You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बिहार: एनडीए में सीटों का बंटवारा, ‘बड़े भाई’ की भूमिका में बीजेपी, क्या हैं संकेत
- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार में लोकसभा चुनाव के लिए एनडीए के घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे का एलान हो गया है.
सीट शेयरिंग के फॉर्मूले के तहत बीजेपी 17 सीटों पर और जेडीयू 16 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. वहीं चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (आर) को पाँच सीटें मिली हैं और जीतन राम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा पार्टी को एक-एक सीटें मिली हैं.
ये पहली बार है जब भारतीय जनता पार्टी सीटों के मामले में नीतीश कुमार की जेडीयू से आगे निकली है.
इससे पहले लोकसभा हो या विधानसभा, बीजेपी और जेडीयू के बीच या तो 50-50 का फ़ॉर्मूला रहा या फिर जेडीयू अधिक सीटों पर चुनाव लड़ती आई है.
कौन सी सीटें किसके खाते में?
सीटों के बंटवारे में राज्य की पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण,औरंगाबाद, मधुबनी, अररिया, दरभंगा, मुज़फ्फरपुर, महाराजगंज, सारण, उजियारपुर, बेगूसराय, नवादा, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बक्सर और सासाराम सीटों पर बीजेपी लड़ेगी.
वहीं, वाल्मिकी नगर, सीतामढ़ी, झंझारपुर, सुपौल, किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, मधेपुरा, गोपालगंज, सीवान, भागलपुर, बांका, मुंगेर, नालंदा, जहानाबाद, शिवहर सीटें जेडीयू के खाते में गई हैं.
लोक जनशक्ति पार्टी (आर) को वैशाली, हाजीपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, जमुई सीट मिली है.
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को गया सीट दी गई है. वहीं उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी काराकाट सीट से चुनाव लड़ेगी.
बीजेपी को जो एक अतिरिक्त सीट मिली है वह नवादा है. पिछले चुनाव में इस सीट पर एलजेपी लड़ी थी और अब ये बीजेपी के पास है.
वहीं एनडीए में जिन सीटों में बदलाव हुए हैं उनमें शिवहर है. ये सीट बीजेपी से जेडीयू के पास गई है. गया सीट जेडीयू से जीतन राम मांझी की हम के पास गई है. काराकाट सीट भी जेडीयू से उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के खाते में गई है.
'बड़े भाई की भूमिका में आई बीजेपी'
सीट शेयरिंग में बीजेपी से पीछे रहने को लेकर जब जेडीयू के नेता और बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, "हम लोगों को 16 सीटों की ही उम्मीद थी. हमको लगता है कि ये माननीय नेताओं की सहमति से ही हुआ होगा."
वरिष्ठ पत्रकार और बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाले कन्हैया भेलारी एनडीए के सीट शेयरिंग फॉर्मूला को राज्य में बीजेपी के बढ़ते कद का संकेत मानते हैं.
बीजेपी से कन्हैया भेलारी कहते हैं, "बीजेपी अब बड़ा भाई बन गई है. राजनीतिक तौर पर वह मज़बूत हुई है और नीतीश कमज़ोर हो गए हैं."
हालांकि, कन्हैया भेलारी यहां पर ये भी रेखांकित करते हैं कि नीतीश कुमार झारखंड में एक लोकसभा सीट अपने दोस्त के लिए मांग रहे हैं. अगर उसपर बात बनती है तो फिर दोनों पार्टियां बराबरी पर आ जाएंगी.
वह कहते हैं, "चर्चा ये चल रही है कि नीतीश कुमार झारखंड की धनबाद लोकसभा सीट अपने मित्र सरयू राय के लिए मांग रहे हैं. सरयू राय वही हैं जिन्होंने रघुवर दास को पूर्वी जमशेदपुर विधानसभा सीट पर हराया था. अगर ये सीट उन्हें मिल जाती है तो फिर दोनों बराबर के भाई हो जाएंगे. झारखंड में 14 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से दो पर अभी एनडीए के उम्मीदवारों के नाम का एलान बाकी है. एक धनबाद और दूसरा चतरा है."
