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कर्नाटक के आलंद में वोटर लिस्ट से नाम हटाने की एसआईटी जाँच रिपोर्ट में क्या बात सामने आई
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
कर्नाटक के आलंद विधानसभा क्षेत्र में वोटर लिस्ट से 6018 वोटरों के नाम हटाने के मामले की जांच राज्य सरकार ने एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) से कराई थी.
इस जांच में पता चला कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए प्रति वोट 80 रुपये भुगतान किए गए थे.
हालांकि ये पैसे किसने ख़र्च किए, इसको लेकर अभी तक एसआईटी ने कोई जानकारी साझा नहीं की है.
एसआईटी की जांच के अनुसार, यह रक़म कलबुर्गी ज़िले के मुख्यालय में स्थित एक डेटा सेंटर में काम करने वाले चार-पांच युवकों को मिली थी. इनकी उम्र 20 से 30 साल के बीच थी.
एसआईटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से नाम न बताने की शर्त पर कहा, "हम अभी कुछ तकनीकी पहलुओं की जांच कर रहे हैं, जैसे कि उन्होंने भारतीय चुनाव आयोग के डेटा में सेंध कैसे लगाई. हमने आयोग को दोबारा पत्र लिखा है ताकि वे 'डेस्टिनेशन आईपी एड्रेस' साझा करें. इससे हमारा केस और मज़बूत होगा."
एसआईटी की जांच में रक़म और उससे जुड़ी जानकारी उस समय सामने आई, जब टीम ने इस विधानसभा सीट से हार चुके बीजेपी उम्मीदवार सुभाष गुट्टेदार, उनके सहयोगियों, डेटा सेंटर के मालिक और कर्मचारियों के घरों पर छापे मारे.
हालांकि एसआईटी ने अभी तक पैसों के लेन-देन और बीजेपी उम्मीदवार के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं की है.
वहीं इस मामले में आलंद से बीजेपी के उम्मीदवार सुभाष गुट्टेदार ने कहा है कि कांग्रेस नेता बीआर पाटिल इस मामले को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं.
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मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की बात पहली बार 2023 विधानसभा चुनाव से पहले सामने आई थी.
इसके बाद आलंद विधानसभा क्षेत्र की रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) ने इस मामले में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी.
आरओ और उनकी टीम ने जांच में पाया कि नाम हटाने के लिए सिर्फ़ 24 आवेदन असली थे. बाकी सभी नक़ली पाए गए.
जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे, उनमें ज़्यादातर वे थे जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस उम्मीदवार बी. आर. पाटिल का समर्थन करते रहे थे.
वोटर लिस्ट से नाम हटाने की गड़बड़ी समय रहते पकड़ में आने के बाद हुए चुनाव में पाटिल ने अपने बीजेपी प्रतिद्वंद्वी सुभाष गुट्टेदार को 10,348 वोटों से हरा दिया था.
हालांकि, यह पूरा मामला तब ज़्यादा चर्चा में आया जब लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इसे मुद्दा बनाया.
राहुल गांधी ने अपने इस अभियान के लिए आलंद को दूसरा उदाहरण बताया था. इससे पहले उन्होंने बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र की महादेवपुरा विधानसभा सीट का ज़िक्र किया था.
कर्नाटक सरकार ने किया था एसआईटी का गठन
कर्नाटक सरकार ने 20 सितंबर को इस मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया. ऐसा तब किया गया जब यह पता चला कि केंद्रीय चुनाव आयोग ने सीआईडी की उस मांग पर कोई जवाब नहीं दिया था, जिसमें उसने 'डेस्टिनेशन आईपी एड्रेस' की जानकारी मांगी थी, जिनसे कथित तौर पर वोटरों के नाम फ़र्ज़ी तरीक़े से हटाए गए थे.
सीआईडी ने इस संबंध में निर्वाचन आयोग को 18 पत्र लिखे थे. वर्तमान में एसआईटी की कमान अतिरिक्त डीजीपी बी. के. सिंह के पास है.
सीआईडी चुनाव आयोग से 'डेस्टिनेशन आईपी एड्रेस' इसलिए मांग रही थी ताकि यह पता लगाया जा सके कि वोटरों के नाम मिटाने की कोशिश करने वाले लोग कहाँ से काम कर रहे थे.
एसआईटी के एक अधिकारी के मुताबिक, स्थानीय निवासी मोहम्मद अशफ़ाक से 2023 में स्थानीय पुलिस ने पूछताछ की थी, लेकिन उन्हें छोड़ दिया गया क्योंकि उन्होंने खुद को निर्दोष बताया था.
हालांकि, एसआईटी ने अशफ़ाक के चार और सहयोगियों का पता लगाया है, जो कथित तौर पर डेटा सेंटर में काम करते थे और मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में शामिल थे.
इसके बाद एसआईटी ने बीजेपी नेता सुभाष गुट्टेदार, उनके बेटों हर्षानंद और संतोष के अलावा उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट मल्लिकार्जुन महंतागोल के ठिकानों पर छापे मारे. इन छापों में कई लैपटॉप और मोबाइल फोन ज़ब्त किए गए. इसी दौरान गुट्टेदार के घर के बाहर जले हुए मतदाता रिकॉर्ड भी मिले.
बीजेपी नेता का क्या कहना है?
18 अक्तूबर को सुभाष गुट्टेदार ने स्थानीय मीडिया से कहा कि उनके घर के बाहर वोटर आवेदन फॉर्म मिलना कोई असामान्य बात नहीं है.
उन्होंने कहा कि त्योहारों के मौसम में घर की सफ़ाई करना आम बात है और हो सकता है कि नौकरानियों ने वो कागज़ फेंक दिए हों. गुट्टेदार ने यह भी कहा कि उनके घर में वोटर लिस्ट का मिलना स्वाभाविक है क्योंकि उन्होंने चुनाव लड़ा था.
गुट्टेदार ने यह भी आरोप लगाया कि उनके कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी बी. आर. पाटिल इस मामले को बढ़ा-चढ़ाकर इसलिए पेश कर रहे हैं क्योंकि वे सिद्धारमैया सरकार में मंत्री बनना चाहते हैं.
हालांकि, इस मामले में दावा किया जा रहा है कि जांच तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन एसआईटी अब तक यह पता नहीं लगा पाई है कि जिन लोगों ने मतदाता सूची से नाम हटाए, उन्हें ओटीपी कैसे मिल रहे थे.
नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति अपना नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए आवेदन कर सकता है, लेकिन नाम हटाने की प्रक्रिया अलग होती है.
मतदाता का नाम सिर्फ़ रिटर्निंग ऑफिसर हटा सकता है और वह भी तब, जब बूथ लेवल ऑफिसर ने ख़ुद जाकर जांच की हो.
यहां तक कि बीएलओ की ओर से जांच रिपोर्ट जमा करने के बाद भी, नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी करने से पहले उस मतदाता के मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी भेजा जाता है. जिसके वेरिफाई होने या जिसके ज़रिए पहचान साबित होने के बाद ही नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू होती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित