चीन से रिश्ते बेहतर होने की उम्मीद जता रहे हैं पीएम मोदी लेकिन ये भी हैं चुनौतियां

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- Author, माइकल कुगलमैन
- पदनाम, विदेश नीति विश्लेषक
हाल ही में एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी चीन से भारत के संबंधों को लेकर सकारात्मक बातें कही हैं. उन्होंने कहा कि विवादित भारत-चीन सीमा पर हालात सामान्य हो चुके हैं. साथ ही उन्होंने संबंध मज़बूत करने की अपील की.
ये बयान ध्यान खींचने वाले हैं, क्योंकि साल 2020 में उत्तरी लद्दाख में सीमा पर हुई झड़प के बाद तनाव बहुत ज़्यादा है. यह साल 1962 में हुए युद्ध के बाद सबसे ख़तरनाक झड़प थी.
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मोदी के बयान की तारीफ़ की और कहा "दोनों देशों को सहयोगी होकर एक दूसरे की सफलता में योगदान देना चाहिए."
हाल ही में द्विपक्षीय संबंधों में सुधारों को देखते हुए मोदी का क़रीबी साझेदारी वाला यह प्रयास वास्तव में उतना बड़ा क़दम नहीं है, जितना कि लग सकता है.
अभी तक रिश्ते तनावपूर्ण बने हुए हैं और वास्तविक मेल-मिलाप के लिए द्विपक्षीय और व्यापक रूप से भू-राजनीतिक नज़रिए से बहुत कुछ सही होना चाहिए.

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क्या संबंध बेहतर हो पाएंगे?
भारत-चीन संबंधों में कई अच्छे पहलू हैं.
दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है. लद्दाख की झड़प के बावजूद चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार बना हुआ है. ब्रिक्स से लेकर एशियाई इन्फ़्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक तक दोनों देश ऐसे कई संगठनों में साझेदार हैं.
भारत और चीन ग़ैर-पश्चिमी आर्थिक मॉडल को समृद्ध करने, इस्लामिक आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई और अमेरिका के दबदबे को अस्वीकार करते हैं.
लद्दाख की झड़प के बाद दोनों देशों के संबंध कई दशकों के सबसे निचले स्तर पर चले गए लेकिन सेनाओं के बीच उच्च स्तरीय वार्ता जारी रही. इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों देश अक्तूबर में सीमा पर पट्रोलिंग के लिए राज़ी हो गए.
अक्तूबर में ही रूस में मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से ब्रिक्स सम्मेलन में मुलाक़ात की और दोनों ने भविष्य में आपसी सहयोग की बात कही. जनवरी में दोनों पक्ष सीधी फ़्लाइट के लिए राज़ी हुए.
इन सबके बावजूद, संबंधों में खटास जारी है.

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पाकिस्तान और अमेरिका पर नज़र
दोनों देश एक-दूसरे के मुख्य प्रतिस्पर्धी देशों से नज़दीकी सुरक्षा संबंध बनाए हुए हैं: भारत अमेरिका के साथ और चीन पाकिस्तान के साथ.
चीन विवादित कश्मीर क्षेत्र में भारत की नीतियों का विरोध करता है. चीन परमाणु आपूर्तिकर्ता जैसे प्रभावशाली समूहों में भारत की सदस्यता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता में बाधा डालकर भारत की महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को विफल कर रहा है.
भारत के विशाल समुद्री क्षेत्र में चीन की बड़ी नौसैनिक उपस्थिति है तथा उसका एकमात्र विदेशी सैन्य अड्डा भी यहीं है.
चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना को भारत लगातार नकारता रहा है. भारत का कहना है कि यह परियोजना उसके क्षेत्र से होकर गुज़रती है. चीन इस परियोजना के ज़रिए भारत के पड़ोस में अपने पैर पसारना चाहता है.
भारत ताइवान के साथ अपने संबंध मज़बूत कर रहा है जिसे चीन अपना 'विद्रोही प्रांत' बताता है. भारत ने तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा को शरण दी है जिन्हें चीन 'ख़तरनाक अलगाववादी' की संज्ञा देता है.
भारत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से सुपरसोनिक मिसाइलों की बिक्री के लिए बातचीत कर रहा है, जिसका इस्तेमाल दक्षिण चीन सागर में चीनी उकसावे को रोकने के लिए किया जा सकता है.
चीन कई वैश्विक मंचों को जिनमें भारत शामिल है, जैसे इंडो-पैसिफिक क्वाड और मध्य पूर्व यूरोप आर्थिक गलियारा, अपने काउंटर के प्रयासों के रूप में देखता है.

