टाटा को मुआवज़ा देने के फ़ैसले पर क्या सोचते हैं सिंगूर के किसान - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, अमिताभ भट्टासाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिंगूर से
एक मध्यस्थता अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को टाटा मोटर्स को एक हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का जो मुआवज़ा देने का निर्देश दिया है उसकी वजह से कई साल बाद हुगली ज़िले का सिंगूर एक बार फिर चर्चा में आ गया है.
टाटा समूह सिंगूर में नैनो कार के लिए निवेश करने के बावजूद वहां संयंत्र चालू नहीं कर सका और उसे गुजरात में नए सिरे से संयंत्र की स्थापना करनी पड़ी, उसी वजह से एक मोटी रक़म के मुआवज़े के भुगतान का निर्देश दिया गया है.
इसमें से मूल मुआवज़े के तौर पर 766 करोड़ रुपये, अदालत में मामले के खर्च के तौर पर एक करोड़ रुपये और 2016 की पहली सितंबर से 11 प्रतिशत की दर से ब्याज यानी कुल मिलाकर क़रीब 1,350 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा.
इस फ़ैसले की वजह से सिंगूर फिर सुर्खियों में है जिसकी क़रीब दस साल पहले भी भारत की राजनीति में काफ़ी चर्चा थी.

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कैसे शुरू हुआ सिंगूर का आंदोलन?
वहां के किसानों ने टाटा समूह के कार संयंत्र के ख़िलाफ़ जो आंदोलन शुरू किया था, उसका नेतृत्व विपक्ष की तत्कालीन नेता ममता बनर्जी ने किया था. उनके सत्ता में पहुंचने की राह में सिंगूर के इस आंदोलन का अहम किरदार था.
2006 के विधानसभा चुनाव में 294 में से 235 सीटें जीत कर वाममोर्चा सातवीं बार सत्ता में लौटा था. उस चुनाव में वाममोर्चा का मुख्य नारा था- ‘खेती हमारा आधार है, उद्योग हमारा भविष्य.’
बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बनने का शपथ ग्रहण समारोह इस बात का संकेत था कि अब राज्य सरकार पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण को ही तरजीह देगी. राजभवन में आयोजित उस शपथ ग्रहण समारोह में देश के तमाम शीर्ष उद्योगपति पहली कतार में बैठे थे.
लेकिन वाममोर्चा की सबसे कट्टर विरोधी ममता बनर्जी ने तब इस बात की कल्पना तक नहीं की होगी कि अगला शपथ ग्रहण समारोह एकदम अलग होगा.
दोनों चुनावों के बीच के पांच वर्षों में जिन कुछ शब्दों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया उनमें से दो अगर ‘खेती और उद्योग’ थे तो बाकी दो ‘सिंगूर और नंदीग्राम’ थे.
हुगली ज़िले के जिस सिंगूर ने राज्य की राजनीति को 360 डिग्री बदल दिया था वह उससे पहले तक धान, आलू और हरी सब्ज़ियों की खेती के लिए मशहूर था.
लेकिन विधानसभा चुनाव के कुछ दिनों बाद टाटा समूह के शीर्ष अधिकारी जब कार संयंत्र के लिए संभावित ज़मीन देखने के लिए उस इलाके के दौरे पर पहुंचे और ग्रामीण महिलाओं ने हाथों में झाड़ू लेकर विरोध-प्रदर्शन किया तो उसके बाद इस इलाके की पहचान ही बदल गई.
सिंगूर के किसान निर्मल कोले कहते हैं, "वह आंदोलन पहले बेड़ाबेड़ी, खासेरबेड़ी इलाके में शुरू हुआ था. हमारा नारा था कि खेती की ज़मीन नहीं दे रहे हैं, नहीं देंगे… वहीं से आंदोलन शुरू हुआ."
