इसराइल के अस्पतालों में फ़लस्तीनी क़ैदियों का हाल: पैरों में बेड़ियाँ, आँखों पर पट्टी और बिना पेनकिलर के ऑपरेशन

- Author, लूसी विलियमसन और बीबीसी आई इन्वेस्टिगेशन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
इसराइल के कुछ स्वास्थ्य कर्मियों ने बीबीसी को बताया है कि कैसे ग़ज़ा में फ़लस्तीनी क़ैदियों को अस्पताल में बिस्तरों पर बेड़ियों से बाँध कर रखा जाता है और उनकी आँखों पर पट्टी बाँध दी जाती है.
कभी-कभी उनके सारे कपड़े उतार दिए जाते हैं और उन्हें नैपी (डायपर) पहना दी जाती है.
एक स्वास्थ्यकर्मी का कहना है कि ये किसी 'यातना' से कम नहीं है.
एक व्हिसल-ब्लोअर ने बीबीसी को बताया कि कैसे सेना के अस्पतालों में बिना पेनकिलर (दर्द की दवा) दिए ही मरीज़ों का इलाज किया जा रहा था, जिससे मरीज़ों को असहनीय दर्द झेलना पड़ता था.
एक और व्हिसल-ब्लोअर का कहना था कि सरकारी अस्पतालों में क़ैदियों की सर्जरी जैसी प्रकिया में भी दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल चुनिंदा तरीक़े से और सीमित मात्रा में किया जाता था.
वो ये भी बताते हैं कि सेना के अस्थायी अस्पतालों में बिना उचित सुविधाओं के गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों का इलाज चल रहा है.
ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारी अस्पताल इनका इलाज नहीं करना चाहते और वो इन मरीज़ों को दूसरी जगह भेजना भी नहीं चाहते.
'मानवाधिकारों का हनन'

इसराइली सेना ने पूछताछ के लिए एक शख़्स को ग़ज़ा से हिरासत में लिया था.
उस व्यक्ति ने बीबीसी से बताया कि उसके पैर में एक घाव था जिसका इलाज करने से मना कर दिया गया, बाद में उनका पैर काटना पड़ा.
इस तरह के आरोपों से घिरे सेना के एक अस्पताल के सीनियर डॉक्टर ने इस बात से इनकार किया है कि अस्पताल की वजह से किसी मरीज़ को अपना अंग गंवाना पड़ा है. लेकिन जिस तरह गार्ड कैदियों के लिए बेड़ियों का इस्तेमाल करते हैं और दूसरे तरीके अपनाते हैं, डॉक्टर ने उन्हें 'अमानवीय' बताया.
इसराइली सेना का कहना है कि बंदियों के साथ 'सावधानी बरतते हुए उचित व्यवहार किया जाता है.'
बीबीसी ने जिन दो व्हिसल-ब्लोअर्स से बात की है वो कैदियों को मिल रहे इलाज का आकलन करने की स्थिति में थे. दोनों ने सहकर्मियों के बीच इस मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए अपना नाम न ज़ाहिर करने की गुज़ारिश की है.
इन दोनों व्हिसल-ब्लोअर्स के साथ बातचीत में जो बातें सामने आईं उनका ज़िक्र 'फ़िजिशियंस फ़ॉर ह्यूमन राइट्स इन इसराइल' की फ़रवरी में आई एक रिपोर्ट में मिलता है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसराइल की नागरिक और सैन्य जेलें 'बदला लेने का एक तंत्र बन गई हैं और यहां कैदियों के' मानवीय अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, ख़ासकर स्वास्थ्य से जुड़े उनके अधिकारों का हनन हो रहा है.

स्दे तेमान सैन्य अस्पताल
बीमार और घायल क़ैदियों के इलाज को लेकर जो चिंताएँ सामने आई हैं, वो दक्षिणी इसराइल के स्दे तेमान सैन्य अड्डे के एक अस्पताल से जुड़ी हैं.
बीते साल इसराइल पर हमास के हमले के बाद इसराइली स्वास्थ्य मंत्रालय ने यहाँ फ़ील्ड अस्पताल बनाया था.
इसराइल के कुछ सरकारी अस्पतालों और उनके कर्मचारियों ने हमास के हमले के दौरान पकड़े गए लड़ाकों का इलाज करने से मना कर दिया था, जिसके बाद ये अस्पताल बनाया गया.
तब से अब तक इसराइली सेना बड़ी संख्या में पकड़े गए ग़ज़ा के लोगों को पूछताछ के लिए स्दे तेमान जैसे सैन्य अड्डों पर लेकर आई है.
जिन पर हमास के लिए लड़ने का शक़ होता है, उन्हें डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाता है.
वहीं अन्य लोगों को बिना किसी आरोप के वापस ग़ज़ा भेज दिया जाता है. इसराइली सेना हिरासत में लिए लोगों के बारे में ब्योरा जारी नहीं करती.
हाथों में बेड़ियाँ, आँखों पर पट्टी
स्दे तेमान अस्पताल में मरीज़ का इलाज कर चुके कुछ डॉक्टरों के मुताबिक़ मरीज़ों के आँखों पर पट्टी बाँधकर रखा जाता है.
साथ ही उनके हाथ-पैर बिस्तर से बाँध दिए जाते हैं.
उन्हें शौचालय इस्तेमाल करने नहीं दिया जाता बल्कि उन्हें नैपी (डायपर) पहनाया जाता है.
स्दे तेमान अस्पताल में क़ैदियों को हथकड़ी लगाने के आरोपों पर इसराइली सेना का कहना है कि "हर क़ैदी की रोज़ाना जाँच की गई है. ऐसा उन मामलों में ही किया जाता है जिनसे सुरक्षा को ख़तरा होता है."
सेना का कहना है कि डायपर का इस्तेमाल ऐसे मरीज़ों के मामले में किया गया ''जिनका ऑपरेशन होना है और जो पूरी तरह चल फिर नहीं सकते.''
लेकिन चश्मदीदों का कहना है कि नैपी और हथकड़ी का इस्तेमाल अस्पताल के हर वॉर्ड में हर जगह किया जा रहा है.
इन चश्मदीदों में अस्पताल के सीनियर एनेस्थियोलॉजिस्ट योएल डोनखिन भी शामिल हैं.
वो कहते हैं, ''सेना, मरीज़ को 100 फ़ीसदी आश्रित बना देती है, एक बच्चे की तरह. आपको हथकड़ी पहनाई जाती है, डायपर पहनाया जाता है. आपको पानी चाहिए, आपको सब कुछ चाहिए, ये अमानवीय है.''

डॉ डोनखिन कहते हैं कि हर मरीज़ का सटीक मूल्यांकन नहीं किया गया था, उन मरीजों के लिए भी नहीं जो ठीक से चल भी नहीं सकते थे. उदाहरण के लिए जिनके पैर कटे हुए थे उन्हें भी हथकड़ी लगाकर बिस्तर पर लिटाया गया था.
वो इस प्रक्रिया को "बेवकूफ़ी भरा" क़दम बताते हैं.
ग़ज़ा युद्ध के शुरुआती हफ़्तों में एक ऐसे ही अस्पताल में मौजूद दो चश्मदीदों ने हमें बताया कि वहाँ मरीज़ों को नग्न अवस्था में कंबल ओढ़ाकर रखा जाता था.
एक डॉक्टर जिन्हें वहाँ के हालात के बारे में जानकारी थी, उन्होंने बताया कि लंबे समय तक बिस्तर से बाँधकर रखने की वजह से मरीज़ों को ''भयानक दर्द'' होता था.
उन्होंने इसे ''यातना'' बताया. उनका कहना था कि बिस्तर से बांधे जाने के कुछ घंटों बाद ही मरीज़ों को तेज़ दर्द शुरू हो जाता है.
कुछ लोगों ने लंबे वक़्त तक ऐसे रहने से नर्व-डैमेज होने का जोख़िम भी जताया है.
'कुछ मरीज़ों के अंग भी काटने पड़े'
पूछताछ के बाद रिहा किए गए ग़ज़ा के क़ैदियों के जो फुटेज़ सामने आए हैं, उनमें उनकी कलाई और पैरों के आसपास चोट और जख़्म के निशान दिखाई दे रहे हैं.
पिछले महीने, इसराइल के दैनिक अख़बार हारेत्ज़ ने स्दे तेमान सैन्य अड्डे पर तैनात एक डॉक्टर के आरोपों को छापा था.
डॉक्टर का कहना था कि बेड़ियों से बाँधे जाने की वजह से हुए जख़्म के कारण दो क़ैदियों के पैर काटने पड़े थे.
अख़बार के मुताबिक़, ये आरोप डॉक्टर ने सरकार के मंत्रियों और अटॉर्नी जनरल को भेजे गए एक निजी पत्र में लगाया था.
पत्र में लिखा था कि दुर्भाग्य से इस तरह पैर काटना एक नियमित घटना हो गई है.
बीबीसी इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर पाया है.
डॉ डोनखिन का कहना है कि हाथ या पैर का काटा जाना सीधे तौर पर बेड़ियों से बाँधे जाने से नहीं जुड़ा हुआ है.
इसमें दूसरे कारक भी शामिल होते हैं, जैसे संक्रमण, डायबिटीज़ और ख़ून की नलियों से जुड़ी दूसरी दिक़्क़तें
इसराइली मेडिकल दिशानिर्देशों के मुताबिक़, किसी भी मरीज़ को तब तक चलने-फिरने से रोका नहीं जाना चाहिए, जब तक कोई ख़ास सुरक्षा कारण न हो और आवाजाही से रोके जाने को भी न्यूनतम स्तर पर लागू करना चाहिए.

इसराइल के मेडिकल एथिक्स बोर्ड के प्रमुख याशी वॉलफ़िश ने घटनास्थल का दौरा किया, जिसके बाद उन्होंने कहा कि सभी मरीज़ों को बिना बेड़ियों के इलाज पाने का अधिकार है, लेकिन कर्मचारियों की सुरक्षा नैतिकता से ऊपर है.
उन्होंने एक बयान में कहा, ''आतंकवादियों को इलाज की उचित सुविधा दी जाती है. उन पर न्यूनतम स्तर का प्रतिबंध लगाया जाता है ताकि कर्मचारियों की सुरक्षा का ख़्याल रखा जा सके.''
इसराइल की सेना ने ग़ज़ा के जिन लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था, उनमें से कई लोगों को बिना आरोप लगाए छोड़ दिया.
डॉ डोनखिन का कहना है कि स्दे तेमान सैन्य अस्पताल में मेडिकल कर्मचारियों की शिकायतों की वजह से बदलाव आया है, जिसमे ढीली बेड़ियाँ बाँधना भी शामिल हैं.
उन्होंने कहा कि उन्होंने गार्डों के साथ बातचीत में इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी मेडिकल प्रक्रिया से पहले प्रतिबंधों को हटाया जाए.
वो कहते हैं, ''वहाँ काम करना अच्छा नहीं लगता. मुझे पता है कि एथिकल कोड के हिसाब से किसी को बिस्तर से बांधकर रखना सही नहीं है, लेकिन इसका विकल्प क्या है? क्या उन्हें मरने के लिए छोड़ देना बेहतर है? मुझे ऐसा नहीं लगता.''
लेकिन रिपोर्ट्स से पता चलता है कि क़ैदियों के साथ अस्पताल के कर्मचारियों का बर्ताव सैन्य और नागरिक अस्पतालों में अलग-अलग है.

'असहनीय दर्द'
एक व्हिसल-ब्लोअर जिन्होंने इसराइल पर हमास के हमले के बाद अक्तूबर में स्दे तेमान अस्पताल में काम किया था, उन्होंने बताया कि कैसे मरीज़ों को एनेस्थेटिक समेत दर्द निवारक दवाएँ ज़रूरी मात्रा में नहीं दी जा रही थीं.
उन्होंने बताया कि कैसे एक बार एक डॉक्टर ने बुज़ुर्ग मरीज़ को दर्द निवारक दवा देने से इनकार कर दिया था. उस वक्त मरीज़ का एक घाव खोला जा रहा था और व्हिसल-ब्लोअर ने डॉक्टर से दर्द निवारक दवा देने का अनुरोध किया था.
उन्होंने बताया, ''वो मरीज़ दर्द से काँप रहा था, मैं रुका और मैंने कहा 'हम ऐसे ये जारी नहीं रख सकते, आपको उसे एनाल्जेसिया देना चाहिए'.''
डॉक्टर ने कहा कि इसे लगाने में अब देर हो चुकी है.
चश्मदीद का कहना था कि ऐसी प्रकियाओं को ''नियमित तौर पर बिना एनाल्जेसिया'' के किया जा रहा था, जिससे ''असहनीय दर्द'' होता था.
ऐसे ही एक और मौके़ पर, हमास के एक लड़ाके का ऑपरेशन चल रहा था और वो बार-बार उनसे मॉर्फ़िन या एनेस्थेटिक के स्तर को बढ़ाने की गुज़ारिश कर रहा था.
बात को अनसुना कर दिया गया. उस लड़ाके को अगले ऑपरेशन के बीच में ही होश आ गया और वो बहुत दर्द में था.
चश्मदीद ने बताया कि वो और उसके कुछ दूसरे सहकर्मी ये महसूस कर रहे थे कि ये बदले की भावना से किया जा रहा था.
इन आरोपों के जवाब में इसराइली सेना का कहना है कि क़ैदियों के ख़िलाफ़ हिंसा ''पूरी तरह से प्रतिबंधित'' है और सुरक्षाबलों को कैसा व्यवहार रखना चाहिए इसके बारे में
उन्हें नियमित तौर पर बताया जाता है.
सेना का कहना था कि हिंसा या अपमान के किसी भी ठोस आरोप की जाँच की जाएगी.
'दर्द निवारक दवाएँ नहीं दी जा रही थीं'
एक दूसरे व्हिसल-ब्लोअर का कहना था कि स्दे तेमान में जो कुछ हो रहा था, वो समस्या का एक पहलू है, जो सरकारी अस्पतालों तक में फैला हुआ है.
इस व्हिसल-ब्लोअर की पहचान छिपाने के लिए बीबीसी उन्हें 'यॉनी' कह रहा है.
यॉनी ने बताया कि सात अक्तूबर के हमले के बाद दक्षिण इसराइल के अस्पतालों में घायल लड़ाकों और पीड़ितों का इलाज करना एक चुनौती बन गई थी, अक्सर एक ही अस्पताल में इनका इलाज हो रहा था.
इसराइल पर हमास के हमलावरों हमला किया था. इस हमले में क़रीब 1,200 इसराइलियों की मौत हुई थी और क़रीब 250 लोगों को अगवा कर लिया गया था.
यॉनी कहते हैं, "पूरा माहौल बेहद भावुक था. साइकोलॉजिकल और क्षमता के लिहाज से दोनों ही स्तर पर अस्पताल पूरी तरह से भरे हुए थे."
उन्होंने आगे बताया, "ऐसा कई बार हुआ जब मैंने कर्मचारियों को ये बात करते हुए सुना कि क्या ग़ज़ा के क़ैदियों को दर्द निवारक दवाएँ मिलनी चाहिए, या क्या सज़ा के तौर पर इलाज का इस्तेमाल किया जा सकता है.''
उन्होंने कहा कि ऐसी बातचीत असामान्य बात नहीं थी. हालाँकि वास्तविक तौर पर ऐसे मामले कम देखने को मिल रहे थे.

यॉनी ने बीबीसी को बताया, ''मुझे एक ऐसे मामले की जानकारी है, जहाँ एक ऑपरेशन के दौरान दर्द निवारक दवा का इस्तेमाल चुनिंदा तरीक़े से और बहुत सीमित मात्रा में किया गया था.''
यॉनी कहते हैं, ''मरीज़ के साथ क्या हो रहा था इसकी जानकारी उसे नहीं दी जाती थी. ऐसे में अगर इलाज के दौरान मरीज़ का ऑपरेशन हो रहा है जिसमें उसके शरीर पर चीरा लगाना शामिल है और मरीज़ को इस बारे में जानकारी नहीं होती थी. उसकी आँखों पर पट्टी होती थी. ऐसे में इलाज और हमले के बीच एक बारीक रेखा ही बचती है.''
हमने स्वास्थ्य मंत्रालय से इन आरोपों का जवाब देने के लिए कहा लेकिन उन्होंने हमें सेना के पास भेज दिया.
यॉनी ने ये भी कहा कि स्दे तेमान फ़ील्ड अस्पताल गंभीर रूप से घायल मरीज़ों के लिए सही तरीक़े से तैयार नहीं था. लेकिन युद्ध के शुरुआती दौर में वहाँ कई ऐसे मरीजों को भी रखा गया था जिनके सीने और पेट में गोलियाँ लगने के घाव थे.
उन्होंने बताया कि कम से कम एक मरीज़ वहाँ बस इस वजह से रुका हुआ था, क्योंकि सरकारी अस्पताल उसे इलाज के लिए एडमिट नहीं कर रहे थे. उन्होंने बताया कि बेस पर डॉक्टर हालात से काफ़ी निराश नज़र आ रहे थे.
