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उपेंद्र कुशवाहा का जेडीयू छोड़ना नीतीश कुमार के लिए कितना बड़ा सियासी झटका?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
बिहार में सत्ता में बैठी जेडीयू के अंदर चल रही ज़ुबानी जंग का फ़ैसला हो गया है.
इस ज़ुबानी जंग में नाराज़ नेता उपेंद्र कुशवाहा ने फिर से पार्टी को अलविदा कह दिया है. कुशवाहा ने इसके साथ ही एक नई पार्टी बना ली है. इस पार्टी का नाम 'राष्ट्रीय लोक जनता दल' रखा गया है.
उपेंद्र कुशवाहा बीते क़रीब दो महीने से पार्टी से नाराज़ चल रहे थे. उन्होंने जेडीयू को एक कमज़ोर पार्टी बताया था और नीतीश कुमार समेत पार्टी के बड़े नेताओं पर लगातार गंभीर आरोप लगा रहे थे.
कुशवाहा के आरोपों पर जेडीयू की तरफ़ से नीतीश कुमार समेत कई नेता लगातार बयान भी दे रहे थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें पार्टी छोड़कर जाने को भी कह दिया था.
इस तरह से चल रहे विवाद के बीच यह कयास लगातार लगाए जा रहे थे कि उपेंद्र कुशवाहा कभी भी पार्टी को छोड़कर जा सकते हैं. कुशवाहा का पार्टी छोड़कर जाना न पहली बार हुआ है और न ही अचानक हुआ है.
सोमवार को पटना में पत्रकारों को बुलाकर कुशवाहा ने पुरानी पार्टी को छोड़ने और नई पार्टी बनाने का एलान किया. इस दौरान उनके साथ कुछ सहयोगी और क़रीबी कार्यकर्ता भी मौजूद थे.
उपेंद्र कुशवाहा ने दावा किया है कि 'उनकी नई पार्टी जननायक कर्पुरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत को बचाने के लिए काम करेगी, जिसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गिरवी रख दिया है.'
कुशवाहा ने क्या लगाए आरोप
कुशवाहा ने आरोप लगाया कि 'नीतीश कुमार ने साल 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरू में अच्छा काम किया. लेकिन 'अंत भला तो सब भला' होता है, जबकि नीतीश कुमार ने 'अंत बुरा तो सब बुरा' कर दिया है.'
उपेंद्र कुशवाहा साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जनता दल यूनाइटेड में शामिल हुए थे. इससे पहले उस साल हुए चुनावों में कुशवाहा की उस समय की 'राष्ट्रीय लोक समता पार्टी' बुरी तरह हारी थी.
उपेंद्र कुशवाहा के जेडीयू में शामिल होते ही उन्हें पार्टी के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था. बाद में उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधान परिषद का सदस्य भी बनवाया.
उपेंद्र कुशवाहा ने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह समेत कई नेताओं पर आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार इन नेताओं की बात पर चलते हैं, इसलिए जेडीयू लगातार कमज़ोर होती गई है.
ललन सिंह ने इस आरोप के बाद उपेंद्र कुशवाहा पर पलटवार किया है. ललन सिंह ने कहा है, "अगर नीतीश कुमार दूसरे की बात पर चलते तो पार्टी में हर किसी के विरोध के बाद भी उपेंद्र कुशवाहा को जेडीयू में शामिल नहीं कराते. वो सुनते सबकी हैं, करते अपनी हैं."
जेडीयू में उत्तराधिकार की लड़ाई
दरअसल नीतीश कुमार की पार्टी दिसंबर में मुज़फ़्फ़रपुर की कुढ़नी विधानसभा सीट पर उपचुनाव हार गई थी. उसके बाद नीतीश ने आरजेडी नेता और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को महागठबंधन के भविष्य का नेता बताया था.
माना जाता है कि इससे उपेंद्र कुशवाहा की महत्वाकांक्षा को बड़ा झटका लगा था. उपेंद्र कुशवाहा ने सोमवार को भी आरोप लगाया कि नीतीश कुमार अपने घर को छोड़ पड़ोसी के घर में अपना उत्तराधिकारी तलाश रहे थे.
इस पर ललन सिंह ने कहा है, "तो क्या उनको नीतीश जी अपना उत्तराधिकारी बना दें? वो जब पार्टी में आए तो कह रहे थे, अब बूढ़ा हो गया हूं, अब कहां जाऊंगा. उनको तो आराम करने के लिए पार्टी में लाया गया था."
इस बीच यह सवाल भी उठता है कि साल 2024 के लोकसभा और 2025 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों के पहले उपेंद्र कुशवाहा के पार्टी छोड़ने से जेडीयू को कितना नुक़सान हो सकता है.
नीतीश का कितना बड़ा नुक़सान
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, "महागठबंधन के पास 45 फ़ीसदी वोट है. कुशवाहा कहां से मुक़ाबला करेंगे? बीजेपी के पास 24 फ़ीसदी वोट है, चिराग पासवान के 6 फ़ीसदी और तीन फ़ीसदी कुशवाहा का वोट जोड़ दें तो भी यह काफ़ी पीछे है."
कन्हैया भेलारी मानते हैं कि 'बीजेपी बिहार में भले ही नरेंद्र मोदी के नाम और चेहरे पर चुनाव लड़े, जैसा वो चाहती भी है कि हर चुनाव एक साथ, एक जैसा हो; लेकिन बिहार की राजनीति से जाति व्यवस्था ख़त्म नहीं होने वाली है.'
उनका मानना है कि ऐसे में अगर कुशवाहा बीजेपी के साथ आते हैं तो अवधारणा की लड़ाई में इसका थोड़ा नुक़सान महागठबंधन को हो सकता है, क्योंकि उपेंद्र कुशवाहा अपनी बिरादरी के बड़े नेता हैं.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "उपेंद्र कुशवाहा, रामविलास पासवान की तरह अच्छे मौसम वैज्ञानिक नहीं हैं. वो ग़लत मौसम में ग़लत पार्टी में होते हैं. साल 2018 में कुशवाहा केंद्रीय मंत्री की कुर्सी छोड़ने की ग़लती भी कर चुके हैं."
सुरूर अहमद का कहना है कि साल 2014 में लोकसभा चुनाव में नीतीश अपने सबसे बुरे दौर में क़रीब 15 फ़ीसदी वोट पाने में सफल रहे थे. लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी को सबसे बुरे प्रदर्शन में क़रीब 18% वोट मिला था.
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इन चुनावों में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा था. लेकिन उनके अपने वोट तीन फ़ीसदी थे. यानी उपेंद्र कुशवाहा अकेले कुछ नहीं कर सकते हैं.
सुरूर अहमद का मानना है कि 'अगर कुशवाहा समाज बीजेपी को वोट देना चाहे तो इसके लिए उपेंद्र कुशवाहा की कोई ज़रूरत नहीं है, बीजेपी के पास सम्राट चौधरी जैसे कई कुशवाहा नेता हैं.'
उनका मानना है कि पार्टी या साझेदार बदलने के मामले में कुशवाहा की छवि ज़्यादा ख़राब है. इसलिए उपेंद्र कुशवाहा का जेडीयू छोड़ना महागठबंधन के लिए बहुत बड़ा नुक़सान नहीं है.
कुशवाहा का राजनीतिक सफ़र
उपेंद्र कुशवाहा ने राजनीतिक सफ़र समता पार्टी से ही शुरू किया था, समता पार्टी में भी नीतीश कुमार का क़द एक बड़े नेता का था.
साल 2000 के बिहार विधानसभा चुनावों में मात खाने के बाद आरजेडी से मुक़ाबले करने के लिए समता पार्टी और जेडीयू का विलय किया गया था.
साल 2003 में नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया था. कुशवाहा साल 2000 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीते थे.
इसके पीछे उनका मक़सद लालू के 'एम-वाई' समीकरण के मुक़ाबले 'लव-कुश' समीकरण खड़ा करना था जिनमें कुर्मी, कोइरी, कुशवाहा जातियां शामिल थीं.
नरेंद्र मोदी को बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने के बाद साल 2013 में नीतीश कुमार एनडीए से अलग हुए थे. इसी समय उपेंद्र कुशवाहा ने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाई (आरएलएसपी) थी.
आरएलएसपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था और उपेंद्र कुशवाहा उस सरकार में मंत्री भी बनाए गए थे.
साल 2017 में नीतीश के बिहार में महागठबंधन को छोड़ एनडीए में लौटने के बाद साल 2018 में कुशवाहा ने एनडीए का साथ छोड़ दिया.
उसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी ने विपक्षी महागठबंधन का दामन थामा था.
इन चुनावों में बुरी हार के बाद साल 2020 के विधानसभा चुनाव में कुशवाहा ने महागठबंधन को छोड़ मायावती की बीएसपी और असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ गठबंधन किया था.
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को न तो 2019 के लोकसभा चुनाव में और न ही 2020 के विधानसभा चुनाव में कोई सीट मिली थी. उसके बाद कुशवाहा ने अपनी पार्टी का विलय जेडीयू में कर दिया था.
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