बांग्लादेश में बाढ़ पर भारत को लेकर ग़ुस्सा, वहाँ के मीडिया में कैसी चर्चा

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- Author, सुमंत सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बांग्लादेश में इन दिनों भीषण बाढ़ का प्रकोप है, जिसकी वजह से लाखों लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ रहा है.
बीबीसी बांग्ला के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में बांग्लादेश के उत्तर-पूर्वी, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों के कम से कम 11 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हुए हैं.
बाढ़ में लगभग 40 लाख लोग फँसे हुए हैं.
फेनी, कोमिला, मौलवीबाज़ार, हबीगंज और चटगांव ज़िले के लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं.
बांग्लादेश के आपदा प्रबंधन एवं राहत मंत्रालय के मुताबिक़, बाढ़ से अब तक कुल 23 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि दो लोग लापता हैं.
इनमें से कोमिला में छह, फेनी में एक, चटगाँव में पांच, खागरचारी में एक, नोआखली में पाँच, ब्राह्मणबारिया में एक, लक्ष्मीपुर में एक और कॉक्स बाज़ार में तीन लोगों की मौत हुई है.
इन ज़िलों में बीते 20 अगस्त से बाढ़ आई हुई है.
रेलवे लाइनों और राजमार्गों के कई जगहों पर जलभराव से राजधानी ढाका और चटगाँव के बीच सड़क के साथ रेल संपर्क टूट गया है.
फेनी, कमिला और सिलहट में भी इसी तरह के हालात देखने को मिल रहे हैं. भूस्खलन के कारण चटगाँव और कॉक्स बाज़ार में रेलवे लाइनें भी टूट गई हैं जबकि दोहाज़री और नज़ीरहाट मार्गों पर रेलवे लाइनों के कुछ हिस्से पानी में डूबे हुए हैं.
बांग्लादेश में इस भीषण बाढ़ को लेकर वहाँ के लोगों में भारत को लेकर ग़ुस्सा देखने को मिल रहा है.
बीते दिनों कई बांग्लादेशी संगठन अपने देश में आई बाढ़ के पीछे भारत को ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे.
वहाँ के मीडिया और सोशल मीडिया में भी बाढ़ को लेकर भारत पर सीधे तौर पर आरोप लगाए थे.
यह मुद्दा और भी गंभीर हो गया जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और जल संसाधन मंत्रालय की सलाहकार सैयदा रिज़वाना हसन ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा, "पानी छोड़ने से पहले भारत ने सूचना नहीं दी थी".
हालाँकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को निराधार बताया था.
बाढ़ को लेकर विवाद

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बांग्लादेश के संगठनों का दावा था कि त्रिपुरा के डंबूर जलविद्युत परियोजना के बांध को खोल दिया गया, इस कारण बांग्लादेश में बाढ़ आई.
19 अगस्त से त्रिपुरा में भारी बारिश के बाद गोमती हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के बांध के दरवाज़े खोलने के बारे में बांग्लादेश में सोशल मीडिया पर कई दावे किए गए थे.
हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर इन आरोपों को निराधार बताया था.
विदेश मंत्रालय ने कहा, "बांग्लादेश में बाढ़ की मौजूदा स्थिति पर यह चिंता जताई गई है कि यह त्रिपुरा में गोमती नदी पर बने डंबूर बांध के खोलने से पैदा हुई है. यह पूरी तरह से सही नहीं है."
विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, "भारत और बांग्लादेश से होकर बहने वाली गोमती नदी के तटीय इलाक़ों में इस साल भारी बारिश हुई है."
भारत का कहना है कि बांग्लादेश में बाढ़ इन इलाक़ों से नीचे की ओर जाने वाले पानी की वजह से आई है.
विदेश मंत्रालय ने बताया कि त्रिपुरा डंबूर बांध बांग्लादेश की सीमा से 120 किलोमीटर दूर है. यह एक छोटी ऊँचाई वाला बांध है, जो बांग्लादेश को भी 40 मेगावॉट की बिजली सप्लाई करता है.
हालाँकि, बांग्लादेश के साथ ही भारत का सीमावर्ती राज्य त्रिपुरा भी बाढ़ के प्रकोप से जूझ रहा है.
मौजूदा बाढ़ के कारण जिन ज़िलों में सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ है, उनमें गोमती भी शामिल है.
बांग्लादेशी मीडिया ने दावा किया है कि इसी ज़िले में गोमती पनबिजली केंद्र के डंबूर बांध के स्लूइस गेट को खोल देने के कारण बांग्लादेश के कई इलाक़ों में भारी बाढ़ आ गई है.
वह पनबिजली परियोजना त्रिपुरा के बिजली विभाग के तहत है.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने फ़रक्का बराज के गेट खोले जाने को लेकर भी बयान जारी किया है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "हमने फरक्का बैराज के गेट खोलने की मीडिया रिपोर्ट देखी है, जिससे नदी के नीचे की ओर 11 लाख क्यूसेक से अधिक पानी गंगा/पद्मा नदी में अपने प्राकृतिक मार्ग से प्रवाहित हो सकेगा."
"यह एक सामान्य मौसमी घटनाक्रम है, जो गंगा नदी बेसिन के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण होता है."
उन्होंने कहा, "यह समझना चाहिए कि फ़रक्का केवल एक बैराज है, न कि एक बांध. जब भी पानी का स्तर तालाब के स्तर तक पहुँचता है, तो जो भी जलप्रवाह आता है वह निकल जाता है."
"यह केवल 40,000 क्यूसेक पानी को फरक्का नहर में मोड़ने के लिए एक संरचना है, जिसे मुख्य गंगा/पद्मा नदी पर गेटों की एक प्रणाली का उपयोग करके सावधानीपूर्वक किया जाता है जबकि बाक़ी पानी मुख्य नदी में बहकर बांग्लादेश चला जाता है."
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया, "प्रोटोकॉल के अनुसार, डेटा को नियमित और समय पर बांग्लादेश में संबंधित संयुक्त नदी आयोग के अधिकारियों के साथ साझा किया जाता है. इस बार भी ऐसा किया गया है."
"हमने गलतफ़हमियां पैदा करने के लिए फर्जी वीडियो, अफवाहें और डर फैलाने वाली बातें देखी हैं. इसका तथ्यों के साथ मजबूती से मुकाबला किया जाना चाहिए."
बांग्लादेशी मीडिया ने क्या कहा?

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बांग्लादेशी अख़बार 'कलेर कांथा' ने 24 अगस्त को अपने पहले पन्ने की रिपोर्ट में कहा, "भारत ने पानी छोड़ने से पहले अधिसूचना जारी करने का पालन नहीं किया."
यह रिपोर्ट मूल रूप से अंतरिम सरकार की पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और जल संसाधन मंत्रालय की सलाहकार सैयदा रिज़वाना हसन के हवाले से छापी गई.
अख़बार के मुताबिक़ उन्होंने कहा, "अगर ऊपरी धारा वाले देश में असामान्य वर्षा होती है और पानी छोड़ने की आवश्यकता होती है, तो निचली धारा वाले देश को पहले से सूचित करने की आवश्यकता होती है, ताकि निचली धारा वाले देश में लोग ख़ुद को तैयार कर सकें और लोगों को निकाला जा सके."
"लेकिन इस बार भारत ने इस अधिसूचना का पालन नहीं किया. यह बात भारत के साथ हमारे समझौते में भी कही गई है."
सैयदा रिजवाना हसन ने शुक्रवार दोपहर हबीगंज सदर उपजिला के मशजान खोई नदी के पास बाढ़ प्रभावित इलाक़े का दौरा करते हुए पत्रकारों के सवालों के जवाब में ये बात कही.
एक अन्य बांग्लादेशी अख़बार 'बॉनिक बार्ता' ने कहा कि सिंधु बेसिन के आसपास की जल संधि दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और सबसे लंबे समय तक चलने वाला अंतरराष्ट्रीय जल-बँटवारा समझौता है.
अख़बार ने लिखा, "सिंधु और उसकी पाँच सहायक नदियां वितस्ता (झेलम), चंद्रभागा (चिनाब), इरावदी (राबी), बिपाशा (ब्यास), शतद्रु (सतलज) भारत से पाकिस्तान में बहती हैं. इस समझौते का उद्देश्य इन नदियों के पानी को दोनों देशों के बीच उचित रूप से साझा करना है. इसे लागू करने तथा समझौते से जुड़े किसी भी विवाद को निपटाने के लिए 'सिंधु आयोग' का गठन किया गया. इस आयोग ने पिछले 64 वर्षों में बड़ी सफलता दिखाई है."
'बॉनिक बार्ता' अख़बार ने आरोप लगाया कि भारत और बांग्लादेश के बीच संयुक्त नदी प्रबंधन को लेकर संधि होने के बावजूद जल के संतुलित वितरण को लेकर कोई ठोस काम नहीं हुआ है.
अख़बार ने आगे लिखा, "दूसरी ओर, मार्च 1972 में, भारत और बांग्लादेश ने 'भारत-बांग्लादेश मैत्री, सहयोग और शांति संधि' पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के अनुसार संयुक्त नदी प्रबंधन हेतु संयुक्त नदी संरक्षण आयोग (जेआरसी) का गठन किया गया. हालाँकि, 52 वर्षों के बाद भी यह आयोग अंतर-देशीय नदियों में जल के संतुलित वितरण को सुनिश्चित करने में कोई भूमिका नहीं निभा सका."
वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेशी मीडिया और सोशल मीडिया बाढ़ को लेकर ग़लत जानकारी फैला रहा है.
विकासशील देशों के लिए अनुसंधान और सूचना प्रणाली (आरआईएस), नई दिल्ली में कार्यरत प्रोफेसर प्रबीर डे कहते हैं, "बांग्लादेशी मीडिया ग़लत जानकारी फैला रहा है. सोशल मीडिया में ऐसी अफ़वाहें ज़्यादा हैं कि भारत में बांध से पानी छोड़ा गया और बाढ़ आ गई. यह सब ग़लत जानकारी है."
बाढ़ की चेतावनी को लेकर प्रबीर डे कहते हैं, "बांग्लादेश को ये बहुत अच्छे से पता है कि भारत का वेदर फोरकास्ट बहुत बार बोल चुका था कि ज़्यादा बारिश होने वाली है और बाढ़ की स्थिति आ सकती है, लेकिन उन लोगों ने तैयारी नहीं की."
उन्होंने कहा, "वहाँ कोई सरकार भी नहीं थी इसलिए ध्यान नहीं दिया गया. बांग्लादेश ने एहतियाती क़दम नहीं उठाए और ज़्यादा बारिश होने से बाढ़ आ गई. इसके लिए भारत ज़िम्मेदार नहीं है."
क्या डंबूर बांध का गेट खोलने से आई बाढ़ ?

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बांग्लादेश में आई बाढ़ की वजह से भारत पर लगे आरोपों को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान के बाद त्रिपुरा के बिजली मंत्री ने भी स्पष्टीकरण दिया.
बिजली मंत्री रतन लाल नाथ ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "डंबूर बांध के गेट को खोलने के मुद्दे पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह महज कुप्रचार है. ऐसी ख़बरें निराधार हैं. गोमती पनबिजली केंद्र के तहत बने डंबूर बांध का कोई गेट नहीं खोला गया है."
उन्होंने कहा, "इस केंद्र में बने जलाशय की अधिकतम भंडारण क्षमता 94 मीटर है. जलस्तर इससे ज़्यादा होने की स्थिति में अतिरिक्त पानी स्वचालित रूप से गेट से बाहर निकल जाता है. जलस्तर कम होने पर गेट ख़ुद से बंद हो जाते हैं."
डंबूर बांध से पानी छोड़ने को लेकर मंत्री ने कहा, "फ़िलहाल जलस्तर भंडारण क्षमता से ज्यादा होने के कारण दो गेटों से पानी बाहर निकल रहा है. इनमें से एक गेट से 50 प्रतिशत की दर से पानी बाहर निकल रहा है. संबंधित इलाक़े के लोगों को लाउडस्पीकर के ज़रिए पहले से ही इस बारे में सतर्क कर दिया गया था."
उनका कहना था कि त्रिपुरा ने बीते तीन दशकों में ऐसी भयावह बाढ़ नहीं देखी है.
वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि ज़्यादा बारिश होने के चलते बांग्लादेश और त्रिपुरा में बाढ़ आई है.
आरआईएस नई दिल्ली के प्रोफ़ेसर प्रबीर डे कहते हैं, "भारत ने बांध से पानी नहीं छोड़ा था, ज़्यादा बारिश होने के चलते बांध भर गया और पानी का फ्लो हुआ."
उन्होंने कहा, "बांग्लादेश का कुमिला, चटगाँव, नोआखाली, फेनी ये सब जगह निचले क्षेत्र में आते हैं. इसके कारण यहाँ बाढ़ आई और त्रिपुरा में भी बाढ़ आई."
शेख़ हसीना के आने से पहले से नाराज़गी

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ऐसा नहीं है कि बांग्लादेश में सिर्फ़ बाढ़ की वजह से ही भारत को लेकर ग़ुस्सा पनपा है.
बीते दिनों बांग्लादेश में हुई राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना भारत आ गईं और अभी तक यहीं हैं.
जिसके बाद बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने कहा है कि भारत शेख़ हसीना को सौंप दे.
लेकिन, दिल्ली के पर्यवेक्षकों और विशेषज्ञों का कहना है कि हसीना के ख़िलाफ़ बांग्लादेश में कई मामले दर्ज होने के बावजूद दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि के तहत उनको वापस भेजने की संभावना न के बराबर है.
भारत और बांग्लादेश के बीच वर्ष 2013 से प्रत्यर्पण संधि है.
शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था, "अगर प्रत्यर्पण की बात करें तो वह पूरी तरह 'काल्पनिक (हाइपोथेटिकल)' सवाल है. ऐसी परिस्थिति में किसी काल्पनिक सवाल का जवाब देने की परंपरा नहीं है."
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले का मुद्दा

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बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अल्पसंख्यकों पर हमलों की रिपोर्ट आई.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने भी 16 अगस्त को अपनी एक रिपोर्ट में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले का ज़िक्र किया है.
इसके मुताबिक़, "बांग्लादेश में हिंदू समेत अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले की रिपोर्ट भी आई है. ख़ासकर देश में सरकार बदलने के बाद 5 और 6 अगस्त को हिंदुओं के घरों और संपत्ति पर हमले की रिपोर्ट है."
यूएन की इस रिपोर्ट में बांग्लादेश के 27 ज़िलों में ऐसे हमले और लूट की ख़बरें मिलने का ज़िक्र है, जिसमें हिंदू मंदिरों को नुक़सान पहुँचाए जाने की भी बात कही गई है.
इस रिपोर्ट में बांग्लादेश के खुलना में इस्कॉन मंदिर में आगज़नी करने का ज़िक्र भी किया गया है.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने बांग्लादेश में मौजूदा हिंसा के दौर में सैकड़ों की संख्या में आम लोगों के मारे जाने, पुलिस थाने पर हमले का ज़िक्र भी किया है.
हालाँकि, बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार प्रोफे़सर मोहम्मद यूनुस ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा है कि कुछ रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों पर हमले की ख़बरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.
बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार के प्रेस विंग की तरफ़ से मीडिया को जानकारी दी गई कि जब मोदी ने सुरक्षा का मुद्दा उठाया तो मुख्य सलाहकार ने कहा कि उनकी सरकार अल्पसंख्यकों समेत देश के हर नागरिक की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.
भारतीय प्रधानमंत्री ने इस बातचीत के बाद एक्स पर लिखा था, "मेरे पास मोहम्मद यूनुस का फ़ोन आया. इस दौरान हम दोनों ने बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को लेकर बात की."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "लोकतांत्रिक, स्थिर, शांतिपूर्ण और प्रगतिशील बांग्लादेश के लिए मैंने भारत का समर्थन दोहराया है. उन्होंने (मोहम्मद यूनुस) बांग्लादेश में हिंदुओं और सभी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन दिया है."
इस बीच, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों को लेकर भारत में कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें हिंदुओं समेत अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के मुद्दे को उठाया गया.
भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर क्या असर होगा?

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विशेषज्ञों के मुताबिक़ बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति को लेकर भारत चिंतित है.
प्रोफ़ेसर प्रबीर डे कहते हैं, "भारत बांग्लादेश की स्थिति को लेकर चिंतित है और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए बहुत सारी मानवीय सहायता देने के लिए भी तैयार है."
बांग्लादेश के लोगों के ग़ुस्से को लेकर उन्होंने कहा, "बांग्लादेश में अभी ऐसी स्थिति है कि उन लोगों को कुछ भी करने के लिए टाइम नहीं मिला. वहाँ अभी कुछ भी हो जाए, तो वो लोग भारत पर आरोप लगाएंगे."
वे कहते हैं, "बाढ़ से राहत के लिए वहाँ आम आदमी ही ख़ुद की मदद कर रहा है, वहाँ सरकार की ओर से ज़्यादा सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं."
बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्रालय की सलाहकार सैयदा रिज़वाना हसन के बयान को लेकर प्रबीर डे कहते हैं, "वो अभी नई हैं. उनके पास रिसोर्स भी नहीं हैं और उन्हें अभी कुछ पता भी नहीं है कि क्या करना है. सबसे आसान यह है कि वे कुछ नहीं कर पा रहे तो भारत पर ब्लेम कर दो."
इस विवाद को लेकर वे कहते हैं, "इससे संबंधों पर असर पड़ेगा, लेकिन इससे बांग्लादेश का ज़्यादा नुक़सान होना है."
प्रबीर डे कहते हैं, "बांग्लादेश को थोड़ा रणनीतिक तौर पर सोचना चाहिए. मेच्योरिटी दिखानी चाहिए. कुछ भी भारत विरोधी बोलकर आप लोकल सेंटीमेंट तो ले सकते हैं, भले ही अभी बाढ़ की समस्या धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है, लेकिन आगे आने वाले समय में फूड सिक्योरिटी की समस्या आएगी तब क्या करेंगे."
उन्होंने कहा, "ये उनकी आंतरिक राजनीति है. आपदा में आंतरिक राजनीति को दूर रखकर आम आदमी के साथ काम करना चाहिए और भारत से मदद के लिए बात करनी चाहिए."
भविष्य में दोनों देशों के बीच संबंधों पर पड़ने वाले असर पर उन्होंने कहा, "बांग्लादेश हमारा पड़ोसी देश है, भारत चाहता है कि बांग्लादेश उसके साथ सांस्कृतिक रूप से जुड़े. हम चाहते हैं कि बांग्लादेश तरक्की करे और आगे बढ़े."
"बांग्लादेश सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद युनूस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में बात भी की है. हम चाहते हैं कि बांग्लादेश हमारे साथ जुड़ा रहे और वहाँ के विकास के लिए साथ काम करें. अगर वे इसके लिए इच्छुक नहीं हैं तो भारत कुछ नहीं कर सकता है."
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों को लेकर दोनों देशों ने अपनी चिंताएं ज़ाहिर की हैं.
इस बीच, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस ने रविवार को राष्ट्र को दिए संदेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन दिया है.
उन्होंने अपने संबोधन में "नए बांग्लादेश" की बात की और कहा, "अलग धर्म या अलग राजनीतिक विचार रखने की वजह से हम किसी के साथ भेदभाव नहीं करेंगे. हम देश के हर सदस्य को एक परिवार में शामिल करना चाहते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















