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बेगूसराय में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को बीजेपी कार्यकर्ताओं ने काले झंडे क्यों दिखाए?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बेगूसराय से
बिहार के बेगूसराय से बीजेपी सांसद गिरिराज सिंह को राज्य में भूमिहार बिरादरी का बड़ा नेता माना जाता है.
उन्हें बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का पसंदीदा चेहरा भी समझा जाता है. वो केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं.
गिरिराज सिंह अक्सर अपने बयानों की वजह से सुर्खियों में रहते हैं. उन्हें बीजेपी में कट्टर हिन्दुत्व वाले चेहरे के तौर पर भी देखा जाता है. फिर इस कद के नेता को बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने ही बेगूसराय में काले झंडे दिखा दिए.
यह घटना बीते रविवार की है जब गिरिराज सिंह एक कार्यक्रम में भाग लेने बेगूसराय गए हुए थे. बेगूसराय में रानी गाँव के पास गिरिराज सिंह की गाड़ी के सामने आकर लोगों ने उन्हें काले झंडे दिखाए थे.
यही नहीं, गिरिराज का विरोध करने वाले लोग काफ़ी आक्रोश में नज़र आ रहे थे. वो "गिरिराज सिंह वापस जाओ और मोदी तुझसे बैर नहीं, गिरिराज तेरी खैर नहीं" नारा भी लगा रहे थे.
ख़ास बात यह भी है कि गिरिराज सिंह का विरोध करने वालों के हाथों में काले झंडे के साथ बीजेपी का भी झंडा था और वो ख़ुद को बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ता और समर्थक बता रहे थे.
क्या है नाराज़गी की वजह?
सवाल यह भी है कि गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ बीजेपी के कार्यकर्ता ही प्रदर्शन क्यों कर रहे थे? क्या यह प्रदर्शन पार्टी के अंदर किसी अन्य गुट से जुड़ा हुआ मामला है या लोग हक़ीकत में गिरिराज सिंह को लेकर नाराज़ हैं?
गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वालों में बीजेपी से जुड़े विनोद राय नाम के एक स्थानीय व्यक्ति का ज़िक्र सामने आया था. उनसे बात करने और घटना की सच्चाई जानने के लिए हम उस इलाक़े में पहुँचे जहाँ गिरिराज सिंह के काफ़िले के सामने लोगों ने प्रदर्शन किया था.
जब हम विनोद राय के पास पहुँचे तो वो अपने सहयोगियों के साथ मौजूद थे. उनका स्पष्ट तौर पर कहना था कि उन्होंने केंद्रीय मंत्री के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था.
गिरिराज सिंह का विरोध करने वालों की नाराज़गी उनसे ज़्यादा उनके क़रीबी लोगों को लेकर भी दिख रही थी.
विनोद राय आरोप लगाते हैं, “हम लोग बीजेपी के ही हैं और काला झंडा दिखाने के पहले मन में कितनी ग्लानि हुई होगी, यह बता नहीं सकते. अपने घर में अपनों का ही विरोध करना अच्छा नहीं लगता. सब लोग उनको कहते हुए थक गए, लेकिन जनता की बात उन तक नहीं पहुँची.”
विनोद राय का आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी की वजह से केंद्र सरकार की योजनाओं पर काम हो रहा है लेकिन पाँच साल के कार्यकाल में गिरिराज सिंह किसी गाँव में नहीं रुके. वह कहते हैं कि उन्होंने गाँव में एक हैंडपंप तो छोड़ दीजिए, गाय बाँधने का एक खूंटा तक नहीं लगवाया है.
हालाँकि, बीबीसी ऐसे किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं करता है. जिस दिन यानी गुरुवार को हम बेगूसराय पहुँचे थे, उस दिन गिरिराज सिंह भी बेगूसराय में ही मौजूद थे. इस मामले पर हमने उनका पक्ष जानने की कोशिश भी लेकिन उनसे हमारी बात नहीं हो पाई.
क्या कहना है विरोध करने वालों का?
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि गिरिराज सिंह को लोकसभा टिकट मिलने पर बीजेपी बिहार में कम से कम एक सीट हारेगी और वह बेगूसराय की सीट होगी. उनका कहना था कि 'गिरिराज सिंह काम नहीं कराते हैं, केवल बयान देकर विवाद बढ़ाते हैं.'
विनोद राय के पास एक क़ानूनी नोटिस भी पहुँचा है, जिसमें रविवार के प्रदर्शन को लेकर 16 लोगों के नाम का ज़िक्र था.
