किम जोंग-उन और पुतिन को आख़िर एक दूसरे से क्या चाहिए?

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- Author, स्टीव रोज़नबर्ग
- पदनाम, रूस संपादक
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन दोनों में कई बातें कॉमन हैं.
दोनों ही ज़्यादा बाहर नहीं निकलते हैं. पुतिन इस साल रूस से बाहर कहीं नहीं गए हैं.
दूसरी तरफ़ किम जोंग उन चार बरस बाद उत्तर कोरिया से बाहर निकल रहे हैं.
रूस और उत्तर कोरिया दोनों पर ही 'दूसरे देशों के लिए परेशानी का सबब बनने' का आरोप लगता रहा है.
दोनों ही देशों पर सख़्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लागू हैं. दोनों ही देशों की सरकारें अमेरिकी 'प्रभुत्व' की आलोचक रही हैं. अक्सर ये देखा गया है कि किसी साझे दुश्मन की वजह से दो नेता एक दूसरे के क़रीब आ जाते हैं.

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ऐसा ही कुछ पुतिन और किम के साथ होता दिख रहा है.
दोनों की नज़दीकी में भले ही ऊपर वाले का कोई योगदान न हो लेकिन साल 2023 में दुनिया के जो हालात हैं, उससे प्रभावित ज़रूर दिखती है.
तो पुतिन और किम के बीच ये जो 'भाईचारा' है, उसे क्या नाम दिया जाए.
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किम जोंग उन के बारे में कभी ये कहा था कि वे उन्हें 'पसंद करने लगे' हैं.
लेकिन पुतिन और किम सार्वजनिक रूप से एक दूसरे पर तारीफों के फूल बरसाने से बचते हुए दिख रहे हैं. दोनों ही नेताओं को ये लगता है कि उनके क़रीबी रिश्ते उन्हें कई फायदे पहुंचा सकते हैं.
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तो पुतिन के रूस को किम जोंग उन के इस दौरे से क्या हासिल होगा? इसकी शुरुआत उत्तर कोरिया की डिफेंस इंडस्ट्री से की जा सकती है. उत्तर कोरिया के रक्षा उद्योग में व्यापक स्तर पर उत्पादन की क्षमता है.
यूक्रेन में रूस की लड़ाई जिस तरह से लंबी खिंच रही है, उससे तो ये लगता है कि मॉस्को के लिए गोला बारूद की आपूर्ति के लिए प्योंगयांग एक अच्छा जरिया साबित हो सकता है.
अमेरिका को संदेह है कि रूस ने पहले से ही इस विकल्प पर काम करना शुरू कर दिया है. अमेरिका ने दावा किया है कि रूस और उत्तर कोरिया के बीच हथियारों के सौदे को लेकर बातचीत काफी आगे बढ़ गई है और रूस कथित रूप से उससे गोला-बारूद की सप्लाई सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है.
रूसी अधिकारियों ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है. लेकिन ऐसे कई स्पष्ट संकेत सामने आ चुके हैं, जो ये इशारा करते हैं रूस और उत्तर कोरिया सैनिक सहयोग बढ़ाने का इरादा रखते हैं.
इसी जुलाई की बात है जब कोरियाई संधि की 70वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए सर्गेई शोइगु ने उत्तर कोरिया का दौरा किया था. सोवियत संघ के विघटन के बाद किसी रूसी रक्षा मंत्री का ये पहला उत्तर कोरिया दौरा था.
सर्गेई शोइगु ने इस यात्रा के दौरान हथियारों की एक प्रदर्शनी में हिस्सा लिया जिसमें किम जोंग ने उनके लिए टुअर गाइड की भूमिका निभाई. इसी यात्रा में रूसी रक्षा मंत्री ने ये भी संकेत दिया कि भविष्य में दोनों देशों का संयुक्त सैन्य अभ्यास भी हो सकता है.
रूस के पूर्व विदेश मंत्री आंद्रेई कोज़िरेव इन दिनों अमेरिका में रह रहे हैं.
आंद्रेई कोज़िरेव ने वीडियो कॉल पर बीबीसी से बातचीत में कहा, "अगर मॉस्को दुनिया के सबसे ग़रीब और सबसे कम विकसित देशों में से एक और अलग-थलग पड़े उत्तर कोरिया से हथियारों की सप्लाई की संभावना तलाश रहा है तो मेरी नज़र में ये रूस की 'महान शक्ति' के प्रोपेगैंडा की चरम सीमा की बेइज़्ज़ती है. कोई महाशक्ति उत्तर कोरिया के पास गठबंधन या मिलिट्री सप्लाई के लिए नहीं जाएगा."
किम जोंग उन से नज़दीकी
लेकिन वैश्विक राजनीति के समीकरणों में आमूलचूल बदलाव की ज़ोरदार चाहत ये करवा सकती है.
यूक्रेन पर पूरी ताक़त के साथ हमला करके व्लादिमीर पुतिन ने पहले ही ये संकेत दे दिए हैं कि उनका इरादा रूस की पसंद के मुताबिक़ ग्लोबल ऑर्डर (वैश्विक व्यवस्था) का निर्माण करना है.
मुमकिन है कि उत्तर कोरिया के साथ सैनिक सहयोग उनके इसी इरादे का एक और संकेत हो.
मॉस्को और प्योंगयांग के बीच हथियारों का सौदा इसी बदलाव को रेखांकित करेगा.
अब तक उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार कार्यक्रमों की वजह से उस पर लगाए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों में रूस पूरी तरह से शामिल था.
ये बात भी दिलचस्प है कि सुरक्षा परिषद के इन्हीं प्रतिबंधों के तहत उत्तर कोरिया से हथियारों की खरीद-बिक्री पर रोक है.
रूसी अख़बार 'मोस्कोव्स्की कॉस्मोलेट्स' ने पिछले हफ़्ते अपने पाठकों को याद दिलाया, "मॉस्को ने सुरक्षा परिषद के उन प्रस्तावों पर अपने दस्तखत किए थे. लेकिन कोई बात नहीं एक दस्तखत को भी मिटाया जा सकता है."
रूस की विदेश और रक्षा नीति परिषद के चेयरमैन फ़्योदोर लुक्यानोव को कोट करते हुए 'मोस्कोव्स्की कॉस्मोलेट्स' ने लिखा है, "लंबे समय से ये सवाल पूछा जाता रहा है कि कि आख़िर हम इन प्रतिबंधों से क्यों बंधे हुए हैं? अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पूरी व्यवस्था ही भारी गड़बड़ियों से गुजर रही है."
"बेशक, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध वैध हैं. इससे इनकार करना मुश्किल है. हमने उनके लिए वोट किया था. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. हम अपना वोट क्यों न पलट दें?"
किम जोंग उन को ये बातें किसी कर्णप्रिय संगीत की तरह लगी होंगी.
हमेशा साथ-साथ?

