चीन में काम करने वाले उत्तर कोरियाई लोगों का 'गुलामों की तरह शोषण'

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- Author, जीन मैकेंज़ी
- पदनाम, सियोल संवाददाता
पिछले महीने एक ख़बर सामने आई कि चीन में काम करने वाले उत्तर कोरियाई लोग पैसा न मिलने पर हिंसा पर उतर आए थे.
उनका आरोप था कि उनका वेतन उत्तर कोरिया की सरकार को हथियार निर्माण के लिए दिया जा रहा है.
उत्तर कोरियाई लोगों के प्रदर्शन की ख़बरें कभी दिखती नहीं हैं क्योंकि सरकार का नागरिकों पर कड़ा नियंत्रण हैं और सार्वजनिक तौर पर असंतोष का मतलब है फांसी की सज़ा.
हालांकि हिंसा की ख़बर अपुष्ट है लेकिन इसने बाहर काम कर रहे हज़ारों उत्तर कोरियाई लोगों की कुशलता को लेकर चिंताएं पैदा कर दीं. बीबीसी ने चीन में काम कर चुके एक उत्तर कोरियाई वर्कर से बात की जिसने दावा किया कि विरोध प्रदर्शन करने वालों के वेतन रोक लिए गए थे.
बीबीसी ने खुद को आईटी वर्कर बताने वाले इस व्यक्ति का पत्राचार देखा है, जिसने आरोप लगाया कि उनका ‘ग़ुलामों की तरह शोषण’ किया जाता है.
इलाक़े में मौजूद स्रोतों के हवाले से एक पूर्व उत्तर कोरियाई राजनयिक ने बताया कि 11 जनवरी को उत्तर पूर्वी चीन में कई उत्तर कोरियाई कपड़ा फ़ैक्ट्रियों में दंगे भड़क गए.
1990 के दशक में दक्षिण कोरिया भाग आए को योंग ह्वान ने बीबीसी को बताया कि ब वर्करों को पता चला कि उनका एक साल का बकाया वेतन प्योंगयांग में युद्ध की तैयारियों के लिए ट्रांसफ़र कर दिया गया तो उनका गुस्सा फूट पड़ा.
को योंग ह्वान ने कहा, “वे हिंसक हो गए और उन्होंने सिलाई मशीनें और किचन के बर्तन तोड़ने शुरू कर दिए. कुछ ने उत्तर कोरियाई अधिकारियों को रूम में बंद कर दिया और उनके साथ मारपीट की.”
बीबीसी ह्वान के दावे की पुष्टि नहीं कर सकता क्योंकि इस ख़बर की सत्यापन योग्य कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. उत्तर कोरिया में ही उच्च स्तर की गोपनीयता नहीं बरती जाती, बल्कि चीन में इसकी फ़ैक्ट्रियों में भी भारी सुरक्षा बंदोबस्त हैं.
एक अनुमान के मुताबिक, एक लाख उत्तर कोरियाई लोग विदेशों में काम करते हैं. इनमें से अधिकांश उत्तर पूर्व चीन में फ़ैक्ट्रियों और निर्माण स्थलों पर हैं. लेकिन फ़ैक्ट्रियों का संचालन उत्तर कोरिया की सरकार करती है.
एक अनुमान के अनुसार, 2017 से 2023 के बीच उन्होंने प्योंगयांग के लिए 74 करोड़ डॉलर कमाए.
उनकी अधिकांश कमाई सरकार को सीधे ट्रांसफ़र कर दी जाती है.
लेकिन ह्वान को पता चला है कि कोविड महामारी के दौरान हड़ताली फ़ैक्ट्रियों के सभी टेक्सटाइल वर्करों के वेतन रोक लिए गए थे और उन्हें बताया कि उत्तर कोरिया लौटने पर उन्हें भुगतान कर दिया जाएगा.
वर्करों पर कड़ी बंदिश

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आम तौर पर ये वर्कर देश से बाहर तीन साल तक रहते हैं लेकिन उत्तर कोरिया के कड़े बॉर्डर लॉकडाउन के कारण अब वे सात सालों के लिए देश से बाहर फंस गए हैं.
ह्वान का दावा है कि जब उत्तर कोरिया ने अपनी सीमाएं खोलीं तभी से असंतोष फूटने लगा लगा था.
कुछ वर्कर घर आना चाह रहे थे ताकि अपना पैसा ले सकें. जब उन्हें पता चला कि उनका बकाया नहीं मिलेगा, उनका गुस्सा फूट पड़ा.
ऐसा ही विवरण दक्षिण कोरिया सरकार के पैसे से चलने वाले थिंक टैंक, कोरिया इंस्टीट्यूट फ़ॉर नेशनल यूनिफ़िकेशन (केआईएनयू) में वरिष्ठ शोधकर्ता चो हान-बीयोम ने साझा किया.
चीन में कुछ स्रोतों के हवाले से उन्होंने कहा कि जिलीन प्रांत में 15 फ़ैक्ट्रियों के 2,500 वर्कर हिंसक प्रदर्शन में शामिल थे.
ये उत्तर कोरिया के इतिहास का ज्ञात सबसे बड़ा प्रदर्शन है. हालांकि इन प्रदर्शनों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती.
चो हान-बीयोम ने कहा, “देश से बाहर बिना वेतन के इतने लंबे समय तक काम करने के कारण ये वर्कर मानसिक और शारीरिक रूप से थक गए होंगे और घर जाना चाह रहे होंगे.”
साल 2017 से 2021 के बीच चीन में काम कर चुके एक उत्तर कोरियाई वर्कर ‘जुंग’ ने नाम न ज़ाहिर करते हुए बीबीसी को बताया कि सबसे अच्छी कंपनी में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों में से वो एक थे. इसका मतलब था कि उन्हें अधिक सहूलियतें थीं.
इसके बावजूद उन्हें अपनी कुल कमाई का 15% ही मिल पाया. बाकी मैनेजरों और सरकारी परियोजनाओं के खाते में चला गया.
हालांकि जुंग को हर महीने वेतन मिलता था लेकिन उनका दावा है कि घाटे में चलनी वाली कंपनियों में वर्करों के वेतन रोक लिए जाते हैं.
उन्होंने कहा, “कड़ाके की ठंडक के दौरान कुछ लोगों को कमरा गर्म की करने की सुविधा नहीं मिलती थी और वे परिसर छोड़कर ज़रूरी चीज़ों के लिए भी बाहर नहीं जा सकते सकते थे.”
जुंग को हफ़्ते में एक बार बाहर जाने दिया जाता था लेकिन कोविड के बाद एक साल तक उन्हें काम की जगह छोड़कर जाने नहीं दिया गया.
प्रतिबंधों के बावजूद विदेश की नौकरियों की होड़ है क्योंकि वहाँ उत्तर कोरिया के मुकाबले दस गुना से भी अधिक आमदनी हो सकती है.
वर्करों को चुनने के लिए उनका इतिहास खंगाला जाता है और पता किया जाता है कि कोई संबंधी देश छोड़कर भागा तो नहीं. इसके आलावा उनके परिवार को देश में रहना होता है ताकि भागने से उन्हें रोका जा सके.
बीबीसी ने इस समय चीन में काम करने वाले एक उत्तर कोरियाई का मेल देखा है जिससे पता चलता है कि पिछले चाल सालों में वर्करों पर कितना दबाव बढ़ा दिया गया है.
उत्तर पूर्वी चीन में आईटी वर्कर के रूप में काम करने वाला व्यक्ति को योंग ह्वान को एक साल से मेल कर रहा है और प्रदर्शन की बात सुनकर उसने पिछले सप्ताह ही संपर्क किया था.
ह्वान ने बताया कि उन्होंने इस व्यक्ति की पहचान पुख़्ता की थी लेकिन बीबीसी इसकी पुष्टि नहीं कर सकता.
वेतन रोकने से असंतोष

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इस आईटी वर्कर ने लिखा, “उत्तर कोरियाई सरकार आईटी वर्कर्स का गुलामों की तरह शोषण करती है. हमसे हफ़्ते के छह दिन 12 से 14 घंटे काम कराए जाते हैं.”
उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को अमेरिका और यूरोप के ग्राहको के लिए रात में काम करना पड़ता है जिससे सेहत संबंधी दिक्कतें होती हैं.
जब वो पहली बार पुहंचा उसे हर महीने कमाई का 15-20% दिया जाता था लेकिन उन्होंने दावा किया 2020 में उनका भुगतान रुक गया.
उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर कोरिया से आदेश आया कि वर्करों को रात में उनके कैंपों में ताला बंद कर रखा जाए ताकि वो भाग न सकें.
इस व्यक्ति ने मेल में विस्तार से बाताया कि कैसे मैनेजर वर्करों को सरेआम बेइज़्ज़त करते हैं और सबके सामने थप्पड़ मारते हैं.
लेकिन अच्छा प्रदर्शन करने वालों को उत्तर कोरियाई रेस्तरां में दावत पर ले जाया जाता, उन्हें किसी एक वेट्रेस के साथ शाम भी गुजारने दिया जाता है.
एम्प्लाई ऑफ़ द मंथ को सबसे पहले चुनने दिया जाता. उन्होंने मैनेजरों पर आरोप लगाया कि ‘वे होड़ करने और अधिक से अधिक पैसे कमाने के लिए युवाओं को उनकी यौन इच्छाओं का सहारा लेते हैं.’
बाहर काम कर चुके जुंग ने बताया कि उनकी भी कंपनी में ये होता था और ‘कोविड के दौरान चूंकि वर्कर घर के अंदर फंस गए थे और बहुत तनाव में थे’, उन्हें कई दफ़ा बाहर ले जाया जाता था.
उत्तर कोरियाई मानवाधिकार के लिए डेटाबेस सेंटर के कार्यकारी निदेशक हान्ना सोंग ने कहा कि बाहर भेजे जाने वाले वर्करों को आम तौर पर बहुत कठिन परिस्थितियों और कड़ी निगरानी में रखा जाता है क्योंकि वो बहुत कम पैसे लेकर घर लौटते हैं.
सोंग ने कहा कि वेतन रोके जाने की घटनाएं उन्होंने भी सुन रखी हैं.
वर्करों के बीच बढ़ती हताशा के बावजूद प्योंगयांग उन्हें वापस बुलाने को अनिच्छुक लगता है.
2017 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया को अपने विदेशों में वर्कर भेजने पर प्रतिबंध लगा दिया था और सभी देशों सेकहा था कि 2019 के अंत तक वे उन्हें वापस भेज दें.
लेकिन चीन ने इन प्रतिबंधों को नहीं माना और वर्करों के नए बैच स्वीकार कर रहा है.
उत्तर कोरिया के लिए ख़तरे की घंटी

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को योंग ह्वान ने कहा कि प्रदर्शन के बाद उत्तर कोरिया ने अपने अधिकारियों को चीन स्थित फ़ैक्ट्रियों में वर्करों को आंशिक भुगतान करने के लिए भेजा लेकिन अभी भी दसियों लाख डॉलर बकाया है.
हो सकता है कि प्रदर्शन की बात बढ़ा चढ़ा कर की गई हो लेकिन जिन लोगों से बीबीसी ने बात की उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ घटना ज़रूर हुई थी.
दक्षिण कोरिया की ख़ुफ़िया एजेंसी ने बीबीसी को बताया कि ‘काम के ख़राब के हालात’ के कारण विदेश में रह रहे उत्तर कोरियाई वर्करों से जुड़ी ‘कई घटनाएं’ हुई थीं और वे इस पर नज़र रखे हुए हैं.
सोंग ने कहा कि अचानक बड़े पैमाने पर प्रदर्शन होने की कल्पना करना मुश्किल है क्योंकि ‘सुरक्षा अधिकारी इसका पहले ही पता लगा लेते हैं और उसे विफल कर देते हैं.’
दक्षिण कोरिया के सेजोंग इंस्टीट्यूट में उत्तर कोरियाई राजनीतिक अर्थशास्त्र के एक्सपर्ट पीटर वार्ड ने प्रदर्शन की ख़बर पर संदेह जताया क्योंकि इसकी कोई भरोसेमंद पुष्टि नहीं है, लेकिन विदेशों में वर्करों की हालत को देखते हुए प्रदर्शन ‘संभव’ है.
अगर ये सही भी है तो डॉ. वार्ड के अनुसार, यह सरकार के लिए कोई ख़तरा नहीं है.
उन्होंने कहा, “यह श्रम विवाद लगता है, ये लोग सरकार उखाड़ फेंकने की कोशिश नहीं कर रहे थे.”
डॉ. वार्ड ने कहा कि उत्तर कोरिया को इस मुद्दे को हल करना होगा क्योंकि चीन नहीं चाहेगा कि उसकी ज़मीन पर प्रदर्शन हों और इस तरह की व्यवस्था को वो रोक सकता है.
लीहायून चोई की अतिरिक्त रिपोर्टिंग
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