इसी दौरान सरकार ने क़रीब एक हज़ार एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया. इसके विरोध में कृषि ज़मीन रक्षा समिति का गठन किया गया. लंबे समय से स्थानीय तृणमूल कांग्रेस विधायक रहे रवींद्रनाथ भट्टाचार्य समेत विभिन्न राजनीतिक दल उस समिति से जुड़े थे. लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही राज्य की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली.
अधिग्रहण के क़रीब डेढ़ साल बाद उस ज़मीन पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने का काम शुरू हुआ. उसे रोकने के लिए किसानों का आंदोलन और उग्र हो उठा. नियमित रूप से धरपकड़ शुरू हो गई और लाठीचार्ज भी किया गया.

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किसानों की आपबीती
स्थानीय किसान अमिय धाड़ा बताते हैं, "वैसी ही एक रात को जब बहुत से लोग अपनी ज़मीन के मुआवज़े का चेक लेने के लिए स्थानीय बीडीओ के दफ़्तर में इंतज़ार कर रहे थे, यह सूचना मिली कि एक व्यक्ति की ज़मीन की कीमत दूसरे व्यक्ति को दे दी जा रही है. हमने दीदी ममता बनर्जी को इसकी सूचना दी. वे दूसरे नेताओं के साथ उसी रात को यहां पहुंच गईं. यहां काफी लोग जमा थे. क़रीब आधी रात के समय पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू किया और ममता दीदी समेत तमाम नेताओं को मार-पीट कर दफ़्तर से बाहर निकाल दिया."
महिला किसान मायारानी कोले भी उस दिन उस भीड़ में शामिल थीं. वह बताती हैं, "हम लोग दोपहर से ही वहां बैठे थे. लेकिन हमें अपनी ज़मीन का मुआवज़ा नहीं मिल रहा था. रात के समय अचानक पुलिस ने पिटाई शुरू कर दी. मेरा सिर फट गया और कपड़े ख़ून से सराबोर हो गए. मैंने किसी तरह अपनी बेटी को पकड़ कर उठाया. वहां से हमें पहले सिंगूर अस्पताल ले जाया गया. वहां सिर पर टांके लगाने के बाद हमें चुंचुड़ा अस्पताल भेज दिया गया. वहां से यह आरोप लगा कर जेल भेज दिया गया कि हम हत्या करने के लिए वहां गए थे."
मायारानी कोले समेत सिंगूर के कई लोगों को चार दिन जेल में रहने के बाद छोड़ा गया था.
धाड़ा बताते हैं, "सरकार ने जितनी ताक़त का इस्तेमाल किया, हमारा आंदोलन उतना ही ताक़तवर हुआ. हालांकि हमने कभी यह नहीं कहा था कि संयंत्र नहीं लगाने देंगे. हम चाहते थे कि संयंत्र भी लगे और हमारी खेती भी बची रहे. तीन या चार फ़सलों वाली ज़मीन को छोड़ कर एक फ़सल वाली ज़मीन या वेटलैंड पर संयंत्र लग ही सकता था."
उनके मुताबिक़, सरकार ने अगर पुलिस और सीपीएम काडरों के ज़रिए अत्याचार करने बजाय किसानों से बातचीत की होती तो यहां संयंत्र लग सकता था.
कैलाशी कोले भी धाड़ा और मायारानी कोले के साथ खेती की ज़मीन बचाने के लिए आंदोलन में शामिल हुई थीं.
उनका कहना था, "संयंत्र लगने की स्थिति में हमारे बच्चों को वहां काम मिल जाता. खेती-किसानी में उनकी ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है. लेकिन अपनी ज़मीन बचाने के लिए हमने जो आंदोलन किया था, वह ग़लत नहीं था. अपनी ज़मीन खोने का दर्द क्या होता है यह किसान के अलावा दूसरा कोई नहीं समझ सकता."

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कई किसानों ने अपनी मर्ज़ी से दी थीं ज़मीनें
एक ओर यह लोग जब खेती की ज़मीन नहीं देने के समर्थन में आंदोलन कर रहे थे तो दूसरी और ऐसे किसानों की तादाद भी काफ़ी है जिन्होंने संयंत्र के लिए स्वेच्छा से अपनी ज़मीन दे दी थी. इनमें उदयन दास भी शामिल हैं.
उदयन दास कहते हैं, "हमने भविष्य के बारे में सोच कर अपनी ज़मीन दी थी. हमने सोचा था कि यहां उद्योग लगने की स्थिति में हमारे घर के बच्चों को काम मिलेगा और बूढ़ा पिता वहां दुकान खोल सकता है."
आंदोलन की वजह से टाटा समूह ने अक्टूबर 2008 में अचानक सिंगूर से इस संयंत्र को हटाने का ऐलान कर दिया. तब उनकी दलील थी कि उग्र राजनीतिक आंदोलन के कारण ही उन्होंने यहां से बोरिया-बिस्तर समेट कर गुजरात जाने का फ़ैसला किया है.

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ममता बनर्जी ने सत्ता में आते ही लिया ये फ़ैसला
उसके बाद सिंगूर ज़मीन आंदोलन की आग धीरे-धीरे धीमी पड़ने लगी था. लेकिन 2011 के विधानसभा चुनाव में अपने गठबंधन के साथ 228 सीटें जीत कर भारी बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी एक बार फिर सिंगूर को चर्चा के केंद्र में ले आईं.
उनके मंत्रिमंडल का पहला ही फ़ैसला था कि टाटा समूह जिस ज़मीन को छोड़ कर गया है उसे किसानों को लौटा दिया जाएगा.
राज्य सरकार ने क़ानून में संशोधन के ज़रिए उस ज़मीन को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था. यह मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था.
शीर्ष अदालत ने 2016 में अपने फ़ैसले में कहा कि राज्य सरकार ने टाटा समूह के लिए ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से ज़मीन का अधिग्रहण किया था. अदालत ने उस ज़मीन को खेती लायक बना कर किसानों को लौटाने का निर्देश दिया था.
उसके बाद कई साल बीत चुके हैं. संयंत्र के शेड को डायनामाइट से उड़ाने और कंक्रीट के स्लैब को हटा कर काफ़ी ज़मीन को खेती लायक बनाया गया है. लेकिन कई इलाके अभी भी घास-फूंस और झाड़ियों से भरे हुए हैं.

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किसानों का दर्द
स्थानीय किसान अमर चंद्र ज्योति बताते हैं, "ज़मीन तो वापस मिल गई है. लेकिन उसकी जो हालत है उसमें खेती करना मुमकिन नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने ज़मीन को खेती लायक बनाने का निर्देश दिया था. लेकिन 2016 से अब 2023 हो गया. ज़मीन आज तक खेती लायक नहीं हो सकी है."
महिला किसान कैलाशी कोले ने अपनी ज़मीन पर खेती शुरू की है. वह बताती हैं, "खेतों में बीज बोते समय अब भी मिट्टी के नीचे से पत्थर और सीमेंट के टुकड़े निकलते हैं."
बीते कुछ वर्षो से किसान इसी चिंता में थे कि सब लोग नए सिरे से कैसे खेती शुरू कर सकते हैं. इसी बीच, मध्यस्थता अदालत का फ़ैसला सामने आया है. इसमें सरकार को अपने ख़ज़ाने से टाटा समूह को मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया है.
अब किसानों का सवाल है कि आख़िर टाटा समूह मुआवज़ा क्यों मांग रहा है?
स्थानीय किसान निर्मल कोले कहते हैं, "मुझे नहीं पता कि सरकार मुआवज़ा क्यों देगी. टाटा समूह को पैसे क्यों मिलेंगे. सरकार ने तो उनसे अपना तमाम सामान ले जाने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट ने तो किसानों की ज़मीन लौटाने का निर्देश दिया था. तो अब टाटा समूह मुआवज़ा क्यों मांग रहा है?"
ज़्यादातर किसानों का कहना है कि मुआवज़े का भुगतान होगा या नहीं, यह सरकार और टाटा समूह के बीच का मामला है. लेकिन साथ ही कई लोग यह भी मानते हैं कि लगभग तैयार वह कार परियोजना अगर शुरू हो गई होती तो उनके इलाके की तस्वीर ही बदल गई होती.