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि क़रीब 800 लोग गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.
हालाँकि रविवार की घटना पर गिरिराज सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि "राजनीति में यह होता रहता है".
स्थानीय स्तर पर चुनावों के समय किसी नेता, उम्मीदवार या पार्टी का समर्थन और विरोध आम बात होती है. इसलिए हम इस घटना के बारे में जानने के लिए बीजेपी के ही एक स्थानीय नेता और बेगूसराय बीजेपी के पूर्व प्रवक्ता नीरज शाण्डिल्य के पास पहुँचे.
नीरज ने कहा, “गिरिराज जी बड़े क़द के नेता हैं, लोगों को उम्मीद थी कि मंत्री बनने के बाद इलाक़े में बहुत काम होगा, इसलिए उनको बड़े अंतर से जिताया था. लेकिन लगता है कि कुछ लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं. वैसे भी एक आदमी हर किसी को खुश नहीं कर सकता.”
विरोध कितना बड़ा
बेगूसराय के तेघरा विधानसभा क्षेत्र के बरौनी फ़्लैग गाँव में होमियोपैथी के डॉक्टर सूर्य शेखर कुमार कहते हैं, “इस इलाक़े में लोग गिरिराज सिंह से नाराज़ हैं. यहाँ उनका कोई काम नज़र नहीं आता है. हमने अपने रेलवे स्टेशन का नाम 'बरौनी फ्लैग' से बदलकर 'बरौनी गाँव' करने की मांग की थी, वह भी नहीं हुआ."
दरअसल बरौनी फ्लैग नाम अंग्रेज़ों के ज़माने का है, जब ट्रेनों को रोकने के लिए फ्लैग यानी झंडे दिखाए जाते थे.
फिर भी लोगों के आरोपों से अलग हमने बेगूसराय में कई जगहों पर बड़े निर्माण कार्य भी होते हुए देखे. इनमें सबसे बड़ा निर्माण गंगा नदी पर सिमरिया में बन रहा नया रेलवे पुल नज़र आया. इसी के समानांतर एक सड़क पुल का निर्माण भी हो रहा है.
इसके अलावा शहर के बीचोंबीच ट्रैफ़िक जाम से छुटकारा पाने के लिए फ़्लाई ओवर का निर्माण और बाईपास रोड पर बेहट में रेलवे फाटक के ऊपर आरओबी (रेलवे ट्रैक के ऊपर से बना पुल) भी बनाया जा रहा है.
बेगूसराय के ही जुगनू देव बताते हैं, “गिरिराज सिंह को लेकर मैं कुछ नहीं बोल सकता, लेकिन यहाँ बीजेपी का माहौल है. यहाँ बीजेपी ने काम किया है. गिरिराज सिंह ने भी काम किया है. उनका संसदीय क्षेत्र है तो करना ही है. जनता को काम से मतलब है.”
बीजेपीमय माहौल बेगूसराय के शहरी इलाकों में भी स्पष्ट तौर पर नज़र आता है. शहरी इलाक़ों में ऐसे बहुत से लोगों से भी हमारी मुलाक़ात हुई जो बीजेपी के कट्टर समर्थक हैं. लोगों का मानना है कि अभी इलाक़े में बीजेपी का कोई विरोध नहीं है.
लोगों को सता रहा है कौन सा डर?
पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने बेगूसराय सीट पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. ऐसे में कुछ लोगों का विरोध बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है?
वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय कहते हैं, “बेगूसराय की अर्थव्यवस्था में इलाक़े की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बड़ी भूमिका है, जिसमें सबसे प्रमुख बरौनी रिफ़ाइनरी है. स्थानीय लोगों को लगता है कि मौजूदा सरकार के दौर में देश में पीएसयू की स्थिति ख़राब हुई है और इससे भी इलाक़े के लोगों के मन में आशंका पैदा हुई है.”
उनके मुताबिक़ पिछले लोकसभा चुनावों में आरजेडी के लालू प्रसाद यादव चाहते थे कि भले ही गिरिराज सिंह चुनाव जीत जाएं लेकिन कन्हैया कुमार न जीते. उस वक़्त मोदी की लहर भी थी. उनका ये भी ममानना है कि यहां फ़िलहाल न तो राम मंदिर और न ही सीएए बहुत बड़ा मुद्दा बन पाया है.
