बुद्धदेव भट्टाचार्य: पश्चिम बंगाल की राजनीति का अंतिम भद्रलोक

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- Author, सुबीर भौमिक
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के निधन के साथ वामपंथी राजनीति का एक अध्याय समाप्त हो गया.
बीते कुछ समय से बीमार चल रहे भट्टाचार्य 80 साल के थे और उनका निधन आठ अगस्त को बालीगंज स्थित उनके पाम एवेन्यू आवास पर हुआ.
उनकी पार्टी के कुछ कॉमरेड उन्हें मार्क्सवादी कम, बंगाली ज़्यादा मानते थे. उनके पहनावे और बातचीत के सलीके के चलते कुछ दूसरे कॉमरेड उन्हें भद्रलोक कहा करते थे. आर्थिक उदारवाद लागू करने और पूंजीवाद के साथ तालमेल बिठाने के चलते कुछ कॉमरेड उन्हें 'बंगाली गोर्बाचोव' भी कहते थे.
पहले ज्योति बसु की कैबिनेट में अहम मंत्री और बाद में 2000 से लेकर 2011 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर, मैं उन्हें ऐसे शख़्स के तौर पर देखता रहा जिन्हें दिन भर की कामकाजी व्यस्तता के बाद यूरोपीय फ़िल्मकारों की बेहतरीन फ़िल्में देखना पसंद था.
1944 में जन्में बुद्धदेव भट्टाचार्य की दिलचस्पी का दायरा राजनीति से इतर साहित्य, थिएटर, सिनेमा और संगीत तक फैला हुआ था. वे घंटों टैगोर की कविताओं को सुना सकते थे और पाब्लो नेरूदा की कविताओं का ज़िक्र कर सकते थे.
बुद्धदेव भट्टाचार्य नामचीन बंगाली वामपंथी कवि सुकांतो भट्टाचार्य के भतीजे थे और मंत्री रहते हुए उन्होंने कुछ नाटक लिखे जिनका मंचन भी हुआ.
1990 के शुरुआती सालों में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर अपने मेंटॉर ज्योति बसु को हतप्रभ कर दिया था हालांकि बाद में ज्योति बसु ने उन्हें मंत्रीमंडल में वापसी करने के लिए मना लिया था.
जब वे सरकार से बाहर थे तब उन्होंने एक दुसमय (ख़राब समय) शीर्षक से एक नाटक लिखा था, एक तरह से यह नाटक उनके अपने उहापोह पर आधारित था.
वे उस वक़्त वामपंथी विचारधारा के साथ समझौता करने में ख़ुद को असमर्थ पा रहे थे.

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फ़िल्मों से लगाव
वैसे कोलकाता के बीचोंबीच नंदन कल्चरल कांप्लैक्स के निर्माण के पीछे बुद्धदेव भट्टाचार्य ही थे. इस सेंटर में दुनिया भर की बेहतरीन फिल्मों का संग्रह मौजूद है.
इतना ही नहीं यहां सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक से लेकर बुद्धदेव दासगुप्ता और गौतम घोष जैसी बंगाली फिल्मकारों की फिल्में भी दिखाई जाती रही हैं.
बीबीसी संवाददाता और बुद्धदेव से छात्र जीवन से ही निजी परिचय के चलते मैं नंदन कल्चरल कांप्लैक्स के उस समूह का हिस्सा था जिन्हें सप्ताहंत बेहतरीन फिल्में देखने को मिलती थीं.
इसके संग्रह में मिखाइल अजेंस्टाइनल की बैटलशिप पोटेमकिम से लेकर कोस्टा जावेरस की जेड के अलावा फ्रांसीसी फ़िल्मकारा फ्रांस्वा तरूपोह, जीन लक गोडार्ड, इटालियन फ़िल्मकार विटोरियो डि सिका, लैटिन अमरीकी फ़िल्मकार लुइस बुनेल, जापानी फ़िल्मकार अकीरा कुरोसोवा, इटालियन फ़िल्मकार फ़ेडरिको फ़ेलिनी जैसे दिग्गजों के सिने संसार के अलावा भारतीय फ़िल्मकारों की फ़िल्में भी मौजूद हैं.
बुद्धदेव ने यहां मंत्री रहते हुए मशहूर फ़िल्मकारों की फ़िल्मों की विशेष स्क्रीनिंग की शुरुआत की.
एक दिन मैंने बुद्धदेव भट्टाचार्य से वहीं सुना, "अगर ऋत्विक घटक की फ़िल्मों को उनके जीवन के दौरान प्रदर्शित करने के लिए हमारे पास नंदन होता तो वे उतनी ग़रीबी में नहीं मरते."
1990 के मध्य में नंदन में ऋत्विक घटक की याद में हुए फ़िल्म समारोह का पूरा मुनाफ़ा उनके परिवार वालों को सौंपा गया था.

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बुद्धदेव भट्टाचार्य का दूसरा रूप
बंगाल के बौद्धिक चिंतकों, लेखकों, कवियों, नाट्यकर्मियों और सिने जगत के लोगों के बीच बुद्धदेव बेहद लोकप्रिय थे.
वे हमेशा इन लोगों को प्रोत्साहित किया करते थे. हालांकि यह सिलसिला तब थम गया जब पश्चिम बंगाल की पुलिस ने नंदीग्राम की ज़मीन को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाईं.
इसके बाद बड़ी संख्या में बंगाली बुद्धिजीवियों ने बुद्धदेव भट्टाचार्य की आलोचना की.
प्रेसीडेंसी कॉलेज में उनकी सहपाठी रहीं फ़िल्म अभिनेत्री और निर्देशिका अपर्णा सेन ने नंदीग्राम में पुलिस कार्रवाई के ख़िलाफ़ मीडिया से कहा था, "मुझे भरोसा नहीं हो रहा है कि बुद्धदेव की पुलिस ग़रीब खेत मज़दूरों पर गोलियाँ चला सकती हैं."
ऐसी ही आलोचना थिएटरकर्मी साउली मित्रा और लेखिका महाश्वेता देवी ने भी की थी.
यह बुद्धदेव भट्टाचार्य का दूसरा रूप था. उन्होंने बंगाल में उद्योग और निवेश को लाने के लिए नारा दिया था, 'डू इट नाउ, इसे अभी करो.'
हालांकि निजी ज़िंदगी में बुद्धदेव भट्टाचार्य हमेशा सादगी भरा जीवन जीते रहे. लेकिन इस पर उन्हें बात करना पसंद नहीं था.
बुद्धदेव सरकारी खर्चे पर तामझाम से कोसों दूर रहे. वे जब मुख्यमंत्री भी थे तब भी दो बेडरूम वाले अपार्टमेंट में रहते थे.
अधिकांश मौक़ों पर वे धोती कुर्ता में ही नज़र आते थे. वेतन का अधिकांश हिस्सा वे पार्टी कोष में जमा करा देते थे और पत्नी के वेतन से परिवार का ख़र्च चलाया करते थे.
उनकी एक ही आदत को महंगी कहा जा सकता था- वे लंबी फ़िल्टर सिगरेट पीते थे.
क्यूबा से लौटने पर पार्टी के कॉमरेड जब उनको क्यूबाई सिगार गिफ़्ट करते थे, तो वे बेहद ख़ुश होते थे. वे चेन स्मोकर थे, लिहाजा मुख्यमंत्री कार्यालय में प्रवेश के बाद उन्होंने सबसे पहले 'स्मोक अलार्म' को बंद करवाया था.
डॉक्टरों के मुताबिक़ सिगरेट नहीं छोड़ने की वजह से ही उनका स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ता गया.
बुद्धदेव 2000 से 2011 के बीच पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे.
अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने सशक्त ट्रेड यूनियनें, हड़ताल, औद्योगिक उत्पादन बंद करना और अमीरों को निशाना बनाने का चलन- इन सबको बदलने की कोशिश की जो कभी बंगाल में वामपंथी शासन की पहचान हुआ करते थे.
व्यक्तिगत तौर पर, वे मानते थे कि आर्थिक सुधार के मोर्चे पर बंगाल की बस छूट चुकी है और 1960-70 के दशक की नक्सली हिंसा के चलते बंगाल में निवेश भी नहीं रहा और इसे वापस लाने की ज़रूरत है.
इसके चलते उन्होंने राज्य में कहीं से भी मिलने वाले वित्तीय निवेश को हासिल करने का लक्ष्य बनाया.
2007 में फार्च्यून पत्रिका के क्ले चैंडलर ने बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ इंटरव्यू के लिए मेरी मदद मांगी थी. मैं चैंडलर के साथ इस इंटरव्यू के लिए गया था. चैंडलर ने बुद्धदेव को एक फार्च्यून 500 समिट का आमंत्रण सौंपा था.
बुद्धदेव ने विनम्रतापूर्वक आवेदन को स्वीकार करते हुए कहा था कि समिट के आयोजन में अब बहुत समय नहीं बचा है कि लेकिन अगर उनकी टीम ने बंगाल में निवेश आकर्षित करने के लिए ठीक प्रजेंटशन तैयार कर लिया तो वे उसमें शामिल होंगे.
चैंडलर ने उनसे मज़ाकिया लहज़े में पूछा कि आप साम्राज्यवादी निवेश को लेकर चिंतित नहीं हैं? तब बुद्धदेव ने जवाब दिया था, "हमारे राज्य के लिए हमें निवेश की ज़रूरत है यह कहां से आ रहा है, इसकी हम परवाह नहीं करते."
उनकी बात ने चीन के राजनेता देंग शियाओ पिंग के मशहूर बयान, "बिल्ली जब तक चूहे खा रही है तब तक यह महत्वपूर्ण नहीं है कि बिल्ली का रंग क्या है.", की याद दिला दी थी.

