चीन इस देश में करोड़ों डॉलर खर्च कर के किस परेशानी में फंस गया है?

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- Author, लॉरा बिकर
- पदनाम, चीन संवाददाता, रुइली में चीन-म्यांमार सीमा से
'एक गांव, दो देश'...ये चीन के दक्षिणी-पश्चिमी किनारे पर बसे यिनजिंग की टैगलाइन हुआ करती थी.
पर्यटकों के लिए लगे एक पुराने साइनबोर्ड में दोनों देशों के बीच जिस तरह की सीमा है, उसकी तारीफ़े की गई हैं.
म्यांमार और चीन के बीच सीमा पर केवल बांस की बाड़ लगी है. जो निश्चित तौर पर उस सहज आर्थिक रिश्ते की ओर इशारा करता है, जो चीन अपने पड़ोसी देश के साथ बनाना चाहता था.
लेकिन अब ये इलाका बदला हुआ नज़र आ रहा है.

बीबीसी ने जब इस इलाके का दौरा किया तो यहां मेटल की बाड़ दिख रही थी जो चीन के युन्नान प्रांत की रुइली काउंटी से होकर गुजरती है.
यहां कंटीले बाड़ दिखाई दे रही है और कुछ जगहों पर सर्विलांस कैमरे लगाए गए हैं. ये बाड़ धान के खेतों से गुजरते हुए पास की गलियों तक पहुंचती दिखती है.
चीन में कोरोना महामारी के दौरान लगाया गया सख्त लॉकडाउन दोनों देशों के बीच विच्छेद की शुरुआती वजह बना. लेकिन म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध ने इस अलगाव को और पक्का कर दिया है.
2021 में खूनी तख्तापलट के बाद म्यांमार में सेना और विद्रोहियों के बीच भीषण युद्ध चल रहा है.
सैन्य सरकार म्यांमार के एक बड़े इलाके पर नियंत्रण करने के लिए लड़ाई लड़ रही है. इसमें चीन की सीमा पर से सटा उसका शान प्रांत भी शामिल है. जिन इलाकों में म्यांमार की सेना को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा उनमें से एक ये भी है.
लेकिन चीन के लिए संकट जैसे दरवाजे पर खड़ा है.
चीन और म्यांमार के बीच ये सीमा 2000 किलोमीटर लंबी है और ये चीन के लिए खर्चीली बनती जा रही है.
क्योंकि उसने अपने लिए एक अहम ट्रेड कॉरिडोर बनाने के लिए म्यांमार में करोड़ों डॉलर निवेश किए हैं.
रुइली में म्यांमार के शरणार्थियों का डेरा

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चीन की इस महत्वाकांक्षी योजना का लक्ष्य जमीन से घिरे अपने दक्षिण पश्चिम इलाके को म्यांमार के जरिये हिंद महासागर से जोड़ना है.
लेकिन ये कॉरिडोर म्यांमार के विद्रोहियों और सेना के बीच युद्ध का मैदान बन गया है.
चीन का म्यांमार की सेना और विद्रोहियों दोनों पर असर है.
लेकिन दोनों पक्षों के बीच जनवरी में शांति वार्ता की कोशिशें नाकाम रही हैं.
शान प्रांत में गरीबी है और उसके लिए इस तरह का संघर्ष कोई नई बात नहीं है.
म्यांमार का ये सबसे बड़ा राज्य दुनिया के लिए अफीम और मेथामफेटामाइन का एक बड़ा स्रोत है.
लेकिन ये म्यांमार की केंद्रीय सत्ता का लंबे समय से विरोध करती आ रही जातीय सेनाओं की भी जमीन है.
हालांकि गृहयुद्ध छिड़ने से पहले यहां चीन के निवेश से बनाए गए स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन काफी सक्रिय थे.
लेकिन अब रुइली में लोगों को लाउडस्पीकर के जरिये चेतावनी दी जा रही है कि वो इस बाड़ के बहुत ज्यादा नज़दीक न आएं.
हालांकि ये चेतावनी एक चीनी टूरिस्ट को यहां लगे गेट की छड़ों के बीच बांहें टिका कर सेल्फी लेने से नहीं रोक पा रही है.
रुइली शहर में चेकपोस्ट से कुछ कदम पर नुक्कड़ की दुकान पर खाना और चाय बेचने वाली ली मियानझेन कहती हैं,''बर्मा के लोग कुत्तों की तरह रह रहे हैं.'' मियानझेन की उम्र 60 के आसपास होगी.
वो मूसे में चीन के बने कपड़े लाकर बेचा करती थीं.
म्यांमार और चीन के बीच कपड़ों का बड़ा व्यापार है.
लेकिन उनके शहर में अब किसी के पास इतना पैसा नहीं बचा है कि इन कपड़ों को खरीद सके.
ली कहती हैं कि मौजूदा हालात ने लोगों को बेचैन कर दिया है.
उन्हें ऐसे कुछ लोगों के बारे में पता है जो महज 10 युआन कमाने के लिए सीमा पार कर चीन गए थे ताकि वो परिवार का पेट भर सकें.
म्यांमार में छिड़े गृह युद्ध ने वहां के लोगों का देश के अंदर और बाहर सफर करना मुश्किल बना दिया है.

