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उत्तर प्रदेश में वक़्फ़ संशोधन बिल के विरोध में काली पट्टी बांधने का मामला: क्या कह रहे हैं नोटिस पाने वाले लोग?
- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में काली पट्टी बांध कर वक़्फ़ संशोधन क़ानून का विरोध करने वाले लोगों को प्रशासन ने नोटिस भेजा है.
सिटी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी किए गए इस नोटिस में लिखा गया है कि जुमे की नमाज़ के दौरान और ईद की नमाज़ के दौरान काली पट्टी बांधकर विधेयक का विरोध किया गया था.
नोटिस के मुताबिक़ इससे शांति व्यवस्था भंग हो सकती थी.
सिटी मजिस्ट्रेट ने नोटिस में इन लोगों को 16 अप्रैल 2025 को पेश होकर दो लाख रुपये का बॉन्ड और इतनी ही धनराशि के दो ज़मानत दाखिल करने का आदेश दिया है.
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लखनऊ में समाजवादी पार्टी की नेता सुमैया राना को भी पुलिस ने 10 लाख रुपये का बॉन्ड भरने का नोटिस दिया है.
सुमैया राना ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि उन्हें घर में नज़रबंद कर दिया गया था. हालांकि इस मामले पर पुलिस विभाग कुछ नहीं कह रहा है.
नाम ना बताने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने ये ज़रूर कहा कि उनको नोटिस दिया गया था.
लेकिन वक़्फ़ विधेयक पास हो जाने के बाद कई पुलिस वाले सुमैया राना के घर के बाहर बैठे हुए दिखाई दिए थे.
सुमैया राना ने पुष्टि की है कि उन्हें नोटिस भेजा गया है, जिसे वे अदालत में चुनौती देंगी.
सुमैया राना ने सीएए-एनआरसी के विरोध प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया था. सुमैया मशहूर शायर मुनव्वर राना की बेटी हैं.
क्या है मामला?
मुज़फ़्फ़रनगर का मामला वक़्फ़ विधेयक पास होने से पहले का है. वहीं लखनऊ का मामला विधेयक पास हो जाने के बाद का है.
मुज़फ़्फ़रनगर में रमज़ान के आख़िरी जुमे के दिन लोगों ने काली पट्टी बांध कर नमाज़ पढ़ी थी.
कई लोगों ने ईद की नमाज़ के दौरान भी काली पट्टी बांधकर विधेयक का विरोध किया था.
नोटिस मिलने के बाद शहर में काफ़ी आक्रोश है. कई लोगों का कहना है कि उन्होंने कोई प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग किया है.
वक़्फ़ संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ पिछले एक सप्ताह से मस्जिद और मदरसों में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अपील पर मुसलमानों ने काली पट्टी बांधकर विरोध जताया था.
नोटिस मिलने के बाद स्थानीय निवासी फ़ख़रुद्दीन ने बताया, "हमें ज़िला प्रशासन की ओर से एक नोटिस भेजा गया है, जिसमें लिखा है कि आपने काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया है."
"हम लोग तो मस्जिद के अंदर काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण तरीक़े से प्रदर्शन कर रहे थे. मस्जिद के बाहर कोई प्रदर्शन नहीं कर रहे थे. लेकिन प्रशासन ने नोटिस भेज दिया है."
फ़ख़रुद्दीन ने कहा, "वक़्फ़ क़ानून के ख़िलाफ़ सबको अपनी बात कहने का अधिकार है. ऐसा लग रहा है कि बादशाही हुकूमत चल रही है. हम कोई अपराधी या हिस्ट्रीशीटर तो हैं नहीं, जो हमारे पास नोटिस भेज दिया गया."
नोटिस पाने वाले मोहम्मद शब्बीर ने बताया, "हमारे शांतिपूर्ण प्रदर्शन को लेकर ज़िला प्रशासन ने नोटिस भेज दिया. उसमें लिखा है कि आपने लोगों को भड़काने वाला काम किया है. आगामी 16 तारीख़ को ज़िला मजिस्ट्रेट के यहाँ हमें बुलाया गया है. हमने किसी को नहीं भड़काया, बल्कि ख़ामोशी के साथ काली पट्टी बांधकर मस्जिद के अंदर अपना विरोध प्रदर्शन किया था."
इस तरह का नोटिस इलाक़े के कई लोगों के पास आया है.
मुज़फ़्फ़रनगर के मदरसा महमूदिया के प्रधानाचार्य नईम त्यागी ने बताया, ''मेरे पास भी एक पुलिस वाले का फ़ोन आया था कि आप मदरसे में आ जाइए. मैं मदरसे में आया, तो पुलिस वाले ने मुझे वारंट पकड़ा दिया."
"पुलिस वाले ने कहा कि तुम्हारे ख़िलाफ़ नोटिस जारी किया गया है. उसने कहा कि आपने काली पट्टी बांधे हुई थी. जबकि मैंने काली पट्टी नहीं बांधी थी और ना ही मैंने किसी को देखा कि किसी ने मदरसे के अंदर काली पट्टी बांधी हुई है."
त्यागी का कहना है कि मदरसे में लगभग चार-पाँच हज़ार लोग जुमे की नमाज़ पढ़ते हैं. अब यह भी नहीं पता कि किसने काली पट्टी बांधी थी और किसने नहीं.
प्रशासन का क्या कहना है
ये नोटिस सिटी मजिस्ट्रेट विकास कश्यप की तरफ़ से दिया गया है. लेकिन ऐसा नोटिस पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर दिया जाता है.
सहारनपुर मंडल के डीआईजी अजय साहनी का कहना है कि मंडल के सभी ज़िलों मे सोशल मीडिया के ज़रिए ग़ैरक़ानूनी बात फैलाने के आरोप में कई लोगों को नोटिस भी दिया गया है और कार्रवाई भी हो रही है.
वहीं मुज़फ़्फ़रनगर के एसपी सिटी सत्यनारायण प्रजापति ने इस विषय पर मीडिया से कहा, ''सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पहचान की गई है. इसके बाद 300 लोगों को नोटिस दिया गया है. पुलिस अन्य लोगों की पहचान करने का प्रयास कर रही है."
"पुलिस रिपोर्ट के आधार पर सिटी मजिस्ट्रेट विकास कश्यप ने नोटिस जारी किए हैं. इसमें प्रदर्शनकारियों से 16 अप्रैल को अदालत में पेश होने के बाद 2-2 लाख रुपये का मुचलका भरने को कहा गया है."
उन्होंने बताया कि जिन लोगों को नोटिस जारी किया गया है, वो लोग 28 मार्च को वक़्फ़ संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हुए विभिन्न मस्जिदों में रमज़ान के अलविदा जुमे की नमाज़ के दौरान काली पट्टी बांधे हुए थे.
वक़्फ़ संशोधन क़ानून को लेकर विवाद
वक़्फ़ क़ानून के ख़िलाफ़ कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं.
कांग्रेस के किशनगंज से सांसद मोहम्मद जावेद और एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.
इससे पहले इस विधेयक को लेकर संसद से सड़क तक विरोध देखा गया. राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद अब यह क़ानून बन चुका है.
इस क़ानून में वक़्फ़ बोर्ड की संरचना, संपत्ति के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कई अहम बदलाव किए गए हैं.
सरकार का कहना है कि वक़्फ़ संपत्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए ये ज़रूरी क़दम हैं.
वहीं विपक्षी दलों का तर्क है कि यह क़ानून अल्पसंख्यकों की धार्मिक आज़ादी पर हमला है.
सांसद मोहम्मद जावेद की ओर से याचिका दाख़िल करने वाले वकील अनस तनवीर ने बीबीसी को बताया, "वक़्फ़ संशोधन क़ानून का मूल स्वरूप मुस्लिमों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. यह संविधान के अनुच्छेद 14, 25(डी), 26 और 300 (ए) के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इसके अमल में आने से सरकार का हस्तक्षेप मुसलमानों के वक़्फ़ में बढ़ जाएगा."
क़ानून के मुताबिक़ वक़्फ़ बोर्ड और सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल की संरचना में बदलाव किया गया है. इसमें अब ग़ैर मुस्लिम सदस्यों को भी शामिल किया गया है.
वक़्फ़ संपत्तियों के सर्वे का अधिकार वक़्फ़ आयुक्त की जगह पर ज़िले के कलेक्टर को दे दिया गया है.
सरकार के कब्ज़े वाली ज़मीनों पर विवाद की स्थिति में कलेक्टर के आदेश को अंतिम माना गया है.
जो संपत्ति धार्मिक कार्यों के लिए इस्तेमाल में थी (वक़्फ़ बाय यूज़र), उसे अब वक़्फ़ नहीं माना जाएगा. नए प्रावधान में इसे हटाया गया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित