबले में भी उन्होंने वही दम दिखाया. 130 गेंदों में नौ चौके और चार छक्के की मदद से उन्होंने 117 रन की पारी खेली.
लगातार दूसरे मुक़ाबले में उन्होंने शतकीय पारी खेली थी.
किसी आईसीसी टूर्नामेंट के फ़ाइनल के दबाव के सामने शतक की उपलब्धि कितनी बड़ी है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि भारतीय टीम दुबई में होने वाले आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी फ़ाइनल से पहले अब तक 11 बार आईसीसी टूर्नामेंट के फ़ाइनल में शिरकत कर चुकी है. लेकिन अब तक भारत की ओर से फ़ाइनल मुक़ाबले में कोई दूसरा शतक नहीं बन पाया है.
यानी सौरव गांगुली का रिकॉर्ड आज तक बना हुआ है, अब देखना है कि रोहित शर्मा के धुरंधर इस रिकॉर्ड की बराबरी कर पाते हैं या नहीं.
क्रिस केर्न्स ने पलटा मैच

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लेकिन सौरव गांगुली का ये शतक भी नाकाफ़ी साबित रहा. भारतीय टीम एक समय बेहद मज़बूत स्थिति में दिख रही थी लेकिन युवराज सिंह, विनोद कांबली और रॉबिन सिंह जैसे बल्लेबाज़ कुछ ख़ास नहीं कर सके.
और आख़िरी ओवरों में कीवी गेंदबाज़ों ने शानदार खेल दिखाते हुए भारत को 50 ओवरों में छह विकेट पर 264 रनों पर रोक दिया था.
इसके बाद वेंकटेश प्रसाद ने अपनी स्विंग भरी गेंदबाज़ी से भारत को जल्दी जल्दी दो कामायबी दिला दी.
लगा मैच भारत की मुट्ठी में है. यहीं से न्यूज़ीलैंड के ऑलराउंडर क्रिस केर्न्स ने अपने करियर की सबसे उम्दा पारी को जमाना शुरू कर दिया. दूसरे छोर पर विकेट गिर रहे थे. एक समय न्यूज़ीलैंड के पांच विकेट गिर गए थे और टीम का स्कोर 132 रन था.
यहां से क्रिस को दूसरे ऑलराउंडर क्रिस हैरिस का साथ मिलना शुरू हुआ. और दोनों ने देखते देखते 25 ओवरों की साझेदारी कर दी और छठे विकेट के लिए मैच जिताने वाले 122 रन जोड़ दिए.
क्रिस हैरिस 72 गेंद पर चार चौकों की मदद से 46 रन बनाकर आउट हुए लेकिन तब तक मैच कीवी टीम की गिरफ़्त में आ चुका था.

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केर्न्स ने दो गेंद बाक़ी रहते विजयी रन बना दिया. उन्होंने 113 गेंदों पर नाबाद 102 रनों की पारी खेली, और उन्हें मैन ऑफ़ द मैच आंका गया.
मैच के प्रेज़ेंटेशन समारोह में क्रिस केर्न्स ने कहा था, "यह अब तक सबसे महान क्षण है. मैं कुछ सालों से खेल रहा हूं. उम्र भी हो गई है लेकिन ऐसा पल अब तक नहीं आया था. जीतना तो दूर अब तक हमारी टीम किसी आईसीसी टूर्नामेंट के फ़ाइनल तक नहीं पहुंची थी. इसलिए यह सबसे बेहतरीन है."
वैसे दिलचस्प यह भी था कि इस मुक़ाबले से ठीक पहले क्रिस के घुटनों का दर्द काफ़ी बढ़ चुका था और उन्होंने दर्द निवारक दवाओं के साथ इस मैच में खेलने का फ़ैसला लिया था.
टीम मीटिंग में उनके विकल्प के नाम पर मुहर भी लग गई थी लेकिन टीम के कप्तान स्टीफ़न फ्लेमिंग ने केर्न्स पर भरोसा जताया जो आख़िरी में ट्रंप कार्ड साबित हुआ.

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मैच पर सौरव गांगुली ने अपनी किताब में लिखा
इस मैच के बाद भारतीय कप्तान सौरव गांगुली ने कहा था कि अंतिम ओवरों में भारतीय बल्लेबाज़ों ने स्टुपिडिटी दिखाई और इस वजह से टीम 300 रन तक नहीं पहुंच सकी.
गांगुली ने क्रिकेट करियर के बाद गौतम भट्टाचार्या के साथ 'ए सेंचुरी इज़ नॉट इनफ़' नाम से अपने करियर के उतार-चढ़ाव पर किताब लिखी.
इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है, "हमने बहुत शानदार शुरुआत की थी. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ जीत से सफ़र शुरू हुआ था. हालांकि हम फ़ाइनल हार गए थे. ये वो मैच था, जिसे हमें जीतना चाहिए था."
सौरव गांगुली ने इस टूर्नामेंट को लेकर इस बात का ज़िक्र भी किया है कि किस तरह से युवराज सिंह ने इंटरनेशनल क्रिकेट में शानदार डेब्यू किया था. लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने फिक्सिंग के भंवर से भारतीय क्रिकेट को बाहर निकालने का काम इसी टूर्नामेंट से दिखाया था.
सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल के उनके शतक को लोग भले भूलते जा रहे हों लेकिन यही वह कॉन्फिडेंस बिल्डिंग का दौर था, जिस नींव पर आज भारतीय क्रिकेट की तूती दुनिया में बोल रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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