पीरियड्स के दिनों में महिला खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग कैसे करती हैं?

महिला खिलाड़ी

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    • Author, जान्हवी मुले
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

“माउंट एवरेस्ट पर सफल चढ़ाई के बाद मैं नीचे उतर रही थी. मैं अभी 8,000 मीटर पर थी, जब मुझे पीरियड्स शुरू हो गए.”

आठ हज़ार मीटर ऊंची पांच चोटियां फतह करने वाली पहली भारतीय महिला पर्वतारोही प्रियंका मोहिते ने अपने अनुभव साझा करते हुए ये बात कही.

“मैं थकी हुई थी. ऑक्सीजन के साथ मैंने क़रीब 12 घंटे तक ऊपर चढ़ाई की थी. मेरे पीरियड्स 10 दिन बाद आने वाले थे. लेकिन हो सकता है कि थकान की वजह से या ख़राब मौसम के कारण ये पहले ही शुरू हो गया हो. मैं इसके लिए तैयार नहीं थी. मैंने टीशू पेपर को पैड की तरह तकरीबन दो दिन तक इस्तेमाल किया.”

हमने प्रियंका से उनके पीरियड्स के अनुभव के बारे में पूछा क्योंकि फ़ीफ़ा महिला वर्ल्ड कप के चलते इस बात की चर्चा हो रही है कि महिला एथलीट अपने माहवारी को किस तरह मैनेज करती हैं.

इस टूर्नामेंट के ठीक पहले न्यूज़ीलैंड की फ़ुटबॉल टीम ने अपनी जर्सी बदल दी. पीरियड्स से संबंधित सफेद कपड़ों के तनाव से बचने के लिए उन्होंने नीले रंग की ड्रेस चुनी.

इसी कारण से विम्बल्डन में भी हाल ही में नियमों में छूट दी गई कि महिला टेनिस खिलाड़ी रंगीन अंडरशार्ट्स पहन सकती हैं.

हालांकि ये कोई नई बात नहीं है कि पीरियड्स के समय महिला एथलीट खेलती हैं और कुछ ने तो पीरियड के दौरान बड़ी जीत भी हासिल की है.

वेटलिफ़्टर मीराबाई चानू ने टोक्यो 2020 में सिल्वर मेडल जीता था, उस समय वो पीरियड्स में थीं और बाद में उन्होंने बताया था कि उन्होंने बेहतर प्रदर्शन के लिए कैसे शारीरिक और मानसिक तैयारी की थी.

महिला एथलीट के लिए माहवारी एक बड़ी चुनौती होती है, हालांकि इस पर बहुत से लोग बात नहीं करते.

किसी अन्य महिला की तरह ही महिला खिलाड़ी का शरीर भी बदलाव के कई चरणों से होकर गुजरता है.

हमने ये समझने की कोशिश की वो कैसे इन बदलावों से तालमेल बिठाती हैं और पीरियड्स के समय ट्रेनिंग करती हैं.

वीडियो कैप्शन, पीरियड्स को लेकर महिला खिलाड़ियों की चुनौतियां

पीरियड्स के समय खेलना मुश्किल होता है?

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पीरियड्स के दौरान महिला एथलीट को मूड स्विंग, पेट दर्द, पीठ दर्द, पैर में दर्द, मितली, थकान आदि का सामना करना पड़ता है.

बाक़ी महिलाएं इन सबके लिए कभी कभार दर्द निवारक दवाएं ले सकती हैं लेकिन खेल में कड़े नियमों के चलते एथलीट कोई भी गोली ख़ुद से नहीं खा सकती. उन्हें पीरियड्स के दौरान ट्रेनिंग करनी पड़ती है और बेहतर प्रदर्शन करना पड़ता है और चोट का भी ख़तरा होता है.

स्वीडन में कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट की सीसिलिया फ़्रिडेन ने इस पर एक अध्ययन किया है.

इस स्टडी में पाया गया है कि महिलाओं में चोटिल होने की दर माहवारी के पहले और इसके दौरान अधिक होती है.

ओवुलेशन के चरण में (14वें दिन) महिलाओं में घुटने की चोट का ख़तरा अधिक होता है और 21वें से 28वें दिन के दरम्यान थकान और मूड स्विंग अधिक होता है.