क्या फिर होगी मोदी-शी की मुलाक़ात?
संबंधों के भविष्य को बेहतर ढंग से समझने के लिए कई ऐसे संकेत हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए.
पहला है सीमा पर बातचीत. 3,380 किलोमीटर लंबी सीमा का पचास हज़ार वर्ग मील क्षेत्र विवादित बना हुआ है.
सीमा पर स्थिति दोनों के बीच संबंधों का सबसे बड़ा संकेतक है. लद्दाख की झड़प के बाद भरोसा टूटा था जिसे पिछले साल हुई पट्रोलिंग डील के ज़रिए वापस हासिल किया गया था. अगर दोनों पक्ष और अधिक भरोसा पैदा कर सकते हैं, तो यह संबंधों के लिए शुभ संकेत होगा.
भविष्य में उच्च स्तरीय सहभागिता भी महत्वपूर्ण है. अगर मोदी और शी, जो दोनों ही व्यक्तिगत कूटनीति को महत्व देते हैं, इस साल मिलते हैं तो इससे द्विपक्षीय संबंधों में आई हालिया गति को बल मिलेगा. उनके पास जुलाई में होने वाली ब्रिक्स, नवंबर में जी-20 और इस साल के बाद होने वाली शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक के बहाने मुलाक़ात का मौक़ा होगा.
एक और ज़रूरी संकेत है चीनी निवेश. यह मैन्युफैक्चरिंग से लेकर नवीकरणीय ऊर्जा तक के प्रमुख भारतीय उद्योगों में महत्वपूर्ण पूंजी लाएगा और चीन के साथ भारत के 85 बिलियन डॉलर के व्यापार घाटे को कम करने में मदद करेगा.
इस तरह के निवेश में बढ़ोतरी से भारत को आर्थिक रफ़्तार मिलेगी और चीन को दुनिया की तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था में ज़्यादा निवेश का मौक़ा मिलेगा. मज़बूत आर्थिक सहयोग सीमा पर तनाव कम करने के लिए अधिक प्रोत्साहन देगा.

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पड़ोसी देशों का झुकाव किस तरफ़?
क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रम भी देखने लायक हैं.
बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका भारत के इन चार पड़ोसी देशों में नए नेताओं ने सत्ता संभाली है. इन नेताओं का अपने पूर्ववर्ती नेताओं की तुलना में चीन की तरफ़ झुकाव ज़्यादा है.
लेकिन अब तक उन्होंने बीजिंग और दिल्ली के साथ संबंधों को संतुलित करने का प्रयास किया है, न कि चीन के साथ तालमेल बिठाने का.
अगर ऐसा जारी रहता है तो भारत की पड़ोसी देशों पर चीन के प्रभाव वाली चिंता थोड़ी कम हो सकती है. साथ ही, अगर चीन भारत के क़रीबी दोस्त रूस के साथ अपनी बढ़ती साझेदारी से पीछे हटता है तो इससे भारत को फ़ायदा होगा.
हालांकि, यह तभी संभव हो सकेगा जब रूस-यूक्रेन युद्ध ख़त्म हो जाए क्योंकि जंग ने रूस की चीन पर निर्भरता को बढ़ा दिया है.
भारत-चीन के बीच 'ट्रंप फ़ैक्टर'
ट्रंप फ़ैक्टर भी एक बड़ा फ़ैक्टर है.
चीन पर टैरिफ़ बढ़ाने के बावजूद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के साथ तनाव कम करने की इच्छा जताई है.
अगर ऐसा होता है तो भारत की चिंता इससे बढ़ सकती है. भारत को यह चिंता होगी कि फिर अमेरिका चीन के ख़िलाफ़ भारत की मदद नहीं करेगा. इसलिए भारत चीन के साथ अपने संबंधों को बेहतर करना चाहेगा.
इसके अलावा अगर ट्रंप की आगामी टैरिफ़ नीति भारत को धक्का देती है तो निश्चित रूप से भारत के पास चीन के साथ आर्थिक सहयोग को मज़बूत करने का कारण होगा. इस बात की संभावना इसलिए अधिक है क्योंकि अमेरिका और भारत के बीच 10 प्रतिशत औसत टैरिफ़ का अंतर है.
भारत और चीन एशिया के दो सबसे बड़े देश हैं और दोनों खुद को गौरवशाली सभ्यता वाले देश मानते हैं.
वे स्वाभाविक प्रतिस्पर्धी हैं. लेकिन संबंधों में हाल ही में हुए सकारात्मक सुधार अन्य मोर्चों पर द्विपक्षीय प्रगति की संभावना के साथ संबंधों में अधिक स्थिरता ला सकते हैं. साथ ही यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मोदी की सुलह की भाषा केवल बयानबाज़ी न हो.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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