क्या कहते हैं आँकड़े
साल 2019 के चुनावी आँकड़ों के मुताबिक़ बेगूसराय में क़रीब 20 लाख मतदाता हैं. उस चुनाव में बेगूसराय में क़रीब 62 फ़ीसदी वोटिंग हुई थी.
उस साल बीजेपी के गिरिराज सिंह को क़रीब 56 फ़ीसदी, सीपीआई के कन्हैया कुमार को 22 फ़ीसदी और आरजेडी के मोहम्मद तनवीर हसन को 16 फ़ीसदी वोट मिले थे.
बेगूसराय में सबसे बड़ी संख्या भूमिहार मतदाताओं की है. माना जाता है कि यहाँ 5 लाख़ से ज़्यादा भूमिहार मतदाता हैं, जबकि क़रीब ढाई लाख मुस्लिम, दो लाख कुर्मी-कुशवाहा और डेढ़ लाख यादव वोटर हैं.
पिछले लोकसभा चुनावों के बाद बिहार में साल 2020 में हुए विधानसभा चुनावों में बेगूसराय का समीकरण काफ़ी बदला हुआ नज़र आया था.
यानी क़रीब डेढ़ साल में ही इलाक़े में बीजेपी कमज़ोर दिखने लगी थी. हालाँकि दोनों ही चुनावों के मुद्दे और चेहरे अलग-अलग थे.
साल 2019 के लोकसभा चुनावों में गिरिराज सिंह 4 लाख से ज़्यादा वोटों से चुनाव जीते थे.
इससे पहले साल 2014 के लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी के ही भोला सिंह बेगूसराय से जीते थे. हालाँकि उनकी जीत का अंतर क़रीब 58 हज़ार वोटों का था. इससे पहले यह सीट जेडीयू के कब्ज़े में थी.
साल 2020 में विधानसभा चुनावों में बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र की 7 विधानसभा सीटों में तेघरा और बखरी सीट पर कम्यूनिस्ट पार्टी की जीत हुई थी.
बीजेपी यहाँ महज़ दो सीटों पर ही जीत पाई थी, जिनमें बछवाड़ा विधानसभा सीट को वह सीपीआई से 500 वोटों से भी कम अंतर से जीत पाई थी. जबकि दो सीटें आरजेडी और एक एलजेपी के खाते में गई थी.
लाल से भगवा तक का सफ़र
साल 2019 के लोकसभा चुनावों में बेगूसराय सीट से सीपीआई ने कन्हैया कुमार को टिकट दिया था. कन्हैया कुमार पहले दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानी जेएयू की छात्र राजनीति में थे.
कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव नहीं चाहते थे कि कन्हैया कुमार यहाँ से चुनाव जीतें और तेजस्वी यादव के सामने बिहार में कोई युवा चेहरा चुनौती बन जाए.
इसलिए उन चुनावों में आरजेडी ने कन्हैया का समर्थन नहीं किया और मोहम्मद तनवीर को चुनाव मैदान में उतारा था.
बेगूसराय को किसी ज़माने में बिहार में वामपंथियों का बड़ा गढ़ माना जाता था. लेकिन आज शहर में कई सड़कों और चौराहों से लेकर खंभों और छतों पर बीजेपी के पोस्टर-बैनर और झंडे नज़र आते हैं.
इसके पीछे बीजेपी के पास मौजूद संसाधनों की भी भूमिका दिखती है और बिहार की बदली हुई राजनीति की भी.
संजीव पांडे मानते हैं, “बेगूसराय वर्ग संघर्ष यानी वामपंथ की धरती रही है. बेगूसराय में भूमिहार, दलित और मुसलमान सभी वर्ग संघर्ष की बात करते थे. लालू ने ही तीस साल पहले बिहार में जातीय अत्याचार को मुद्दा बनाया था. लालू की राजनीति ने बेगूसराय को जातियों में तोड़ दिया और कम्यूनिस्ट आंदोलन कमज़ोर पड़ गया.”
हालाँकि वामपंथी आंदोलन के दौर में बेगूसराय को ‘पूरब के लेनिनग्राद’ (रूस का शहर) के तौर पर मिली पहचान अब भी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है. पिछले विधानसभा चुनाव परिणामों के अलावा भी इलाक़े में वामपंथी दलों की निशानी और मौजूदगी नज़र आती है.
यही नहीं, साल 2019 के लोकसभा चुनावों को भले मोदी लहर का चुनाव कहा जाता है, मगर उस दौर में भी कम्यूनिस्ट पार्टी को यहाँ ढाई लाख से ज़्यादा वोट मिले थे.
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