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पप्पू यादव के आने से बिहार में कांग्रेस का कितना भला होगा
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
बिहार की सियासत में 1990 के दशक में ‘बंदूक और संदूक’ यानी धन बल और बाहुबल की ख़बरें अक्सर सुर्खियों में होती थी.
'मंडल और कमंडल' की राजनीति के अलावा लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम यादव यानी 'एम-वाय' समीकरण में भी उस दौर में कई नेताओं को सियासत में आगे बढ़ने का मौक़ा मिला था.
इसी दौर में पप्पू यादव, आनंद मोहन, मोहम्मद शहाबुद्दीन, मुन्ना शुक्ला, राजन तिवारी और सूरजभान जैसे नेताओं ने राजनीति में दस्तक दी थी.
कथित रॉबिनहुड वाली छवि वाले इनमें से कई नेताओं को जनता का भी ख़ूब समर्थन मिला और वो चुनावी राजनीति में आगे बढ़ते गए. कई नेताओं के बारे में जनता में यह छवि भी बनी कि "ये समय पर काम में आते हैं."
राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव भी इन्हीं में से एक हैं. कोसी-सीमांचल के इलाक़े में पप्पू यादव की अच्छी पकड़ मानी जाती है. यानी कोसी नदी के किनारे नेपाल और बांग्लादेश की सीमा के क़रीब बसे पूर्णिया, अररिया, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, किशनगंज और कटिहार के इलाक़े.
इनकी राजनीतिक ताक़त का अंदाज़ा इस बात से भी लगता है कि वो कई बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर भी विधानसभा से लेकर लोकसभा तक का चुनाव जीतने में सफल रहे हैं.
लालू प्रसाद यादव के काफ़ी क़रीबी रहने के कारण किसी ज़माने में पप्पू यादव को लालू के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखा जाने लगा था.
हालांकि बाद में लालू यादव और उनके बीच दूरी बनने लगी. कई दलों का चक्कर लगाने वाले पप्पू यादव सियासत के मैदान में अकेले पड़ गए, जिसके बाद उन्होंने साल 2015 में अपनी अलग 'जन अधिकार पार्टी' (जेएपी) बनाई.
बुधवार 20 मार्च को पप्पू यादव ने आख़िरकार अपने दल जेएपी का विलय कांग्रेस में कर दिया. माना जा रहा है कि सीटों की साझेदारी में कांग्रेस उनको पूर्णिया या सुपौल की सीट से उम्मीदवार बना सकती है.
हाल के समय में पप्पू यादव लगातार इस कोशिश में लगे हुए थे कि बिहार में विपक्ष के महागठबंधन में उनको जगह मिल सके.
पप्पू यादव का सियासी सफर
पप्पू यादव का सियासी सफर साल 1990 में शुरू हुआ था. उस वक़्त उन्हें जनता दल की तरफ से टिकट नहीं मिला था तो वो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा चुनाव में खड़े हुए थे. उन्होंने बिहार की सिंहेश्वर विधानसभा सीट से चुनाव जीता था.
1991 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पूर्णिया से वो लोकसभा चुनाव जीते. इसके बाद 1996 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की.
1999 में पप्पू यादव एक बार फिर से निर्दलीय ही पूर्णिया सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे.
पप्पू यादव को अंतिम चुनावी सफलता साल 2014 में मिली थी जब उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के टिकट पर मधेपुरा लोकसभा सीट से जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के शरद यादव को हराया था.
2014 के लोकसभा चुनावों में उनकी पत्नी रंजीत रंजन भी कांग्रेस के टिकट पर सुपौल सीट से लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रही थीं. फिलहाल रंजीत रंजन कांग्रेस से राज्यसभा सांसद हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "बिहार में एक कहावत है 'रोम इज़ फ़ॉर पोप एंड मधेपुरा इज़ फ़ॉर गोप'. (यानी रोम पोप का तो मधेपुरा गोप (यादवों) का है."
सुरुर अहमद के मुताबिक़ जहां नदियां बहती हैं, वहां हरियाली ज़्यादा होती है और वहीं मवेशियों को पालना भी आसान होता है. इसलिए कोसी नदी के आसपास के इलाक़ों में यादवों की बड़ी आबादी है
चुनावी आंकड़े बताते हैं कि वजह जो भी हो लेकिन पूर्णिया और कोसी इलाक़े में पप्पू यादव की सियासी ज़मीन मज़बूत रही है.