कन्हैया कहते हैं , "बीजेपी बिहार में तो बड़ा भाई बन ही गई है. मान लीजिए, अगर झारखंड में एक सीट देकर भरपाई कर भी ली जाए तो भी बिहार में पहली बार बीजेपी सीटों के बंटवारे में बड़ा भाई बन गई है. जीतने वाले विधायकों की संख्या के मामले में तो वह 2020 में ही इस भूमिका में आ गई थी."
ऐसी ही बात बिहार के वरिष्ठ पत्रकार नवेन्दु भी करते हैं. वे कहते हैं, “यह पहली बार है जब बिहार में बीजेपी, जेडीयू से ज्यादा सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने जा रही है. इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ है.”
वे कहते हैं, “सीटों का बंटवारा यह बताता है कि अब एनडीए गठबंधन में नीतीश कुमार की वह भूमिका नहीं रह गई है, जो 2019 के समय पर थी.”
पिछले चुनावों में क्या थे समीकरण?
साल 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव बीजेपी और जेडीयू ने एक साथ लड़ा था.
इस चुनाव में विधानसभा की 243 सीटों में से बीजेपी 121 पर और जेडीयू 122 पर लड़ी थी. उस समय चिराग पासवान गठबंधन का हिस्सा नहीं थे.
वहीं जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) को 7 सीटें मिली थीं.
लेकिन जेडीयू केवल 43 सीटों पर जीत पाई थी. लेकिन 2015 में 53 सीटें जीतने वाली बीजेपी को 2020 में 74 सीटें मिली थीं.
अगर पिछले लोकसभा चुनाव को देखें तो 2019 में बीजेपी और जेडीयू बिहार की 17-17 सीटों पर लड़ी थी और बाकी की छह सीटें लोक जनशक्ति पार्टी को मिली थीं.
साल 2015 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो जेडीयू महागठबंधन का हिस्सा थी. उस समय जेडीयू और आरजेडी ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा और बाकी बची 41 सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं. इस चुनाव में जेडीयू ने 71 सीटें जीती थीं.
उस समय एनडीए में बीजेपी, एलजेपी, आरएलएसपी (अब आरएलएम) और हम थे. बीजेपी ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और एलजेपी को 42 सीटें मिली थीं. वहीं आरएलएसपी और हम ने क्रमशः 23 और 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था.
साल 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू 141 और बीजेपी 102 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. वहीं, साल 2005 में जेडीयू ने 139 सीटों पर और बीजेपी ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था.
नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने का असर?
नीतीश कुमार ने पिछला विधानसभा चुनाव एनडीए में रहकर लड़ा था लेकिन दो साल बाद यानी 2022 में उन्होंने अपनी राहें अलग कर लीं और महागठबंधन (कांग्रेस, आरजेडी, जेडीयू और वाम दलों से मिलकर बने गठबंधन) में आए गए.
हालांकि, वह इस अलायंस के साथ दो साल का समय भी पूरा नहीं कर सके और इसी साल जनवरी में नीतीश कुमार ने एक बार फिर से पाला बदल लिया.
नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर एनडीए के साथ सरकार बनाई. हालांकि, हर बार मुख्यमंत्री वही रहे.
नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने को भी जानकार बिहार में बीजेपी के आगे निकलने की एक वजह बताते हैं.
इसी का ज़िक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "ये बात सही है कि नीतीश कमज़ोर हुए हैं लेकिन इसके बावजूद इतने दिनों से सीएम हैं."
"उनके कमज़ोर होने की वजह बढ़ती उम्र है लेकिन वो फ़्लिप-फ़्लॉप करते रहते हैं. इसकी वजह से नीतीश की ईमानदारी पर अब शक होने लगा है. बीजेपी के वोटरों का भी और नेताओं का भी. बीजेपी को ये भी लग रहा है कि कल को वह (नीतीश) अपने सांसदों के साथ फिर न पाला बदल लें."
