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कर्नाटक: आलंद में वोटर लिस्ट से नाम हटाने के मामले में 22,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक पुलिस के विशेष जांच दल (एसआईटी) ने आलंद विधानसभा क्षेत्र के 'वोटर लिस्ट से नाम हटाने' वाले मामले में आरोपपत्र दाखिल कर दिया है. इसमें पूर्व बीजेपी विधायक और उनके बेटे को अभियुक्त नंबर एक और अभियुक्त नंबर दो के रूप में दर्ज किया गया है.
आरोपपत्र में कहा गया है कि पूर्व विधायक सुभाष गुट्टेदार, उनके बेटे और ज़िला पंचायत सदस्य हर्षानंद गुट्टेदार, साथ ही पांच अन्य लोगों ने मिलकर यह षड्यंत्र रचा था. इन लोगों पर आरोप है कि उन्होंने 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले कलबुर्गी ज़िले के आलंद विधानसभा क्षेत्र के 5,994 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटवा दिए थे.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में नई दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करके चुनाव आयोग पर आरोप लगाया था कि आलंद विधानसभा क्षेत्र के क़रीब छह हज़ार मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई थी.
राहुल गांधी के बयान के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने प्रेस नोट जारी करके बताया था कि इस पूरे मामले की जांच के बाद वोटरों के नाम हटाने का काम रद्द कर दिया गया और राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई.
इस मामले की कर्नाटक सरकार ने 20 सितंबर को जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था.
सुभाष गुट्टेदार ने खुद पर लगे आरोपों का खंडन किया है.
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चार्जशीट के अनुसार, अभियुक्तों ने उन मतदाताओं की पहचान की, जिन्होंने पिछले चुनावों में उन्हें वोट नहीं दिया था और उनके नामों को ग़ैरक़ानूनी तरीके़ से हटवा दिया.
इसके लिए उन्होंने कलबुर्गी के एक डेटा सेंटर के तीन ऑपरेटरों- अकरम पाशा, मुक़रम पाशा और मोहम्मद अशफ़ाक़ और पश्चिम बंगाल के बापी आद्या के साथ मिलकर साजिश रची. आद्या ने कथित रूप से चुनाव आयोग की ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंचने के लिए 'ओटीपी बायपास' की सुविधा उपलब्ध कराई थी.
अभियुक्तों पर धोखाधड़ी, पहचान की नक़ल, आपराधिक षड्यंत्र और विश्वासघात से संबंधित भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है.
आरोपों से इनकार किया
शुक्रवार को 22,000 पन्नों वाले आरोपपत्र को बेंगलुरु की प्रथम अतिरिक्त महानगरीय मजिस्ट्रेट अदालत में पेश किया गया.
सुभाष गुट्टेदार पूर्व में बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों से विधायक रहे हैं. उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया है और इन्हें 'झूठ का पुलिंदा' बताया है.
इस मामले में वो अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस विधायक बीआर पाटिल के दावों को ख़ारिज करते हैं. बीआर पाटिल ने दावा किया था कि इस तरह वोट हटाकर उन्हें नुक़सान पहुंचाने की कोशिश की गई थी.
सुभाष गुट्टेदार ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह झूठ है. चुनाव के ढाई साल बाद, वह (बीआर पाटिल) वोट चोरी की बात सिर्फ़ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि राहुल गांधी ने इसका ज़िक्र किया. कोई उन्हें मंत्री बनाना नहीं चाहता, इसलिए वह राहुल गांधी का सहारा ले रहे हैं. उनका दूसरा मक़सद यह है कि मैं और मेरा बेटा चुनावी मैदान में न रहें. हम इस मामले में क़ानूनी तौर पर भी लड़ेंगे."
गुट्टेदार ने आगे कहा, "हम किसी का नाम कैसे डिलीट कर सकते हैं? नाम हटाने से पहले तहसीलदार ही घर-घर जाकर जांच करते हैं."
सुभाष गुट्टेदार, हर्षानंद गुट्टेदार और टिप्पेरुद्र को 31 अक्तूबर को निर्वाचित प्रतिनिधियों की विशेष अदालत से अग्रिम ज़मानत मिल गई है.
काम करने का तरीका
आरोपपत्र के अनुसार, गुट्टेदार और उनके बेटे ने अकरम पाशा को उन लोगों के नाम हटाने के लिए रखा था जिन्होंने मतदाता सूची के अनुसार पिछले चुनावों में उन्हें वोट नहीं दिया था. कई जगहों पर छापेमारी के दौरान एसआईटी को चुनाव आयोग के आधे जले हुए फ़ॉर्म मिले, जिनसे मतदाताओं के नाम हटाए गए थे.
आरोप है कि अकरम पाशा, असलम पाशा और मोहम्मद अशफ़ाक़ ने नकली नामों से राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (एनवीएसपी) पर खाते बनाए थे. आरोप है कि उन्होंने इस सुविधा को ग़ैरक़ानूनी तरीके से हैक किया और मतदाताओं के नाम हटाए.
यह सुनिश्चित करने के लिए कि कन्फ़र्मेशन के संदेश असली मतदाता तक न पहुंचे, उन्होंने पश्चिम बंगाल के बापी आद्या से संपर्क किया, जो 'ओटीपीबाज़ार' नाम की वेबसाइट चलाते हैं.
उन्होंने इस वेबसाइट से ओटीपी नंबर हासिल किए और देश के अलग-अलग हिस्सों से अन्य मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल किया, ताकि असली मतदाता को बिना पता चले वोट हटाया जा सके.
आरोप है कि समस्या तब सामने आई जब बूथ लेवल अधिकारी या बीएलओ ने बीआर पाटिल के कुछ समर्थकों से पूछा कि क्या वे ज़िले से बाहर जा रहे हैं, क्योंकि उनके पास इन लोगों के वोट हटाने के लिए आवेदन आए थे.
इस तरह मामला सहायक आयुक्त, जो चुनाव अधिकारी भी थे, उन तक पहुंचा और पुलिस में शिकायत कराई गई.
राहुल गांधी के इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद ही चुनाव आयोग (ईसीआई) ने वोट हटाने और जोड़ने के लिए आधार-आधारित ओटीपी प्रमाणीकरण प्रणाली लागू की.
एसआईटी से पहले इस मामले की जांच कर रही सीआईडी ने चुनाव आयोग से आईपी एड्रेस और पोर्ट की जानकारी मांगी थी, लेकिन आयोग ने उसके लिखे गए 18 पत्रों का कोई जवाब नहीं दिया था.
सीआईडी का कहना था कि डेस्टिनेशन एड्रेस और पोर्ट्स से उन लोगों की लोकेशन डिटेल्स पता लगाने में मदद मिलेगी, जिन्होंने मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की थी.
हालांकि ऐसा लगता है कि डेटा सेंटर ऑपरेटरों की गिरफ़्तारी के बाद एसआईटी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने में क़ामयाब रही.
अकरम पाशा और उसके रिश्तेदारों को हर वोट हटाने पर 80 रुपये दिए गए थे. जांच में बापी आद्या को किए गए भुगतानों का भी पता चला है.
संकेत हैं कि एसआईटी जल्द ही एक और आरोपपत्र दाखिल करेगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.