सिंगूर आंदोलन से अब तक ममता बनर्जी और उनकी राजनीति कितनी बदलीं

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिन्दी के लिए
सिंगूर एक बार फिर सुर्खियों में है. सिंगूर पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में वही जगह है, जहाँ टाटा मोटर्स ने अपनी महत्वाकांक्षी नैनो परियोजना का संयंत्र लगाने का फ़ैसला किया था.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस और ख़ासकर ममता बनर्जी के विरोध के कारण टाटा को आख़िरकार यहाँ से इस परियोजना को समेटना पड़ा था.
अब मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने सिंगूर में नैनो कार परियोजना ठप होने के कारण हुए नुक़सान के लिए टाटा मोटर्स को मुआवज़े के तौर पर क़रीब 766 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया है.
हालांकि, राज्य सरकार ने कहा है कि उसके पास तमाम क़ानूनी विकल्प मौजूद हैं.
जिस ममता बनर्जी के भारी विरोध और आंदोलन के कारण टाटा को यहाँ से अपनी लखटकिया नैनो परियोजना को समेटकर गुजरात के साणंद जाना पड़ा था, वही ममता बीते 12 साल से बंगाल की सत्ता में हैं.
सिंगूर और नंदीग्राम में ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में पहुंचने का रास्ता साफ़ किया था. सिंगूर आंदोलन राज्य के सरकारी स्कूलों में आठवीं क्लास की इतिहास की किताब का हिस्सा बन चुका है.
उस आंदोलन के क़रीब 15 साल बाद औद्योगीकरण के मुद्दे पर ममता बनर्जी के रुख़ में भले 360 डिग्री का बदलाव आ चुका है, मगर सिंगूर का भूत उनकी सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा है.

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क्या थी नैनो परियोजना
टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा ने 18 मई 2006 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और वाणिज्य मंत्री निरुपम सेन के साथ बैठक के बाद सिंगूर में नैनो कार परियोजना लगाने का एलान किया था.
तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने उस समय इस परियोजना से राज्य में औद्योगीकरण की तस्वीर बदलने का दावा किया था.
दरअसल, वह लंबे अरसे बाद राज्य में पहला बड़ा निवेश था. उसके बाद इस परियोजना के लिए क़रीब एक हज़ार एकड़ ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई. लेकिन इसके लिए हुगली ज़िला प्रशासन की ओर से बुलाई गई तमाम बैठकों का तृणमूल कांग्रेस ने बहिष्कार किया था.
30 नवंबर 2006 को पुलिस ने जब ममता बनर्जी को सिंगूर जाने से रोक दिया तो तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा में बड़े पैमाने पर हंगामा और तोड़-फोड़ की थी.
विपक्ष की नेता के रूप में ममता बनर्जी ने तीन दिसंबर 2006 से कोलकाता में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आमरण अनशन शुरू किया.
मौजूदा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कई नेताओं ने 26 दिन के उस अनशन के दौरान ममता से मुलाक़ात कर एकजुटता जताई थी. बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ममता बनर्जी को दो-दो बार बातचीत का न्योता दिया था, लेकिन वे नहीं गईं.

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24 अगस्त 2008 को ममता बनर्जी ने सिंगूर में परियोजना के लिए अधिगृहित 1,000 एकड़ में 400 एकड़ ज़मीन वापसी की मांग करते हुए दुर्गापुर एक्सप्रेस हाईवे पर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया.
आख़िर तीन अक्टूबर 2008 को राज्य के सबसे बड़े त्योहार दुर्गा पूजा से ठीक दो दिन पहले रतन टाटा ने कोलकाता में अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में लखटकिया कार परियोजना को सिंगूर से बाहर ले जाने का एलान किया.
उन्होंने इसके लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व में जारी तृणमूल कांग्रेस के आंदोलन को ज़िम्मेदार ठहराया था. इसके बाद नैनो फैक्ट्री को गुजरात के साणंद में शिफ्ट कर दिया गया.
लंबे समय तक चली अदालती कार्यवाही के बाद 31 अगस्त, 2016 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वह ज़मीन किसानों को लौटा दी गई. वहां थोड़ी ज़मीन पर कुछ समय बाद खेती शुरू हुई.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल में पत्रकारों से कहा था कि सिंगूर में जिस 997 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया गया था, उसमें से 800 एकड़ खेती के लायक है. उसमें से 434 एकड़ पर 2016 से ही खेती हो रही है.

