इमरजेंसी की वो फ़िल्म जिसने संजय गांधी को जेल भिजवाया

इंदिरा गांधी और संजय गांधी

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इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी अपने बेटे संजय गांधी के साथ, 19 नवंबर 1976 को गुवाहाटी (असम) में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान
    • Author, वंदना
    • पदनाम, सीनियर न्यूज़ एडियर, बीबीसी न्यूज़

(यह लेख पहली बार जुलाई, 2017 में प्रकाशित हुआ था.)

1975 में भारत में जब आपातकाल लगा, तो उस दौरान संजय गांधी पर कई तरह के आरोप लगे थे-कथित ज़्यादतियाँ, जबरन नसबंदी, सरकारी कामकाज में दख़ल और मारुति उद्योग से जुड़ा विवाद.

हालांकि, आपातकाल के बाद जब उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी मामले चले, तो उन्हें जेल एक फ़िल्म के मामले में जाना पड़ा.

संजय गांधी पर आरोप था कि आपातकाल के दौरान 1975 में बनी फ़िल्म 'क़िस्सा कुर्सी का' के प्रिंट उनके कहने पर जलवाए गए. यह फ़िल्म उन्हीं पर आधारित एक राजनीतिक व्यंग्य (स्पूफ़) थी.

किस्सा कुर्सी का

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'किस्सा कुर्सी का' फ़िल्म ने पहुंचाया जेल

फ़िल्म 'किस्सा कुर्सी का' जनता पार्टी के सांसद अमृत नाहटा ने बनाई थी जिसके नेगेटिव ज़ब्त कर लिए गए थे और बाद में कथित तौर पर जला दिए गए.

इमरजेंसी के बाद बने शाह कमीशन ने संजय गांधी को इस मामले में दोषी पाया था और कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया. हालांकि, बाद में यह फ़ैसला पलट दिया गया.

फ़िल्म में संजय गांधी और उनके कई क़रीबियों का स्पूफ़ दिखाया था -शबाना आज़मी, गूँगी जनता का प्रतीक थी, उत्पल दत्त गॉडमैन के रोल में थे और मनोहर सिंह एक राजनेता के रोल में थे जो एक जादुई दवा पीने के बाद अजब-ग़ज़ब फ़ैसले लेने लगते हैं.

1978 में इसे दोबारा बनाया गया. लेकिन संजय गांधी को जेल पहुँचाने वाली फ़िल्म जब रिलीज़ हुई तो कब आई और कब गई किसी को पता भी नहीं चला.

किशोर कुमार

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इमेज कैप्शन, 1975 में एक सरकारी समारोह में न गाने के कारण किशोर कुमार के गानों को ऑल इंडिया रेडियो पर बैन कर दिया गया था

नसबंदी पर स्पूफ़ और किशोर कुमार

इसी तरह 1978 में आईएस जौहर की फ़िल्म 'नसबंदी' भी संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम का स्पूफ़ थी जिसमें उस दौर के बड़े सितारों के डुप्लिकेटों ने काम किया था. फ़िल्म में दिखाया गया कि किस तरह से नसंबदी के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पकड़ा गया.

फ़िल्म का एक गाना था 'गांधी तेरे देश में ये कैसा अत्याचार' जिसके बोल कुछ यूँ थे-

"कितने ही निर्दोष यहाँ मीसा के अंदर बंद हुए,

अपनी सत्ता रखने को जो छीने जनता के अधिकार,

गांधी तेरे देश में ये कैसा अत्याचार"

इसे इत्तेफ़ाक़ कहिए या सोचा समझा क़दम कि ये गाना किशोर कुमार ने गाया था.

दरअसल, इमरजेंसी के दौरान किशोर कुमार उस वक़्त बहुत नाराज़ हो गए थे जब उन्हें कांग्रेस की रैली में गाने के लिए कहा गया.

प्रीतिश नंदी के साथ छपे एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैं किसी के आदेश पर नहीं गाता."

