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बीजेपी में जिन दिग्गजों को लेकर उठ रहे थे सवाल, उन्हें टिकट मिलने के क्या हैं मायने
- Author, स्नेहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में जब राजनाथ सिंह गृह मंत्री के बदले रक्षा मंत्री बने तो उनके सियासी भविष्य को लेकर अटकलें तेज़ हो गई थीं.
इसी तरह नितिन गडकरी को बीजेपी के संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति से बाहर किया गया तो उनके सियासी भविष्य को लेकर भी कई तरह की बातें होने लगी थीं.
शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे हैं और चुनाव जीतने के बाद भी उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो कई तरह के सवाल उठने लगे थे.
लेकिन बीजेपी ने इन तीनों को 2024 के आम चुनाव में टिकट दिया है. इन तीनों दिग्गजों को बीजेपी ने भले लोकसभा के चुनावी मैदान में उतारा है लेकिन आने वाले दिनों में सरकार और पार्टी में इनकी हैसियत क्या होगी यह अहम सवाल है.
बीजेपी पिछले 10 सालों में पूरी तरह से बदल गई है. नेतृत्व नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हाथों में है. इस लिहाज से संगठन और सरकार में इन्हीं की टीम का दबदबा है.
राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान अटल-आडवाणी के नेतृत्व वाली बीजेपी से हैं. राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी ख़ुद भी बीजेपी के अध्यक्ष रहे हैं. अटल-आडवाणी की बीजेपी वाले अहम लोग या तो रिटायर हो चुके हैं या निर्णायक भूमिका में नहीं हैं.
शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश के विदिशा से, नितिन गडकरी को नागपुर से और राजनाथ सिंह को लखनऊ से टिकट दिया गया है.
बीजेपी ने अब तक उम्मीदवारों की दो सूची जारी की हैं.
पहली सूची में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का नाम नहीं आने के बाद ये कहा जाने लगा था कि उनका टिकट कट सकता है, लेकिन बीजेपी ने उन्हें नागपुर से एक बार फिर मैदान में उतारा है.
शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश का सीएम नहीं बनाने के बाद से ही उन्हें केंद्र की राजनीति में भेजे जाने की बातें होने लगी थी.
2019 में सरकार के बनने कुछ समय बाद ही जून में राजनाथ सिंह को कई कमेटियों से बाहर कर दिया गया लेकिन 24 घंटे के अंदर ही ये फैसला बदल गया. इसके बारे में जानकारों का कहना था कि चौबीस घंटे के अंदर फ़ैसला बदल जाना बड़ी बात थी.
'बीजेपी उथलपुथल के मूड में नहीं है'
लंबे समय तक बीजेपी का चेहरा रहे लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी का टिकट 2019 में काट दिया गया था.
2014 में पीएम मोदी ने मुरली मनोहर जोशी की सीट वाराणसी से चुनाव लड़ा था. उन्हें कानपुर की सीट दी गई. लेकिन 2019 में उनके हाथ से कानपुर की सीट भी चली गई.
2019 में लालकृष्ण आडवाणी की जगह गांधीनगर से अमित शाह को टिकट दिया गया. बीजेपी के भीतर ये बड़ा बदलाव था.
नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह के बारे में भी ऐसी बातें कही जा रही थीं कि टिकट कट सकता है लेकिन बीजेपी ने सूची जारी कर बताया है कि वो अब भी इन नेताओं पर दांव खेल रही है.
बीजेपी के इस कदम पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, "बीजेपी चुनाव के बीच कुछ भी उथलपुथल के मूड में नहीं है. उनकी ये कोशिश है कि किस तरह से वो अपनी जीत पक्की कर सकते हैं. नितिन गडकरी के बारे में काफ़ी अटकलें थीं कि उन्हें सीट दी जाएगी या नहीं. लेकिन यही है कि बीजेपी किसी भी सीट पर कोई चांस नहीं लेना चाहती. बीजेपी में अभी एक ही तरीक़ा है, वो है चुनाव जीतना"
उन्होंने कहा, "शिवराज सिंह चौहान को ही मध्य प्रदेश में सीएम पद से अलग तो कर दिया लेकिन वहां की महिलाएं ये कह रहीं थीं कि उन्होंने वोट तो शिवराज सिंह चौहान के नाम पर दिया था. बीजेपी ने सोच समझकर उन्हें मुख्यमंत्री तो नहीं बनाया लेकिन नेतृत्व उन्हें एकदम नाराज़ नहीं करना चाहता था क्योंकि इसका असर होता. उसी तरह गडकरी को भी एडजस्ट किया और राजनाथ सिंह को भी एडजस्ट किया."
वो कहती हैं कि टिकट मिलना इस बात का संकेत हो सकता है कि पार्टी में सब कुछ ठीक है.
'वफ़ादारी या मनमुटाव चुनाव में फ़ैक्टर ही नहीं'
बीजेपी के कई नेता लोकसभा चुनाव से पहले 'अबकी बार 400 पार' का नारा लगाते हुए दिखे हैं. गृह मंत्री अमित शाह भी रैलियों में इसका ज़िक्र करते हैं.
पीएम मोदी ने फरवरी में 'विकसित भारत, विकसित मध्य प्रदेश' कार्यक्रम के दौरान कहा था कि 'अबकी बार 400 पार' का नारा सत्तारूढ़ बीजेपी ने नहीं बल्कि जनता ने दिया है.
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि बीजेपी अभी इस आंकड़े को ध्यान में रखकर चल रही है. बीजेपी टिकट देने के पीछे तय फॉर्मूला नहीं रख रही है.
उन्होंने कहा, "बीजेपी फॉर्मूला लागू नहीं कर रही है कि 75 साल से ज़्यादा नहीं, कम नहीं. सीएम नहीं, पुराने लोग बाहर, नए लोग अंदर. ऐसा नहीं हो रहा है. वो सेफ़ प्ले करना चाहते हैं ताकि अधिक से अधिक सीटें हासिल कर सकें. ये बहुत स्पष्ट तौर पर दिख रहा है."
"देखिए, चाहे पूरी तरह से लॉयल्टी का फ़ैक्टर हो या मनमुटाव हो, चाहे पीएम मोदी अपनी टीम को लाना चाहते हों आगे के लिए. इस बार वो मैटर नहीं किया है, क्राइटेरिया ही नहीं है. लेकिन ये बात भी स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी आगे के लिए अपनी टीम को लाना चाहेंगे. कैबिनेट बदलाव में ये चीजें दिखी हैं. जयशंकर, हरदीप सिंह पुरी, अश्विनी वैष्णव को जगहें मिली हैं "
हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी का कहना है कि राजनीति के बारे में लोग ये धारणा बनाकर चलते हैं कि मजबूत नेता साथ नहीं चल सकते हैं. अटल-आडवाणी की जोड़ी इसका अच्छा उदाहरण है कि वो साथ रहे.
'राजनीति में ताक़तवर भी साथ रह सकते हैं'
2013 में जब राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष थे तो उन्होंने ही नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा पीएम उम्मीदवार के रूप में की थी.
उन्होंने तब एक इंटरव्यू में कहा था, "ये ज़रूरी नहीं है कि पार्टी अध्यक्ष लोगों को अपनी तरफ़ खींचने वाला भी हो और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी हो. मुझे पार्टी ने एक कार्य सौंपा है. मुझे वो पूरा करना है. ये कार्य है 2014 के चुनाव में जीत दिलाना."
राजनाथ सिंह को भी गडकरी की तरह ही राजनीतिक विश्लेषक मोदी कैम्प से बाहर का मानते हैं.
इस पर लंबे समय से बीजेपी को कवर करने वाले विजय त्रिवेदी कहते हैं, "पीएम मोदी से राजनाथ सिंह के अच्छे संबंध रहे हैं. ये बात सही है कि अटल-आडवाणी वाली जो पीढ़ी थी, अब वो ख़त्म हो गई है. ये एक मात्र बचे हैं. लेकिन मोदी कैम्प से इन्हें बाहर माना जाता है, ये बात बार-बार ख़ारिज होती रही है. इस बार भी चुनाव जीतने पर उन्हें बड़ी ज़िम्मेदारी मिल सकती है."