सुफ़ियान अबु सलाह की आपीबीती
ख़ान यूनिस में रहने वाले 43 साल के ड्राइवर सूफ़ियान अबु सलाह उन लोगों में से एक थे, जिन्हें इसराइली सेना ने छापे के दौरान हिरासत में ले लिया था.
उन्हें पूछताछ के लिए सैन्य अड्डे पर ले जाया गया.
उन्होंने बताया कि सैनिकों ने यात्रा के दौरान और बेस पर बेरहमी से पिटाई की. उनके पैर में एक हल्का घाव था जिसके इलाज के लिए भी मना कर दिया गया और बाद में उसमें संक्रमण फैल गया.
सूफ़ियान ने बीबीसी को बताया, "मेरे पैर में संक्रमण फैल गया और वो नीला पड़ गया. वो स्पंज जितना मुलायम हो गया."
उन्होंने कहा कि एक हफ़्ते के बाद गार्ड्स उन्हें अस्पताल ले गए. वो रास्ते में उनके जख़्मी पैर पर चोट करते हुए उन्हें ले गए.
जख़्म को साफ़ करने के लिए दो ऑपरेशन किए गए लेकिन उनसे काम नहीं बना.
वो बताते हैं, "इसके बाद वो मुझे सरकारी अस्पताल ले गए, वहाँ डॉक्टरों ने मुझे दो विकल्प दिए- पैर या ज़िंदगी.''
सूफ़ियान ने अपनी ज़िंदगी को चुना. इसके बाद डॉक्टरों ने उनका पैर काट दिया और उन्हें फिर से सैन्य अड्डे भेज दिया गया. बाद में उन्हें ग़ज़ा में छोड़ दिया गया.
वो कहते हैं, "वो वक़्त मानसिक और शारीरिक यातना का था. मैं उसके बारे में बयां नहीं कर सका. मुझे दो पैरों के साथ हिरासत में लिया गया था, अब मेरे पास एक ही बचा है. मैं तब भी रो रहा था और अब भी.''
इसराइली सेना ने सूफ़ियान के साथ हुए बर्ताव को लेकर लगाए गए आरोपों का जवाब नहीं दिया है.
लेकिन सेना ने ये कहा है कि गिरफ़्तारी या हिरासत के दौरान सूफ़ियान के साथ हुई हिंसा के दावों के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है, इसकी जाँच की जाएगी.

इसराइली स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देश
सात अक्तूबर के हमास के हमले के बाद के दिनों में इसराइल के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक दिशा-निर्देश जारी किया था, जिसके मुताबिक़ ग़ज़ा में क़ैदियों का इलाज सैन्य या जेल अस्पतालों में किया जाएगा.
इसके बाद ही स्दे तेमान अस्पताल बनाया गया था. इस फ़ैसले को इसराइल के मेडिकल जगत की संस्थाओं का समर्थन मिला था.
याशी वॉलफिश का कहना है कि ये नैतिक दुविधा का समाधान है, जिससे 'हमास के आतंकवादियों' के इलाज की ज़िम्मेदारी पब्लिक हेल्थ सिस्टम से हट जाएगी.
वहीं कुछ लोगों ने स्दे तेमान को बंद करने की मांग की थी. साथ ही यहाँ के हालात को 'मेडिकल प्रोफे़शनल और मेडिकल एथिक्स के लिहाज़ से निम्न स्तर' का बताया.
एक डॉक्टर ने बीबीसी से कहा, "मेरा डर ये है कि स्दे तेमान में हम लोग जो कर रहे हैं, उससे चीज़ें फिर कभी सामान्य नहीं होंगी. क्योंकि जो चीज़ें हमें पहले उचित नहीं लगती थीं, वो इस संकट के ख़त्म होने के बाद हमें उचित लगने लगेंगी.''
वहीं डॉ. डोनखिन कहते हैं कि फ़ील्ड अस्पताल के मेडिकल कर्मचारी कभी-कभी यहाँ के हालातों पर रोने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं.
वो कहते हैं, "जब हमारा अस्पताल बंद होगा, हम जश्न मनाएँगे."
(अतिरिक्त रिपोर्टिंग: नाओमी शेरबेल-बॉल, गिडी क्लेमन, आयशा खेराल्लाह)
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