इसराइल गहरे घरेलू संकट में फँसा, नहीं माने नेतन्याहू

इसराइल

इमेज स्रोत, Reuters

इमेज कैप्शन, मौजूदा जनआक्रोश को इसराइल के इतिहास में सबसे बड़े प्रदर्शनों में से एक माना जा रहा है
    • Author, रफ़ी बर्ग
    • पदनाम, मिडिल ईस्ट एडिटर, बीबीसी न्यूज़ ऑनलाइन

इसराइल इन दिनों अपने इतिहास के सबसे गंभीर घरेलू संकट से घिरा हुआ है.

इसराइली सांसदों ने कड़े विरोध के बावजूद न्यायिक सुधार से जुड़े विवादित विधेयक को पास कर दिया है.

इसके क़ानून बनने से अब सुप्रीम कोर्ट के पास मौजूदा सरकार के फ़ैसलों को पलटने की शक्ति ख़त्म हो जाएगी.

सरकार का तर्क है कि शक्तियों के असंतुलन को सुधारने के लिए नया क़ानून लाना ज़रूरी है. सरकार का मानना है कि हालिया दशकों में सरकारी फ़ैसलों में अदालतों की दखलअंदाज़ी ख़ूब बढ़ गई है.

विपक्षियों के बहिष्कार के बीच सोमवार को विधेयक 64 वोटों से पारित किया गया.

संसद में अपनी टिप्पणी में विपक्षी नेता याएर लैपिड ने इस क़दम को "इसराइल के बहुमत पर एक अति अल्पसंख्यक द्वारा कब्ज़ा" कहा है.

लेकिन पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क़ानून आने के बाद भी अदालतें स्वतंत्र रहेंगी.

इसराइल में न्याय व्यवस्था के काम करने के तरीक़ों में बदलाव की सरकारी योजना के ख़िलाफ़ सड़कों पर हज़ारों लोग उतरे हुए हैं.

आइए जानते हैं, इसराइल में इस समय हो क्या रहा है.

इसराइल में क्या चल रहा है?

इसराइल

इमेज स्रोत, Getty Images

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

इस साल की शुरुआत से ही हर सप्ताह सरकार की न्यायिक सुधार योजना के ख़िलाफ़ इसराइल की जनता विरोध प्रदर्शन कर रही है.

धीरे-धीरे ये प्रदर्शन बढ़ते रहे और अब देश भर के बड़े शहरों और कस्बों की सड़कों पर सैकड़ों हज़ारों लोगों का हुजूम है.

इससे बेपरवाह सरकार ने सोमवार को न्यायिक सुधार विधेयक को क़ानून के तौर पर पारित कर दिया. इस कानून के ज़रिए देश में सुप्रीम कोर्ट से सरकारी फैसलों को रद्द करने की शक्ति को अतार्किक बताते हुए ख़त्म कर दिया गया है.

प्रदर्शनकारी सभी सुधारों को वापस लेने और प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.

प्रदर्शनकारियों को नेतन्याहू के राजनीतिक विरोधियों के साथ ही इसराइली सेना, खुफ़िया एजेंसियों और सिक्यॉरिटी सर्विसेज़ के पूर्व शीर्ष अधिकारियों, पूर्व प्रधान न्यायाधीशों और नामी-गिरामी क़ानूनविदों का समर्थन मिल रहा है.

इसराइली सरकार के इस क़दम ने कई पक्षों में गहरी चिंता पैदा कर दी है.

इसराइल की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण वायु सेना के पायलटों सहित युद्ध के लिए तैयार रखे जाने वाले सैकड़ों सैनिकों ने काम पर आने से मना कर दिया है, जिसके बाद ये ख़तरा पैदा हो गया है कि इससे देश की सुरक्षा संकट में है.

लोगों में इतना ग़ुस्सा क्यों है?