टाटा के नैनो संयंत्र के लिए स्वेच्छा से ज़मीन देने वाले असित ज्योति कहते हैं, "टाटा समूह जिस तरह जिद्दी फ़ैसला लेकर यहां से चला गया, वह अनुचित तो था ही, तत्कालीन सरकार ने जिस तरह ढिलाई बरती वह भी सही नहीं था. हम सिंगूर के लोग उस फ़ैसले को स्वीकार नहीं कर सके. उस समय हमारे बेटे-बेटियों ने काफी आंसू बहाए हैं. यह दर्द आजीवन नहीं भुलाया जा सकता."

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जानकारों का क्या है कहना?
मध्यस्थता अदालत के फ़ैसले पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. कुछ लोगों का कहना है कि टाटा समूह के सिंगूर से जाने से ममता बनर्जी की राजनीति की जीत हुई है. लेकिन राज्य में उद्योग की संभावना की पराजय हुई है.
विश्लेषकों का कहना है कि टाटा समूह जैसे बड़े औद्योगिक घराने के बंगाल से जाने के बाद राज्य में कोई बड़ा निवेश नहीं आया है.
पश्चिम बंगाल वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष और अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार कहते हैं, "टाटा समूह जिस आंदोलन के कारण यहां से चला गया उसे आम लोगों का समर्थन हासिल था. अगर ऐसा नहीं होता तो उसके कुछ साल ममता बनर्जी भारी बहुमत के साथ जीतकर सत्ता में नहीं आ पाती."
उनके मुताबिक, मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि टाटा समूह यहां से चला गया. उस घटना का राज्य के औद्योगीकरण पर एक दीर्घकालीन प्रतिकूल असर भी पड़ा है. इस मामले में निश्चित रूप से राजनीति और ममता बनर्जी की जीत हुई. दूसरी ओर, सीपीएम भी तो राजनीति करती थी. उसके हाथों में तो प्रशासन था. वह परिस्थिति को क्यों नहीं संभाल सकी. उनकी राजनीति तो पूरी तरह बेकार हो गई. इसके ज़िम्मेदार तो वह हैं जो तब सरकार चला रहे थे.
टाटा से समझौता पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम ने किया था. वाममोर्चा सरकार के बाद आने वाली सरकार को भी समझौता मानना चाहिए था. लेकिन वह लोग तो उल्टी राह पर चलने लगे.
सीपीएम सांसद और सीनियर एडवोकेट विकास रंजन भट्टाचार्य कहते हैं, "टाटा के साथ समझौता पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम ने किया था. वाममोर्चा सरकार के सत्ता से हटने के बाद आने वाली सरकार को भी वह समझौता मानना चाहिए था. लेकिन वह लोग तो उल्टी राह पर चलने लगे. सार्वजनिक तौर पर संयंत्र में तोड़-फोड़ की गई. ऐसे में टाटा समूह का प्राधिकरण में जाना तो स्वाभाविक था. समूह ने क़ानून का सहारा लिया है और प्राधिकरण का फ़ैसला दलीलों पर आधारित है."
जिन लोगों ने स्वेच्छा से ज़मीन दी थी या जो ज़मीन देने के ख़िलाफ़ थे, लेकिन अदालत के फ़ैसले के तहत ज़मीन वापस मिलने के बावजूद खेती नहीं कर पा रहे हैं- इन दोनों तरह के किसानों को इस बात का मलाल है कि उनको न तो माया मिली और न ही राम. इस ज़मीन पर न तो खेती हो सकी और न ही उद्योग की स्थापना हुई.
विशेषज्ञों का कहना है कि टाटा समूह के राज्य से जाने के बाद कोई बड़ा उद्योग राज्य में नहीं आया है. इसके कारण पश्चिम बंगाल में उद्योग की संभावना ही धूमिल पड़ गई है.
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