दुर्गा पूजा से पहले भारत पहुँची पसंदीदा मछली की खेप, हिलसा कूटनीति का क्या असर?

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- Author, अबुल कलाम आज़ाद
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
रज़िया सुल्ताना ढाका के मीरपुर नंबर 6 बाजार से 100 टका में मछली खरीद रही थीं लेकिन बगल में हिलसा मछलियों की दुकानों की ओर मुड़कर भी नहीं देखा.
वो कहती हैं कि ढाका आने के बाद वह कभी हिलसा मछली नहीं खरीद पाईं.
उनके मुताबिक़, “हमारे पास हिलसा मछली खरीदने और छोटा-मोटा काम करके तीन दिन तक चावल खाने की क्षमता नहीं है भाई. अगर हिलसा खरीदते हैं, तो आप चावल नहीं खा पाएंगे, अगर आप चावल खाते हैं, तो हिलसा नहीं खाएंगे."
बांग्लादेश में आम लोगों के लिए हिलसा मछली कितनी मुश्किल हो गई है, इसका उदाहरण रज़िया सुल्ताना हैं.
कम आमदमी के अलावा बांग्लादेश में मध्यम वर्ग के लोग भी हिलसा मछली खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे.

दुर्गा पूजा से पहले पहली खेप

बीते अगस्त में बांग्लादेश में हुई राजनीतिक उथल पुथल के बीच दोनों देशों के बीच तनाव के कारण हिलसा के निर्यात पर संकट के बादल घिर गए थे.
बांग्लादेश की मत्स्य एवं पशु संसाधन सलाहकार फ़रीदा अख़्तर ने हिलसा के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी, जिसके बाद भारतीय बाज़ार में इसके पहुंचने पर संकट पैदा हो गया था.
ख़ासकर पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के सीज़न में हिलसा मछली की मांग अधिक होती है और इस साल हिलसा की आपूर्ति कम होने के चलते इसके दाम आसमान छू रहे हैं.
हालांकि दुर्गा पूजा के ठीक पहले शुक्रवार को बांग्लादेश से हिलसा मछलियों की पहली खेप हावड़ा के थोक मछली बाज़ार पहुंची गई है.
हावड़ा थोक मछली बाजार एसोसिएशन के सचिव सैयद अनवर मकसूद ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, “हर साल की तरह इस साल भी हमने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को चिट्ठी लिखी थी कि दुर्गा पूजा के अवसर पर हमें हिलसा मछली दें."
उन्होंने कहा कि पहली खेप 45 से 50 मीट्रिक टन है और शनिवार से और खेप पहुंचेगी.
हिलसा इतनी महंगी क्यों?

बांग्लादेश में बीस साल से बाज़ार में मछली बेच रहे एक हिलसा विक्रेता ने कहा कि मौजूदा क़ीमत पर आम लोगों के लिए हिलसा ख़रीद पाना मुश्किल है.
उपभोक्ता अधिकारों पर काम करने वाली बांग्लादेश की गैर सरकारी संस्था कंज्यूमर्स एसोसिएशन ऑफ़ बांग्लादेश के मुताबिक़, “2014 में पीक सीजन के दौरान आधा से एक किलो ग्राम की हिलसा की औसत क़ीमत 505 टका थी.
अभी हिलसा की क़ीमत 1400 टका है. सुपरमार्केट में यह 2,000 टका प्रति किलो की दर से बिक रही है.
खुदरा बाज़ार में समुद्री और नदी की हिलसा की क़ीमत 1,600 टका से 2,000 टका तक है.
इस साल हिलसा की ऊंची क़ीमत और उपलब्धता के लिए मुख्य रूप से सरकार, मछुआरे और व्यापारी ज़िम्मेदार हैं. विक्रेताओं का कहना है कि भारत में निर्यात की घोषणा के बाद इसकी क़ीमत बढ़ गई है.
सोमवार को बांग्लादेश के चांदपुर में नदी में नाव से जाकर देखा गया तो पता चला कि हिलसा जाल में कम आ रही हैं. मछुआरों का कहना है कि वे इस मौसम में हिलसा नहीं पकड़ पा रहे हैं.
मोमिन सोहेल नाम के मछुआरे ने बताया कि उसने सीजन में एक दिन में सबसे ज़्यादा 15 किलो हिलसा पकड़ी थी. उन्हें लगता है कि बाज़ार में यह हिलसा 2200 से लेकर 2300 टका प्रति किलो के हिसाब से बिकेगी.
मोमिन सोहेल कहते हैं, “नदी में नाव ले जाने का रोज़ाना का खर्च 3,000 टका है. मछली मिले न मिले ये खर्च देना ही होगा."
मुहम्मद दुलाल बीस सालों से ट्रॉलर से समंदर में मछलियाँ पकड़ते आ रहे हैं.
वो कहते हैं, "अगर हिलसा की क़ीमत नहीं बढ़ेगी तो हमारे तेल का खर्च भी निकल पाएगा. मैं बारह दिनों तक समंदर में था. तीन लाख टका खर्च हुए. हमें जो मछलियां मिलीं उसकी क़ीमत लगभग 40,000 टका होगी. पिछले साल सीज़न के दौरान 80 लाख टका की मछली पकड़ी गई थी. इस बार 35 लाख रु. की आमदनी हुई, जबकि लागत चालीस लाख टका है. प्रतिबंध लग रहा है और मैं एक बार फिर समंदर में जा सकता हूं."
मछलियों की कमी और निर्यात की इजाज़त