साल 2016 में हुआ एक अन्य अध्ययन दिखाता है कि आधे से अधिक शीर्ष महिला एथलीट को हार्मोन में बदलाव का भी सामना करना पड़ता है जो उनकी ट्रेनिंग और प्रदर्शन को भी प्रभावित करते हैं.

इस अध्ययन को करने वाली डॉ. जियोर्जी ब्रुइनवेल्स खुद एक एथलीट रह चुकी हैं.

वो कहती हैं, “ओवुलेशन से पहले महिला के शरीर में इस्ट्रोजेन का स्तर सर्वाधिक होता है. इस दौरान अधिकांश महिलाओं को लगता है कि वो खेल में सबसे अधिक सक्षम हैं. लेकिन ओवुलेशन के ठीक पहले ये स्तर गिर जाता है.”

“इसके बाद के चरणों में प्रोजेस्टीरोन हार्मोन बढ़ता है, जो शरीर का तापमान, सांस, दिल की धड़कन बढ़ाता है जो मेटाबोलिज़्म दर को प्रभावित करता है. इसलिए आपको भोजन में बदलाव करने की ज़रूरत होती है.”

इन हार्मोनल बदलावों के बारे में खिलाड़ियों को पता चल सके तो ये उनके ट्रेनिंग के समय को व्यवस्थित करने में मदगार हो सकता है.

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पीरियड्स में ट्रेनिंग

इस साल के वर्ल्ड कप में ओपेनिंग गोल करने वाली न्यूज़ीलैंड की फ़ुटबॉलर हान्ना विल्किंसन कहती हैं, “अगर कोई बड़ा मैच होता है तो खिलाड़ी खैर मनाती थीं कि उन्हें पीरियड्स न आए. लेकिन चीजें बदल चुकी हैं.”

वो कहती हैं कि आपको पीरियड्स के दौरान भी खेलने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होना रहता है.

प्रियंका मोहिते इस बात से सहमत हैं, “मैं अपने पीरियड्स के दौरान भी प्रैक्टिस करती हूं. मैं कम से कम टहलने जाती हूं, ट्रेडमिल पर मेहनत करती हूं, योगा, स्ट्रेचिंग आदि करती हूं. पीरियड्स के दौरान शरीर के निचले हिस्से वाले व्यायाम से बचती हूं लेकिन कभी व्यायाम करना छोड़ती नहीं.”

पिछले 30 सालों से जिम्नास्टिक सिखाने वाले महाराष्ट्र के सीनियर कोच हरीष परब कहते हैं, “मेरे स्टूडेंट पहले से मुझे बता देते हैं कि उन्हें पीरियड्स आ रहा है या उसकी तारीख़ करीब आ रही है.”

वो कहते हैं, “इसलिए हम उसी हिसाब से उनके ट्रेनिंग और अभ्यास के समय को निर्धारित करते हैं. हम ये सुनिश्चित करते हैं कि इस समय वे अपने शरीर पर बहुत ज़ोर न लगाएं. इसलिए पीरियड्स के समय ट्रायल या टूर्नामेंट का सामना करने के लिए वे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार रहती हैं.”

वो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ट्रेनिंग और ख़ुराक मजबूती का मूल है.

“अधिकांश जिम्नास्ट बहुत जल्द ट्रेनिंग शुरू कर देते हैं. जब वे 12 साल के होते हैं तब हम डाइटीशियन से उनकी खुराक के बारे में सलाह लेते हैं. हम सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें पर्याप्त आयरन और कैल्शियम मिले. हम स्त्रीरोग विशेषज्ञ के साथ भी सेशन का बंदोबस्त करते हैं ताकि लड़कियों को सही सही पता रहे कि उनके शरीर में क्या बदलाव हो रहे हैं.”

ऐप

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टेक्नोलॉजी कैसे मदद कर रही है?

हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट खेलों में आप पूरी टीम के लिए एक तरह का फ़िटनेस नियम नहीं लागू कर सकते. आजकल फ़िटनेस ट्रेनर हरेक खिलाड़ी के लिए अलग अलग व्यायाम निर्धारित करते हैं.

