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बिहार में बीजेपी ने पशुपति पारस को किनारे कर चिराग पासवान को क्यों चुना?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
बिहार में बीजेपी की अगुआई वाला गठबंधन एनडीए (नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस) ने लोकसभा चुनाव के लिए सीटों की साझेदारी की घोषणा कर दी है.
राज्य की 40 लोकसभा सीटों में 17 पर बीजेपी, 16 पर जेडीयू, पाँच पर चिराग पासवान की एलजेपी(आर) चुनाव लड़ेगी. एक-एक सीट जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा के हिस्से आई है.
उपेंद्र कुशवाहा को लेकर अब भी स्थिति स्पष्ट नहीं है क्योंकि सोमवार को सीटों की साझेदारी की घोषणा हुई तो उपेंद्र कुशवाहा संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं थे.
इस साझेदारी में रामविलास पासवान के भाई और केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस के हिस्से में कुछ नहीं आया है.
साल 2019 के मुक़ाबले दो नए साझेदारों को एनडीए में जगह देने के लिए नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने अपनी दो जीती हुई सीट छोड़ दी है.
इसमें एक काराकाट लोकसभा सीट है जो राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा के हिस्से में आई है.
वहीं जेडीयू ने पिछले चुनाव में जीती अपनी गया लोकसभा सीट भी जीतन राम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के लिए छोड़ दी है.
इन दो सीटों के बदले बीजेपी ने साझेदारी में जेडीयू को अपनी शिवहर लोकसभा सीट दे दी है. वहीं एलजेपी ने अपनी नवादा सीट बीजेपी के लिए छोड़ दी है.
एलजेपी (आर) के हिस्से में वैशाली, हाजीपुर, समस्तीपुर, खगड़िया और जमुई की सीट आई है.
साल 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी और जेडीयू ने 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि एलजेपी के हिस्से में 6 सीटें आई थीं.
इनमें केवल किशनगंज लोकसभा सीट पर जेडीयू की हार हुई थी और बाक़ी सभी सीटों पर एनडीए को जीत मिली थी.
चिराग पासवान की जीत
सीटों की इस साझेदारी में जिस पार्टी का हाथ ख़ाली रहा है, वह चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पारस के धड़े वाली राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी.
ख़ास बात यह है कि साल 2021 में एलजेपी में टूट होने के बाद पशुपति कुमार पारस का धड़ा बीजेपी के साथ था और वो मंत्री पद पर भी थे. चिराग पासवान अकेले रह गए थे.
लेकिन पार्टी में टूट के बाद भी चिराग पासवान बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे और लगातार सभाएं और रैलियाँ करते रहे. वहीं पशुपति कुमार पारस को ज़मीनी स्तर पर बहुत सक्रिय नहीं देखा गया.
बीजेपी जब पशुपति पारस को तवज्जो दे रही थी तब भी चिराग ख़ुद को पीएम मोदी का हनुमान बताते रहे और कहते थे कि पीएम उनके दिल में बसते हैं. चिराग ने पूरे सब्र के साथ इंतज़ार किया और बीजेपी को समझाने में कामयाब रहे उन पर भरोसा करना ज़्यादा फ़ायेदेमंद है.
साल 2020 में रामविलास पासवान के निधन के बाद साल 2021 में उनकी पार्टी एलजेपी दो हिस्सों में टूट गई थी. इस टूट में पार्टी के पाँच सांसद पशुपति कुमार पारस के साथ आ गए थे.
उस वक़्त बीजेपी ने भी पारस के धड़े को मान्यता दी थी.
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, “एलजेपी में टूट के बाद चिराग पासवान अकेले रह गए थे और देखा गया कि एलजेपी समर्थकों की सहानुभूति चिराग पासवान के साथ थी. इसलिए मोदी उनको मनाने की कोशिश में काफ़ी पहले से लगे हुए थे, नहीं तो बीजेपी के सामने भी पासवान वोटों के दूर जाने का ख़तरा था.”
चिराग की चतुराई
पार्टी में टूट के बाद माना जाता था कि चिराग पासवान के मन में बीजेपी को लेकर नाराज़गी है. हालाँकि बाद में चिराग ने बीजेपी को लेकर संतुलित रवैया अपनाया.
बीजेपी से दूर रहकर भी चिराग पासवान ने राजनीतिक चतुराई का बख़ूबी इस्तेमाल किया. साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों के बाद से ही वो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ बयान देते रहे.
यहा सिलसिला कुछ ही दिन पहले वैशाली में हुई चिराग पासवान की रैली तक मौजूद रहा लेकिन उन्होंने बीजेपी के ख़िलाफ़ कभी मोर्चा नहीं खोला.
इस दौरान चिराग पासवान ने राष्ट्रीय जनता दल से भी अपने संबंध मधुर बनाए रखे. वो तेजस्वी यादव की इफ़्तार पार्टी में भी दिखे और लालू परिवार के साथ पारिवारिक रिश्ते की बात करते रहे.
हालाँकि चाचा पशुपति पारस से तल्ख़ी और उनके केंद्र सरकार में मंत्री बने रहने के बाद भी चिराग ने बीजेपी से अपना नाता पूरी तरह नहीं तोड़ा और कभी आरजेडी के खेमे में नहीं गए.
बिहार में पासवान बिरादरी के क़रीब 5.3% वोट हैं. पिछले कई चुनावों के आधार पर माना जाता है कि एलजेपी के पास बिहार में क़रीब छह फ़ीसदी वोट हैं और इसमें बड़ा हिस्सा पासवान वोटरों का है.
एलजेपी में टूट के बाद पशुपति पारस के गुट ने भले ही कोई चुनाव नहीं लड़ा है, लेकिन कई मौक़ौं पर चिराग पासवान ने साबित किया है कि एलजेपी के परंपरागत वोट उनके पास हैं.
एलजेपी के वोट चिराग के साथ?
चिराग पासवान ने साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी को बिना किसी गठबंधन के चुनाव मैदान में उतारा था. उन चुनावों में पार्टी को केवल एक सीट पर जीत मिली थी लेकिन क़रीब सात फ़ीसदी वोट मिले थे.
पार्टी में टूट के बाद से चिराग पासवान के गुट ने साल 2021 के अंत में बिहार में दो सीटों पर विधानसभा उपचुनाव लड़े थे. इन दोनों सीटों पर पार्टी ने अपने उम्मीदवारों को बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा था और उन्हें क़रीब 6 फ़ीसदी वोट मिले थे.
चिराग के साथ वोटों की इस ताक़त को देखते हुए बीजेपी ने भी कुढ़नी समेत बिहार के कई विधानसभा उपचुनावों में चिराग पासवान से अपने उम्मीदवार के लिए प्रचार कराया था.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, “पशुपति पारस को आगे बढ़ाकर बीजेपी को कुछ नहीं मिलने वाला था. जो बीजेपी हर्षवर्धन और गौतम गंभीर जैसे अपने नेताओं को किनारे करने में समय नहीं लगाती उसे पारस को किनारे लगाने में कितना समय लगेगा.”
एनडीए को कितना ख़तरा
सुरूर अहमद का मानना है कि चिराग पासवान का राजनीति में भविष्य बचा हुआ है जबकि पशुपति पारस की उम्र की वजह से अब भविष्य उनके साथ नहीं है.
एलजेपी (आर) के मुताबिक़ चिराग पासवान इस बार के लोकसभा चुनावों में हाजीपुर सीट से चुनाव लड़ेंगे.
हाजीपुर लोकसभा सीट को रामविलास पासवान की सीट के तौर पर देखा जाता है. साल 2019 के चुनावों में पशुपति कुमार पारस यहाँ से चुनाव जीते थे.
जबकि चिराग पासवान पिछले चुनावों में बिहार की ही जमुई लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने थे.
नचिकेता नारायण कहते हैं, “पिछले दिनों चिराग पासवान ने जमुई में कहा था कि वो कभी जमुई को नहीं छोड़ेंगे. अब देखना होगा कि वो जमुई सीट को लेकर क्या फ़ैसला करते हैं. यही नहीं अब पशुपति पारस भी नज़र होगी कि वो क्या करेंगे.”
पशुपति कुमार पारस लगातार यह दावा करते रहे हैं कि रामविलास पासवान के असली राजनीतिक उत्तराधिकारी वही हैं और रामविलास ने ख़ुद जीवित रहते हुए उन्हें हाजीपुर सीट से चुनाव लड़वाया था.
अब लोकसभा चुनावों के लिहाज से एनडीए में पारस के पास कुछ नहीं बचा है तो ऐसे में उनके अगले क़दम पर सबकी नज़र होगी.
पशुपति पारस का अब क्या होगा?
नचिकेता नारायण कहते हैं, “राजनीति में पशुपति पारस की पारी अब ख़त्म हो गई दिखती है. लेकिन उनके साथ इस व्यवहार को विपक्षी गठबंधन जनता के सामने कितना भूना पाता है, यह देखना दिलचस्प होगा.”
जेडीयू इस तरह का आरोप लगा चुकी है कि साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में चिराग पासवान ने जेडीयू के उम्मीदवारों को हराने के लिए एनडीए में रहकर भी अपने उम्मीदवार खड़े किए थे.
ऐसे में नीतीश और चिराग पासवान के एक साथ होने से क्या एनडीए के सामने कोई ख़तरा भी हो सकता है?
सुरूर अहमद कहते हैं, “नीतीश की पार्टी के कमज़ोर होने के पीछे जिस तरह से चिराग पासवान को ज़िम्मेवार बाताया जाता है, अगर यह सच है और लोकसभा चुनावों में दोनों दलों का वोट एक-दूसरे को ट्रांसफ़र नहीं हुआ तो इसका नुक़सान एनडीए को हो सकता है.”
बिहार में फ़िलहाल एनडीए में सीटों की साझेदारी को लेकर फ़ैसला हुआ है और माना जाता है कि अब जल्द ही विपक्षी खेमें में भी सीटों की साझेदारी हो जाएगी.
बिहार के सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि मुकेश सहनी के दल वीआईपी के साथ बात तय हो जाती है तो बीजेपी अपने कोटे की एक सीट वीआईपी को दे सकती है.
हालाँकि इस सियासी उठापकट में अभी बहुत से पन्ने खुलने की संभावना है. सत्ता पक्ष और विपक्ष के उम्मीदवारों के नाम की घोषणा के साथ ही ये पन्ने भी खुलने लगेंगे.
लोकसभा चुनावों में एनडीए में सीटों की साझेदारी की घोषणा होते ही सभी संभावनाओं और अटकलों पर विराम लग गया है.
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