एलजेपी की टूट और अब चिराग पर भरोसा
जून 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद पशुपति कुमार पारस ने अपने भतीजे चिराग़ पासवान के ख़िलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था.
इस राजनीतिक तख्तापलट में चिराग़ पासवान के चचेरे भाई और समस्तीपुर के सांसद प्रिंस राज, खगड़िया से सांसद महबूब अली कैसर, वैशाली से सांसद वीणा देवी, और नवादा से सांसद चंदन सिंह ने पशुपति कुमार पारस का समर्थन किया था. इसके बाद सांसदों ने औपचारिक रूप से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को पत्र लिखकर लोकसभा में दल का नेता पशुपति कुमार पारस को बनाए जाने की अपील की थी, जिसके बाद बिना किसी देरी के उन्होंने इस पर मुहर लगा दी थी.
इसके बाद दोनों धड़ों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न मिले. चिराग़ पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के बेटे हैं और पशुपति कुमार पारस रामविलास के छोटे भाई हैं.
2019 लोकसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी, एनडीए की सहयोगी थी और उसके हिस्से छह सीटें आई थीं. एलजेपी ने तब सभी छह सीटों पर जीत दर्ज की थी.
हालांकि, सीटों के बंटवारे में चिराग पासवान आगे निकल गए.
पशुपति पारस हाजीपुर सीट से दावा ठोक रहे थे. ये सीट चिराग पासवान को मिली है. वहीं पशुपति पारस के धड़े के हिस्से एक भी सीट नहीं है.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "जब जनवरी में सरकार बनी तब ये नहीं लग रहा था कि चिराग पासवान को पाँच सीटें मिलेंगी. तब पशुपति पारस को सीटें मिलने की संभावना ज़्यादा थी. बीजेपी ने नीतीश के साथ ही चिराग पासवान की अहमियत को भी समझा है. जब पारस को तोड़ना था तब उन्हें केंद्रीय मंत्री बना दिया. लेकिन ये सच है कि वो युवा नहीं हैं. वो चल फिर नहीं सकते. चिराग की तरह संवाद में कुशल नहीं है. ये कहा जा सकता है कि पासवानों की राजनीति का भविष्य चिराग के हाथों में है, बीजेपी को ये समझ आ गया."
वह कहते हैं कि बीजेपी को ये भी लग रहा था कि अगर चिराग पासवान नाराज़ होकर महागठबंधन में चले जाएंगे तो इससे कहीं गठबंधन को फ़ायदा न हो, क्योंकि उनके पास पाँच फ़ीसदी से अधिक वोट शेयर तो है ही. मगर पशुपति पारस अगर विपक्ष के साथ जाते हैं, तो इससे वोटों पर ख़ास असर नहीं होगा.
चिराग पासवान को पांच सीटें मिलने पर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार नवेन्दु इसे चिराग पासवान की जीत की तरह भी देखते हैं.
वे कहते हैं, “अब तक चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस ही फ्रंट फुट पर बीजेपी के साथ दिखाई दे रहे थे, लेकिन अब पासा पलट गया है. शायद बीजेपी को ये अहसास हो गया है कि वह पशुपति पारस के मुकाबले चिराग पासवान के दम पर दलित वोटबैंक को अच्छे से कैटर कर सकती है.”
नवेन्दु कहते हैं, “अगर रामविलास पासवान की विरासत की बात की जाए, तो जो पासवान समाज में पारंपरिक वोटर है, वह चिराग पासवान की बजाय पशुपति पारस को अपना नेता मानता है, लेकिन उस समाज का जो युवा वर्ग है वह चिराग के साथ है और इस चुनाव में करीब 18 करोड़ युवा वोटर पहली बार वोट करेंगे, तो कहीं न कहीं चिराग के साथ बीजेपी को ज्यादा फायदा होगा.”
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)