उत्तर कोरिया रूस से और क्या हासिल करना चाह रहा होगा?
उत्तर कोरिया निश्चित तौर पर अपने यहाँ खाद्यान की कमी को पूरा करने के लिए रूस की मदद चाहेगा. ऐसी भी अटकलें हैं कि उत्तर कोरिया रूस से न्यूक्लीयर पनडुब्बियां मांग सकता है.
डेढ़ साल से चल रहे यूक्रेन युद्ध के लिए पुतिन को गोला-बारूद की सख़्त ज़रूरत है. उत्तर कोरिया के साथ इस मामले पर डील संभव है. लेकिन इसका ये मतलब तो कतई नहीं है कि बिनी उत्तर कोरियाई मदद के रूसी जंगी मशीनें थम जाएंगी.
रूस के पूर्व विदेश मंत्री आंद्रेई कोज़िरेव कहते हैं, "पुतिन को ये डील हर हाल में चाहिए, ऐसा भी नहीं है. वे मौजूदा गोला-बारूद के सहारे भी इस युद्ध को लंबा खींच सकते हैं. और वो हालात के साथ खुद को एडजस्ट भी कर सकते हैं. पुतिन हर दिन पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद चीन, उत्तर कोरिया और दोस्ताना अफ़्रीकी मुल्कों से डील कर रहे हैं. ये भविष्य का विकल्प नहीं है पर मौजूदा वक़्त में तो इससे काम चल ही रहा है. और ये काम कई वर्षों तक चलता रहे."
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