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मार्क्सवादी सिद्धांतों से समझौता
बुद्धदेव पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक तरह से देंग और गोर्बाचोव की तरह ही थे लेकिन उन्हें इन दोनों से अपनी तुलनाएं पसंद नहीं थीं.
बीबीसी के एंड्रूय व्हाइटहेड को बीबीसी की कम्यूनिज़्म पर आधारित सिरीज़ के लिए दिए गए इंटरव्यू में बुद्धदेव ने कहा था, "मार्क्सवाद विचारों की संरचना है जिसका रचनात्मक इस्तेमाल किसी को भी अपनी परिस्थितियों के मुताबिक़ करना चाहिए."
उन्होंने कृषि आय पर आश्रित पश्चिम बंगाल को अद्यौगिकीकरण की राह पर लाकर अपने राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा जोख़िम लिया था.
उद्योग धंधों की स्थापना के लिए उन्होंने विदेशों से और देश के ही दूसरे राज्यों से पूंजी लाने के लिए मार्क्सवादी सिद्धांतों से समझौता भी किया.
इसमें दुनिया की सबसे सस्ती कार टाटा नैनो का प्रोजेक्ट भी शामिल था, जिसे वे कोलकाता के पास में सिंगुर में लाने में कामयाब हुए.
इसके अलावा दूसरे प्रस्ताव भी थे, जिसमें मिदनापुर ज़िले के सालबोनी में जिंदल समूह के स्वामित्व वाले भारत के सबसे बड़े स्टील प्लांट और नयाचार में केमिकल हब की स्थापना शामिल थी.
लेकिन नंदीग्राम में किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद इनमें से किसी भी प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं हो पाया. नंदीग्राम में इंडोनेशियाई सालेम समूह केमिकल इंडस्ट्रीज हब बनाना चाहता था.
लेकिन बुद्धदेव भट्टाचार्य की योजना नाकाम हो गई और उनकी पार्टी को दूसरे वामपंथी दलों के साथ 2009 के आम चुनावों में भारी नुकसान का सामना करना पड़ा.
सिंगुर और नंदीग्राम बुद्धदेव के लिए वाटरलू साबित हुए.
2011 में पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे को हार का सामना करना पड़ा. ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार का गठन किया.

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जब अपनी सीट तक नहीं बचा सके
2011 के चुनाव में बुद्धदेव अपनी सीट तक नहीं बचा सके. 24 सालों तक जाधवपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले बुद्धदेव को तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार मनीष गुप्ता ने 16,684 मतों से हराया था.
जब ज्योति बसु मुख्यमंत्री थे तब गुप्ता राज्य के मुख्य सचिव हुआ करते थे.
वैसे बतौर मुख्यमंत्री बुद्धदेव के बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के साथ हमेशा नज़दीकी संबंध रहे.
शेख़ हसीना बांग्लादेश से कोलकाता आने वाले अपने निजी मित्रों के हाथों बुद्धदेव के लिए स्वादिष्ट इलिश मछली भिजवाती रहीं.
ज्योति बसु की तरह ही बुद्धदेव का मानना था कि बांग्लादेश में सेक्युलर डेमोक्रेटिक सरकार के होने से पश्चिम बंगाल को धर्म की राजनीति से दूर रखने में मदद मिलेगी.
2009 में उन्होंने अपने नजदीकी दोस्तों से शेख़ हसीना के सत्ता में लौटने पर कहा था, "अगर बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथी सत्ता में आते हैं तो पश्चिम बंगाल को हिंदुत्व ब्रिगेड से दूर रख पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा."
ये भी संयोग है कि शेख़ हसीना को बांग्लादेश की सत्ता छोड़कर भारत में शरण लेने के कुछ ही दिनों के बाद उनका निधन हुआ है.
बांग्लादेशी अवामी लीग के कई नेता निजी बातचीत में कहते आए हैं कि तीस्ता जल बंटवारे के समझौते में जिस तरह से बाधा ममता बनर्जी उत्पन्न कर रही हैं, वैसा बुद्धदेव कभी नहीं करते.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आम तौर पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की मुखर आलोचक रही हैं लेकिन उन्होंने ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य पर कभी कोई निजी आरोप नहीं लगाया है.
वे बीमार बुद्धदेव भट्टाचार्य को देखने के लिए कई बार जाती रहीं ताकि कम से कम बुद्धदेव अपने पार्टी समर्थकों को बीजेपी से दूर रहने की अपील कर सकें.
वैसे पश्चिम बंगाल के प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक सुखोरंजन दासगुप्ता की नजरों में बुद्धदेव भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल के पहले मुख्यमंत्री बिधान रॉय की तरह थे.
उन्होंने बताया, "बुद्धदेव को बंगाल से प्यार था, बंगाल की पहचान दर्शाने वाली हर चीज़ से उन्हें प्यार था चाहे वो भाषा हो, संस्कृति हो या कुछ भी हो."
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