मोदी और राजनाथ सिंह के बीच मनमुटाव के कयास पर वो कहते हैं कि पहले अटल-आडवाणी की जोड़ी के बारे में भी कयास लगता था कि इनके बीच मनमुटाव है, और ये जोड़ी नहीं चलेगी लेकिन वो जोड़ी खूब चली.
उन्होंने कहा, "लोग राजनीति में ये समझते हैं कि बराबर के ताकत वाले लोग साथ-साथ नहीं रहते हैं लेकिन बीजेपी उसे गलत साबित करती है. आप ये बात सोचिए कि पार्टी के चार अध्यक्ष नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और जे पी नड्डा, इन सबका पीएम के साथ तालमेल अच्छे हैं. ऐसा आम तौर पर नहीं होता.
उन्होंने कहा कि यहां एक बात है कि बीजेपी में अभी पीएम मोदी सबसे ताकतवर हैं. इसके पीछे की वजह है कि जनता उनके नाम पर वोट देती है.
महाराष्ट्र की पेंचीदा होती राजनीति
कई बार विपक्ष नितिन गडकरी को बीजेपी के एक ऐसे नेता के रूप में पेश करता रहा है, जिनका नरेंद्र मोदी और अमित शाह से संबंध अच्छे नहीं हैं. कांग्रेस के नेता गडकरी की छवि ऐसे पेश करते हैं मानों उनके साथ पार्टी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह नाइंसाफ़ी कर रहे हैं.
13 मार्च को बीजेपी ने 72 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की. महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं और बीजेपी ने 20 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा की है.
नागपुर से उम्मीदवार बनाए जाने के बाद नितिन गडकरी ने एक्स पर पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का शुक्रिया अदा किया.
महाराष्ट्र की राजनीति पर नज़र रखने वाले बीबीसी के पत्रकार आशीष दीक्षित कहते हैं कि नितिन गडकरी और पीएम मोदी के संबंध शुरू से ही थोड़े असहज रहे हैं. इसके पीछे कई कारण हैं. एक वजह यह है कि गडकरी राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं. फिर पूर्ती घोटाले में गडकरी का नाम आने लगा. गडकरी के बाद राजनाथ सिंह अध्यक्ष बने. एक तरह से गडकरी के अस्त होने के साथ पीएम मोदी का उदय हुआ.
वो कहते हैं कि गडकरी को भी राजनीतिक विश्लेषक मोदी कैम्प का नेता नहीं मानते हैं.
2014 में पहले कार्यकाल में पीएम मोदी ने बहुत सारे सीनियर लोगों को जगह दे दी थी. अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, उमा भारती...दूसरे टर्म में सिर्फ़ राजनाथ और गडकरी को रखा था. बाकी लोग कम होते चले गए. इसलिए इनकी भी टिकट कट जाने की अटकलें थीं.
वो कहते हैं कि जिस तरह से पीएम मोदी ने अपनी एक तरह की छवि बनाई है, गडकरी भी राजनेता हैं और उन्होंने भी वैसी कोशिशें की हैं. उनकी छवि कम समय में बड़े प्रोजेक्ट पूरा करने वाला और प्रभावी नेता के रूप में बताई जाती है...तो इस तरह की छवि वाले नेता को अगर उम्मीदवारी से ड्रॉप किया जाता तो उसका नुकसान भी हो सकता है.
पत्रकार आशीष दीक्षित कहते हैं कि पिछले कुछ समय में महाराष्ट्र की राजनीति बहुत जटिल हो गई है. यहां दो शिवसेना है, दो एनसीपी है. बाकी छोटी पार्टियां भी है. तो बीजेपी यहां कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है. महाराष्ट्र में इसलिए उन्होंने सीटों में बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं किया है. इस सूची में वर्तमान एमपी में से सिर्फ़ चार के ही टिकट काटे गए हैं.
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