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ज़्यादातर वाकये ली जैसे लोगों से जुड़े हुए हैं, जो यहां से या तो भाग गए हैं या सीमा पार कर चीन पहुंचने के लिए नए रास्ते ढूंढ रहे हैं.
लेकिन ली के परिवार को चीन में काम करने के लिए वर्क परमिट नहीं मिल पाया.
लिहाजा उनका परिवार मांडले में ही फंस गया. विद्रोही म्यांमार के इस दूसरे बड़े शहर के नजदीक पहुंचने लगे हैं.
ली ने कहा,''मुझे तो लग रहा है कि मैं चिंता से मर जाऊंगी. इस लड़ाई की वजह से तो हमारी किस्मत ही फूट गई है. पता नहीं ये सब कहां जाकर खत्म होगा.''
31 साल के ज़िन ऑन्ग (बदला हुआ नाम) कुछ खुशकिस्मत लोगों में से हैं जो रुइली के बाहरी इलाके में मौजूद उस इंडस्ट्रियल पार्क में काम करते हैं, जहां कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और व्हीकल पार्ट्स बनते हैं. यहां से ये सारी दुनिया में भेजे जाते हैं.
म्यांमार से यहां आकर ऑन्ग जैसे और भी लोग काम करते हैं.
सस्ते कामगारों के बदौलत अपना प्रोडक्शन करने वाली चीन समर्थित कंपनियां इन्हें यहां लेकर आती हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़ वो एक महीने में 2400 युआन यानी 450 डॉलर तक कमा लेते हैं. हालांकि ये इसी काम के लिए चीन के कामगार को मिलने वाली रकम से कम है.
ज़िन ऑन्ग कहते हैं,''युद्ध की वजह से म्यांमार में अब हमारे लिए करने को कुछ भी नहीं बचा है. हर चीज महंगी है. चावल, खाने पकाने का तेल.. सबकुछ. हर जगह भीषण लड़ाई चल रही है. हर किसी को भागना पड़ रहा है.''
ऑन्ग के माता-पिता इतने बुजुर्ग हैं कि वो वहां से भाग भी नहीं सकते. ऑन्ग को उनके लिए पैसे भी भेजने पड़ते हैं.
ऑन्ग और उनके जैसे दूसरे कर्मचारी रुइली में सरकारी कंपाउंड से कुछ किलोमीटर दूर पर रहते और काम करते हैं.
ऑन्ग ने कहा कि म्यांमार में वो जिस हालात से निकल कर आए हैं उसकी तुलना में यह जगह उन जैसे लोगों के लिए अभयारण्य है.
उन्होंने कहा, '' म्यांमार में हालात अच्छे नहीं है इसलिए हम यहां शरण लिए हुए हैं.''
ऑन्ग म्यांमार में अनिवार्य सैनिक भर्ती अभियान से पीछा छुड़ा कर यहां आए हैं.
म्यांमार में युद्ध और युवाओं की दिक्कत

