भारत के चावल निर्यात पर प्रतिबंध का असर अमेरिका तक, लेकिन ऐसा क्यों हुआ

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    • Author, पायल भुयन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"पिछले शुक्रवार मुझे दोस्तों से पता चला कि आस-पास के किराना दुकानों में चावल की कमी हो गई है. मैंने सोचा ये अफ़वाह है, क्योंकि मुझे जानकारी थी कि भारत में चावल उत्पादन अच्छा है तो ऐसा हो नहीं सकता. फिर देखा अचानक धडाधड़ व्हॉट्सऐप में दोस्तों रिश्तेदारों के मैसेज आने लगे कि चावल और आटा नहीं मिल रहा है. बाद में जब मैं दुकान पर गया तो देखा कि जिस जगह चावल और आटा रखा जाता था वो पूरा रैक ही खाली थी."

अमेरिका के डैलस में पिछले 12 सालों रहने वाले कृष्णा बी कुमार कहते हैं कि उन्होंने इस तरह के हालात वहां कभी नहीं देखे.

वह बताते हैं कि आस-पास के किराना दुकानों में न चावल मिल रहा है और ना ही आटा, और जहां ये मिल भी रहा है वहां इसके लिए दो से तीन गुने दाम वसूले जा रहे हैं.

दरअसल, भारत सरकार ने 20 जुलाई को चावल के निर्यात को लेकर एक बड़ा फैसला लिया. इसके तहत चावल निर्यात में जो सबसे बड़ी कैटगरी नॉन-बासमती सफेद चावल की है, उस के एक्सपोर्ट पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है.

हालांकि जो स्टॉक निर्यात के लिए जहाज से निकल चुके हैं उस माल को उतारने की इजाज़त होगी. भारत सरकार के इस फ़ैसले के पीछे तर्क दिया गया है कि आने वाले त्योहार के मौसम में घरेलू बाज़ार में चावल की बढ़ती मांग और खुदरा क़ीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए ये फैसला लिया गया है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है. इस फ़ैसले के बाद भारत जितना चावल निर्यात करता है अब वो करीब करीब आधा हो जाएगा.

भारत सरकार के इस फैसले से दुनिया भर के खाद्य बाज़ार में चावल के दाम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.

लेकिन पहले समझते हैं ये फ़ैसला क्यों लिया गया.

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क्यों सरकार को उठाना पड़ा ये कदम

सरकार के मुताबिक़ घरेलू बाज़ार में चावल की क़ीमतें लगातार बढ़ रही हैं. चावल की खुदरा क़ीमतों में एक साल में 11.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है. सिर्फ़ पिछले महीने ये दर 3 प्रतिशत बढ़ गई.

घरेलू बाज़ार में चावल के दाम में कमी लाने और चावल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने पिछले साल 8 अगस्त को नॉन-बासमती सफ़ेद चावल के निर्यात पर 20 प्रतिशत का निर्यात शुल्क लगाया था ताकि चावल के इस किस्म की निर्यात में थोड़ी कमी आए. बावजूद इसके नॉन बासमती सफ़ेद चावल के निर्यात में इज़ाफ़ा देखा गया.

नॉन बासमती सफ़ेद चावल का निर्यात 2021-2022 मार्च में 33.66 लाख टन से बढ़कर (सितंबर-मार्च) 2022-2023 में 42.12 लाख टन तक पहुंच गया.

मौजूदा वित्त वर्ष में 2023-24 (अप्रैल-जून) में नॉन बासमती सफ़ेद चावल निर्यात लगभग 15.54 लाख टन निर्यात किया गया जो पिछले साल 2022-23 (अप्रैल-जून) के मुक़ाबले 35 प्रतिशत ज़्यादा है.

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सरकार का मानना है कि चावल की इस किस्म के निर्यात में ये तेज़ इज़ाफ़ा दुनिया भर के भू-राजनीतिक परिदृश्य, चावल उत्पादक देशों में अल नीनो और बदलते मौसम की वजह से हुआ है.

हालांकि भारत ने बासमती चावल और उबले चावल के निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है.

बीबीसी से बात करते हुए राइस असोसिएशन ऑफ़ इंडिया के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर राजीव कुमार कहते हैं, "घरेलू स्तर पर देखें तो चावल के दाम 4 रुपय प्रति किलो तक कम हुए हैं, इसलिए चावल के दाम कम करने का सरकार की कोशिश तो कारगर रही. मगर वहीं थाईलैंड और वियतनाम ने अपने चावल के निर्यात पर 10 प्रतिशत दाम बढ़ा दिए हैं. इसका असर वैश्विक खाद्य क़ीमतों पर पड़ेगा. थाईलैंड और वियतनाम से हमारा मुख्य मुक़ाबला है."

तो क्या वाकई अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चावल के दाम बढ़ रहे हैं?

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आईएमएफ़ ने क्या कहा

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने कहा है कि भारत के नॉन बासमती सफ़ेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का असर वैश्विक खाद्य मुद्रास्फ़ीति पर पड़ सकता है.

आईएमएफ़ के मुख्य अर्थशास्त्री पीएर-ओलिवीए गुहाशां ने कहा है, "हम भारत सरकार से चावल के निर्यात पर ऐसे प्रतिबंध हटाने की लिए कहेंगे, क्योंकि इसका असर दुनिया पर पड़ सकता है."

गुहाशां ने ये भी कहा, "भारत के इस फ़ैसले का असर वैसा ही होगा जैसा काला सागर से यूक्रेन के अनाज निर्यात पर रोक लगाने से हुआ है, जिससे दूसरे देशों में गेंहू के दाम बढ़ गए हैं. इससे इस साल वैश्विक अनाज की क़ीमतों में 10 से 15 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है."

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प्रतिबंध से फ़ायदा किसका

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इस सप्ताह वियतनाम से निर्यात किए जाने वाले चावल की कीमत बीते एक दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है.

भारत और थाईलैंड के बाद वियतनाम दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है.

राजीव कुमार इस प्रतिबंध से नुकसान की बात करते हुए कहते हैं, "मुझे लगता है कि किसानों के लिए बेहतर होता है कि उनके उत्पाद की मांग ज़्यादा हो. जब आप निर्यात पर प्रतिबंध लगाते हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि उनके उत्पाद की मांग कम होगी और किसान को ऊंचे दाम नहीं मिलेंगे. दूसरी बात ये है कि निर्यातक तो इस फ़ैसले से सीधे तौर पर प्रभावित हैं, उनकी तो ये रोज़ी-रोटी है."

"भारत का चावल दुनिया भर के 165 देशों में जाता है, जो चावल व्यापारियों की मेहनत का नतीजा है. इन्हीं की वजह से दुनिया भर में भारतीय चावल की मांग बढ़ी है. ग्लोबल ट्रेड में देखें तो भारत का 42 प्रतिशत मार्केट शेयर है. अगर ये प्रतिबंध लंबे समय तक चला तो हम इस मार्केट को खो सकते हैं. भारत इस बाज़ार में बड़ा खिलाड़ी है और अगर वो यहां से हटता है तो ज़ाहिर सी बात है कि दुनिया भर में क़ीमतें बढ़ेंगी. मुझे लगता है कि वो देश जो भारत के चावल पर निर्भर हैं उनके लिए ये बहुत बड़ी चुनौती है."

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राजीव कुमार ये भी कहते हैं, "चीन और फिलिपींस जो अमूमन थाईलैंड और वियतनाम से चावल खरीदते हैं, अब उन्हें बढ़े हुए दाम में चावल खरीदने पड़ेंगे."

ऑल इंडिया राइस असोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विजय सेतिया ने बीबीसी से बात करते हुए इस प्रतिबंध पर चितां जताई.

उनका मानना है कि इस प्रतिबंध से चावल के निर्यात में भारत की साख को धक्का लगेगा.

वो कहते हैं, "इस प्रतिबंध से भारत की जो एक बड़े मार्केट प्लेयर की छवि बन गई है, उसे नुकसान पहुंचेगा. जिन देशों में भारतीय चावल जाता है वहां दाम बढ़ सकते हैं, और इससे फ़ायदा वियतनाम, पाकिस्तान थाईलैंड जैसे देशों को होगा, क्योंकि उनका चावल अधिक दाम पर बिकेगा."

"विश्व व्यापार में 45 मिलियन टन चावल का निर्यात होता है जिसमें से भारत का हिस्सा 22 मिलियन टन है. इसमें बासमती और नॉन बासमती दोनों चावल शामिल है. अगर आप इसमें से 18 मिलयन टन घटा दें दो आप सोचिए कि इसका अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कितना असर होगा. तो ऐसी स्थिति में ये खरीदारों का नहीं विक्रेताओं का बाज़ार बन जाएगा."

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जमाखोरी की आशंका

पिछले सप्ताह भारत सरकार के इस फ़ैसले के बाद अमेरिका के भारतीय किराना दुकानों में भारतीय मूल के लोगों की लंबी कतार नज़र आई.

सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे वीडियो भी सामने आए जिसमें अमेरिका के डिपार्टमेंटल स्टोर पर चावल की लूट मची हुई नज़र आ रही है.

इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोग बाज़ार में चावल की कमी के डर से बाज़ार से ज़रूरत से ज़्यादा चावल खरीद रहे हैं. इस प्रतिबंध ने उत्तरी अमेरिका, यूरोप और पश्चिम एशिया में ख़ासकर तेलुगू समुदाय के लोगों के बीच चिंता का माहौल पैदा कर दिया है.

वहीं, अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू लिखता है कि अमेरिका के प्रमुख शहर जैसे कि टेक्सस, मिशिगन और न्यू जर्सी में कई भारतीय किराना दुकानों के बाहर चावल खरीदने कि लिए लगी कतार को देख कर दुकानदारों ने भी बिक्री सीमित कर दी. कई दुकानों पर ये नियम बनाए गए हैं कि एक ग्राहक चावल का एक बैग ही खरीद सकता है.

वहीं, ट्विटर पर एक यूज़र आर्यभट्ट एक तस्वीर ट्वीट कर लिखते हैं, "डैलस में पटेल ब्रदर्स स्टोर के बाहर भरतीय मूल के लोगों की लंबी कतार देखी गई."

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रूस-यूक्रेन के अनाज समझौते का असर

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद काला सागर से होने वाले अनाज निर्यात को लेकर आशंकाएँ जताई जा रही थी.

लेकिन रूस और यूक्रेन ने युद्ध के बावजूद पिछले साल काला सागर से अनाज के सुरक्षित निर्यात के लिए समझौता किया था.

ये समझौता पिछले साल जुलाई में लागू होने के बाद से तीन बार रिन्यू किया जा चुका है.

समझौते के तहत यूक्रेन के ओदेसा, चोर्नामोस्क और यूज़नी/पिवदनी बंदरगाहों से मालवाहक जहाज़ को काले सागर से गुज़रने की इजाज़त थी पर अब स्थिति बदल गई है.

पिछले दिनों रूस ने इस समझौते से अलग होने की घोषणा कर दी. अब चिंता ये जताई जा रही है कि पहले से ही अकाल का सामना कर रहे कई अफ़्रीकी देशों के लिए गंभीर खाद्य संकट पैदा हो सकता है.

जब दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा को लेकर संकट के हालात बने हुए हैं तो ऐसे में भारत की ओर से लगाया गया ये प्रतिबंध दुनिया में मंडरा रहे संकट को और गहरा सकता है.

अमेरिका के डैलस में काम कर रहे सॉफ़्टवेर इंजीनियर कृष्णा बी कुमार कहते हैं, "करीब दस किलो चावल का बैग जो पहले 14 से 15 डॉलर में मिल जाया करता था वो अब 40 डॉलर में मिल रहा है. यहां तक कि करीब 10 किलो आटे का बैग पहले 12 डॉलर तक मिल जाया करता था वो भी अब 20 डॉलर में मिल रहा है. हर चीज़ के दाम बढ़ गए हैं. ये सही नहीं हैं. लोग अनाज का स्टॉक खत्म हो जाने के डर से इन्हें जमा कर रहे हैं."

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भारत कितना चावल निर्यात करता है

भारतीय चावल के निर्यात पर लगा प्रतिबंध वैश्विक व्यापार के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

इसे समझने के लिए एक नज़र आंकड़ों पर डालते हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व चावल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 40% से अधिक है.

यह 2022 में 55.4 मिलियन टन थी. भारत का चावल निर्यात 2022 में रिकॉर्ड 22.2 मिलियन टन तक पहुंच गया था, जो दुनिया में चावल के चार सबसे बड़े निर्यातकों - थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और अमेरिका के कुल निर्यात से ज़्यादा है.

भारत 140 से अधिक देशों को चावल निर्यात करता है. भारतीय नॉन-बासमती चावल के प्रमुख खरीदारों में अफ्रीकी देश बेनिन, बांग्लादेश, अंगोला, कैमरून, जिबूटी, पापुआ न्यू गिनी, आइवरी कोस्ट, कीनिया और नेपाल शामिल हैं.

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वहीं, ईरान, इराक़ और सऊदी अरब मुख्य रूप से भारत से प्रीमियम बासमती चावल खरीदते हैं.

भारत ने 2022 में 17.86 मिलियन टन नॉन-बासमती चावल का निर्यात किया था, जिसमें 10.3 मिलियन टन नॉन-बासमती सफ़ेद चावल भी शामिल है.

सितंबर 2022 में, भारत ने टूटे हुए चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया और चावल की अलग अलग किस्म के निर्यात पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाया था.

भारतीय किसान साल में दो बार धान की रोपाई करते हैं. जून में बोई गई फसल का कुल उत्पादन 80 फीसदी से अधिक है, जो 2022-23 में 135.5 मिलियन टन थी.

वहीं, सर्दियों के महीनों में धान की खेती मुख्य रूप से मध्य और दक्षिण भारत में की जाती है. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब, ओडिशा और छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख चावल उत्पादक राज्य हैं.

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क्या जल्द ख़त्म होगा प्रतिबंध

राइस असोसिएशन ऑफ़ इंडिया के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर राजीव कुमार कहते हैं, "सरकार की चिंता को हम समझते हैं. हमें ये लगता है कि देश में चावल की कमी नहीं होगी."

"हमें उम्मीद है कि इस साल 130 मिलियन टन चावल का उत्पादन होगा और हमारी खपत 108 मिलियन टन के आसपास है. लेकिन पिछले छह महीने में चावल के दाम में तकरीबन 20 प्रतिशत का इज़ाफ़ा देखा गया है."

"इसकी वजह जो हमें समझ आता है, वो ये है कि कहीं कहीं लोगों ने चावल की जमाखोरी की है."

"आप भारतीय खाद्य निगम (एफ़सीआई) का स्टॉक देखें तो वो काफ़ी संतोषजनक है. एफ़सीआई के पास अपने बफ़र स्टॉक का ढाई गुना अनाज है. ऐसे में हम उम्मीद करते हैं कि ये प्रतिबंध जल्द खत्म होगा."

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क्या जलवायु परिवर्तन है इसकी वजह

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पिछले कई हफ़्तों में भारत के उत्तरी हिस्सों में भारी बारिश हुई है.

इसकी वजह से पंजाब और हरियाणा के साथ-साथ कई राज्यों में फ़सलें ख़राब हो गईं, जिसकी वजह से कई किसानों को दोबारा रोपाई करनी पड़ी.

उत्तरी भारत में कई जगहों पर धान के खेतों में हफ़्तें भर से भी ज़्यादा समय तक पानी भरा रहा, इसकी वजह से रोपी गई फसल नष्ट हो गई.

किसानों को खेतों से पानी कम होने का इंतज़ार करना पड़ा ताकि वो दोबारा रोपाई कर सकें.

वहीं, कई प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में किसान इसलिए बुआई नहीं कर पाए क्योंकि वहां पर्याप्त बारिश ही नहीं हुई.

सरकार की ओर से चावल का खरीद मूल्य बढ़ाने के बाद उम्मीद थी की चावल की खेती बढ़ जाएगी, लेकिन 2022 की तुलना में किसानों ने अब तक 6 प्रतिशत कम क्षेत्र में ही धान की फ़सल लगाई है.

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