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भारत जोड़ो यात्रा के बाद क्या विपक्ष राहुल गांधी को अपना नेता मान लेगा?
- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सात सितंबर, 2022 को तमिलनाडु के कन्याकुमारी से शुरू हुई भारत जोड़ो यात्रा 30 जनवरी को कश्मीर के श्रीनगर में ख़त्म हो जाएगी.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कई राज्यों से होते हुए क़रीब 3750 किलोमीटर की पदयात्रा कर इसे पूरी की है.
ख़ुद राहुल गांधी और कांग्रेस मीडिया प्रभारी जयराम रमेश कहते रहें हैं कि भारत जोड़ो यात्रा को चुनावी राजनीति से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए.
राहुल गांधी जब राजस्थान में थे तो पत्रकारों से बात करते हुए जयराम रमेश ने कहा था कि भारत जोड़ो यात्रा 'चुनाव जीतो' या 'चुनाव जिताओ यात्रा' नहीं है.
पहले 2014 और फिर 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस जब लगातार दो बार 50 सीटों के आसपास सिमट गई थी तो यह कहा जाने लगा था कि नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने विपक्ष लगभग पूरी तरह ख़त्म हो गया है.
मोदी और अमित शाह समेत बीजेपी के कई बड़े नेता ये कहने लगे थे कि उनका उद्देश्य भारत को 'कांग्रेस मुक्त' करना है.
हालांकि जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का प्रदर्शन चाहे जितना भी ख़राब रहा हो लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि कांग्रेस अब भी प्रमुख विपक्षी दल है और 'कांग्रेस मुक्त भारत' का असल अर्थ 'विपक्ष मुक्त भारत' है.
राहुल गांधी या कांग्रेस के दूसरे नेता भले ही इसे ग़ैर-राजनीतिक क़रार दें लेकिन इन राजनीतिक सवालों का उठना लाज़मी है कि क्या भारत की राजनीति इस समय वाक़ई विपक्ष मुक्त हो चुकी है? और अगर ऐसा है तो क्या भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी को विपक्ष के नेता पर स्थापित करने में कुछ हद तक सफलता पाई है?
इसी से जुड़ा एक दूसरा अहम सवाल यह भी है कि इस यात्रा से भारत की जनता को राहुल गांधी आख़िर क्या संदेश देना चाहते हैं और वो इसमें किस हद तक सफल हुए हैं?
दोनों ही सवाल अहम बहुत अहम हैं. लेकिन पहले बात करते हैं विपक्ष की राजनीति की.
जनता दल-यू के महासचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद केसी त्यागी कहते हैं कि राहुल गांधी ने भी कभी यह नहीं कहा कि वो ख़ुद को विपक्ष का नेता स्थापित करने के लिए यह यात्रा कर रहे हैं.
त्यागी के अनुसार भारत जोड़ो यात्रा एक सांस्कृतिक और लोगों को जागरूक करने का प्रोग्राम है और उसमें शामिल होने वाली भीड़ की बढ़ती तादाद बताती है कि यह यात्रा अच्छे उद्देश्यों के लिए किया जा रहा कार्यक्रम है.
'कांग्रेस के बग़ैर कोई मोर्चा संभव नहीं'
केसी त्यागी के अनुसार 2014 और 2019 के चुनाव के बाद कांग्रेस अपने न्यूनतम स्कोर पर है और विपक्षी दल का दर्जा प्राप्त करने में भी नाकाम रही, ऐसे में कांग्रेस को एकत्रित करने के लिए, पार्टी में जान फूंकने के लिए, जनता से उसको जोड़ने के लिए राहुल गांधी ने प्रयास किए हैं और उसमें उनको काफ़ी सफलता भी मिली है.
केसी त्यागी का कहना है कि उनकी पार्टी का मत बिलकुल साफ़ है कि बग़ैर कांग्रेस पार्टी के कोई भी राजनीतिक मोर्चा नहीं बन सकता है.
हालांकि एनडीए छोड़कर राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर बिहार में सरकार बनाने के बाद नीतीश कुमार जब दिल्ली सोनिया गांधी से मिलने आए थे तो उनको कांग्रेस ने कोई ख़ास अहमियत नहीं दी थी.
इस पर केसी त्यागी कहते हैं, "हम निराश नहीं हैं. जब नीतीश कुमार सोनिया गांधी से मिले थे, उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव होना था. गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले थे. इसलिए हमलोगों को बाद में दोबारा बैठना चाहिए लेकिन अभी तक कांग्रेस की तरफ़ से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है, और कोई ऐसे लक्षण भी नहीं हैं कि वो विपक्षी एकता के लिए कोई प्रयास कर रहे हैं."
उनके अनुसार कांग्रेस के बिना कोई विपक्षी गठबंधन संभव नहीं है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी गठबंधन में नवीन पटनायक, केसीआर, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और मायावती सभी को साथ होना चाहिए.
वो कहते हैं कि वक़्त ही विपक्षी एकता कराएगा. 1977 की मिसाल देते हुए वो कहते हैं कि उस समय लगभग सारे नेता जेल में थे, आपस में कोई संवाद संभव नहीं था. जनसंघ किसी के साथ विलय के लिए तैयार नहीं था. समाजवादी पार्टी भी अलग रास्ते पर चल रहे थे. जेपी भी कोई पार्टी बनाना नहीं चाहते थे, लेकिन जनता ने अपना विकल्प चुन लिया और सभी को साथ आने को मजबूर किया और इंदिरा गांधी की कांग्रेस 1977 का चुनाव हार गई.
वो कहते हैं, "देश के सामाजिक ताने-बाने को, धर्म निरपेक्ष परंपरा को सुदृढ़ करने की इच्छा और अभिलाषा जिन दलों की जितनी सुदृढ़ होगी वो दल राष्ट्र की एकता के लिए इसकी सार्वभौमिकता के लिए सब साथ आएंगे ऐसा मेरा मानना है."
'सामूहिक विपक्ष की बात करना अभी जल्दबाज़ी होगी'
किसी भी आम चुनाव में उत्तर प्रदेश सबसे अहम होता है क्योंकि वहां से 80 सांसद चुनकर आते हैं. पिछले दो चुनावों (2014 और 2019) में बीजेपी की शानदार सफलता का एक कारण यूपी में पार्टी का प्रदर्शन रहा था. दोनों ही बार बीजेपी ने 60 से ज़्यादा (2014 में तो 71 सीटें जीती थीं) सीटें जीती थीं.
इसलिए अगर बीजेपी को रोकना है तो उसे यूपी में रोकना होगा, लेकिन फ़िलहाल वहां भी विपक्ष बिखरा पड़ा है.
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता घनश्याम तिवारी भारत जोड़ो यात्रा को नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ एक शानदार प्रयास क़रार देते हुए कहते हैं कि इससे राहुल गांधी के नेतृत्व को उभार मिलता है, वो मज़बूत होता है, लेकिन 2024 की बात अभी करना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी.
2023 में क़रीब दर्जन भर राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और ज़्यादातर (कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़) में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर है.
सपा प्रवक्ता के अनुसार 2024 के आम चुनाव कांग्रेस की भूमिका क्या होगी यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्यों के इन चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहता है.
यूपी की बात करते हुए घनश्याम तिवारी कहते हैं कि वहां अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा पूरी मज़बूती से बीजेपी का मुक़ाबला करने की तैयारी कर रही है.
वो कहते हैं, "समाजवादी पार्टी विपक्ष के किसी भी साझे प्रयास को एक सिरे से ख़ारिज नहीं करती है. लेकिन सामूहिक विपक्ष की दृष्टि से अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी."
'कांग्रेस के अलावा क्यों नहीं सोच सकते हैं?'
यूपीए के दौरान ही तेलंगाना का गठन हुआ था और एक समय ऐसा लग रहा था कि केसीआर की टीआरएस का कांग्रेस में विलय हो जाएगा. आज स्थिति यह है कि टीआरएस ना केवल कांग्रेस की कट्टर विरोधी पार्टी बन गई है, बल्कि केसीआर ने अपनी राष्ट्रीय महत्वकांक्षा को पूरी करने के लिए अपनी पार्टी का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) रख लिया है.
बीआरएस के प्रवक्ता कृषांक मन्ने के अनुसार राहुल गांधी कहते हैं कि उनकी भारत जोड़ो यात्रा राजनीतिक यात्रा नहीं है लेकिन ऐसे राज्यों में जहां बीजेपी की सरकार नहीं है वहां उन्होंने ना केवल राजनीतिक बयानबाज़ी की है बल्कि उन पार्टियों को बीजेपी की बी टीम क़रार दिया.
कृषांक मन्ने कहते हैं, "भारत जोड़ो यात्रा पूरी तरह एक राजनीतिक है और यह राहुल गांधी की छवि को बढ़ाने के लिए की जा रही है. इस देश को कोई मज़बूत संदेश देने के लिए नहीं है."
ऐसे में 2024 के चुनाव को देखते हुए बीआरएस की रणनीति क्या है, इसका जवाब देते हुए कृषांक मन्ने कहते हैं, "आज हमारा फ़ोकस यह है कि हमलोग मोदी को जनता के एजेंडा पर चुनौती देंगे, जिसका उन्होंने (मोदी) 2014 में वादा किया था लेकिन वो पिछले आठ-नौ साल से दूर भाग रहे हैं."
कांग्रेस के बारे में उनका साफ़ कहना था, "क्यों हम कांग्रेस के अलावा सोच नहीं सकते हैं. कांग्रेस आज 40-50 सीटों तक सीमित है. कांग्रेस को उतनी अहमियत क्यों देंगे जब सारे राज्य (ग़ैर-कांग्रेस और ग़ैर-बीजेपी) अपने-अपने क्षेत्र में मज़बूत हैं. उनके मुख्यमंत्री हैं."
राहुल अभी भी 'विपक्ष का चेहरा' नहीं
कांग्रेस की राजनीति को क़रीब से देखने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता कहती हैं कि इस यात्रा से पहले जिस तरह से बीजेपी या कई राजनीतिक विश्लेषक राहुल गांधी को हल्के में लेते थे और उनके लिए कई अपशब्द कहते थे, अब वो राहुल गांधी को उतनी आसानी से वो सब नहीं कह पाएंगे.
स्मिता गुप्ता के अनुसार इस यात्रा के बाद राहुल गांधी कांग्रेस के सर्वमान्य नेता के तौर पर दोबारा स्थापित हो गए हैं और विपक्ष के एक जानेमाने नेता के तौर पर आगे बढ़े हैं.
हालांकि वो कहती हैं, "राहुल गांधी ने यह तो साबित कर दिया है कि उन्हें और गंभीरता से लिया जाना चाहिए लेकिन अभी भी राहुल गांधी को 'विपक्ष का चेहरा' नहीं कहा जा सकता है."
स्मिता गुप्ता के अनुसार कांग्रेस के सहयोगी पार्टियों की ज़िम्मेदारी है कि वो केसीआर और ममता बनर्जी जैसे नेताओं को जाकर समझाएं कि अगर उनका पहला मक़सद बीजेपी को हराना है तो फिर कांग्रेस को साथ लेकर ही चलना पड़ेगा.
'राहुल गांधी उम्मीद की राजनीति कर रहे हैं'
लेकिन जानेमाने समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को राजनीति के दाव पेंच से बिलकुल अलग करके देखते हैं.
शिव विश्वनाथन कहते हैं कि राहुल गांधी की यात्रा एक तरह की भारत की खोज है. उनके अनुसार राहुल गांधी की यात्रा में शामिल होने वाले नेताओं से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा, राहुल की यात्रा को ख़ास बनाता है उसमें शामिल होने वाले ग़ैर-राजनीतिक लोग.
राहुल गांधी की इस यात्रा के दौरान समाज के अलग-अलग हिस्सों के लोग शामिल हुए. फ़िल्मी दुनिया से उर्मिला मातोंडकर, स्वरा भास्कर, पूजा भट्ट, रिया सेन और आनंद पटवर्धन शामिल हुए. सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय भी शामिल हुईं और तेलंगाना में रोहित वेमुला की मां भी.
खेल की दुनिया से भी कई लोग शामिल हुए. संगीत की दुनिया के टीएम कृष्णा, स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा, गणेश देवी और आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी यात्रा में शामिल हुए.
शिव विश्वनाथन के अनुसार राहुल गांधी ने यात्रा की शुरुआत में ज़रूर सिर्फ़ चुनाव के बारे में सोचा होगा लेकिन यात्रा के साथ-साथ उनकी राय बदलती गई.
उनके अनुसार शुरुआती दौर में राहुल गांधी अपने भाषणों में सिर्फ़ और सिर्फ़ बीजेपी को निशाना बना रहे थे लेकिन जैसे-जैसे वो लोगों से मिलते गए उन्हें एहसास हो गया कि भारत को इस समय एक नए तरह की राजनीति की ज़रूरत है.
उनके अनुसार राहुल गांधी ने यह सब कुछ सोचकर नहीं किया, वो ख़ुद इसके शिकार हो गए लेकिन फिर भी इसके लिए राहुल गांधी को श्रेय दिया जाना चाहिए.
क्या राहुल खुद भी नहीं समझ पा रहे?
लेकिन क्या आम लोगों को राहुल गांधी अपना संदेश देने में सफल हुए, इसके जवाब में शिव विश्वनाथन कहते हैं, "धीरे-धीरे लोगों तक राहुल गांधी का संदेश जा रहा है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी इस यात्रा के हीरो हैं, इस यात्रा के हीरो वो भारतीय हैं जो यात्रा में शामिल हुए और जिन्होंने राहुल गांधी को बताया कि आज की पार्टी पॉलिटिक्स काफ़ी खोखली है."
लेकिन शिव विश्वनाथन आगाह करते हुए कहते हैं कि एक ख़तरा यह भी है कि कांग्रेस का लोगों को निराश करने का इतिहास रहा है और यह अपने पुराने ढर्रे पर फिर जा सकती है.
वो कहते हैं, "अगर राहुल गांधी को नागरिक समाज के साथ मिलकर राजनीति करनी है तो उन्हें कांग्रेस पार्टी में नए तरह से सुधार करना होगा और हमें भविष्य की एक नई राजनीतिक पार्टी मिल सकती है. यहां पर नागरिक समाज के लोग उनकी मदद कर सकते हैं और अगर ऐसा होता है तो यह एक चमत्कार होगा."
शिव विश्वनाथन के अनुसार शरद पवार और नीतीश कुमार जैसे कांग्रेस के सहयोगी भी सिर्फ़ सत्ता हासिल करना चाहते हैं और ख़ुद को मज़बूत बनाना चाहते हैं, लेकिन राहुल गांधी ऐसे पहले नेता बन गए हैं जो लोगों को सशक्त करने की बात कर रहें हैं राजनेताओं को सशक्त करने की नहीं.
वो कहते हैं कि यात्रा के दौरान जो कुछ हो रहा है वो ख़ुद राहुल गांधी को भी पूरी तरह समझ में नहीं आ रहा है लेकिन उन्होंने जो किया है वो चुनावी राजनीति से दूर एक नए भारत का सपना दिखाता है लेकिन कई बार सपने टूट जाते हैं.
शिव विश्वनाथन के अनुसार, राहुल गांधी उम्मीद की राजनीति कर रहे हैं लेकिन इसे सफल बनाने के लिए ज़रूरत है विचारों की राजनीति की.
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