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म्यांमार की सेना से सैनिकों के पलायन और सैनिकों के मारे जाने के बाद सैनिक सरकार ने इसे अनिवार्य बना दिया है.
यहां काम करने वाले कई कर्मचारी शान प्रांत के सबसे बड़े शहर लेशियो और सैनिक सरकार समर्थित अपराधी परिवारों के गढ़ लाउकाकिंग से हैं.
जनवरी में लाउकाकिंग पर विद्रोहियों का कब्जा हो गया था और लेशियो को उन्होंने घेर लिया था.
ये एक ऐसा अभियान है जिसने युद्ध की धारा और इसमें लगे चीन के दांव को बदल दिया है.
दोनों शहर चीन के अहम ट्रेड कॉरिडोर से लगे हैं. लेकिन चीन की मध्यस्थता में हुए युद्धविराम ने लेशियो को सैनिक सरकार के हवाले कर दिया.
लेकिन हाल के दिनों में विद्रोहियों की सेना शहर में आगे बढ़ आई है. ये अब तक की उनकी सबसे बड़ी जीत है.
इंटरेशनल क्राइसिस ग्रुप के म्यांमार सलाहकार रिचर्ड होर्सी कहते हैं विद्रोही मूसे में इसलिए और आगे नहीं बढ़े कि इससे चीन के नाराज़ होने का ख़तरा हो सकता था.
उन्होंने कहा,''अगर वहां लड़ाई चलती रहती तो उसका असर उन निवेशों पर पड़ता जो वहां चीन सरकार करने जा रही थी.''
सैनिक शासन का नियंत्रण लगभग पूरे शान प्रांत में खत्म हो गया है. सिर्फ़ मूसे को छोड़ कर. मूसे रुइली के ठीक आगे है.
चीन किस परेशानी में फंस गया है?

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रुइली और मूसे दोनों स्पेशल ट्रेडिंग जोन करार दिए गए हैं और बीजिंग के पैसे से बने हैं. ये 1700 किलोमीटर के ट्रेड रूट के लिए बेहद अहम हैं.
इसे चाइना-म्यांंमार इकोनॉमिक कॉरिडोर कहते हैं. ये रूट एनर्जी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और रेयर अर्थ माइनिंग में चीन के निवेश के लिए काफी मददगार है.
इसके बीच एक रेलवे लाइन है जो युन्नान की राजधानी कुनमिंग को चीन की ओर से बनाए जा रहे डीप सी पोर्ट (बंदरगाह) कयाउकफु को जोड़ेगी. ये पोर्ट म्यांमार के पश्चिमी तट पर बन रहा है.
ये पोर्ट बंगाल की खाड़ी से लगा है. रुइली और इसके बाहर के उद्योग इस पोर्ट के जरिये हिंद महासागर और उसके बाद ग्लोबल मार्केट तक अपनी पहुंच बना सकते हैं.
ये बंदरगाह उन गैस पाइपलाइनों के लिए एक ‘स्टार्टिंग प्वाइंट’ है जो म्यांमार से युन्नान तक गैस की सप्लाई करेगी.
लेकिन ये योजनाएं अब खटाई में पड़ती दिख रही हैं.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग म्यांमार की निर्वाचित नेता आंग सान सू ची को जबरदस्ती सत्ता से हटाए जाने के बाद आई सरकार के दौर से ही खनिज संसाधनों से भरपूर अपने इस पड़ोसी देश से रिश्ते बेहतर करने में जुट गए थे.
शी जिनपिंग ने वहां सैन्य तख्तापलट की निंदा करने से इनकार कर दिया था. इसके बाद वो सैनिक शासन को हथियार भी बेचते रहे. हालांकि उन्होंने सैन्य शासन प्रमुख मिन ऑन्ग हलाइंग को सत्ता प्रमुख के तौर पर मान्यता नहीं दी और न ही उन्हें चीन आमंत्रित किया.
तीन साल बीत चुके हैं और अब तक युद्ध में हजारों लोग मारे गए हैं और विस्थापित भी हुए हैं. लेकिन इसका अंत नहीं दिख रहा है.
सेना को अब नए मोर्चे पर लड़ना पड़ रहा है. लेकिन इसके बावजूद सेना के हाथ से म्यांमार के आधे से लेकर दो तिहाई हिस्से निकल चुके हैं.
इस हालात ने चीन के सामने एक गतिरोध पैदा कर दिया है.
होर्सी कहते हैं,''चीन को ये हालात पसंद नहीं. वो म्यांमार के सैनिक शासक मिन ऑन्ग हलाइंग को अक्षम शासक मानते हैं.''
होर्सी कहते हैं,'' चीन वहां चुनाव पर जोर दे रहा है. इसलिए नहीं कि वो म्यांमार में लोकतंत्र की वापसी चाहता है बल्कि इसलिए कि इस गतिरोध को दूर करने का ये एक रास्ता हो सकता है.''
जबकि म्यांमार की सैन्य शासन को शक है की चीन दोनों तरफ से 'खेल' रहा है. एक तरफ वो सैन्य शासन का समर्थन करता दिख रहा है तो दूसरी तरफ ओर वो शान प्रांत में जातीय सेनाओं से भी अपने रिश्ते बरकरार रखे हुए है.
विश्लेषकों का मानना है कई विद्रोही गुट चीनी हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं. हाल की लड़ाइयां पिछले साल तीन जातीय समूहों के दोबारा उठ खड़े होने का नतीजा हैं.
ये लोग खुद को ब्रदरहुड अलायंस कहते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस गठबंधन ने बीजिंग की मौन सहमति के बगैर अपने कदम नहीं उठाए होंगे.
युद्ध के मैदान में इस गठबंधन की जीत ने उन कुख्यात परिवारों का अंत कर दिया था जिनके स्कैम सेंटरों ने हजारों चीनी कामगारों को अपने जाल में फंसाया था. चीन भी अपनी इस सीमा पर बढ़ती अराजकता से परेशान था. उसने इसका स्वागत किया और दसियों हजार संदिग्धों को विद्रोही सेनाओं के हाथों सौंप दिया.
चीन का अस्पष्ट रवैया