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ममता के रुख़ में बदलाव
दिलचस्प ये भी है कि किसानों की ज़मीन पर लगने वाली टाटा परियोजना का विरोध करने वाली ममता बनर्जी ने सत्ता में लौटने के बाद एक बार फिर टाटा समूह को राज्य में निवेश के लिए आमंत्रित किया.
ममता बनर्जी सरकार हर साल बड़े पैमाने पर बंगाल वैश्विक व्यापार सम्मेलन आयोजित करती रही हैं. उनमें तमाम बड़े औद्योगिक घरानों को न्योता भेजा जाता रहा है.
निवेश आकर्षित करने के लिए उन्होंने गौतम अदानी से भी मुलाकात की है और उनके साथ निवेश के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. यही नहीं, निवेश आकर्षित करने के लिए ममता कई बार विदेश दौरे भी कर चुकी हैं. उन्होंने हाल में ही दुबई और स्पेन का भी दस दिनों का दौरा किया था.

लेकिन आख़िर ममता के रुख़ में बदलाव की वजह क्या है? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि विपक्ष में रहने और उसके बाद सत्ता में आने के बाद नेताओं और राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं.
उत्तर बंगाल के एक कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे प्रो. सुबिमल भट्टाचार्य कहते हैं, "ममता ने जब सिंगूर और नंदीग्राम में अधिग्रहण-विरोधी आंदोलन किया था तब वे विपक्ष में थीं और उनका मक़सद किसी भी तरह वाममोर्चा को सत्ता से हटाना था."
"वे इसमें कामयाब भी रहीं. लेकिन सत्ता में आने के बाद उनको औद्योगीकरण और बेरोज़गारी जैसे प्रमुख मुद्दों पर कुछ ठोस पहल करनी थी या कम से कम ऐसा करते हुए नज़र आना था. वे यही कर रही हैं."

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विपक्ष के सवाल
वैसे, विपक्षी राजनीतिक दल और अर्थशास्त्री सरकार के दावों और व्यापार सम्मेलनों की कामयाबी पर सवाल उठाते रहे हैं.
उनका कहना है कि इन सम्मेलनों में अब तक महज सहमति पत्रों पर ही हस्ताक्षर होते रहे हैं और उनकी कोई क़ानूनी अहमियत नहीं है. असल सवाल यह है कि उनमें से कितनी परियोजनाओं को अमली जामा पहनाया जा सका है.
सीपीएम, कांग्रेस और भाजपा हर सम्मेलन के मौके पर सरकार से इस मुद्दे पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग करती रही हैं कि अब तक कितने सहमति पत्रों को अमली जामा पहनाया जा सका है.
विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ममता के विदेश दौरों को पिकनिक बताते हैं. उनका कहना है कि सरकार को साफ़-साफ़ बताना चाहिए कि इन दौरों पर कितनी रकम ख़र्च हुई और इसके बदले राज्य मे कितना निवेश हुआ.

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सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती भी भारी-भरकम ख़र्च से आयोजित ऐसे सम्मेलनों को बेमतलब बताते हैं. वह कहते हैं, "आयोजन जितनी भारी-भरकम रक़म ख़र्च हो चुकी है उसमें राज्य में कई उद्योग लग सकते थे. अब तक के तमाम सम्मेलनों ने खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली कहावत को ही चरितार्थ किया है."
लेकिन सरकार विपक्ष के दावों और आरोपों को तवज्जो देने के लिए तैयार नहीं है.
तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और राज्य सरकार में मंत्री अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "विपक्ष को तो हर बात में कमी नज़र आती है. टेबल का छोर (यानी विपक्ष औऱ सत्ता पक्ष) बदलने के बाद नज़रिया बदल जाता है. कहीं भी रातोरात निवेश नहीं होता. यह प्रक्रिया लंबी है. इसलिए सम्मेलन और विदेश दौरों का नतीजा सामने आने में समय लगना स्वाभाविक है."
वह कहते हैं, "ममता की उद्योग-विरोधी छवि विपक्ष की देन है. दीदी कभी उद्योग या किसी औद्योगिक घराने के ख़िलाफ़ नहीं रहीं. अगर ऐसा होता तो वे टाटा या अदानी को राज्य में निवेश का न्योता नहीं देती. राज्य और इसके लोगों का हित ही उनके लिए सर्वोपरि रहा है. सिंगूर आंदोलन के मूल में भी यही बात थी."
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