चांदपुर के एक विक्रेता ने बताया कि पिछले सप्ताह के मुकाबले इस सप्ताह क़ीमत में 200 टका तक उछाल आया है. पहले हिलसा पकड़ने वाली नावों पर पुलिस उत्पीड़न की शिकायतें आती थीं, अब इनमें कमी आई है.
फिर इस बार मछली की क़ीमत इतनी अधिक क्यों है, इस सवाल पर चांदपुर मछली बाज़ार के व्यापारी अनवर हुसैन गाजी ने कहा, 'इतनी क़ीमत पहले कभी नहीं हुई और सिर्फ इस बार है.'
वह भारत में मछली निर्यात भी करते हैं. उन्होंने कहा, "पानी में बड़ी मछलियों की कमी हो गई है जिससे दाम बढ़ गए हैं.”
हिलसा की कमी के लिए बड़ी मछलियों के निर्यात की इजाज़त को ज़िम्मेदार माना जा रहा है.
जबकि दाम तय करने की व्यवस्था बिना किसी बदलाव के पहले जैसे जारी है.
शाहजहां गाजी नाम के एक अन्य कारोबारी ने कहा कि ‘निर्यात के फैसले से बड़ी मछली की मांग और क़ीमत दोनों बढ़ गई है.’
हालांकि बांग्लादेश में हिलसा का उत्पादन हर साल लगातार बढ़ता रहा है, लेकिन आशंका है कि इस बार उत्पादन घट सकता है.
क्योंकि पिछले साल जुलाई और अगस्त में बांग्लादेश में 81 हजार 876 मीट्रिक टन हिलसा पकड़ी गई थी लेकिन इस साल जुलाई और अगस्त में यह काफ़ी कम है. इस बार पकड़ी गई मात्रा 56 हजार 273 टन है.
भारत को निर्यात से असर

इन सबके बीच भारत में हिलसा का निर्यात शुरू हो गया है.
बांग्लादेश वाणिज्य मंत्रालय ने 49 कंपनियों को 50 टन के हिसाब से कुल 2420 मीट्रिक टन हिलसा निर्यात करने की मंजूरी दे दी है.
हालाँकि, मत्स्य पालन और पशु संसाधन सलाहकार फ़रीदा अख़्तर ने पद संभालने के बाद भारत में हिलसा के निर्यात के ख़िलाफ़ बयान दिया था.
फ़रीदा अख़्तर के इस बयान का कई लोगों ने स्वागत किया कि देश के आम लोग हिलसा खाएंगे और फिर इसके निर्यात पर विचार करेंगे.
लेकिन आख़िरकार वाणिज्य मंत्रालय ने 3000 टन हिलसा निर्यात करने का फ़ैसला किया. इस फैसले के बाद हिलसा की मांग और कीमतों पर असर पड़ा है.
सरकार का दावा है कि भारत जाने वाली हिलसा की मात्रा बांग्लादेश के कुल उत्पादन की तुलना में कम है. लेकिन मछली का निर्यात ऐसे समय में किया जा रहा है जब नदी में उसकी उपलब्धता कम है.
इसके अलावा, भारत को निर्यात की जाने वाली हिलसा बड़े आकार की और नदी की मछली है, इसलिए इसकी मांग और दाम दोनों बढ़ गए हैं.
मत्स्य एवं पशु संसाधन सलाहकार ने कहा, "यह मंत्रालय उन सभी कारणों पर गौर करेगा कि कीमतें क्यों बढ़ रही हैं और हम अन्य सभी मंत्रालयों का सहयोग लेंगे.”
सलाहकार फ़रीदा अख़्तर ने कहा, “मछली की उपलब्धता कम है और लोग खा नहीं पा रहे हैं. यदि हम इसे नियंत्रित नहीं कर सके तो यह हमारी ओर से बहुत दुखद होगा. निर्यात की घोषणा से पहले इसका दाम 1500 टका प्रति किलोग्राम था, अब सुनने में आ रहा है कि यह 1600-1700 टका है. ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए.”
अख्तर ने बीबीसी को बताया कि निर्यात का मामला वाणिज्य मंत्रालय का निर्णय है.
उन्होंने कहा, " निर्यात का विषय हमारा मंत्रालय नहीं है. वाणिज्य मंत्रालय निर्यात करेगा. हमारा वचन देश के लोगों को खाना खिलाना है और मैं आज भी इस वचन पर कायम हूं.”
हिलसा कूटनीति?

कई लोग सवाल करते हैं कि क्या हिलसा निर्यात के फैसले के पीछे कूटनीति की भूमिका है?
बांग्लादेश में पिछली अवामी लीग सरकार के दौरान नियमित पूजा अवसरों के लिए हिलसा को बांग्लादेश से निर्यात किया जाता था.
पूर्व राजदूत एम. हुमायूं कबीर ने बीबीसी को बताया कि भारत के पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी हिलसा की काफ़ी मांग है.
कबीर कहते हैं कि पहली हिलसा 1992 में बांग्लादेश से निर्यात की गई थी.
उन्होंने बताया, “जहां तक मुझे याद है तब प्रणब मुखर्जी योजना मंत्री थे. फिर उन्होंने 5000 टन का परमिट दिया जिसे बांग्लादेश से आयात किया जा सकता है. कोलकाता में इसकी काफ़ी मांग है. 1992 में, जब मैं कोलकाता में काम करता था, तो मुझे पहली बार हिलसा मिली.”
कई लोग भारत में हिलसा निर्यात के ख़िलाफ़ मत्स्य सलाहकार के रुख़ और बांग्लादेश में व्यापक विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई करने वाले छात्र नेताओं के भारत के प्रति सख़्त रूख़ अपनाने के संदर्भ में इस पूरे मुद्दे को देख रहे हैं.
बदलते राजनीतिक हालात में भारत को हिलसा निर्यात करने के बांग्लादेश के फैसले का कूटनीतिक महत्व भी माना जा रहा है.
इस बारे में एम हुमायूं कबीर ने कहा, “हमने अपनी ओर से दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और आशा करते हैं कि वे इसका जवाब देंगे. यह एक बहुत ही बारीक कूटनीति है. लेकिन भारत की हालिया बातचीत या उनके नेताओं की ओर से जिस तरह के बयान आ रहे हैं, वह बहुत अच्छे नहीं लग रहे हैं."
फ़रीदा अख़्तर ने कहा, “पिछली सरकार के दौरान कुछ घटनाएं घटी थीं कि अगर उन्हें तीस्ता का पानी लेना हो तो वे कुछ हिलसा से संतुष्ट हो सकते थे. दरअसल पश्चिम बंगाल में मछली अधिक खाई जाती है. लेकिन पूरा भारत नहीं खाता. कूटनीतिक तौर पर यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं होना चाहिए.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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