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लोकसभा चुनाव 2024: कमलनाथ के लिए छिंदवाड़ा इस बार कितनी बड़ी चुनौती
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल से
मध्य प्रदेश में सिर्फ़ छिंदवाड़ा ही एक ऐसी संसदीय सीट है, जिस पर भारतीय जनता पार्टी सिर्फ़ एक बार जीत हासिल कर पाई है.
ये सीट भी बीजेपी के पास सिर्फ़ एक साल तक रही थी, जब राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुंदरलाल पटवा ने उपचुनाव में कमलनाथ को हराया था.
वर्ष 1977 में भी जब पूरे देश में इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ लहर थी, तब भी ये सीट कांग्रेस ने ही जीती थी.
आज़ादी के बाद से ये सीट ज़्यादातर कांग्रेस की रही है और कमलनाथ के परिवार का इस पर क़ब्ज़ा 40 सालों से भी ज़्यादा से है.
लेकिन इस बार का लोकसभा चुनाव इस सीट के लिए बिल्कुल अलग है. ये पहला मौक़ा है, जब कमलनाथ रात दिन छिंदवाड़ा में ही कैंप कर रहे हैं और अपने बेटे नकुलनाथ के लिए प्रचार कर रहे हैं.
कमलनाथ का अभेद्य गढ़
दूसरा सबसे अहम पहलू ये है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कमलनाथ के क़रीबी माने जाने वाले कांग्रेस के नेताओं का बीजेपी में एक-एक कर जाने का सिलसिला शुरू हो गया है.
छिंदवाड़ा को कांग्रेस से ज़्यादा कमलनाथ का अभेद्य गढ़ माना जाता रहा है.
पिछले दो विधानसभा के चुनावों में छिंदवाड़ा की सात में से सात सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों को जीत मिली थी.
लेकिन एक सप्ताह पहले अमरवाड़ा से तीन बार के कांग्रेस विधायक कमलेश शाह बीजेपी में शामिल हो गए.
इस बार लोकसभा चुनाव से पहले इस सीट पर बीजेपी ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.
बड़े नेताओं का छिंदवाड़ा दौरा
विधानसभा के चुनावों के परिणामों के फ़ौरन बाद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने छिंदवाड़ा की सातों विधानसभा की सीटों का दौरा शुरू कर दिया था.
उन्होंने नारा दिया था, "इस बार भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा की 29 में से 29 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है."
फिर एक-एक कर मुख्यमंत्री मोहन यादव सहित मध्य प्रदेश बीजेपी के बड़े नेताओं ने इस सीट पर दौरा करना शुरू कर दिया.
बीजेपी के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी का दावा है कि एक मौजूदा और कई पूर्व विधायकों सहित छिंदवाड़ा में 3000 कांग्रेस नेताओं ने पिछले एक महीने में उनकी पार्टी का दामन थाम लिया है.
सौसर विधानसभा के तुर्कीखापा गाँव में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कमलनाथ ने लंबे समय बाद अपनी चुप्पी तोड़ी.
रणभूमि में तब्दील
कमलनाथ तब से चुप थे, जबसे उनके और उनके सांसद पुत्र नकुल नाथ के बीजेपी में शामिल होने की अटकलें चल रही थी.
तुर्कीखापा गाँव की चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कमलनाथ ने आरोप लगाया कि छिंदवाड़ा की पवित्र भूमि को बीजेपी ने रणभूमि में तब्दील कर दिया है.
उनका आरोप था कि बीजेपी 'कहीं पैसों का लालच' देकर तो कहीं 'डर दिखाकर' कांग्रेस के नेताओं को तोड़कर ले जा रही है.
वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना का कहना है कि इस बार कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ के लिए चुनावी डगर कठिन होती नज़र आ रही है.
इस बार भी बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव के अपने प्रत्याशी विवेक बंटी साहू को दोबारा मैदान में उतारा है.
कमलनाथ की साख
विधानसभा के चुनाव में भी विवेक बंटी साहू कमलनाथ के ख़िलाफ़ लड़े थे और हार गए थे. लेकिन इस बार उनके प्रचार के लिए बीजेपी ने कई दिग्गज नेताओं को मैदान में उतरा है.
संजय सक्सेना का कहना था कि इस बार कमलनाथ के लिए चुनौती इसलिए नहीं है कि उनके कई क़रीबी नेताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया है.
वो कहते हैं कि चुनौती इसलिए है क्योंकि उनके और उनके बेटे के बीजेपी में जाने की अटकलें चल रहीं थीं और उन्होंने आगे आकर फ़ौरन उसका खंडन नहीं किया था.
उनका कहना था, "इसलिए भी कमलनाथ की साख को धक्का पहुँचा है क्योंकि उनके लोकसभा क्षेत्र के लोगों को लगने लगा है कि उन्होंने बीजेपी में जाने की कोशिश की थी. कांग्रेस के अंदरूनी गलियारों में भी इसकी चर्चा ज़ोरों पर थी कि कमलनाथ और उनके पुत्र दिल्ली में डेरा डालने के बाद अपने समर्थक विधायकों और नेताओं को दिल्ली बुला रहे थे. कुछ गए भी थे कुछ नहीं गए थे. लेकिन इससे कमलनाथ की छवि पर असर ज़रूर पड़ा."
कांग्रेस की बढ़त
लेकिन कमलनाथ के क़रीबी कांग्रेस नेता इसे 'सिर्फ़ अफ़वाह' बताते हैं. उनका कहना है कि जिस कांग्रेस के नेता को इंदिरा गाँधी ने अपना तीसरा पुत्र तक कहा हो, वो इस तरह का क़दम नहीं उठा सकता.
गुंजन शुक्ल छिंदवाड़ा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और कमलनाथ के नज़दीकी माने जाते हैं.
बीबीसी से बातचीत में गुंजन शुक्ल कहते हैं, "ये बीजेपी की ही एक चाल थी. ये अफ़वाह भी उन्होंने ही फैलाई थी. जब सारे हथकंडे अपना कर भी कई दशकों से छिंदवाड़ा की सीट पर कमलनाथ और उनके पुत्र को बीजेपी शिकस्त नहीं दे पाई, तो उसने इस तरह की चाल चलनी शुरू कर दी."
उनका कहना था कि बीजेपी ने छिंदवाड़ा की उन विधानसभा सीटों को चुना, जहाँ कांग्रेस ने हमेशा से ही काफ़ी बढ़त बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है.
गुंजन शुक्ल का आरोप है कि अमरवाड़ा और छिंदवाड़ा विधान सभा के कांग्रेस के नेताओं को "डराकर और प्रलोभन देकर बीजेपी में शामिल कराया गया है."
'बीजेपी में जाने की कोशिश'
गुंजन शुक्ल कहते हैं कि जिस तरह का माहौल बीजेपी ने बनाने की कोशिश की है, उससे कांग्रेस को 'ज़्यादा नुक़सान नहीं' होगा, क्योंकि कमलनाथ ने जिस तरह 'छिंदवाड़ा मॉडल' को विकसित किया है, वो कोई और नहीं कर सकता.
लेकिन जानकार कहते हैं कि कमलनाथ के क़रीबी नेता भले ही उनके बीजेपी में जाने की कोशिश को अफ़वाह बता रहे हों, लेकिन इन अफ़वाहों को इसलिए भी बल मिला क्योंकि कमलनाथ ने इसका फ़ौरन खंडन नहीं किया था.
संजय सक्सेना कहते हैं कि जब तक कमलनाथ 'इन अफ़वाहों' का खंडन करते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कांग्रेस के अंदर भी इसको लेकर नेता असहज महसूस करने लगे थे.
ख़ास तौर पर तब, जब दिल्ली प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता तजिंदरपाल सिंह बग्गा ने प्रेस बयान जारी कर 'कमलनाथ के बीजेपी में शामिल होने' का 'विरोध' किया था. बग्गा का आरोप था कि 1984 के दंगों में 'कमलनाथ की भूमिका संदिग्ध' थी.
पहचान बनाने में कामयाबी
जानकार ये भी कहते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर छिंदवाड़ा से कांग्रेस के नेताओं का बीजेपी में शामिल होना अपने आप में कमलनाथ और उनके पुत्र के लिए इस बार बड़ी चुनौती है.
वो मानते हैं कि इनमें ज़्यादातर वो नेता शामिल हैं, जिनका 'करियर' कमलनाथ की वजह से ही चमका है और उन्होंने राजनीति में अपनी पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की थी.
तीन बार विधायक रह चुके दीपक सक्सेना कमलनाथ के सबसे भरोसेमंद माने जाते थे जिन्होंने 2019 विधानसभा के उपचुनाव में कमलनाथ के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी.
लेकिन अमरवाड़ा से मौजूदा विधायक कमलेश शाह और छिंदवाड़ा के महापौर विक्रम अहाके का कांग्रेस छोड़कर जाना राजनीतिक हलकों में कमलनाथ के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है.
संजय सक्सेना कहते हैं कि अगर ऐसे हालात बन गए हैं, तो उसके लिए ख़ुद कमलनाथ ही ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने समय रहते क़दम नहीं उठाए थे.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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