इंग्लिश इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट्स के डॉ. रिचर्ड बर्डन कहते हैं, “लंबे समय से माहवारी को ट्रेनिंग और प्रदर्शन के लिहाज से एक बाधा के तौर पर देखा जाता रहा है. लेकिन अगर आप इसका दूसरा पक्ष देखें, तो ट्रेनिंग छोड़ देने की बजाय ट्रेनिंग को लेकर हार्मोन के उतार चढ़ाव को सटीक तरीके से इस्तेमाल की पर्याप्त संभावना है.”

खिलाड़ी इन उतार चढ़ावों पर नज़र बनाए रखने के लिए ऐप्प का इस्तेमाल करते हैं.

क्लू, फ़िटबिट जैसे ऐप्प महिलाओं को माहवारी ट्रैक करने में मदद करते हैं. फ़िटआरवुमन तो और मददगार है. वो महावारी के हर चक्र में ट्रेनिंग गतिविधि, पोषण और फ़िजियोलॉजी सपोर्ट की हिस्ट्री तैयार करता है.

इस ऐप को स्पोर्ट्स टेक कंपनी ओरेको ने बनाया है और डॉ. जिओर्जी ब्रुइनवेल्स की रिसर्च ने इसमें अहम भूमिका निभाई है.

डॉ. ब्रुइनवेल्स ने अमेरिकी फ़ुटबॉल टीम के साथ काम किया है. जब 2019 में टीम ने वर्ल्ड कप जीता तो उस समय बताया गया कि इस टेक्नोलॉजी ने तैयारी में काफ़ी मदद की थी.

लेकिन केवल ट्रेनिंग ही नहीं, कपड़े बनाने वाली कंपनियां भी महिला खिलाड़ियों की ज़रूरतों का संज्ञान ले रही हैं और लीकप्रूफ़ कपड़ों को बाज़ार में उतारा है.

प्रियंका मोहिते

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इमेज कैप्शन, पर्वतारोही प्रियंका मोहिते

बोलना सबसे अहम बात है

पर्वतारोही प्रियंका मोहिते को लगता है कि खिलाड़ियों को माहवारी के बारे में खुल कर बोलना शुरू कर देना चाहिए. शुरू में वो खुद पीरियड्स के बारे में बातें करने से झिझकती थीं, लेकिन अब जब भी वो हाईस्कूल और कॉलेजों में लड़कियों और लड़कों से मिलती हैं इसके बारे में बातें करती हैं.

“अन्नपूर्णा अभियान के दौरान, मेरी टीम में चार पुरुष थे और हम एक ही टेंट में रहते थे. अगर आपको पैड या कप बदलने की ज़रूरत है तो आपको टेंट में ही बदलना पड़ेगा क्योंकि बाहर तेज़ हवा और बर्फ थी. इसलिए आपको अपने टीम के साथ भरोसे का रिश्ता विकसित करने की ज़रूरत होती है.”

लेकिन अब हर कोई इसे कर सकता है. अर्जुन पुरस्कार विजेता भारतीय पहलवान दिव्या काकरान ने बीबीसी को बताया था कि पारम्परिक रूप से पुरुषों के दबदबे वाले खेल कुश्ती में माहवारी और पीरियड्स को टैबू की तरह देखा जाता है.

उन्होंने कहा, “लड़कियां कोच से नहीं कह सकतीं कि उन्हें ये दिक्कत है. वहां कोई साफ़ सुथरा टॉयलेट नहीं होता, बदलने की कोई जगह नहीं होती. अगर आपको बार बार टॉयलेट जाना पड़े, आपके कपड़े में धब्बे पड़ जाएं तो कोच को क्या बताएं, इस तरह से सवाल खड़े होते हैं.”

यहां कोचों की भूमिका अहम हो जाती है. हरीष परब कहते हैं कि पिछले 30 सालों में स्थितियां काफ़ी बदली हैं.

वो कहते हैं, “अभिभावक पहले से अधिक जागरूक हैं, इसलिए महिला खेलों में पीरियड्स के बारे में खुली बातचीत होती है. लड़कियों ने भी इसको लेकर बात करनी शुरू कर दी है. अगर वे मुझसे सीधे बात नहीं करना चाहतीं तो वे महिला असिस्टेंट कोच या सीनियर खिलाड़ियों से बोलती हैं.”

और शायद, पीरियड्स पर ईमानदार बातचीत की महिला खेल को सबसे अधिक ज़रूरत है.

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