कांग्रेस के लिए कितने फ़ायदेमंद साबित होंगे?
बिहार में पप्पू यादव का नाम हमेशा चर्चा में रहा है. कोविड-19 के दौरान लोगों की मदद करते हुए पप्पू यादव की तस्वीरें सोशल मीडिया अक्सर देखी जाती थीं.
उनके समर्थकों का दावा रहा है कि इस इलाक़े में जो काम सरकार को करना चाहिए वह पप्पू यादव ने किया.
कोविड महामारी के दौरान ही बिहार के छपरा में ड्राइवर मौजूद नहीं होने की वजह से कई एंबुलेंस सेवा में नहीं थे. ख़बरों के मुताबिक़ ये एंबुलेंस बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूडी के सांसद फंड से ख़रीदे गए थे.
उस समय पप्पू यादव ने 40 ड्राइवर उपलब्ध कराने का दावा किया था और एंबुलेंस को फ़ौरन लोगों की सेवा में लगाने की मांग की थी.
मई 2021 में कोविड लॉकडाउन के नियमों को तोड़ने के आरोप में पप्पू यादव गिरफ़्तार भी किया गया था.
इसका उनके समर्थकों ने जमकर विरोध किया था.
क़रीब चार साल पहले राजधानी पटना में आई बाढ़ के दौरान भी पप्पू यादव को लोगों की मदद करते हुए देखा गया था.
उस समय बिहार के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत शेयर की गई थी. उस वक्त पटना के कई इलाक़े पानी में डूब जाने से सुशील मोद अपने परिवार के साथ एक फ़्लाइओवर पर फंसे हुए थे.
लेकिन इसी दौरान पप्पू यादव की तस्वीरें बता रही थीं कि वो लोगों के बीच जा रहे हैं और उनसे संपर्क साधने में लगे हुए हैं.
पप्पू यादव फिलहाल न तो विधायक हैं और न ही सांसद. लेकिन उनके घर के बाहर अब भी समर्थकों और मदद मांगने वालों की भीड़ जुटी रहती है.
सांसद रहते हुए दिल्ली में उनके आवास पर भी बड़ी संख्या में बिहार के लोगों का डेरा होता था. पढ़ाई-लिखाई से लेकर इलाज कराने तक के लिए दिल्ली पहुंचने वाले कई लोग पप्पू यादव के आवास पर दिख जाते थे.
पूर्णिया के स्थानीय पत्रकार अभय कहते हैं, "पप्पू यादव की छवि ग़रीबों का मसीहा और बाहुबली नेता वाली है. वो ग़रीबों की मदद करते हैं. बाहुबली छवि की वजह से उनके रहते पूर्णिया में डॉक्टर किसी मरीज़ को एडमिट कर मनमाने पैसे नहीं वसूल सकता."
अभय के मुताबिक़ पप्पू यादव बीच में मधेपुरा चले गए थे. इससे पूर्णिया के लोग उनसे थोड़ा नाराज़ भी हो गए थे, लेकिन उन्होंने अब ‘प्रणाम पूर्णिया’ अभियान चलाकर लोगों से दोबारा संपर्क बनाने की कोशिश की है.
अभय का मानना है कि पप्पू यादव को पूर्णिया के यादवों के अलावा ग़रीबों- पिछड़ों, युवा, मुस्लिम और दलितों का भी समर्थन हासिल है. चुनावी राजनीति में यह उनके लिए मददगार है.
कांग्रेस ने उनपर दांव खेलकर पूर्णिया के अलावा कोसी-सीमांचल के इलाक़े में अपनी ताक़त बढ़ाने की कोशिश की है.
लालू और पप्पू यादव: कभी दूर-कभी पास
1990 में ही लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. उस दौर में बिहार में पिछड़ों के लिए भी राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हुआ था.
इसी साल तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल कमिशन की सिफ़ारिशों को लागू करने का एलान किया था.
पप्पू यादव को सबसे ज़्यादा सुर्खियाँ उस वक़्त मिली थीं, जब एक अन्य बाहुबली नेता माने जाने वाले आनंद मोहन से उनकी सियासी अदावत चल रही थी.
दरअसल ये दोनों ही नेता सीमांचल यानी कोसी और इसके आसपास के इलाक़े में अपने पैर जमाने की कोशिश में जुटे थे.
आनंद मोहन और पप्पू यादव दोनों ही 1990 में विधायक बने थे.
आनंद मोहन सहरसा ज़िले की महिषी सीट से जनता दल के टिकट पर चुनाव जीते थे. वहीं पप्पू यादव को जनता दल ने टिकट नहीं दिया तो वो मधेपुरा के सिंहेश्वर से निर्दलीय ही चुनाव लड़े और जीत गए.
सुरूर अहमद याद करते हैं, "लालू सामान्य पृष्ठभूमि से आए नेता थे, जबकि पप्पू यादव रसूख वाले थे. इसलिए निर्दलीय भी चुनाव लड़कर जीत सकते थे. लालू उस दौर में बहुत ताक़तवर नहीं हुए थे. वो राजनीतिक हालात की वजह से मुख्यमंत्री बनाए गए थे. लालू शुरू में पप्पू यादव और आनंद मोहन को बहुत महत्व नहीं देते थे."
राजनीति के इस नए दौर में राजपूत नेता आनंद मोहन लालू से दूर होते चले गए जबकि पप्पू यादव लालू के क़रीब आ गए.
पप्पू यादव पिछड़ों और यादवों को लेकर आगे बढ़ रहे थे तो राजपूत नेता आनंद मोहन सवर्णों को साधने में जुट गए थे.
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी के मुताबिक़, "एक ज़माने में इन दोनों नेताओं के बीच गोलियां चलती थीं. ऐसा कई बार हुआ है. आनंद मोहन राजपूत बिरादरी के साथ अगड़ों की राजनीति करते थे और पप्पू यादव पिछड़ों की राजनीति करते थे."
अजीत सरकार की हत्या
1991 में बिहार की मधेपुरा लोकसभा सीट पर उप-चुनाव के दौरान इन दोनों नेताओं की दुश्मनी खुलकर सामने आई थी.
इस सीट पर उस समय जनता दल के वरिष्ठ नेता शरद यादव चुनाव लड़ रहे थे. इसमें आनंद मोहन, शरद यादव के ख़िलाफ़ थे जबकि पप्पू यादव उनके समर्थन में थे.
पप्पू यादव ने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान उनके विरोधियों ने उन पर आठ घंटे तक गोलियां चलाई थीं, लेकिन जिला कलेक्टर और पुलिस सुपरिन्टेंडेट ने मौक़े पर पहुंचकर उनकी जान बचाई थी.
इसके बाद नवंबर 1991 में एक चुनावी सभा से लौटते हुए आनंद मोहन पर हमला हुआ था. कहा जाता है कि इस दौरान दोनों तरफ से जमकर गोलियां चली थीं. इसमें आनंद मोहन के कुछ समर्थक घायल हुए थे. उन्होंने इसका आरोप पप्पू यादव पर लगाया.
पप्पू यादव का नाम इसके अलावा भी और कई मामलों में सामने आया था. लेकिन उन पर सबसे गंभीर आरोप लगा था मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के विधायक रहे अजीत सरकार की हत्या का.
अजीत सरकार की हत्या पूर्णिया में जून 1998 में कर दी गई थी. इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी और पटना की एक विशेष अदालत ने फ़रवरी 2008 में इस मामले में पप्पू यादव और दो अन्य लोगों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.
क़रीब आठ साल जेल में रहने के बाद पटना हाई कोर्ट ने फ़रवरी 2009 में पप्पू यादव को ज़मानत दी थी.
पप्पू यादव अब कांग्रेस के साथ आकर अपनी नई सियासी पारी शुरू कर रहे हैं. भले ही कोसी के इलाक़े में उनकी अपनी मज़बूत सियासी पकड़ है, लेकिन एनडीए में नीतीश कुमार की वापसी के बाद पप्पू यादव के लिए भी लड़ाई अब आसान नहीं रही है.
पप्पू यादव केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अक्सर हमला करते रहे हैं, ज़ाहिर 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनके तेवर बरक़रार रहेंगे, लेकिन जनता का कितना समर्थन उनके लिए अभी भी बरक़रार है यह देखना दिलचस्प होगा.
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