नेतन्याहू

इमेज स्रोत, Getty Images

नेतन्याहू के विरोधियों का कहना है कि नए सुधारों से न्यायिक व्यवस्था कमज़ोर पड़ेगी, जिससे देश का लोकतंत्र खोखला पड़ जाएगा. इनका कहना है कि न्यायिक व्यवस्था ही एकमात्र ऐसा ज़रिया है, जिससे सरकारी शक्तियों के इस्तेमाल पर नज़र रखी जा सकती है.

इसके पीछे इसराइल की वर्तमान सरकार का भी विरोध है, जो देश के इतिहास में सबसे धुर दक्षिणपंथी मानी जाती है.

आलोचकों का कहना है कि ये सुधार नेतन्याहू को बचाने के लिए किए जा रहे हैं, जिन पर फ़िलहाल कथित भ्रष्टाचार के आरोपों का मुक़दमा चल रहा है. हालांकि, नेतन्याहू इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं. आलोचकों का ये भी दावा है कि न्यायिक व्यवस्था में सुधार लाने वाले क़ानून से सरकार को कोई भी विधेयक बेरोकटोक पास कराने में मदद होगी.

वहीं, सरकार का तर्क है कि न्यायपालिका का विधायिका के काम मे हद से अधिक हस्तक्षेप है. सरकार ये भी कहती है कि उदारवादी मुद्दों पर न्यायपालिका पक्षपाती रवैया अपनाती है और जिस तरह से न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है, वो प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है.

कौन से क़ानूनी सुधार संकट की वजह हैं?

इसराइल

इमेज स्रोत, Getty Images

ये संकट देखने में सरकार की शक्तियों बनाम अदालतों की जाँच करने और सरकार के ख़िलाफ़ जाने की शक्ति से जुड़ा लगता है. सरकार और कुछ समर्थक कहते हैं कि ये बदलाव काफ़ी समय से लंबित थे, लेकिन सरकार इस नए क़ानून के ज़रिए काफ़ी कुछ बदलने जा रही है.

मसलन:

  • क़ानूनों की समीक्षा करने या उन्हें ख़ारिज करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति को कमज़ोर करना, नेसेट (संसद) में एक के साधारण बहुमत से ऐसे निर्णयों को ख़ारिज करने की शक्ति पाना.
  • जजों की नियुक्ति वाली कमिटी में सरकारी प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाकर, सुप्रीम कोर्ट सहित अन्य अदालतों में न्यायाधीशों को चुनने में अहम भूमिका निभाना.
  • मंत्रियों के लिए अटॉर्नी जनरल के निर्देशों पर चलने वाले अपने कानूनी सलाहकारों के सुझावों को मानने की बाध्यता खत्म करना. फिलहाल कानूनन मंत्रियों को सुझाव मानने पड़ते हैं.

कितना आगे जाएगा ये संकट?

सड़कों पर रोष और संघर्ष के बीच इसराइल का ये संकट और गहराने की आशंका है.

प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा है कि वो बाक़ी सुधारों पर अगस्त से अक्टूबर मध्य के बीच संसद की कार्यवाही बंद रहने के दौरान आम जनता के साथ सहमति पर पहुँचने की कोशिश करेंगे.

हालांकि, प्रधानमंत्री अपनी कैबिनेट में शामिल धुर दक्षिणपंथी मंत्रियों पर निर्भर हैं. इनके समर्थन के बिना नेतन्याहू की सरकार गिर जाएगी. इन मंत्रियों ने ही ज़ोर दिया है कि सभी सुधार लागू होने चाहिए और किसी भी सूरत में इनसे पीछे नहीं हटना चाहिए.

वहीं विपक्षियों का कहना है कि जब तक कानून लागू करने की प्रक्रिया रोकी नहीं जाती वो वार्ता बहाली पर तैयार नहीं होंगे.

इसराइल के मुख्य श्रमिक संघ ने हड़ताल की धमकी दी है और प्रदर्शनकारियों ने भी अपनी गतिविधियां तेज़ करने का संकल्प लिया है, जिसकी वजह से ये संकट आने वाले दिनों में खत्म होता नहीं दिखता.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)