चुनाव आयोग में नियुक्ति: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के क़दम पर उठाए सवाल

चुनाव आयोग

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    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चुनाव आयोग में सुधार और स्वायत्तता के बारे में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई गुरुवार को पूरी हो गई और संविधान पीठ ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है.

पीठ ने सभी पक्षों को लिखित रुप से अपनी दलीलें पेश करने के लिए पाँच दिनों का समय भी दिया है, जिसके बाद अदालत अपना फ़ैसला सुनाएगी.

चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में साल 2018 में कई याचिकाएं दायर की गईं थीं. सुप्रीम कोर्ट ने इन सब याचिकाओं को क्लब करते हुए इसे पाँच जजों की संविधान पीठ को रेफ़र कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की संविधान पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार शामिल हैं, जबकि जस्टिस केएम जोसेफ़ इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे हैं.

चार साल बाद 18 नवंबर, 2022 से संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू की जो कि गुरुवार (24 नवंबर) को ख़त्म हुई. इन याचिकाओं में माँग की गई थी कि चुनाव आयुक्त (ईसी) और मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली अपनाई जानी चाहिए.

सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने सरकार से कई गंभीर सवाल किए.

अदालत ने यहां तक कह दिया कि हर सरकार अपनी हां में हां मिलाने वाले व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त नियुक्त करती है.

अदालत ने यह भी कह दिया कि देश को टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की ज़रूरत है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश को इस समय टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की ज़रूरत है.

उस समय वो योजना आयोग के सदस्य थे जो कि अब नीति आयोग कहा जाता है. प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया था.

वो 1990 से 1996 तक पूरे छह साल के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त थे. उन्हें चुनाव आयोग में कई ऐतिहासिक सुधारों के लिए जाना जाता है. दिसंबर 2019 में उनका निधन हो गया था.

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि हमें एक ऐसे सीईसी की आवश्यकता है जो प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई कर सके.

अरुण गोयल

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अरुण गोयल पर क्या है विवाद?

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बुधवार और गुरुवार के दिन चुनाव आयोग के नए सदस्य अरुण गोयल पर ज़्यादा चर्चा हुई.

बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अरुण गोयल की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से उनकी नियुक्ति की फ़ाइल मांगी थी.

पंजाब काडर के 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी अरुण गोयल ने सोमवार (21 नवंबर) को चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला था.

इससे पहले उन्हें शनिवार (19 नवंबर) को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था. उन्होंने शुक्रवार (18 नवंबर) को वीआरएस यानी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी.गोयल इसी साल 31 दिसंबर को रिटायर होने वाले थे.

लेकिन अब वो मौजूदा सीईसी राजीव कुमार के फ़रवरी, 2025 में रिटायर होने के बाद अगले सीईसी होंगे.

गुरुवार को अटॉर्नी जनरल वेंकटरमाणी ने अरुण गोयल की नियुक्ति संबंधित फ़ाइल सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की. फ़ाइल देखने के बाद अदालत ने कहा कि वो अरुण गोयल की योग्यता पर नहीं बल्कि उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है.

अदालत ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि गोयल ने एक ही दिन में सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली, एक ही दिन में क़ानून मंत्रालय ने उनकी फ़ाइल को मंज़ूरी दे दी, चार नामों की सूची प्रधानमंत्री के समक्ष पेश की गयी तथा गोयल के नाम को 24 घंटे के भीतर राष्ट्रपति से मंज़ूरी भी मिल गयी.

वेंकटरमानी ने कहा कि चयन की एक प्रक्रिया तथा मापदंड है और ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार हर अधिकारी का पिछला रिकॉर्ड देखे और यह सुनिश्चित करें कि वह छह साल का कार्यकाल पूरा करें.

गुरुवार को भी अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, "यदि आप प्रत्येक क़दम पर संदेह करना शुरू करेंगे, तो संस्था की अखंडता और स्वतंत्रता और सार्वजनिक धारणा पर प्रभाव पड़ेगा. क्या कार्यपालिका को हर मामले में जवाब देना होगा?"

लेकिन सुप्रीम कोर्ट अटॉर्नी जनरल की बातों से ज़्यादा सहमत नहीं दिखी.

जस्टिस जोसेफ़ ने टिप्पणी की कि यानी आप उन्हीं को निर्वाचन आयुक्त बनाने के लिए चुनते हैं, जो रिटायरमेंट के क़रीब हों और वो मुख्य निर्वाचन आयुक्त का छह साल का कार्यकाल पूरा ही नहीं कर पाएं! क्या ये तार्किक प्रक्रिया है? हम आपको खुलेआम बता रहे हैं कि आप नियुक्ति प्रक्रिया की धारा छह का उल्लंघन करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट

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अदालत के सामने क्या है मुद्दा

निर्वाचन आयोग (चुनाव आयुक्त की सेवा और कारोबार का संव्यवहार शर्तों) अधिनियम, 1991 के तहत चुनाव आयुक्त का छह साल या 65 वर्ष की आयु तक का कार्यकाल हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 2007 के बाद से ऐसा देखा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अपना छह साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाते हैं.

इस पर अटॉर्नी जनरल का कहना था कि चुनाव आयोग के सदस्यों के पूरे कार्यकाल को देखा जाना चाहिए सिर्फ़ सीईसी के रूप में उनके कार्यकाल को नहीं.

अटॉर्नी जनरल का दावा था कि इस तरह से देखा जाए तो चुनाव आयोग के सदस्यों का कार्यकाल क़रीब पाँच साल रहा है.

अदालत के सामने दूसरा मुद्दा है चुनाव आयुक्तों के संवैधानिक अधिकार. क्या चुनाव आयुक्तों को अपना कार्यकाल और पद से हटाए जाने के मामले में वही अधिकार हैं जो कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हैं.

मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल महाभियोग के ज़रिए ही हटाया जा सकता है लेकिन चुनाव आयुक्तों को यह अधिकार हासिल नहीं है.

पहले चुनाव आयोग में केवल एक ही सदस्य होता था लेकिन 1993 में सरकार ने दो नए चुनाव आयुक्तों को नियुक्त कर दिया.

सरकार ने कहा कि फ़ैसले या तो सर्वसम्मति से होंगे और असहमति के मामले में निर्णय बहुमत की राय से होंगे.

उस समय सीईसी रहे टीएन शेषन ने इसे अदालत में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में इस पर फ़ैसला दिया लेकिन सरकार के फ़ैसले को सही क़रार दिया.

अदालत में इस पर भी चर्चा हुई कि तीन सदस्यों में से सीईसी कैसे नियुक्त किया जाता है.

इस पर सरकार के वकील ने कहा कि परंपरा का पालन करते हुए सबसे वरिष्ठ सदस्य को सीईसी बना दिया जाता है.

पूर्व सीईसी एसवाई क़ुरैशी के अनुसार यह कोई क़ानून नहीं है और सरकार चाहे तो इस परंपरा का पालन नहीं भी कर सकती है.

संविधान के अनुच्छेद 324 या बाद में बने क़ानून में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त का चयन कैसे किया जाएगा.

संविधान पीठ ने इस ओर इशारा करते हुए कहा था कि नियुक्ति के मामले में संविधान की ख़ामोशी और क़ानून की कमी के कारण सरकारों का जो रवैया रहा है वो परंपरा परेशान करने वाली है.

सुनवाई के दौरान जस्टिस जोसेफ़ की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ का बार-बार यही कहना था कि उसका प्रयास एक प्रणाली बनाने का है, ताकि सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने.

पीठ ने कहा था, “हमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को चुनना होगा.सवाल है कि हम सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को कैसे चुनें और कैसे नियुक्त करें.”

ईवीएम

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अदालत बनाम सरकार?

अदालत में सुनवाई पूरी हो गई है और अब सबको पाँच जजों की बेंच के फ़ैसले का इंतज़ार है.

लेकिन क्या इस पूरी बहस को देखते हुए कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार इस मामले में आमने-सामने आ गए हैं?

जाने माने बुद्धिजीवी प्रताप भानु मेहता ने अंग्रेज़ी के अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में इस पर एक लेख लिखा है.

मेहता ने अपने लेख में इससे जुड़े कई मुद्दों की चर्चा की है.

वो कहते हैं कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में न्यायपालिका को शामिल किया जाने से कोई ख़ास बेहतरी नहीं होगी.

उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड का केस चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की तुलना में ज़्यादा अहमियत रखता है.

उनके अनुसार अगर सुप्रीम कोर्ट कोई फ़ैसला सुना भी देती है तो उससे थोड़े बहुत बदलाव ज़रूर होंगे लेकिन इससे गंभीर मुद्दे अछूते ही रहेंगे.

मेहता लिखते हैं कि हाल के दिनों में चुनाव आयोग ने कई ऐसे फ़ैसले किए हैं जिनपर सवाल उठे हैं. चुनाव आयोग के राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहने को लेकर भी चिंताएं ज़ाहिर की गईं हैं.

प्रताप भानू मेहता का कहना है कि इन सबके बावजूद सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में सावधान रहने की ज़रूरत है.

मेहता लिखते हैं कि यह सोच भी पूरी तरह से सही नहीं है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस किसी चयन प्रक्रिया में होंगे तो सबकुछ ठीक हो जाएगा.

उनके अनुसार इससे शक्ति के बंटवारे के सिद्धांत के भी प्रभावित होने का ख़तरा है.

वो सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति का हवाला देते हुए पूछते हैं कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सीबीआई निदेशक के चयन समिति में शामिल हो गए हैं लेकिन क्या इससे कहा जा सकता है कि सीबीआई की छवि बेहतर हुई है और वो एक निष्पक्ष और स्वतंत्र एजेंसी के रूप में काम करने लगी है.

मेहता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट जिस तरह से चुनाव आयुक्त बनाए जाने से पहले अधिकारी के रिकॉर्ड देखने की बात हो रही है उस आधार पर तो टीएन शेषन को उनकी राजनीतिक निकटता के कारण कभी भी चुनाव आयुक्त नहीं बनाया जाता.

उनके अनुसार एमएस गिल जैसे कुछ लोगों ने शानदार काम किया लेकिन उन्होंने रिटायरमेंट के बाद सरकार से पद स्वीकार कर अपनी छवि को नुक़सान पहुंचाया.

मेहता के अनुसार जिस चयन समिति में प्रधानमंत्री बैठे हों उसमें चीफ़ जस्टिस को शामिल करना ही बहुत विचित्र है.

वो कहते हैं कि लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण इंजन संसद है लेकिन एक जवाबदेह संस्था के रूप में संसद लगभग निष्क्रिय हो गई है.

संविधान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा

शेषन

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हैदराबाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और फ़िलहाल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अध्यापक और संविधान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्ताफ़ की राय कुछ अलग है.

बीबीसी हिंदी से बातचीत में वो कहते हैं कि सुनवाई के दौरान अदालत ने जो कुछ भी कहा है वो सिर्फ़ उनके विचार हैं, इसलिए बेहतर है कि हम फ़ैसले का इंतज़ार करें.

उनके अनुसार ऐसा कई बार देखा गया है कि अदालत बहुत ही बात जानना और समझना चाहती है और इसलिए सुनवाई के दौरान उनका रवैया कभी-कभी सख़्त भी होता है, लेकिन उनका फ़ैसला उससे अलग हो जाता है.

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा भी मानते हैं कि लोकतंत्र के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड का केस सबसे बड़ा है और बेहतर होता अगर सुप्रीम कोर्ट उसकी सुनवाई पहले कर लेती.

उन्होंने उम्मीद जताई कि अब इलेक्टोरल बॉन्ड केस पर भी सुनवाई जल्द ही होगी.

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के अनुसार चुनाव के मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसले ऐसे हुए हैं जिनपर संविधान विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं.

इस केस की सुनवाई के दौरान पूर्व सीईसी टीएन शेषन का भी ज़िक्र हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश को शेषन जैसे सीईसी की ज़रूरत है.

लेकिन फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि निश्चित तौर पर शेषन ने बेहतरीन काम किए थे लेकिन यह भी सच्चाई है कि असम में 'डी-वोटर' का जो मामला था वो शेषन के कार्यकाल में ही शुरू हुआ था.

उनके अनुसार एक बहुत ही छोटा सा अधिकारी असम के किसी भी वोटर के नाम के आगे डी लगा देता था और वो डाउटफ़ुल वोटर (यानी ऐसा वोटर जिसकी नागरिकता शक के घेरे में है) हो जाता था जिससे उस व्यक्ति को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था.

मौजूदा केस के बारे में प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं कि इस बात की संभावना है कि सुप्रीम कोर्ट कह दे कि सरकार अकेले चुनाव आयुक्त की नियुक्ति नहीं करेगी, इसके लिए एक सर्च कमेटी होनी चाहिए जिसमें नेता प्रतिपक्ष के अलावा चीफ़ जस्टिस भी हों.

लेकिन प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा इस बात से इनकार करते हैं कि इस केस की सुनवाई के दौरान जो कुछ सामने आया उसके आधार पर कहा जाए कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच मतभेद पैदा हो गए हैं.

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के अनुसार लोकपाल, सीबीआई निदेशक, मानवाधिकार आयोग जैसे कुछ संस्थानों की नियुक्तियों में न्यायपालिका का दख़ल होता है लेकिन सिर्फ़ जजों के शामिल हो जाने से बिल्कुल निष्पक्ष और स्वतंत्र नियुक्ति होगी ऐसा मानना ग़लत है.

उनका कहना है कि नियुक्ति के मामले में हमेशा ही सरकार का दख़ल ज़्यादा होगा लेकिन जजों के आने से स्थिति में थोड़ा सुधार ज़रूर होगा.

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के अनुसार सैद्धान्तिक तौर पर न्यायपालिका का यह काम नहीं है कि वो अधिकारियों के चयन प्रक्रिया में शामिल हो लेकिन यह बेहतर होगा कि सरकार चयन प्रक्रिया में विपक्ष को भी कुछ जगह दे.

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