बीजेपी में कैसे होता है अध्यक्ष पद का चुनाव, क्यों हो रही है पार्टी को नया अध्यक्ष चुनने में देरी

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीजेपी के मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल क़रीब दो साल पहले समाप्त होने के बाद उन्हें लगातार एक्सटेंशन दिया जा रहा है.
बीजेपी के इतिहास में यह पहला मौक़ा है जब किसी अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद इतने लंबे समय तक नया अध्यक्ष नहीं चुना गया है.
हालांकि इस दौर में बीजेपी ने कई अहम चुनावों में जीत हासिल की है, यानी उसके चुनावी प्रदर्शन पर इसका ज़्यादा विपरीत असर नहीं पड़ा है.
इस कहानी में हम जानने की कोशिश करेंगे कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव कैसे होता है और क्या इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी कोई भूमिका होती है.


क्या कहता है बीजेपी का संविधान

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बीजेपी के संविधान के मुताबिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष वही व्यक्ति हो सकता है जो कम से कम 15 वर्षों तक पार्टी का सदस्य रहा हो.
बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का 'चुनाव' निर्वाचक मंडल करता है, जिसमें राष्ट्रीय परिषद के सदस्य और प्रदेश परिषदों के सदस्य शामिल होते हैं.
बीजेपी संविधान में ये भी लिखा है कि निर्वाचक मंडल में से कोई भी बीस सदस्य राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के नाम का संयुक्त रूप से प्रस्ताव कर सकते हैं.
यह संयुक्त प्रस्ताव कम से कम ऐसे पांच प्रदेशों से आना ज़रूरी है जहां राष्ट्रीय परिषद के चुनाव संपन्न हो चुके हों. साथ ही साथ नामांकन पत्र पर उम्मीदवार की स्वीकृति आवश्य होनी चाहिए.
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी लंबे समय से बीजेपी की राजनीति पर नज़र रख रहे हैं.
उनका कहना है, ''बीजेपी के संविधान को देखें, यदि उनकी औपचारिकताओं को देखें तो बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले ज़िला संगठनों के चुनाव, प्रदेश संगठन और राष्ट्रीय परिषद के चुनाव होते हैं."
संगठन की दृष्टि से बीजेपी ने भारत को 36 राज्यों में बांट रखा है और आधे से ज़्यादा राज्यों के संगठन के चुनाव होने के बाद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता है.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "शुरुआत से ही आज तक बीजेपी में संविधान की प्रक्रिया तो यही है लेकिन अध्यक्ष का चुनाव सामूहिक विचार करके सर्वसम्मति से करते हैं. इसलिए पिछले क़रीब 45 साल में किसी अध्यक्ष के लिए वोटिंग नहीं हुई है. यानि जब कम से कम दो लोग खड़े हों और उनके बीच वोटिंग से फ़ैसला हो."
बीजेपी में कभी किसी अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए वोटिंग नहीं हुई है. कोशिश ये होती है कि बीजेपी के लोग और संघ के लोग आपस में विचार विमर्श करते हैं और पार्टी की ज़रूरत को ध्यान में रखकर अध्यक्ष का चयन किया जाता है.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "राजनीति दलों में बीजेपी कोई अपवाद नहीं है. पार्टी का अध्यक्ष चुनने की कवायद लोकतांत्रिक ढंग से नहीं की जाती है. इसके लिए सदस्य वोट नहीं देते हैं. बीजेपी में कभी इस पद के लिए वोटिंग नहीं हुई है. कांग्रेस में भी यही होता रहा है."
"इसका एक अच्छा पहलू यह है कि नेताओं के बीच टकराव नहीं होता है, इसलिए राजनीतिक दल आम राय से पार्टी अध्यक्ष चुनता है, जो काम पार्टी का राजनीतिक चेहरा करता है."
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "अक्सर सवाल खड़ा किया जाता है कि संघ बीजेपी को कोई दिशा निर्देश दे रहा है. ये कहना कि संघ का कोई दख़ल नहीं होता है और ये भी कहना कि संघ ने निर्देश दे दिया है और इस नाम पर पर्ची बना दी है, ये ठीक नहीं है. लेकिन दोनों में विचार विमर्श ज़रूर होता है."
ऐसा पहली बार हो रहा है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को इतने लंबे समय तक एक्सटेंशन पर चलाया जा रहा है.
अध्यक्ष का कार्यकाल

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बीजेपी के संविधान के मुताबिक़ इसके अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है.
साल 2010 में नितिन गडकरी पार्टी के अध्यक्ष बने थे और उनके कार्यकाल में पार्टी के संविधान में एक संशोधन किया गया था.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "संघ उस समय गडकरी जी को दोबारा अध्यक्ष बनाना चाहता था, यानी लगातार दो बार. उस समय पार्टी के संविधान में तो बदलाव हो गया कि एक के बाद एक लगातार दो बार आप पार्टी के अध्यक्ष बन सकते हैं लेकिन गडकरी जी दोबारा अध्यक्ष नहीं बन पाए. अंदरूनी या अन्य किन्हीं वजहों से."
इस बीच पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल ख़त्म हुए भी काफ़ी समय हो चुका है. वो जनवरी 2020 में पार्टी के अध्यक्ष बने थे और जनवरी 2023 में उनका कार्यकाल ख़त्म हो गया.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "कहा गया कि लोकसभा चुनाव होने हैं इस वजह से जेपी नड्डा को एक्सटेंशन दे दिया गया. जब लोकसभा चुनाव ख़त्म हो गए तो उन्हें 20 दिन का एक्सटेंशन दिया गया और कहा गया कि पार्टी अध्यक्ष का चुनाव होगा. फिर कहा गया कि प्रदेश स्तर के आधे राज्यों के ज़रूरी संगठन के चुनाव अभी नहीं हुए हैं. इस तरह से जेपी नड्डा को दोबारा अध्यक्ष नहीं बनाया गया और वो लगातार एक्सटेंशन पर चल रहे हैं."
बीजेपी को अध्यक्ष चुनने में देरी क्यों?

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विजय त्रिवेदी कहते हैं, "स्पष्ट शब्दों में कहूं तो अगर इसके लिए किसी नाम पर सहमति होती तो देरी क्यों होती? और सहमति किसको करनी है? अगर केवल बीजेपी की बात है तो तर्क के आधार पर प्रधानमंत्री को इसका फ़ैसला करना है, भले ही ये सच है या नहीं, मुझे नहीं पता."
"अब इसमें दूसरा साझेदार आरएसएस है, जिसे अध्यक्ष के नाम पर सहमित बनानी है. तो ज़ाहिर है कि आरएसएस और बीजेपी एक नाम या एक बिंदु पर सहमत नहीं हो पा रहे होंगे. इस वजह से पार्टी अध्यक्ष चुनने में देरी हो रही है."
"अभी तक तो यही है कि नड्डा जी को दोबारा अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा और उनका जो बयान साल 2024 के चुनावों में आया, उससे भी थोड़ी सी नाराज़गी बढ़ी."
दरअसल साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि जब बीजेपी कमज़ोर थी तो उसे आरएसएस की ज़रूरत थी, अब बीजेपी ख़ुद मज़बूत है तो उसे आरएसएस की वैसी ज़रूरत नहीं रही.
रशीद किदवई कहते हैं, "ये बड़ा दिलचस्प सवाल है कि बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने में आरएसएस की क्या भूमिका होती है. खुलकर तो कोई भी नहीं कह रहा है लेकिन कहीं न कहीं अंदर से एक खींचतान हो रही है, लेकिन आरएसएस का एक मत है कि वो शुरू से व्यक्तिवाद के ख़िलाफ़ रहा है."
"आरएसएस नहीं चाहता है कि व्यक्ति संगठन से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो, इसलिए वो चाहता है कि कोई ऐसा चेहरा हो जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीज मज़बूती से काम कर सके. जबकि मोदी और शाह की सोच ऐसी है कि नया अध्यक्ष उन्हीं की राय और सोच का हो. बीजेपी में नेताओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन उनमें कोई आम राय नहीं बन पाई है. हालांकि ये सब केवल कयास हैं, इसका कोई प्रमाण नहीं है."
रशीद किदवई का मानना है कि सत्ता का नशा या ताक़त (चाहे इसे कोई नाम दें) जो फ़ैसले लेता है कई बार उससे संगठन कमज़ोर हो जाता है, जैसा कि कांग्रेस में भी हुआ है.
रशीद किदवई कहते हैं, "इंदिरा गांधी ने बहुत से ऐसे मुख्यमंत्री बनाए जिनके पास दस-बीस विधायकों का भी समर्थन नहीं था. हमने यही बीजेपी में देखा जब उन्होंने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री चुना. आज तो यह फ़ैसला ले किया जाता है कि लेकिन दस-बीस-तीस साल के बाद इसका क्या असर होगा यह कोई नहीं कह सकता."
हालांकि नड्डा के कार्यकाल को देखें तो पार्टी अध्यक्ष के दौर पर वो काफ़ी सफल साबित हुए हैं. उनके कार्यकाल में पार्टी ने लोकसभा चुनाव से लेकर कई राज्यों के विधानसभा चुनाव जीते हैं.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "इस मामले में प्रदर्शन मुद्दा नहीं है. हालांकि बीजेपी ने इस मुद्दे पर कभी खुलकर नहीं कहा है, लेकिन सर्वसम्मति नहीं बनी है वर्ना देरी क्यों हो रही है."

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इसके अलावा बीजेपी के लिए उसका नया अध्यक्ष बहुत महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि उन्हें ही साल 2029 के लोकसभा चुनावों की तैयारी करनी होगी.
इससे पहले डिलिमिटेशन और लोकसभा और राज्यों की विधानसभा में महिला आरक्षण की वजह से जो बदलाव आना है, उसका भी ध्यान रखना होगा.
वहीं बीजेपी के लिए साल 2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी काफ़ी महत्वपूर्ण होगा. ख़ासकर साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जो नुक़सान हुआ है उसकी भरपाई करना भी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "ये सारी घोषित वजहें हैं और जो वजह घोषित नहीं है, मैं समझता हूं कि वो जाति जनगणना और कास्ट पॉलिटिक्स का मुद्दा है. इस राजनीतिक हक़ीक़त का जवाब भी बीजेपी को तलाशना है. इसके अलावा महिला भी एक मुद्दा है क्योंकि कांग्रेस के पास कम से यह कहने को है कि सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष रही हैं, जबकि बीजेपी में अब तक कोई महिला अध्यक्ष नहीं बनी है."
माना जाता है कि हाल के समय में बीजेपी की नज़र में दक्षिण भारत भी है, जहां वो पार्टी का विस्तार करना चाहती है. तो क्या बीजेपी दक्षिण भारत से किसी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकती है?
हालांकि दक्षिण भारत के अध्यक्षों के कार्यकाल में बीजेपी का प्रदर्शन बहुत बेहतर नहीं रहा है.
बीजेपी का इतिहास

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इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान लागू की गई इमरजेंसी के बाद देश के तमाम विपक्षी दलों ने जनता पार्टी के नाम से मोर्चा बनाकर केंद्र में अपनी सरकार बनाई थी. हालांकि साल 1977 के आम चुनावों के बाद बनी यह सरकार तीन क़रीब तीन साल में ही गिर गई.
उसके बाद साल 1980 में हुए आम चुनावों में जनता पार्टी महज़ 31 सीटों पर सिमट गई थी. इस दौरान एक तरफ दोहरी सदस्यता का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस में बना हुआ था.
जनता पार्टी के नेशनल एग्ज़ीक्यूटीव ने अपने सदस्यों के लिए दोहरी सदस्यता पर पाबंदी लगा दी. इसके तहत पार्टी सदस्यों पर एक साथ आरएसएस और पार्टी दोनों के सदस्य होने पर पाबंदी लगा दी गई.
उसके बाद आरएसएस से जुड़े राजनीतिक दल 'जनसंघ' के जो सदस्य जनता पार्टी में शामिल हुए थे उन्होंने 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की स्थापना की.
उस समय अटल बिहारी वाजपेयी को बीजेपी का संस्थापक अध्यक्ष चुना गया.
उसके बाद 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस की लहर चली जिसमें बीजेपी महज़ दो सीट ही जीत पाई, जबकि कांग्रेस को 404 लोकसभा सीटें मिली थीं.
साल 1986 में लाल कृष्ण आडवाणी को बीजेपी ने अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना. साल 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने ऐतिहासिक राम रथ यात्रा निकाली.
इसने बीजेपी की राजनीति दशा को पूरी तरह बदल दिया. साल 1991 में हुए आम चुनावों में बीजेपी ने 120 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की.
इस तरह से चुनावों में अच्छे और बुरे प्रदर्शनों के बीच बीजेपी का सफर आगे बढ़ता रहा. बीजेपी के नेतृत्व में पहली बार साल 1996 में केंद्र में सरकार बनी जब पार्टी को आम चुनावों में सबसे ज़्यादा 161 सीटों पर जीत मिली.
उस वक़्त अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की. हालांकि उनकी सरकार महज़ 13 दिल चल पाई और बहुमत न होने की वजह से सरकार गिर गई.
उसके बाद बीजेपी ने एनडीए बनाकर साल 1998 और फिर 1999 में सरकार बनाई. साल 2004 में एनडीए और बीजेपी को लोकसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा.
उसके बाद बीजेपी की सरकार साल 2014 में ही वापस आई जब नरेंद्र मोदी पार्टी का चेहरा बने. इस दौरान पार्टी अध्यक्ष पर नियमित तौर पर बदलते रहे, लेकिन यह पहला मौक़ा है जब बीजेपी के अध्यक्ष पद पर कोई फ़ैसला नहीं हो पाया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