अंजाम तो सभी जानते हैं कि बाद में किशोर कुमार के गानों पर ऑल इंडिया रेडियो ने बैन लगा दिया गया था.

नसबंदी फ़िल्म का एक और गाना था- 'क्या मिल गया सरकार इमरजेंसी लगा के', जिसे मन्ना डे और महेंद्र कपूर ने गाया था.

शोले पर भी गिरी थी गाज

शोले का पोस्टर

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कई मशहूर फ़िल्मों को भी इमरजेंसी के कारण मुश्किल उठानी पड़ी थी.

फ़िल्म शोले के आख़िरी सीन में असल में रमेश सिप्पी ने दिखाया था कि ठाकुर कील लगे जूतों से गब्बर को रौंद देता है. लेकिन वो इमरजेंसी का दौर था और सेंसर बोर्ड के नियम काफ़ी सख़्त थे.

वो नहीं चाहता था कि ऐसा कुछ भी दिखाया जाए जिससे लगे कि कि कोई भी क़ानून अपने हाथ में ले सकता है.

सेंसर बोर्ड चाहता था कि गब्बर को पुलिस के हवाले कर दिया जाए. लेकिन रमेश सिप्पी अड़ गए.

अनुपमा चोपड़ा की किताब 'शोले द मेकिंग ऑफ़ ए क्लासिक' में वो लिखती हैं, "सिप्पी परिवार ने कई जान-पहचान वालों तक अपनी बात पहुँचाई. बाप-बेटे आपस में भी उलझ बैठे. एक समय रमेश सिप्पी ने फ़िल्म से अपना नाम हटाने का भी मन बनाया. "

वकील रहे जीपी सिप्पी ने बेटे को समझाया कि इमरजेंसी में कोर्ट जाने का कोई फ़ायदा नहीं.

तो कुछ और ही होती शोले

शोले का पोस्टर

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रिलीज़ की तारीख तय थी -15 अगस्त 1975 और 20 जुलाई गुज़र चुकी थी. संजीव कुमार सोवियत संघ में थे. वे तुरंत भारत लौटे. आख़िरी सीन दोबारा शूट हुआ, डबिंग और मिक्सिंग हुई.

सेंसर ने रामलाल का वो सीन भी काट दिया जिसमें वो ज़ोर-ज़ोर से ठाकुर के उन जूतों में कील ठोकता है जिससे ठाकुर गब्बर को मारने वाला था- क्योंकि रामलाल की आँखों में विद्रोह की झलक थी.

इस तरह इमरजेंसी के दौरान शोले तैयार हुई लेकिन ये वो फ़िल्म नहीं थी जो रमेश सिप्पी बनाना चाहते थे.

गुलज़ार की फ़िल्म आंधी का किस्सा तो जगजाहिर है. कई लोगों का आरोप था ये इंदिरा गांधी की ज़िंदगी पर आधारित थी और इमरजेंसी के दौरान बैन कर दी गई थी.

'किशोर कुमार, जयप्रकाश पर बैन'

देवानंद

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इमरजेंसी के दौरान कई कलाकार ऐसे भी थे जो फ़िल्मों के ज़रिए विरोध के अलावा बात आगे तक ले गए.

देव आनंद तो इतने नाराज़ थे कि उन्होंने 'नेशनल पार्टी ऑफ़ इंडिया' नाम की राजनीतिक पार्टी तक बनाई थी. शिवाजी पार्क में इसका बड़ा जलसा भी हुआ.

देव आनंद अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं, "मैं समझ गया था कि मैं उन लोगों के निशाने पर हूँ जो संजय गांधी के क़रीब हैं."

कई देशों में राजनीतिक हस्तियों और घटनाओं पर फ़िल्में बनना आम बात है. लेकिन भारत में आज भी सियासतदानों और सिनेमा के बीच असहज सा रिश्ता बना हुआ है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित