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इस बार क्यों आसानी से नहीं मिल रहे मशहूर कश्मीरी सेब
- Author, अक़ीब जावीद
- पदनाम, श्रीनगर, कश्मीर
सर्द और धुंध भरे दिन भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सैकड़ों सेब उत्पादक किसान एक फल मंडी में टिन के अस्थाई शेड में अपनी फसल को लेकर पहुंचे थे.
इस उम्मीद में कि व्यापारी उनके सेब खरीदने पहुंचेंगे.
इस साल किसानों के बीच सेब की गुणवत्ता को लेकर चिंता है क्योंकि इस बार उनकी क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है और इससे दाम पर भी असर पड़ने वाला है.
कश्मीर अपने विभिन्न किस्मों के सेब के लिए भारत में जाना जाता है. लेकिन फंफूद लगने, जलवायु परिवर्तन और कई आर्थिक दिक्कतों से भरी चुनौतियों ने इस फलते फूलते उद्योग को संकट में डाल दिया है.
आकार, रंग और गुणवत्ता के अनुसार, सेबों को ए, बी और सी की श्रेणी में रखा जाता है. ए प्रीमियम कैटेगरी है जबकि बी और सी फंफूद लगे सेब होते हैं, हालांकि बी, सी के मुकाबले कम संक्रमित होता है.
पुलवामा के एक सेब बागवान ग़ुलाम नबी मीर कहते हैं, “इस साल सेब उत्पादन का क़रीब 40% सी- ग्रेड का है.”
जम्मू एवं कश्मीर के हर्टिकल्चर विभाग के मुताबिक, सेब, अखरोट और बादाम की खेती प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर इस इलाक़े में क़रीब 23 लाख लोगों को रोज़गार मुहैया कराती है.
श्रीनगर के एक स्वतंत्र अर्थशास्त्री एजाज़ अयूब ने बीबीसी को बताया कि हर साल 20 लाख टन से भी ज्यादा सेब निर्यात होता है, जिससे 120 अरब रुपये का राजस्व हासिल होता है.
ये कश्मीर के टूरिज़्म उद्योग का दोगुना है.
मौसम की मार
लेकिन मौसम में अनिश्चितता ने इस पर कहर ढाना शुरू कर दिया है.
50 साल के अब्दुल्ला गफ़्फ़ार क़ाज़ी कहते हैं, “अप्रैल से मई के बीच बेमौसम की बारिश से फ़सल में फंफूद लगती है. अगर किसान कीटनाशक छिड़कते हैं तो बारिश उन्हें बहा ले जाती है.”
शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज़ में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. तारिक़ रसूल का कहना है कि मौसम की अतिवृष्टि से सेब की फसल के आकार, क्वालिटी और मात्रा पर भी असर पड़ता है.
मौसम के आधार पर गर्मियों में या वसंत के मौसम में फसल में रोग लगता है और सेब की गुणवत्ता बी से सी ग्रेड की हो सकती है.
कश्मीर के बडगाम ज़िले में चडूरा के 58 साल के किसान ग़ुलाम मोहम्मद भट का कहना है कि उन्होंने मौसम में इतनी अनिश्चितता यहां पहले कभी नहीं देखी.
वो कहते हैं, "मई में ओले पड़े, जिससे मेरी फसल बर्बाद हो गई."
जबकि अगस्त और सितम्बर में लंबे समय से सूखे की स्थिति से पानी की कमी हो गई जिससे सेबों का स्वाद फीका का हो गया.
जम्मू कश्मीर के मौसम विभाग का डेटा दिखाता है कि पिछले सात सालों में कश्मीर में बिगड़ते मौसम की घटनाएं बढ़ी हैं.
साल 2010 और 2022 के बीच जम्मू एवं कश्मीर में खराब मौसम की वजह से 550 से अधिक लोग मारे गए.
18 जुलाई 2021 को कश्मीर में आठ सालों में सबसे अधिक गर्म दिन (35 डिग्री सेल्सियस) रहा. उसी साल, जनवरी में घाटी में 30 सालों में सबसे सर्द रात का रिकॉर्ड भी दर्ज किया गया.
कश्मीर में स्वतंत्र रूप से मौसम अनुमान लगाने वाले फ़ैज़ान आरिफ़ केंग के अनुसार, इस साल मार्च से मध्य अप्रैल के बीच यहां तापमान सामान्य से 12 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया.
इसकी वजह से सेब के पेड़ों में जल्द फूल आ गए. लेकिन इसके बाद मौसम में अचानक बदलाव आया और जून तक तापमान समान्य से नीचे ही बना रहा.
ईरानी और अमेरिकी सेब
फ़ैज़ान आरिफ़ केंग कहते हैं, "इस समय से पहले वसंत के 'झूठे आभास' ने फसल को नुकसान पहुंचाया."
मौसम की अतिवृष्टि फसल के परिवहन को भी बड़ी चुनौती बना देता है.
सर्दियों में फसल पकने की शुरुआत होती है. लेकिन इस दौरान घाटी पूरी दुनिया से कटी होती है क्योंकि श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर भूस्खलन के ख़तरे बढ़ जाते हैं, जबकि यही एकमात्र सड़क है जो देश के अन्य हिस्से से इस इलाके को जोड़ती है.
अगर भूस्खलन से हाईवे बंद हो गया तो सेब से लदे सैकड़ों ट्रक कई दिनों तक फंसे रहते हैं और यह एक सामान्य नज़ारा होता है.
दिल्ली में आज़ादपुर फल मंडी में कश्मीर एप्पल मर्चेंट्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष विजय टैरा का कहना है कि भारत के फल बाज़ार में ईरान के सेब आ रहे हैं.
सेब के किसानों का कहना है कि इससे कश्मीर के सेब बाज़ार का हिस्सा और क़ीमत दोनों प्रभावित हो रहे हैं.
कश्मीर वैली फ़्रूट ग्रोवर्स कम डीलर यूनियन के अध्यक्ष अहमद बशीर कहते हैं, "सिर्फ दो सप्ताह पहले, भारत की फल मंडी में कश्मीरी सेब के एक बॉक्स की क़ीमत 1,000 से 1,300 रुपये थी, अब यह 800 रुपये हो गई है, जिससे लागत भी पूरी नहीं होती है."
वो कहते हैं कि अमेरिका से आयातित सेबों पर 20 प्रतिशत आयात शुल्क माफ़ करने के भारत सरकार के फैसले से भी सेब किसान, क़ीमतों में गिवारट झेलने को मजबूर हैं.
नवंबर में कश्मीर वैली फ़्रूट ग्रोवर्स कम डीलर यूनियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर इस संकट में हस्तक्षेप करने की मांग की.
केंद्र सरकार से गुहार
इलाक़े के हर्टिकल्टर विभाग का कहना है कि इन मुद्दों का हल केंद्र सरकार के स्तर पर ही हो सकता है.
विभाग के डिप्टी डायरेक्टर मंज़ूर अहमद मीर ने कहा, “हमने इस मुद्दे को केंद्र के सामने उठाया है, वे ही इस मुद्दे पर कुछ कर सकते हैं.”
किसान इस बात से भी परेशान हैं कि सरकार नकली या कम गुणवत्ता के कीटनाशक बेचने वाले डीलरों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है.
भट कहते हैं, “अगर कीटनाशक भरोसेमंद क्वालिटी के हों तो हमारे बागों में कम रोग लगेंगे.”
हर्टिकल्टर विभाग में एक अन्य डिप्टी डायरेक्टर शफ़ीक़ ख़ालिद कहते हैं कि आरोपी डीलरों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की गई है और उनपर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं.
अर्थशास्त्री अयूब कहते हैं कि ‘अगर सेब पैदा करने वाले किसानों को अच्छी आमदनी नहीं होती है तो घरेलू अर्थव्यवस्था में जान डालने वाला उपभोग भी प्रभावित होता है.’
वो कहते हैं, “जब बाज़ार में पैसा आता है तो यह अन्य धंधों से जुड़े लोगों के पास भी पहुंचता है. इसलिए अगर पैसा आना बंद हुआ तो सभी लोगों पर इसका प्रभाव पड़ेगा.”
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