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चीन के लिए सबसे खराब स्थिति ये है कि म्यांमार का गृहयुद्ध वर्षों से चल रहा है. लेकिन वो ये भी नहीं चाहेगा कि सैन्य शासन का पतन हो जाए. क्योंकि इस स्थिति से अराजकता और फैल जाएगी.
चीन दोनों हालात में क्या कदम उठाएगा ये तो अभी साफ नहीं है. ये भी साफ नहीं है कि वो शांति वार्ता के लिए दोनों पक्षों पर दबाव डालने के अलावा और क्या कर सकता है.
चीन की ये विडंबना यहां रुइली में साफ दिखती है. यहां दुकानें बंद हैं. एक शहर जिसे सिर्फ बॉर्डर से लगी अपनी लोकेशन की वजह से फायदा हो रहा था अब म्यांमार से अपनी नजदीकी की वजह से पैदा दिक्कतों की वजह से मुसीबत झेल रहा है.
चीन के कड़े लॉकडाउन की वजह से यहां कारोबार को जो नुकसान हुआ था वो सीमा के आरपार आवाजाही और व्यापार धीमा पड़ने से और बढ़ गया.
म्यांमार के श्रमिकों पर आश्रित होने की वजह से यहां के कारोबार को नुकसान पहुंचा है. बर्मीज़ कामगारों को काम पाने में मदद करने वाले एजेंटों ने बताया कि चीन ने भी सीमा पार से श्रमिकों की भर्ती से जुड़े नियम कड़े कर दिए हैं.
उसने अपने यहां गैरकानूनी तौर पर काम करने का आरोप लगा कर कई श्रमिकों को वापस भी भेज दिया है.
एक छोटी फैक्ट्री के मालिक ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया, ''कामगारों को वापस भेजने का मतलब ये है कि धंधा नहीं हो रहा है. इस हालात में मैं क्या कर सकता हूं.''
चेक प्वाइंट का अगला चौराहा युवा कामगारों से भरा है. माताएं और उनके बच्चे छांव में इंतजार कर रहे हैं. वो अपना पेपरवर्क दिखा कर ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि काम के लिए जिस चीज की ज़रूरत है वो उनके पास है.
इस प्रक्रिया में सफल लोगों को एक पास दिया जाता है, जिसके आधार पर वो एक सप्ताह तक काम कर सकते हैं. ली जैसे ये लोग इस दौरान बॉर्डर के आर-पार भी जा सकते हैं.
ली ने कहा,''मुझे इस बात की उम्मीद है कि कुछ अच्छे लोग हर पक्ष से लड़ाई बंद करने के लिए कह सकते हैं. अगर दुनिया में हम जैसे लोगों के लिए बोलने वाला कोई नहीं होगा तो ये वास्तव में बड़ी त्रासदी होगी.''
वो कहती हैं उनके आसपास के लोग उन्हें यही दिलासा देते रहते हैं चीन के इतने नजदीकी इलाके में लड़ाई नहीं छिड़ेगी. लेकिन उन्हें इस पर भरोसा नहीं है.
वो कहती हैं, ''भविष्य में क्या होगा कोई नहीं बता सकता.''
लेकिन उनके और ज़िन ऑन्ग के लिए रुइली एक सुरक्षित विकल्प है. वो इस बात को समझते हैं कि चीनियों की तरह उनका भी भविष्य अब चीन के हाथ में है.
कीमती पत्थर बेचने वाले एक म्यांमारी विक्रेता से मोलभाव करने वाला एक चीनी पर्यटक कहता है, ''तुम्हारे देश में तो लड़ाई चल रही है. मैं जो कीमत दे रहा हूं ले लो.''
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