कन्हैया कुमार कर रहे हैं गिरिराज सिंह की राह आसान या मुश्किल?

सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के नेता और जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने पटना में बीबीसी के 'बोले बिहार' कार्यक्रम (15 मार्च) में कहा था कि वो किसी भी सूरत में बीजेपी विरोधी वोट बँटने नहीं देंगे.

अब कन्हैया सीपीआई के टिकट पर बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे हैं और उन्हें राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाले महागठबंधन का साझा उम्मीदवार नहीं बनाया गया है. इससे पहले कहा जा रहा था कि कन्हैया बेगूसराय से महागठबंधन के साझा उम्मीदवार होंगे.

बेगूसराय से बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को उतारा है. इसके अलावा आरजेडी भी अपना उम्मीदवार उतार रही है. इन दोनों को चुनौती देने के लिए कन्हैया भी मैदान में हैं.

ज़ाहिर है आरजेडी एक राजनीतिक पार्टी के रूप में शुरू से ही बीजेपी विरोधी रही है और बीजेपी विरोधी वोट उसे मिलते रहे हैं.

दूसरी तरफ़ सीपीआई की पहचान एक राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा विरोधी ज़रूर है लेकिन आज उसकी पहचान बिहार में कुछ समूहों और कुछ ख़ास जगहों में ही बची है. लेकिन ये भी है कि कन्हैया की पहचान उनकी अपनी पार्टी सीपीआई से ज़्यादा लोकप्रिय है.

कन्हैया को बीजेपी विरोधी वोट उनकी पहचान पर मिलेगा न कि आरजेडी की तरह सीपीआई का कोई ठोस वोट बैंक है. ऐसे में कन्हैया को भी जो मत मिलेगा वो मोदी विरोधी ही होगा. तो कन्हैया क्या अपने ही दावे के ख़िलाफ़ नहीं जा रहे?

पटना में प्रभात ख़बर के स्थानीय संपादक अजय कुमार कहते हैं कि बेगूसराय में कन्हैया और आरजेडी के अलग उम्मीदवार होने के कारण बीजेपी विरोधी वोट ज़रूर बँटेगा और इसका सीधा फ़ायदा गिरिराज सिंह को मिलेगा.

अजय कुमार इस बात को मानते हैं कि मोदी के समर्थन वाले वोटों के बँटने की बहुत गुंजाइश नहीं है लेकिन मोदी विरोधी वोटों को एक साथ रखना बड़ी चुनौती है. बेगूसराय में साफ़ दिख रहा है कि मोदी विरोधी वोट एकजुट नहीं रहने जा रहे. वो कहते हैं कि बेगूसराय में अगर केवल महागठबंधन का उम्मीदवार होता, चाहे कन्हैया होते या कोई और तो मोदी विरोधी वोटों के बँटने की गुंजाइश ना के बराबर होती.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ''कन्हैया का ये कहना कि वो और उनकी पार्टी बीजेपी विरोधी वोट को बंटने नहीं देंगे, यह सिर्फ़ कहने की बात है. अगर इस बात पर वो संजीदा होते तो वो ख़ुद बेगूसराय से चुनाव नहीं लड़ते. पिछले साल बेगूसराय में भाजपा और राजद के बीच टक्कर हुई थी. बीजेपी के विजयी उम्मीदवार से आरजेडी महज 58 हज़ार वोट पीछे थी.''

मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ''वहीं सीपीआई को 1.92 हज़ार वोट मिले थे. अगर कन्हैया और उनकी पार्टी भाजपा विरोधी वोटों को बंटने नहीं देना चाहते हैं तो ये 1.92 लाख वोटों को महागठबंधन के प्रत्याशी को ट्रांसफर करवा सकते थे. देखिए राजनीति में सिद्धांतों पर बात करना और चलना दो अलग-अलग चीज़ें हैं. क्या कन्हैया भूमिहार समाज से नहीं आते तो भी बेगूसराय से लड़ते? या फिर उन्होंने कहीं और से लड़ने का फ़ैसला क्यों नहीं किया?''

इस सवाल को पटना में रविवार को कन्हैया से बीबीसी के लिए नीरज प्रियदर्शी ने भी पूछा कि आपने बीबीसी के कार्यक्रम में कहा था कि किसी भी सूरत में मोदी विरोधी वोट नहीं बँटने देंगे, लेकिन अब तो ऐसा होता दिख नहीं रहा. इस सवाल के जवाब में कन्हैया ने कहा, ''भाजपा विरोधी वोटों में बिखराव की कोई संभावना ही नहीं है. इसका कारण ये है कि ये गठबंधन तो चुनाव की घोषणा के बाद बना है, उससे पहले जनता ने अपना गठबंधन बना लिया था.''

कन्हैया ने कहा, ''जहां तक बात राजनीतिक समझ और समीकरणों की है तो हम समझते हैं कि बिहार के पिछले दोनों (विधानसभा और लोकसभा) चुनाव में वोटों का ध्रूवीकरण हुआ था. इस बार भी हमारी समझ से ऐसा ही होगा. महागठबंधन की पार्टी चाहे कोई भी हो, सबका एक ही मक़सद है भाजपा को हराना. इसके पहले भी मुज़फ्फ़रपुर शेल्टर होम मामला हो या कोई अन्य मसला. हर जगह भाजपा के ख़िलाफ़ महागठबंधन के सब लोग एक साथ खड़े हुए हैं.''

कन्हैया आगे कहते हैं, "जहां तक बात बेगूसराय की है तो वहां आरजेडी के तनवीर हसन से मेरी लड़ाई ही नहीं है. बेगूसराय की लड़ाई केवल कन्हैया कुमार बनाम गिरिराज सिंह की लड़ाई है."

रविवार को कन्हैया की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बात तेजस्वी यादव की भी आई कि क्या तेजस्वी नहीं चाहते हैं कि कन्हैया राजनीति में आएं? नहीं तो फिर बेगूसराय की सीट उन्होंने अपने कोटे में क्यों ले ली? राजद के तनवीर हसन के लड़ने की चर्चा क्यों चली? लोग ये भी कह रहे हैं कि कन्हैया पर तेजस्वी ने घास नहीं डाली.

इस पर जवाब ख़ुद कन्हैया कुमार ने दिया. बकौल कन्हैया, "मैं कोई गधा नहीं हूं जो मुझ पर कोई घास डालेगा. मैं इंसान हूं और रोटी खाता हूं. रोटी की ही बात भी करता हूं. इसलिए मैं इसकी परवाह भी नहीं करता कि कोई मुझ पर घास डालेगा कि नहीं.''

कन्हैया ने कहा, ''जहां तक बात तनवीर जी की है तो मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि वो लड़ाई में हैं ही नहीं. मेरी लड़ाई सिर्फ़ भाजपा से है. जो हम समझ रहे हैं, वो (तेजस्वी) इस बात को क्यों नहीं समझ रहे हैं तो मैं सिर्फ़ इतना ही कहूंगा कि वो भी एक राजनीतिक दल चलाते हैं, उनकी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं, उनका अपना गुणा-गणित है. अब ये बात उनसे पूछनी चाहिए कि जो हम समझ रहे हैं वो ये क्यों नहीं समझ रहे हैं."

क़रीब घंटे भर से अधिक चली प्रेस वार्ता के दौरान कन्हैया कुमार से उनकी और गिरिराज सिंह की जाति (भूमिहार) एक होने के कारण ये सवाल भी पूछा गया कि क्या वे भूमिहार हैं, इसलिए उन्हें बेगूसराय से टिकट दिया गया?

कन्हैया ने इसका जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने कभी इसके बारे में सोचा ही नहीं. वो कहते हैं कि मैं आदर्श राजनीति करना चाहता हूं उसमें जाति की कोई अहमियत ही नहीं है.

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि कन्हैया और गिरिराज सिंह दोनों भूमिहार जाति से हैं इसलिए भूमिहार वोट भी बँट सकते हैं और इसका नुक़सान गिरिराज को भी होगा. बेगूसराय में भूमिहार मतदाता न केवल बड़ी संख्या में हैं बल्कि प्रभावशाली भी हैं.

लेकिन दूसरी तरफ़ ये बात भी कही जा रही है कि भूमिहार बीजेपी को वोट करते हैं इसलिए कन्हैया को जाति के नाम पर वोट शायद ही मिले. हालांकि इस बात से भी भूमिहारों के रुख़ का रुझान तय होगा कि वो अपने तबक़े का नेता कन्हैया में देखते हैं या गिरिराज सिंह में.

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