पाम ऑयल को लेकर इंडोनेशिया ने किया अहम फ़ैसला, भारत पर क्या होगा असर

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इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो ने कहा है कि वो इस महीने की 28 तारीख से रसोई के लिए इस्तेमाल होने वाले पामोलिन के तेल यानी पाम ऑयल और इसके कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगाएंगे.
उन्होंने कहा कि इस दौरान देश में पाम ऑयल के उत्पादन पर लगातार नज़र रखी जाएगी. देश में 'सस्ते और भरपूर मात्रा में' पाम ऑयल की सप्लाई सुनिश्चित करने के बाद ही रोक उठाने को लेकर विचार किया जाएगा.
एक वीडियो संदेश में राष्ट्रपति जोको विडोडो ने शुक्रवार को कहा कि उनका उद्देश्य देश में खाने के सामान की उपलब्धता सुनिश्चित करना है. पाम ऑयल के निर्यात पर लगी रोक अगले फ़ैसले तक लागू रहेगी.
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इंडोनेशिया में बड़े पैमाने पर पाम के पेड़ों की खेती होती है. इसके फल से पाम ऑयल का उत्पादन होता है जिससे रसोई का तेल बनाया जाता है. इसके अलावा डिटर्जेंट, शैंपू, टूथपेस्ट लेकर चॉकलेट, डोनट और लिपस्टिक तक में इसका इस्तेमाल होता है. दुनिया के कुछ हिस्सों में इसका इस्तेमाल बायोफ्यूल में भी होता है
पाम ऑयल के उत्पादन के मामले में इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है. लेकिन फिलहाल देश खुद स्थानीय स्तर पर इसकी कमी से जूझ रहा है.
स्टॉक मार्केट नैसडेक की वेबसाइट के अनुसार इस साल जनवरी के आख़िर में इंडोनेशिया ने पाम ऑयल के निर्यात को सीमित कर दिया था. मार्च में इस पर लगी रोक तो हटा ली गई लेकिन तब तक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पाम ऑयल की कीमतें आसमान छू रही थीं.
ब्लूमबर्ग में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार रूस यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद से बढ़ती महंगाई के मद्देनज़र खाने के सामान की कमी की स्थिति से बचने के लिए कई मुल्क अपनी फसलों को बचाने के लिए कदम उठा रहे हैं. इंडोनेशिया का ये फ़ैसला भी इसी दिशा में लिए गए कदम के तौर पर देखा जा रहा है.
इसी सप्ताह चैनल न्यूज़ एशिया पर छपी एक ख़बर के अनुसार इंडोनेशिया के फ़ैसले के कारण चिंता बढ़ गई है. इसी वक्त अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोयाबीन के तेल की कीमतें भी बढ़ी हुई हैं.
रिपोर्ट कहती है कि सूरजमुखी के तेल के मामले में यूक्रेन दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है और रूस यूक्रेन युद्ध के कारण यहां से होने वाले निर्यात पर असर पड़ा है.
दुनिया की ज़रूरत के 76 फीसदी सूरजमुखी के तेल का व्यापार ब्लैक सी के रास्ते होता है लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले से ये व्यापार बुरी तरह बाधित हुआ है. ऐसे में लोगों की उम्मीदें सोयाबीन और पाम ऑयल पर थीं.
रसोई में इस्तेमाल के मामले में सोयाबीन के तेल को पाम ऑयल के अच्छा विकल्प के तौर पर देखा जाता है.
लेकिन कुछ सप्ताह पहले वेजिटेबल ऑयल के मामले में दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक अर्जेंन्टीना ने सोयाबीन के तेल पर निर्यात को लेकर रजिस्ट्रेशन बंद करने की घोषणा की थी. इस कदम के साथ उसने साल 2021-22 में लगाई गई फसल के निर्यात पर रोक लगी दी थी.

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इसी साल मार्च में समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक रिपोर्ट छापी थी जिसके अनुसार अर्जेंटीना सोयाबीन तेल के निर्यात पर 31 फीसदी टैक्स लगाता है. इस साल यानी 2021-22 में सूखे के बावजूद देश में सोयाबीन का उत्पादन 4 करोड़ से लेकर 42 करोड़ टन कर रहा है.
सरकार के फ़ैसले के बाद अर्जेंटीना में सप्लायर्स और निर्यातकों का कहना है कि ये देश के हित में नहीं है. उनका कहना है कि इसके निर्यात पर रोक लगी तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचेगा और विदेशी मुद्रा की उसकी ज़रूरत पूरी नहीं होगी. और तेल का आयात करने वाले मुल्क इसके विकल्प की तलाश में अमेरिका या ब्राज़ील का रुख़ कर सकते हैं.
दुनिया भर में बढ़ती महंगाई के बीच संयुक्त राष्ट्र ने मुल्कों से अपील है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीज़ों की कीमतें नियंत्रण में रहें इसके लिए मुल्क युद्ध का असर व्यापार पर न पड़ने दें और व्यापार जारी रखें.
कई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि पहले से ही कोविड महामारी के कारण सप्लाई चेन की दिक्कतें झेल रहे मुल्कों पर रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा अर्जेंटीना और फिर इंडोनेशिया के फ़ैसले का बड़ा असर दिख सकता है. इसके परिणामस्वरूप अंततराष्ट्रीय स्तर पर खाने के तेलों की कीमतों में इज़ाफा दिख सकता है.
इस साल जनवरी में इंडोनेशिया ने देश के भीतर पाम ऑयल की बिक्री को लेकर पाबंदियां लगाई थीं. सरकार ने एक निश्चित मात्रा में देश के भीतर क्रूड पाम ऑयल अधिकतम 9,300 इंडोनीशियाई रुपये प्रति किलो में बेचने को अनिवार्य बना दिया था.
निक्केई एशिया के अनुसार देश के भीतर खाने के तेल की कीमतें बढ़नी शुरू हो गई थीं और इसमें बीते साल के मुक़ाबले 40 फीसदी तक का इज़ाफ़ा दर्ज किया गया. इसके बाद देश के व्यापार मंत्री मोहम्मद लुफ्ती ने खाने के तेल के सभी उत्पादकों के लिए अपने निर्यात का 20 फीसदी देश के भीतर बाज़ार में बेचना अनिवार्य कर दिया था.

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भारत पर क्या होगा असर
बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत हर साल 1.3 करोड़ टन रसोई के तेल का आयात करता है, जिसका 63 फीसदी हिस्सा यानी 8.5 लाख टन पाम ऑयल होता है. इसका एक बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया से खरीदा जाता है जबकि कुछ मात्रा में मलेशिया और थाईलैंड भी भारत को पाम ऑयल बेचते हैं.
बीएल एग्रो ऐसी कंपनी है जो इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल भारत में आयात करती है. कंपनी के चेयरमैन घनश्याम खंडेलवाल ने बीबीसी से बातचीत में बताया था, "केंद्र सरकार, भारत में होने वाली कुल खपत का 65 फ़ीसद तेल आयात करती है और 35 फ़ीसद का उत्पादन देश में होता है. आयात किए जाने वाले 65 फ़ीसद तेल में 60 फ़ीसद पाम ऑयल होता है, क्योंकि बाक़ी तेल में इसे मिलाया जाता है."
पाम ऑयल के इस आयात पर केंद्र सरकार का 50 हज़ार करोड़ रुपये सालाना ख़र्च होता है.
सॉलवेंट एक्सट्रैक्टर्स असोसिएयन ऑफ़ इंडिया के डायरेक्टर जनरल बीवी मेहता ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया है कि इंडोनेशिया का ये कदम दूसरे देशों को तो प्रभावित कर सकता है लेकिन ये भारत को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.
उनका मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए भारत को अपने कूटनीतिक रास्तों को सक्रीय करने की ज़रूरत है.

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द हिंदू बिज़नेसलाइन में छपी रिपोर्ट की मानें तो भारतीय उपभाक्ताओं को आने वाले मुश्किल वक्त के लिए कमर कस लेनी चाहिए.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय बाज़ार पहले ही कोविड के बाद के दौर में रमज़ान और शादियों के सीज़न में महंगाई की मार झेल रहा है. ऐसे में इंडोनेशिया के कदम के बाद वहां खाने के तेल की कीमतें कम हो जाएंगी, लेकिन भारत में इसकी क़ीमतें आसमान छू सकती हैं.
इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में ट्रेडर्स भी खाने के तेल की कीमत में 3,000 से 5,000 रूपये प्रति टन की बढ़ोतरी देख सकते हैं. एक जानकार के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका बड़ा असर सोमवार को ट्रेड बाज़ार खुलने के बाद ही दिख सकता है.
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